कोरोना की महामारी और तकनीक प्रवीण आचार्यों की तैयारी


 -डी० रामकृष्ण राव

विश्वव्यापी कोरोना महामारी की अचानक आ गई समस्या से व्यापक लॉकडाउन के परिणामस्वरूप सामाजिक दूरी अपनाने को बाध्य कर दिया है। इन परिस्थितियों में शैक्षिक संस्थाओं का संचालन लगभग असंभव है क्योंकि उसके लिए छात्रों-आचार्यों तथा अन्य कार्यकर्ताओं का एकत्रीकरण होता है। इस असुविधा का सामना नवीन तकनीक का उपयोग करके ऑनलाइन वेब आधारित वीडियो कांफ्रेंसिंग के उपकरणों का प्रयोग करके आचार्यों तथा विद्यार्थियों के मध्य वार्तालाप द्वारा किया जा सकता है।

उपलब्ध तकनीक

आज अनेक वीडियों कांफ्रेंसिंग उपकरण उपलब्ध है जोकि विद्यालय शिक्षकों के लिए उपयोगी हो सकते हैं। कुछ प्रमुख नाम है –  ZOOM, Web Ex, Team Viewer, Google Hangout, MS Team, Go to Meeting आदिइन सभी में लगभग 100 प्रतिभागी हो सकते है तथा इन पर HD Audio, Video, Screen Sharing, White Boards तथा Break out rooms आदि सुविधाएँ उपलब्ध हैं। कोरोना आपदा को ध्यान में रखते हुए ZOOM ने अपनी पहले से चली आ रही 40 मिनट की सीमा को समाप्त कर दिया है।

शिक्षकीय गुणवत्ता का विकास

ऑनलाइन कक्षा/ई-पाठशाला या आभासी कक्षाओं (VIRTUAL Classes) के संचालन का मूल आधार है आचार्य बंधुओं में तकनीक कके उपयोग करने की मानसिकता, क्षमता और दक्षता का विकास तथा इन परिस्थितियों से अनुकूलता स्थापित करने  वाली अधिगम पद्धति की स्वीकार्यता। उनके सम्मुख बड़ी चुनौती है कि चर्चा, गतिविधि, सामूहिक क्रियाकलाप युक्त रोचक तथा तनावमुक्त शैक्षिक सत्र ऑनलाइन कैसे चलाये जायें। उनके सामने उन विद्यार्थियों से संवाद करने की भी चुनौती है जो कि इस ऑनलाइन पद्धति के लिए एक प्रकार से पहली पीढ़ी के विद्यार्थी है तथा इस नई पद्धति को स्वीकार करने जा रहे हैं। उन्हें इस बात का भावनात्मक सहारा देना है, प्रोत्साहित करना है और विश्वास दिलाना है कि आज जो यह ‘नया’ है, आने वाले कल में यही ‘सामान्य ‘ होने वाला है।

चूँकि विद्यार्थी लम्बे समय तक स्क्रीन के सामने बैठने और अध्ययन करने के अभ्यस्त नहीं हैं, वे थकान और ऊब अनुभव कर सकते हैं। इसलिए विद्यालयों और शिक्षकों को इस प्रक्रिया में मूल्यसंवर्धन करने की आवश्यकता होगी ताकि नीरसता उत्पन्न न हो। छोटी प्राथमिक कक्षाओं में कला, हस्तकौशल, गीत-संगीत-नृत्य-अभिनय, खेल, कथा-कहानी आदि मजेदार गतिविधियों को स्थान दिया जा सकता है। माध्यमिक तथा उच्च कक्षाओं में शिक्षक अपने उस दिन के विषय से सम्बंधित रोचक तथ्य बता सकते है या तात्कालिक प्रतियोगिताएं आयोजित कर सकते हैं। इससे विद्यार्थीं उत्साहपूर्वक इन कार्यक्रमों में सहभागी होंगे, उनकी रुचि बनी रहेगी और शिक्षकों को भी प्रतभाव (feedback) मिल सकेगा कि उनके द्वारा प्रस्तुत विषय उनके छात्रों को कितना हृदयंगम हुआ, उन्होंने कितना सीखा?

सभी हितग्राहियों (Stakeholders) का सहयोग

ऑनलाइन कक्षाओं के संचालन में पाश्र्वभूमि की तैयारी अत्यंत महत्त्व की है। विद्यालय के प्रधानाचार्य, विषय प्रमुख तथा शिक्षक, दिनचर्या प्रमुख, स्त्रोत केंद्र तथा संचार माध्यम का प्रयोग करने वाली टोली सभी के बीच कुशल समन्वय आवश्यक है। प्रक्रिया के सफल संचालन करने और उसे परिणामदायक बनाने के लिए अभिभावकों को इस गतिविधि के विषय में मौखिक या लिखित जानकारी देने की भी आवश्यकता है। यदि अभिभावकों के साथ अच्छे सम्बन्ध सम्पर्क हों तो वे न केवल सहभागी बनते हैं बल्कि फोटो आदि के साथ अपना प्रतिभागी तथा अन्य सहयोग भी देते हैं। समुचित सम्पर्क, समन्वय सहयोग और समझदारी द्वारा चालाई गई ऑनलाइन कक्षाओं से श्रेष्ठतम परिणाम अनुभव में आ सकते हैं।

ऑनलाइन शिक्षण के लाभ

ऑनलाइन कक्षाओं के माध्यम से शिक्षण का सबसे बड़ा लाभ विद्यार्थियों को यह मिलता है कि वे कभी-भी और कहीं भी अपनी रुचि और सुविधा के अनुसार सीख सकते है और अपने पाठों को रिकॉर्ड कर सकते हैं। स्वाध्याय की दृष्टि से वे उन पाठों को बाद में कितनी भी बार पढ़ सकते हैं। अनुसंधानों से सिद्ध हुआ है कि विद्यार्थी ऑनलाइन कक्षाओं के माध्यम से बेहतर सीखते हैं, क्योंकि वे अपनी व्यक्तिगत गति से सीख सकते हैं। उन्हें पूरी कक्षा की गति से तालमेल बैठाने की आवश्यकता नहीं होती।

स्त्रोत केंद्र की स्थापना तथा साइबर–सुरक्षा

सरकार ने दूरस्थ गाँवों और जनजातीय क्षेत्रों तक भी तकनिकी दृष्टि से फाइबर-नेट सुविधा पहुँचा दी है। अभिभावकों से आग्रह किया जाना चाहिए कि बच्चों को सीखने की दृष्टि से व्यवधान रहित वातावरण घर में उपलब्ध कराये तथा इन्टरनेट की समुचित व्यवस्था कर दें। विद्यालयों तथा विद्यार्थियों को इस बात का ध्यान रखना होगा कि प्रक्रिया में अनाधिकृत व्यक्तियों को प्रवेश न करने दे। विद्यालय को यह भी देखना होगा कि पाठ्यसामग्री के समुचित संग्रहण की व्यवस्था रहे ताकि आवश्यकता पड़ने पर इस रिकार्डेड सामग्री का उपयोग संदर्भ, दोहरान के साथ-साथ शिक्षकों के मूल्याङ्कन तथा गुणवत्ता विकास के लिए भी किया जा सके। इन रिकार्डेड पाठों की प्रान्त केन्द्रों पर एक संग्रह व्यवस्था बनाई जा सकती जहाँ उनकी विषयवस्तु की जाँच, गुणवत्ता वृद्धि तथा आचार्य विकास कार्यक्रमों की आधार भूमि के लिए उपयोगिता हो सकती है।

दोष रहित ऑनलाइन अधिगम

अपनी उपयोगिता, सरलता, लोकप्रियता तथा ‘कभी भी-कहीं भी’ सीखने की सुविधा के कारण ऑनलाइन शिक्षण आज के शिक्षा जगत में किसी क्रांति से कम नहीं है। शिक्षाविद् इसे आज की आवश्यकता और भविष्य के लिए सर्वसामान्य स्थिति मान रहे हैं जिसके लिए हम शिक्षा जगत के कार्यकर्ताओं की सिद्धता आवश्यक है।

विद्यालयों को लगातार पाँच दिनों के लिए इन ऑनलाइन कक्षाओं का दिनक्रम बनाना चाहिए। प्रतिदिन एक निर्धारित समय पर विद्यार्थी अपने घर से ही एक एंड्रायड फोन के माध्यम से इन कक्षाओं में जुड़ सकेंगे। सप्ताह के शेष दो दिन आचार्यों तथा अभिभावकों के बीच संवाद के लिए रखने चाहिए, जिसकी उन्हें आवश्यकता रहने वाली है। ऑनलाइन कक्षाओं के संचालन और उनके माध्यम से सीखने-सिखाने की प्रक्रिया का अनुभव जिन शिक्षकों ने लिया है, वह न केवल रोचक और उत्साहजनक रहा है बल्कि कहीं-कहीं तो कुछ मेधावी तथा तकनीक के अभ्यासी विद्यार्थियों ने स्वयं को ही शिक्षक की भूमिका में लाने के योग्य क्षमता विकसित कर ली है।

मूल्य संवर्द्धन

इस सम्पूर्ण अधिगम प्रक्रिया को और अधिक उत्तरदायी, रोचक, रचनात्मक तथा नवाचारी बनाने के लिए हमारे शिक्षक बंधुओं को न केवल नवीनतम विषयवस्तु को विभिन्न स्त्रोतों से संग्रह करने का अभ्यास चाहिए, बल्कि एकत्र सामग्री को रोचक तथा ग्राह्य पद्धति से प्रस्तुत करने की क्षमता भी विकसित करनी चाहिए। इससे शिक्षक बंधुओं की शैक्षिक गुणवता नवीनतम जानकारी के माध्यम से अधिक निखरेगी।

विद्या भारती तथा कोरोना महामारी

विद्या भारती एक विस्तृत राष्ट्रीय आन्दोलन है जो वर्तमान शिक्षा प्रणाली में आमूलभूत परिवर्तन कर उसे अधिक उपयोगी सार्थक तथा भविष्योंन्मुखी बनाने का प्रयास कर रहा है ताकि शिक्षा भारतीय जीवन मूल्यों, सांस्कृतिक, दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक तथा समाजिक अधिष्ठान पर आधारित हो, सर्वांगीण बाल विकास की ओर केन्द्रित हो तथा नवीनतम शैक्षिक पद्धतियों का प्रयोग करते हुए वैश्विक चुनौतियों में अपना अपना स्थान बना सके। कोरोना नामक इस जागतिक आपदा के दौरान विद्या भारती को ऐसी दोषरहित ऑनलाइन शिक्षण पद्धति को अपनाना होगा ताकि कोरोना का प्रभाव समाप्त होकर परिस्थितियों के सामान्य होने तक छात्र घरों पर रहकर भी अपना अध्ययन कार्य निर्बाध जारी रख सकें।

डिजिटल बनें, नवाचार करना सीखे

शैक्षिक संस्थाओं में तकनीकी परिवर्तन की दिशा में धीमीगति चिंताजनक हैं। केवल डिजिटल साक्षरता ही नहीं बल्कि अपनी योग्यता, क्षमता, गुणवत्ता तथा व्याप बढाने के लिए भी विद्या भारती को लॉकडाउन की इस अवधि का सदुपयोग करना चाहिए। अनेक नगरीय ग्रामीण तथा जनजातीय क्षेत्रों में स्थित विद्यालय अपने सीमित संसाधनों में भी आत्मविश्वासपूर्वक ऑनलाइन शिक्षण के अच्छे प्रयोग संचालित कर रहे हैं। एक प्रकार से इस वैश्विक आपदा ने हमारे आचार्यों तथा विद्यार्थियों को अपनी कार्यक्षमता बढ़ाने तथा अधिक रचनात्मक, नवाचारी और दिन प्रतिदिन बदलते हुए इस विश्व के साथ कदम बढाने की क्षमता विकसित करने का शुभ अवसर उपलब्ध करा दिया है।

4G तथा 5G तकनीकों का शैक्षिक जगत में प्रयोग निश्चित रूप से तथाकथित Internet of Thing (IOT) आधारित एप्लीकेशन के एकीकरण, डिजिटल प्रयोगशालाओं के विकास, स्मार्ट कक्षाओं की स्थापना के माध्यम से सीखने-सिखाने की वर्तमान प्रणाली को व्यापक रूप से प्रभावित करने वाला है। इन आवश्कताओं को ध्यान में रख कर प्रान्तों के स्तर पर एक सूचना-संचार प्रोद्योगिकी प्रकोष्ठ (ICT CELL) की स्थापना और उसके माध्यम से तकनीक आधारित शैक्षिक गतिविधियों के उपयोग पर प्रशिक्षण कार्यक्रमों के आयोजन को प्राथमिकता देनी होगी।

शिक्षक केवल उपभोक्ता नहीं, विषयवस्तु के रचनाकार बनें

शिक्षकों को 21वीं शताब्दी के लिए अपरिहार्य चार कौशलों का विकास करना होगा – समीक्षात्मक चिन्तन, संवाद कौशल, समन्वय तथा रचनात्मकता। शिक्षक केवल ज्ञान के उपभोक्ता बन कर सफल नहीं हो सकते, उन्हें स्वयं पाठ्यवस्तु का व्यापक अध्ययन कर रचनाकार (Content Creator) बनना होगा। आज की परिस्थितियों में विषयवस्तु असंख्य स्त्रोतों से उपलब्ध हो सकती है केवल हम में अपने उपयोग की सामग्री की खोजी दृष्टि और उसे उचित प्रकार से प्रस्तुत करने की क्षमता चाहिए। प्रमुख स्त्रोत हैं –

NCERT का e-pathshala portal जिस पर 1886 Audio, 2000 से अधिक Video, 696 e-books तथा 504 flipbook उपलब्ध हैं।

मानव संसाधन विकास मंत्रालय के पोर्टल जैसे – Swayam, Sakshat, swayamprabha, Virtual Lab, Talk to Teacher, Spoken Tutorial, e-kalpa आदि।

स्त्रोत अन्य भी हैं किन्तु शिक्षक को स्वयं की विश्लेषण क्षमता, बुद्धिमत्ता तथा विचार कौशल द्वारा ही पाठ्य सामग्री का चयन, उपयोग तथा प्रस्तुतिकरण करना होगा। इसके लिए योजनाबद्ध, व्यवस्थित प्रशिक्षण की आवश्यकता होगी।

प्रशिक्षण व्यवस्था

डिजिटलीकरण की प्रक्रिया में ई-लर्निंग तथा ऑनलाइन शिक्षण के लिए मानसिकता तैयार किया जाना बहुत महत्त्वपूर्ण है। अत: इस प्रक्रिया में सहभागी सभी हितग्राहियों के लिए सघन प्रशिक्षण कार्यक्रमों के आयोजन की आवयश्कता है। इसके लिए सबसे पहले Master trainers तथा Resoure Persons की आवश्यकता होगी। प्रशिक्षण विभाग को Micro Level Concept के लिए Modules तैयार करने होंगे। विद्वत परिषद के सहयोग से स्वाध्याय हेतु सामग्री विकसित की जा सकती है।

प्रशिक्षण कार्यक्रमों का आयोजन आवधिक करना होगा, समय-समय पर पुनश्चर्या करानी होगी ताकि कौशल विकास होता रहे, समस्या-जिज्ञासा समाधान समय पर हो जाए तथा इस मार्ग की समस्त चुनौतियों का सफलतापूर्वक सामना किया जा सके।

विद्या भारती ई-पाठशाला

विद्या भारती ने ई लर्निंग की सामग्री के निर्माण के उद्धेश्य से भोपाल को केंद्र बनाकर 2017 से एक विनम्र प्रयास प्रारंभ किया। विद्या भारती ई-पाठशाला को सक्षम कार्यकर्ताओं की एक टोली संचालित कर रही है। अब तक प्रस्तुत किए गए विषयवस्तु को अद्यतन करने, उसे उपयोगी बनाने, उपयोगकर्ता के लिए सरल बनाने तथा उसमें भारतीय मूल्यों को समुचित स्थान देने के लिए विषयश: विशेषज्ञों की टोली बनाने की आवश्यकता है। वर्तमान में यह ई-पाठशाला केवल हिंदी में विषयवस्तु प्रदान कर रही है किन्तु आवश्यकतानुसार इसे क्षेत्रीय भाषाओं में भाषांतरित या पुनर्रचित किया जा सकता है।

विद्या भारती ई-पाठशाला की विषयवस्तु और अधिक उपयोगी प्रभावी तथा गुणवत्तायुक्त बनाने की आवश्यकता है ताकि विद्या भारती के अलावा अन्य विद्यालय भी इसका स्वागत करें। इसके लिए हमें इस क्षेत्र के विशेषज्ञों के परामर्श से अन्यतम प्रयास करने होंगे। समाज तथा शैक्षिक जगत विद्या भारती की ओर आशा भरी दृष्टि से देख रहा है।

भविष्य में एकमेव मार्ग

यह सत्य है कि तकनीक के प्रयोग से शिक्षक की महता न तो कम हो सकती है, न उनका स्थान तकनीक ले सकती है। किन्तु समय की आवश्यकता को पहचानते हुए हमें तकनीक को अपना सहयोगी बनाना होगा। हमारे शिक्षक और उनकी शिक्षण पद्धति कालबाह्य न हो जायें, हमारी नई पीढ़ी की शिक्षा की इस नई एवं रूपांतरित व्यवस्था को स्वीकार तथा स्वयं आगे बढ़ कर उपयोग करने की मानसिकता के साथ हमें शिक्षकों की विश्वसनीयता को बनाए रखने के लिए अंत:करणपूर्वक प्रयास करने होंगे।

(लेखक विद्या भारती अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान के अखिल भारतीय अध्यक्ष है।)

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