बाल केन्द्रित क्रिया आधारित शिक्षा-17 (भाषा कौशल में श्रवण, कथन व वाचन)


यदि यह पूछा जाए कि बालक सबसे पहले क्या बोलना सीखता है, तो उत्तर आएगा ‘माँ’ बोलना। बालक ‘माँ’ बोलना नहीं सीखता, वह अनुकरण करता है। माँ जब उसे कहती है कि वह माँ बोले तो वह माँ के होठों को देखता है और वैसा ही करने का प्रयास करता है। उसी प्रयास में  ‘म’ की ध्वनि निकलती है। बालक को अनुकरण की आदत होती है।

भाषा के दो स्वरूप हैं – एक ध्वनि स्वरुप, दूसरा वर्ण स्वरुप। मौखिक भाषा ध्वनि स्वरुप है, लिखित भाषा वर्ण स्वरुप है। लिखित भाषा वर्ण स्वरूप है। भाषा की परिभाषा है ‘या भाष्यते सा भाषा’। जो हम बोलते है वही भाषा है। भाषा सीखना अर्थात् अच्छा बोलना, अच्छा व सही लिखना सीखना है। भाषा के मुख्य चार कौशल हैं – दो ध्वनि स्वरुप के और दो वर्णस्वरूप के। ध्वनि स्वरुप के दो कौशल हैं – सुनना (श्रवण) एवं  बोलना (कथन); वर्ण स्वरूप के दो कौशल हैं – पढ़ना (वाचन) व लिखना (लेखन)।

कथन श्रवण का अनुसरण करता है। इसी प्रकार जो बालक सुनता है वही बोलता है। घर में माता-पिता व घर के अन्य सदस्यों से जो भी सुनता है वही बोलने का प्रयास करता है। प्राकृतिक दृष्टि से भाषा सीखने की प्रारंभिक पद्धति अर्थात् पहला चरण श्रवण है। जितना अधिक सुनेगा उतना ही बालक जानेगा। इसलिए शैशवकाल में वह अच्छा सुने इसका ध्यान रखना आवश्यक है। कभी-कभी बालक अपशब्द बोलता है तो आचार्य व अभिभावक को लगता है कि उसने इतनी कम आयु में अपशब्द कहाँ से सीखे? किसी से सुने होंगे तभी वह अपशब्द बोलता है। बालक अच्छे गीत, कविताएँ, कहानी, जीवन प्रसंग सुने ऐसी योजना हो। बालक जैसा श्रवण करेगा वैसा ही कथन करेगा।

जो गीत, कविता, कहानी, जीवन प्रसंग वह श्रवण करे; बालक द्वारा इन्हें कथन का अवसर भी पर्याप्त मिलना चाहिए। जितना अधिक अवसर मिलेगा उतना कथन अच्छा होगा। प्रारम्भ में बालक जैसा सुने वैसा ही बोले। धीरे-धीरे कहानी व जीवन प्रसंग आदि को अपने शब्दों में कहें इससे भाषा अच्छी होती जाती है।

आदर्श कथन व वाचन : यदि बालक का श्रवण, कथन व वाचन अच्छा करना हैं तो आचार्य का कथन अच्छा होना चाहिए। अच्छे कथन व वाचन के लिए सबसे पहले कथन की स्पष्टता हो तथा स्वर इतना उँचा हो कि कक्षा में सभी को ठीक से सुन सके। ठीक से सुनेगा ही नहीं तो समझा में कैसे आएगा। फिर कथन की गति ठीक हो व कथन में यति भी हो। गति यानि इतना धीरे भी न हो कि सुनने का उत्साह ही न रहे और इतनी तेज भी न हो की समझ भी न आए। यति शब्दों में, शब्द समुह में, विराम-चिन्ह के अनुसार व दो वाक्यों के मध्य उसी अनुसार हो। अच्छे कथन में कुछ शब्दों पर बलाघात की आवश्यकता होती हैं। वाक्यों में उतार-चढ़ाव, भावों का ध्यान रखना पड़ता है।

शुद्ध उच्चारण : अच्छे कथन व वाचन के लिए वर्ण, ध्वनि, मात्रा का उच्चारण सिखाया जाना भी आवश्यक है। जैसे ‘स,श,ष’ का ठीक उच्चारण करने में बड़ी संख्या में लोगों की कठिनाई आती है। बड़ी आयु होने पर भी शुद्ध उच्चारण नहीं आ पाता। क्योंकि तीनों वर्णो के ठीक उच्चारण नहीं सिखाया गया। उन्हें सिखाया गया है- स सपेरे वाला, श शलगम वाला, ष षट्कोण वाला। ध्वनि स्थान के साथ नहीं सिखाया गया। इसी प्रकार ‘ज,झ,ग,घ,ड.,त्र,ण,ज्ञ’ का उच्चारण, हस्त्र-दीर्घ का भेद, उच्चारण स्थान आदि भी सिखाया जाए। धीरे-धीरे आम बातचीत में भी शुद्धता के साथ अभ्यास होता रहे। शुद्ध उच्चारण अलग से हो और आम बातचीत अलग तरह से हो, ऐसा नहीं होना चाहिए।

उपरोक्त बातों को ध्यान में रखकर कथन होगा तो वह आदर्श कथन व वाचन कहलाएगा। आचार्य का कथन आदर्श होगा तो बालक द्वारा सुनकर उसका कथन भी आदर्श की ओर जाएगा। शुद्ध उच्चारण के लिए संस्कृत सुभाषित, मंत्र एवं सूत्रों का पाठन उपयोगी सिद्ध होता है। किसी भी उच्चारण दोष को दूर करने की क्षमता संस्कृत भाषा के उच्चारण में है। इसीलिए शुद्ध हिंदी बोलना सीखने के लिए इन सभी का भी अभ्यास करें।

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