भारतीय शिक्षा – ज्ञान की बात 83 (बुद्धि विभ्रम के कारण व परिणाम)

 ✍ वासुदेव प्रजापति

अब तक हमने अंग्रेजी शिक्षा का हमारे मन और बुद्धि पर क्या परिणाम हुआ उसे जाना, अब हम ये जानेंगे कि उन्होंने हमारी बुद्धि को भ्रमित कैसे किया? आखिर वे कौन से कारण थे, जिनसे हमारी बुद्धि भ्रमित हो गई। आओ! उन कारणों को समझने का प्रयत्न करें। रोग के कारणों को पहचान लिया तो रोग भगाना हमारे लिए सरल हो जायेगा।

विजातीय जीवन दृष्टि का आरोपण

बुद्धि अपने विवेक से कार्य करती है। किसी भी घटना, स्थिति या पदार्थ को उसके यथार्थ रूप में जानना ही विवेक है। परन्तु बुद्धि का अधिष्ठान चिति है और आलम्बन जीवन दृष्टि है। चिति देश का मूल स्वभाव है और जीवन दृष्टि उसका बौद्धिक रूप है। देश के स्वभाव और जीवन दृष्टि में एकरूपता होने पर ही यथार्थ बोध होता है। परन्तु हमारे देश की चिति और जीवन दृष्टि में विच्छेद हो गया है, इसलिए हमारी बुद्धि यथार्थ बोध नहीं कर पा रही है।

भारत की जीवन दृष्टि और पश्चिम की जीवन दृष्टि में मूलभूत अन्तर है। भारत आत्मवादी है जबकि पश्चिम देहवादी है। पश्चिम देह को आधार बनाकर सारी बातें देखता है, समझता है और उसके अनुसार व्यवहार करता है। देह पंचभूतात्मक है, पंचमहाभूत जड़ है अर्थात् भौतिक है। इसलिए पश्चिम भौतिकवादी कहलाता है। वह भौतिक दृष्टि से देह के प्रकाश में जीव, जगत व जगदीश को देखता है और वैसा ही व्यवहार करता है। भारत आत्मतत्त्व के प्रकाश में जीव, जगत और जगदीश को देखता है, उसे समझता है, ग्रहण करता है और तदनुसार व्यवहार करता है। इसलिए भारत आत्मवादी है। समस्या यह है कि अंग्रेजी शिक्षा के परिणाम स्वरूप भारत के बौद्धिक क्षेत्र में पश्चिम की भौतिक दृष्टि का साम्राज्य हो गया है। हमने अपनी जीवन दृष्टि को भूलाकर विजातीय जीवन दृष्टि को ओढ़ लिया है। यही बुद्धि विभ्रम का प्रथम मूलभूत कारण है।

दृष्टि बदलने से सारी बातें बदल जाती है। हम सही को गलत और गलत को सही, उचित को अनुचित और अनुचित को उचित मानने लगते हैं। तथा अच्छे को बुरा और बुरे को अच्छा कहने लगते हैं। केवल हमारी दृष्टि बदलती है, स्थिति तो वही की वही बनी रहती है। इसलिए सभी बातों में ऐसी घालमेल हो जाती है कि हमें कुछ सूझता ही नहीं और हम राह भटके हुए राही की भाँति व्यवहार करते हैं।

परार्थी विचार को स्वार्थी बनाया

जीवन दृष्टि बदल जाने से हम स्वार्थी बन गए हैं। अन्यथा भारतीय दृष्टि तो सम्पूर्ण सृष्टि को एकात्म मानने वाली है। व्यक्ति को आत्मरूप मानकर हम सम्पूर्ण सृष्टि के परिप्रेक्ष्य में विचार करते हैं। परन्तु जीवन दृष्टि बदल जाने से अब व्यक्ति को प्रमुख मानकर सृष्टि का विचार करने लगे हैं। सृष्टि व्यक्ति के लिये है, व्यक्ति सृष्टि के लिए नहीं है, यह हमारे व्यवहार का सिद्धान्त बन गया है। भारतीय दृष्टि हमें सिखाती है कि मैं सृष्टि के लिए किस प्रकार उपयोगी बन सकता हूँ। इसके विपरीत पश्चिमी दृष्टि से हमने सीखा है कि मैं मेरे सुख के लिए इस सृष्टि का कैसे व कितना उपयोग कर सकता हूँ। अपनी जीवन दृष्टि बदलने के कारण हमारे विचार और व्यवहार में यह विपरीत परिवर्तन हुआ है।

इस “मैं और मेरे” विचार के परिणामस्वरूप ही शोषण, प्रदूषण जैसे संकटों की परम्परा निर्माण हुई है। पंचमहाभूत हमारे उपभोग के लिए बने हैं, ऐसी समझ हो जाने के कारण भूमि, जल, वायु आदि का हम शोषण करने लगे हैं, फलतः प्रदूषण का संकट खड़ा हुआ है। स्वास्थ्य से सम्बन्धित समस्याएँ पैदा हुई हैं। प्रकृति का संतुलन बिगड़ने के कारण प्राकृतिक आपदाएँ आती हैं। ऋतुचक्र प्रभावित होता है, तापमान अप्राकृतिक पद्धति से घटता-बढ़ता है, जिससे प्राणियों का नाश होता है। समृद्धि का क्षरण होने लगता है। हमारी मूल धारणा इसके लिए कारणभूत होती है, परन्तु यह बात हमारी समझ में बैठती नहीं है। हमें केवल संकट ही दिखाई देते हैं, कारण नहीं दिखाई देते।

विपरीत जीवन दृष्टि ओढ़ लेने के कारण हमारी बुद्धि संकट निवारण के मूल तक न पहूँचकर उन समस्याओं को अधिक विकट बनाने वाले उपाय ही करती है, क्योंकि बुद्धिभ्रमित है। उदाहरण के लिए एक व्यक्ति स्वास्थ्य का विचार न करके विदेशी शीतल पेय कोका कोला पीता है। इसके पीने से एसीडिटी होती है, एसीडिटी दूर करने के लिए दवाई खाता है। उस दवाई को खाने से चक्कर आते हैं और सिरदर्द होने लगता है। अब सिरदर्द भगाने के लिए दूसरी दवाई खाता है, उससे सिरदर्द तो भाग जाता है, परन्तु रक्तचाप बढ़ जाता है। इस प्रकार वह एक के बाद दूसरी, तीसरी दवाइयाँ लेता रहता है, परेशान होता है, सबसे शिकायत करता है, परन्तु कोका कोला पीना नहीं छोड़ता। यदि वह केवल एक बात कर ले तो शेष सभी बातें स्वतः निर्मूल हो जायेगी, यह उसकी बुद्धि में नहीं आता। उसी प्रकार हम अपनी दृष्टि ठीक कर लें तो सभी समस्याएँ ठीक हो जायेंगी। परन्तु हमें तो विजातीय दृष्टि ही सही लगती है।

केवल अपने सुख को चाहना

हमने व्यक्तिवादी विचार को अच्छे-अच्छे शब्दों से निरूपित कर अपने संकट बढ़ा लिए हैं। हम व्यक्ति स्वातंत्र्य की बात करते हैं, व्यक्ति के अधिकार की बात करते हैं, व्यक्ति के विकास की बात करते हैं और व्यक्ति अपने सुख की बात करे इसे स्वाभाविक मानते हैं। व्यक्ति अपने सुख के लिए दूसरे व्यक्ति का उपयोग करे, इसे उचित ठहराते हैं। ये सभी बातें पाश्चात्य जीवन दृष्टि से प्रेरित हैं। भारतीय जीवन दृष्टि में अपना विचार बाद में, पहले दूसरों का विचार करना, यही मान्यता है। किन्तु हम उसे नहीं मानते। मानना तो दूर की बात है, हम अपने ही विचार को अस्वाभाविक और अव्यावहारिक बतलाते हैं।

तर्क आधारित बात करें तो व्यक्ति का सुख, व्यक्ति का विकास, व्यक्ति की स्वतंत्रता आदि सबका सुख, सबका विकास और सबकी स्वतंत्रता के बिना सम्भव ही नहीं है। यह तर्कपूर्ण बात भी हमारी बुद्धि में नहीं बैठती। केवल तर्क ही नहीं, युगों का अनुभव भी इसी बात को सिद्ध करता है। किन्तु हम उस अनुभव को भी नकारते हैं। तर्क और अनुभव की बात को न मानने का कारण यह है कि व्यक्ति स्वार्थी हो गया है और स्वार्थ के वशीभूत होकर वह ‘स्व’ के परे जाकर विचार करने को तैयार ही नहीं होता। वह न इतिहास में देखना चाहता है और न जगत के विस्तार में देखना चाहता है।

अपने अतीत से दूर करना

तार्किक बातें बुद्धि में स्थापित नहीं होने का कारण हमारे प्राचीन देश के अतीत का ज्ञान नहीं होना है। आज के व्यक्ति को न तत्त्वज्ञान की जानकारी है, न शास्त्रों की, न व्यवस्थाओं की और न व्यवहारों की समझ है। मानसिक स्तर पर हीनता बोध से ग्रस्त होने के कारण पश्चिम जो कहता है, वही सही है, ऐसा मानस बन गया है। इसलिए किसी भी विषय का विश्लेषण करने की, परीक्षण करने की तथा बुद्धि से परखने की आवश्यकता ही प्रतीत नहीं होती। पश्चिम कहता है हमारे शास्त्र कनिष्ठ है और प्राचीन होने के कारण त्याज्य है, ऐसा अतार्किक व अशास्त्रीय तर्क प्रतिष्ठित हो गया है। यही तो हमारा बुद्धि विभ्रम है।

मात्र व्यक्ति के सुख का विचार करने से परिवार का महत्त्व कम हुआ है। परिवार में परस्पर सहयोग की भावना का स्थान दूसरों पर आश्रित होना माना जा रहा है। आश्रित न होना पड़े इसलिए स्वतंत्रता की बात होने लगी है। स्वतंत्रता मन के अनुसार चलकर स्वच्छंदता में बदल गई है। इस प्रकार हमारी दिशा गलत हो जाने से हम भटक गए हैं। भटकते-भटकते हम कहाँ तक जायेंगे, कल्पना करना भी कठिन है। परिवार का विघटन बढ़ते-बढ़ते समाज के विघटन तक पहुँच गया है। इस प्रकार हम सामाजिक दुर्दशा की अनवस्था में जी रहे हैं।

विकास का आधार बदलना

हमने विकास का आधार ही गलत ले लिया है। भौतिकवादी होने के कारण हम देहवादी बन गए हैं। हमारी समृद्धि की कल्पना भी भौतिक है। समृद्धि का प्रेरक तत्त्व काम है, इसलिए कामनापूर्ति को ही हम मुख्य और केन्द्रवर्ती पुरुषार्थ मानने लगे हैं। फलतः हमारी जीवनशैली स्वाभाविक रूप से भोग प्रधान बन गई है। अधिक भोग में अधिक सुख मानने लगे हैं, भले ही प्रत्यक्ष में कष्टों का अनुभव कर रहे हों। कामनापूर्ति हेतु सामग्री जुटाना, अर्थ पुरुषार्थ का पर्याय बन गया है। अधिकतम सामग्री जुटाने को अपनी सफलता मानने लगे हैं। इस प्रकार यह सफलता विकास का पर्याय बन गई है। और इसे ही विकास का आधुनिक सिद्धांत मान लिया गया हैं। बुद्धि विभ्रम का यह भी एक प्रमुख कारण है।

भौतिकता का आधार मानने से हमारी दिशा ही बदल गई है। हमें यह समझ में नहीं आता कि आत्मतत्त्व ने सृष्टि बनकर जब अपना विस्तार प्रारम्भ किया तो उसका अन्तिम छोर पंचमहाभूतात्मक स्थूल शरीर बना। इस सृष्टि का आधार आत्मतत्त्व है, पंचमहाभूत नहीं। हम केवल बुद्धि से ही समझें तब भी आत्मतत्त्व को अधिष्ठान मानने से जीव व जगत के सभी व्यवहारों की स्पष्टता हो जाती है जबकि भौतिकता को अधिष्ठान मानने से अनेक व्यवहारों का औचित्य अनसुलझा ही रहता हैं। आज समस्या यह है कि हमारी बुद्धि आत्मतत्त्व तक पहुँचती ही नहीं। आत्मतत्त्व के प्रकाश में सब कुछ देखने से सब बातें सरल हों जाती हैं, इसे ही हम स्वीकार नहीं करते। आत्मतत्त्व या आत्मा को स्वीकार कर भी लिया तो उसे बुद्धि से नहीं जाना जा सकता, इसलिए अव्यावहारिक मान लेते हैं।

भारतीय शब्दों के अभारतीय अर्थ करना

हमने भारतीय जीवन व्यवहार से सम्बन्धित अत्यन्त मूल्यवान और गूढ़ संकल्पनात्मक शब्दों को विपरीत अर्थ के साथ जोड़कर उन्हें उलझा दिया हैं। उदाहरण के लिए धर्म, संस्कृति, आत्मा, राष्ट्र, श्रद्धा, प्रेम, विज्ञान, वैज्ञानिकता आदि अनेक संकल्पनाएँ आज उलझ गईं हैं। लोकतंत्र, समाज, वर्ण, जाति, आश्रम, परिवार और शिक्षा आदि शब्दों को भी विपरीत अर्थ प्रदान कर दिये हैं। आज जो अर्थ दिये गए हैं, वे भारतीय सन्दर्भ में उनके सही अर्थ नहीं हैं।

स्वतंत्रता और स्वायत्तता ऐसी ही भारतीय संकल्पनाएँ हैं जिन्हें अभारतीय अर्थ दे रखा है। भारतीय जीवन दृष्टि में प्रत्येक पदार्थ का स्वतंत्र अस्तित्त्व है, जिसका एक प्रयोजन है। हम भारतीय पदार्थों, प्राणियों, वनस्पतियों और मनुष्यों के स्वतंत्र अस्तित्त्व को स्वीकारते हैं और उनका सम्मान व रक्षण भी करते हैं। परन्तु आज हमने इसका भारतीय अर्थ नकारते हुए स्वतंत्रता की पश्चिमी संकल्पना को स्वीकार कर लिया है। पश्चिम प्रत्येक व्यक्ति की स्वतंत्रता को एक-दूसरे का विरोधी मानता है। वह मनुष्य के अतिरिक्त पदार्थ, प्राणी और वनस्पति आदि की स्वतंत्रता को मान्यता ही नहीं देता। फलतः श्रेष्ठता कनिष्ठ बनकर गर्व का अनुभव करती है, जो कितनी विचित्र बात है।

ऐसी ही दूसरी संकल्पना विकास की है। जब व्यक्ति को केन्द्र में रखकर विकास की बात होती है तो उसमें स्पर्धा का निर्माण होता है। और स्पर्धा को विकास का कारक तत्त्व माना जाता है, जो विपरीत बुद्धि का परिचायक है। इस स्पर्धा को सही ठहराने के लिए ‘स्वस्थ स्पर्धा’ शब्द का प्रयोग किया जाता है, जो ‘आकाश कुसुम’ जैसा असम्भव प्रयोग है। जिस प्रकार आकाश में फूल नहीं उगा करता, उसी प्रकार स्पर्धा कभी स्वस्थ नहीं हो सकती। स्पर्धा में संघर्ष होता है, संघर्ष से हिंसा जन्म लेती है और हिंसा से विनाश होता है। परन्तु हमने स्पर्धा को व्यवहार का केन्द्रवर्ती तत्त्व बना दिया है। और स्पर्धा के साथ पुरस्कार को जोड़कर, उसे श्रेष्ठता का बाना पहना दिया है। परस्पर विरोधी बातें एक-साथ करना मूढ़मति का लक्षण है। वातानुकूलित कक्ष में बैठकर पर्यावरण की चिन्ता करना, फास्टफूड जैसे तामसी आहार का सेवन करते हुए सात्त्विकता एवं संस्कार की बात करना, रासायनिक खाद से उत्पन्न अनाज खाकर उत्तम स्वास्थ्य की कामना करना, निरन्तर मोबाइल व इंटरनेट का प्रयोग करते हुए बुद्धि की तेजस्विता बढ़ने की आशा रखना नितान्त असम्भव है। यह अति सामान्य बात भी हमारी समझ में नहीं आती।

तीसरी महत्त्वपूर्ण संकल्पना भारतीय शिक्षा की है। पश्चिमी शिक्षा से छिन्नभिन्न हुई बुद्धि ने हमारे सभी सामाजिक व सांस्कृतिक शास्त्रों के अर्थ को अनर्थ में और सिद्धांतों को विध्वसंकों में बदल दिया है। हमारा अर्थशास्त्र जो धर्म का अविरोधी था, उसे आज कामानुसारी बना दिया गया है। ऐसा कामानुसारी अर्थ, धर्म, शिक्षा व राज्य आदि व्यवस्थाओं का नियंत्रक बन बैठा है। हमारा मनोविज्ञान जो आत्मानुगामी होता था, वह आज देहानुगामी बन गया है। हमारा समाजशास्त्र संस्कार सिद्धांत को छोड़कर केवल करार के सिद्धांत पर चलने लगा है। भारतीय शिक्षा धर्म सिखाने वाली होने के स्थान पर बाजार में ज्ञान बेचने वाली व्यवस्था बन गई है। जिस प्रकार किसी अनिष्ट पदार्थ का स्पर्श होते ही समूचा शरीर तंत्र अस्तव्यस्त हो जाता है, उसी प्रकार पश्चिमी बुद्धि के प्रभाव में भारतीय बुद्धि क्षत-विक्षत होकर हमारी सभी व्यवस्थाओं को बदलकर अनवस्था निर्माण कर रही है। ये ही भारतीय ‘बुद्धि विभ्रम’ के प्रमुख कारण हैं।

(लेखक शिक्षाविद् है, भारतीय शिक्षा ग्रन्थमाला के सह संपादक है और विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान के सचिव है।)

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