महामना मदनमोहन मालवीय का दीक्षान्त भाषण – 14 दिसम्बर 1929 (भाग चार)

 – अवनीश भटनागर

भाषा के रूप में अंग्रेजी

मातृभाषा और राष्ट्रीय विकास में उसकी भूमिका की बात कहने के बाद भी महामना एक भाषा के रूप में अंग्रेजी के महत्व को कम नहीं आँकते। ज्ञान प्राप्त करने के माध्यम के रूप में भाषा की महत्ता है और इसीलिए वे उच्च शिक्षा के लिए विदेश जाने वालों को अंग्रेजी भाषा का पूर्ण ज्ञान प्राप्त करने और साथ ही जर्मन और फ्रेंच भी सीखने की सलाह देते हैं। वे कहते हैं, “यह भाषा मनुष्य समाज में व्यापारिक भाषा के रूप में देखी जाती है और व्यावहारिक व्यापार में इसको गौण भाषा के रूप में सीखना बेहतर है। किंतु हमें उसे ऐसा मुख्य स्थान नहीं देना चाहिए जैसा कि आज यह हमारी शिक्षा प्रणाली, सार्वजनिक राज्य प्रबंध और व्यापारिक संसार में जमाए बैठी है। राष्ट्रीय भाषाओं को न अपनाने के कारण हमारी कितनी क्षति और कितना अधोपतन हुआ है इसका वर्णन नहीं हो सकता।”

महामना अंग्रेजी प्रेमी लोगों को स्मरण कराते हैं कि जिस अंग्रेजी भाषा और साहित्य की संपन्नता का वे अभिमान करते हैं, वह स्वयं इंग्लैंड में ही उपेक्षित थी। चैदहवीं सदी के मध्य तक इंग्लैंड में फ्रेंच को अभिजात्य वर्ग की भाषा माना जाता था। ग्रीन की पुस्तक ‘शॉर्ट हिस्ट्री ऑफ इंग्लिश पीपुल’ के इस अंश का महामना अपने भाषण में उल्लेख करते हैं, “चैदहवीं शताब्दी के मध्य में स्वतंत्रता के लिए जो संघर्ष नॉरमन वंश के अंतिम राजाओं के काल में हुआ था, उसके पराकाष्ठा पर पहुंचने पर विजित तथा विजेता के बीच आपसी संपर्क के प्रभाव से उच्च वर्ग में भी फ्रेंच भाषा का उपयोग बंद हो गया। व्याकरण-पाठशाला तथा नई भाषा सीखने के फैशन के कारण एडवर्ड तृतीय से उसके पौत्र के राज्यकाल तक अंग्रेजी भाषा ने उन्नति की।”

इस परिवर्तन का परिणाम हुआ कि शेक्सपियर और मिल्टन जैसे कवियों-लेखकों ने साहित्य रचना अंग्रेजी में की और बाइबिल का अंग्रेजी में अनुवाद हुआ। यहां महामना मालवीय जी एक अत्यंत तर्कसंगत बात इन शब्दों में श्रोताओं के सामने रखते हैं, “ध्यान दीजिए कि अंग्रेजी भाषा की कितनी क्षति हुई होती यदि अंग्रेजी उसी प्रकार तिरस्कृत रहती जैसी कि वह 1382 ई. में थी? उसी प्रकार हिंदी तथा अन्य राष्ट्रीय भाषाओं की ओर पर्याप्त ध्यान न देने के कारण तथा उनको राष्ट्रीय शिक्षा और पारस्परिक व्यवहार का माध्यम न बनाने के कारण भारतीय भाषाओं के साहित्य के विकास में कितनी क्षति हुई है? अंग्रेजी भारतवर्ष की राष्ट्रीय भाषा कभी नहीं हो सकती। 75 वर्ष की अंग्रेजी शिक्षा के बाद भी यहां की जनसंख्या का केवल 0.89 प्रतिशत ही अंग्रेजी जानता है। …जब तक अंग्रेजी भाषा भारत की कचहरी, दफ्तरों, संस्थाओं, स्कूल-कॉलेजों, विश्वविद्यालयों में अपना वर्तमान प्रमुख स्थान धारण किए रहेगी, तब तक हिंदी राष्ट्रीय जीवन में उचित स्थान नहीं प्राप्त कर सकती और राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली का विकास भी नहीं हो सकता।”

राष्ट्रीय शिक्षा और स्वराज्य

भारत में शिक्षा की दुरावस्था के कारणों का वर्णन करने के बाद मालवीय जी श्रोताओं के विचार हेतु एक महत्वपूर्ण प्रश्न रखते हैं कि जब भारत और इंग्लैंड के सम्राट और नियम बनाने वाली पार्लियामेंट एक ही हैं तो दोनों देशों के बीच शिक्षा की स्थिति में इस अंतर का मूल कारण क्या है? वही शासन इंग्लैंड में प्रारंभिक शिक्षा को अनिवार्य और निशुल्क करता है, देश की आवश्यकता की पूर्ति के लिए शिल्प-कलाओं की शिक्षा की व्यवस्था करता है और शिक्षा के माध्यम से अपने देश को उन्नतिशील देशों की उच्च सीढ़ी पर खड़ा करता है किंतु 1910 ईस्वी में गोपाल कृष्ण गोखले द्वारा प्रस्तुत अनिवार्य शिक्षा के प्रस्ताव के बाद से अब (1929) तक भारत में यह व्यवस्था नहीं करता। क्यों?

मालवीय जी स्वयं ही इसका उत्तर सुझाते हैं, “इस भिन्नता का एकमात्र कारण है ब्रिटिश पार्लियामेंट स्वयं को इंग्लैंड की जनता का संरक्षक मानती है किंतु भारतीय जनता का नहीं। यह सच है कि विजेता विदेशी सरकार विजित देश की जनता की उतनी चिंता नहीं करती, जितनी स्वदेशी सरकार कर सकती है।”

राष्ट्रीय शिक्षा के विकास के सर्वाधिक महत्वपूर्ण प्रश्न पर मालवीय जी का सुझाव है कि राष्ट्रीय सरकार का गठन हो और सबसे पहले देश के प्रमुख आचार्यों की सभा यह विचार करे कि भारत में राष्ट्रीय शिक्षा के लिए किस प्रकार की नीति का अवलंबन किया जाए? यह सभा अन्य राष्ट्रों के अनुभव से लाभ लेकर ऐसा तर्कसंगत शैक्षिक कार्यक्रम तय करे जो देश की आवश्यकताओं के अनुकूल हो और जो भारतीय मस्तिष्क को योग्यता अनुसार श्रेष्ठतम परिणाम दिला सके।

स्त्री शिक्षा

मालवीय जी स्त्रियों की शिक्षा को पुरुषों की शिक्षा से भी अधिक महत्वपूर्ण मानते हैं, क्योंकि वह भारत की भावी संतानों की माता और प्रथम शिक्षिका हैं। वह महिलाओं को प्राचीन साहित्य तथा संस्कृति के ज्ञान से लेकर वर्तमान ज्ञान-विज्ञान, कला, संगीत की शिक्षा देकर उनकी शारीरिक, मानसिक, नैतिक तथा आध्यात्मिक उन्नति देखना चाहते हैं। वह सावित्री, अरुंधति, मैत्रेयी, लीलावती आदि प्राचीन काल की श्रेष्ठ नारियों, सुराज्य प्रबंध करने वाली देवी अहिल्या और लक्ष्मी बाई जैसी श्रेष्ठ नेतृत्वकर्ता आदि सभी प्रकार के गुण विकसित करने वाली स्त्री शिक्षा का विचार करने के लिए राजनीतिज्ञों और विद्वानों को साथ मिलकर योजना बनाने का सुझाव देते हैं।

देशभक्ति की शिक्षा

महामना राष्ट्रीय उत्थान के लिए अध्यापक की भूमिका को बहुत महत्वपूर्ण मानते हैं क्योंकि अध्यापक अपने छात्रों को चाहे जिस ओर मोड़ सकते हैं। यदि अध्यापक देशभक्त हैं, राष्ट्र के प्रति अपने उत्तरदायित्व को समझते हैं तो अगली पीढ़ी को वैसा ही तैयार कर देंगे। जर्मनी, फ्रांस, अमेरिका तथा इंग्लैंड ने अपनी शिक्षा प्रणाली के माध्यम से ही राष्ट्रीय शक्ति और दृढ़ता का निर्माण किया है। इसमें मालवीय जी जापान के उदाहरण को अन्यतम मानते हैं जिसने देशभक्ति और शिक्षा के आधार पर न केवल सब प्रकार की उन्नति की है बल्कि इसी शक्ति के बल पर चीन और रूस जैसे देशों को परास्त भी किया है।

महामना कहते हैं, “भारतवर्ष को इसी प्रकार की राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली की आवश्यकता है जो हमारी युवा पीढ़ी को राष्ट्रीय चरित्र, देशभक्ति और राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व का बोध कराये जिससे संतोषजनक परिणाम प्राप्त होंगे।”

(लेखक विद्या भारती के अखिल भारतीय मंत्री और संस्कृति शिक्षा संस्थान कुरुक्षेत्र के सचिव है।)

और पढ़ें : महामना मदनमोहन मालवीय का दीक्षान्त भाषण – 14 दिसम्बर 1929 (भाग तीन)

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