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	<title>Uncategorized Archives - राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन rashtriyashiksha.com</title>
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	<title>Uncategorized Archives - राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन rashtriyashiksha.com</title>
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		<title>भारतीय ज्ञान का खजाना-41 (व्यापार में सर्वोच्च स्थान पर रहा भारत &#8211; २)</title>
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		<pubDate>Tue, 22 Sep 2026 02:35:30 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>&#x270d; प्रशांत पोळ केवल दक्षिण भारत में रोमन साम्राज्य के 6000 से अधिक सिक्के मिले हैं। यह सिक्के सोने या चांदी के है। प्रमुखता से यह सिक्के, सीजर ऑगस्टस और&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"><img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/270d.png" alt="✍" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /> प्रशांत पोळ</p>
<p style="text-align: justify;">केवल दक्षिण भारत में रोमन साम्राज्य के 6000 से अधिक सिक्के मिले हैं। यह सिक्के सोने या चांदी के है। प्रमुखता से यह सिक्के, सीजर ऑगस्टस और टिबेरुस (Tiberius) इन राजाओं के कालखंड के है। अर्थात, ईसा पूर्व 100-200 वर्ष से लेकर सन् 100 तक के ये सिक्के हैं। मजेदार बात यह है, कि इटली को छोड़ दे, तो विश्व में सबसे अधिक प्राचीन रोमन सिक्के अपने भारत में ही मिले हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">इसी कालखंड में भारत के व्यापार का एक और जबरदस्त प्रमाण मिला है, इटली के पोंपेई (Pompeii) इस शहर में। नेपल्स शहर के पास बसे हुए इस छोटे से शहर की एक विशेषता है। पहली शताब्दी में, सन् 79 में, इस शहर के निकट माउंट वेसुविअस में ज्वालामुखी का प्रचंड विस्फोट हुआ। उसमें से निकले लावारस में यह शहर पूरी तरह दब गया। अगले अनेक वर्ष, यह इस मलबे में 15 से 20 फीट अंदर दबा रहा। इसकी खोज हुई, सोलहवीं शताब्दी में। और आगे चलकर उन्नीसवीं शताब्दी में इसका उत्खनन प्रारंभ हुआ। 1960 तक यह शहर लगभग पूरा मलबे से बाहर निकल सका। इतने वर्ष मलबे में दबने के बाद भी, दबी हुई वस्तुएं अच्छी स्थिति में मिली।</p>
<p style="text-align: justify;">इस उत्खनन में उन्हें एक देवी की मूर्ति मिली। ईसा पूर्व 200 वर्ष (अर्थात आज से 2200 वर्ष पूर्व) यह प्रतिमा तैयार हुई होगी। हाथी के दांतों की यह प्रतिमा, पूर्णतया भारतीय है। अक्टूबर 1938 में यह देवी की प्रतिमा खोज निकाली Amedeo Maiuri नाम के इटालियन पुरातत्व विशेषज्ञ ने। प्रारंभ में यह प्रतिमा देवी लक्ष्मी की मानी गई। विश्व में यह प्रतिमा ‘पोंपेई लक्ष्मी’ नाम से प्रसिद्ध हुई। परंतु बाद में अध्ययन के बाद यह माना गया कि यह प्रतिमा लक्ष्मी की नहीं, किसी यक्षिणी की है।</p>
<p style="text-align: justify;">यह प्रतिमा मथुरा में तैयार की गई होगी ऐसा एक मत है। अन्य मतानुसार महाराष्ट्र के जालना जिले के भोकरदन में यह मूर्ति तैयार हुई होगी। क्योंकि ऐसी ही एक मूर्ति वहां भी मिली है। इस मूर्ति के साथ ही, सातवाहन कालखंड का, राजा वशिष्ठिपुत्र पुलुमवी (पहली शताब्दी) का सिक्का मिला है। यह सातवाहनों के सागरी व्यापार का प्रमाण है।</p>
<p style="text-align: justify;">इटली की पोंपेई लक्ष्मी कि ईसा पूर्व 200 वर्ष की मूर्ति, यह भारत-रोमन साम्राज्य में होने वाले व्यापार का जबरदस्त प्रमाण तो है ही, परंतु इसी मूर्ति के कालखंड के आसपास, भारत-रोमन व्यापार का और एक मजबूत प्रमाण मिला है, भारत में महाराष्ट्र के कोल्हापुर में..!</p>
<p style="text-align: justify;">‘पेरिप्लस ऑफ द एरीथ्रिरियन सी’ इस प्राचीन प्रवास वर्णन में उल्लेख होने के कारण, कोल्हापुर शहर के पश्चिम दिशा में, पंचगंगा नदी के तट पर, सन 1877 में सर्वप्रथम उत्खनन किया गया। आगे चलकर सन 1945-46 में, डेक्कन कॉलेज, पुणे के माध्यम से पुरातत्ववेत्ता हसमुख सांकलिया और मोरेश्वर दीक्षित के नेतृत्व में विस्तृत उत्खनन हुआ। यह भाग ब्रह्मपुरी नाम से जाना जाता था। इस उत्खनन में उनको अनेक वस्तुएं मिली। उसमें ग्रीको रोमन रचना की भी वस्तुएं थी। इसके अलावा इसमें उन्हें ‘पोसायडन’ इस ग्रीको रोमन समुद्र देवता की ब्रांझ की मूर्ति मिली। यह मूर्ति लगभग 7 इंच की है। पहली शताब्दी में, ग्रीस के अलेक्जेंड्रिया में यह मूर्ति तैयार की गई होगी। ब्रह्मपुरी के परिसर में उस समय सातवाहनों का साम्राज्य था। इस पोसायडन मूर्ति के साथ-साथ, अनेक रोमन सिक्के भी मिले हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">इन सब प्रमाणों से वैज्ञानिकों ने यह अनुमान निकला की, इस ब्रह्मपुरी (आज का कोल्हापुर) में, ग्रीक व्यापारियों की रहने की बस्ती (बसाहट) होगी। यह ग्रीक व्यापारी, उनके पोसायडन इस समुद्र देवता को हमेशा साथ लेकर प्रवास करते होंगे।</p>
<p style="text-align: justify;">भारत के रोमन-ग्रीक इन देशों के साथ प्राचीन व्यापार के और कितने स्पष्ट प्रमाण चाहिए?</p>
<p style="text-align: justify;">‘कोल्हापुर पोसायडन’ यह मूर्ति और एक महत्वपूर्ण बात की ओर संकेत करती है। रोम और ग्रीस के साथ व्यापार के लिए उपयोग में आने वाला ‘मसाला मार्ग’ (स्पाइस रूट, समुद्री मार्ग) यह केवल भारत के दक्षिण में, विशेष रूप से केरल के बंदरगाहों तक, सीमित नहीं था, तो कोकण और गुजरात से भी सीधे समुद्र मार्ग से यूरोपीय देशों के साथ व्यापार होता था।</p>
<p style="text-align: justify;">सन् 2023 में भारत में G20 का समिट हुआ। इसकी अध्यक्षता भारत ने की थी। इस समिट में एक आर्थिक कॅरिडॉर की संकल्पना रखी गई। यह संकल्पना संबंधित देशों के साथ-साथ अन्य देशों को भी पसंद आई। ‘भारत-मध्य पूर्व-यूरोप’ ऐसा यह आर्थिक कॅरिडॉर (India &#8211; Middle East &#8211; Europe Economic Corridor &#8211; IMEEC) होने वाला है।</p>
<p style="text-align: justify;">भारत के संदर्भ में गहन अध्ययन करने वाले विलियम डार्लिंपल ने इस संकल्पना का स्वागत किया है। उनका कहना है कि, ‘लगभग 2000 वर्ष पूर्व, यही भारत का सही और महत्वपूर्ण व्यापारी मार्ग था’। डार्लिंपल के कहने के अनुसार, ‘सिल्क रुट यह एक तरह से नई संकल्पना है। सिल्क रुट या सिल्क रोड यह संकल्पना सर्वप्रथम उन्नीसवी शताब्दी में, जर्मन भूगोल वैज्ञानिक, ‘फार्मिंग &#8211; बोन &#8211; रिश्टोफेन’ ने सबके सामने  रखी। वह अंग्रेजी साहित्य और भाषा में सन् 1930 से शामिल हुई। लेकिन विगत 20/25 वर्षों में सही मायने में यह शब्द जनमानस में लोकप्रिय हुआ’।</p>
<p style="text-align: justify;">वस्तुस्थिति यह है कि उस कालखंड में, सबसे जल्दी गति का, सबसे सस्ता और तुलनात्मक रुप से सबसे सुरक्षित व्यापारी मार्ग, यह मसाला मार्ग था, जो बीच समंदर से जाता था।</p>
<p style="text-align: justify;">पहली शताब्दी के आसपास, रोमन साम्राज्य के ‘प्लिनी द एल्डर’ (गायस प्लिनियस सेकुंडस &#8211; वर्ष 23 से 79) ने भारत समेत अनेक देशों में बहुत प्रवास किया। उसने लिखकर रखा है-</p>
<p style="text-align: justify;">“हमारी रोमन महिलाओं को क्या हुआ है? भारतीय वस्त्रों और हीरे-माणिक से बने हुए गहनों की ओर, वह इतनी ज्यादा आकर्षित क्यों होती है? यह महिलाएं रोमन ऊनी वस्त्र पहनकर खुश नहीं रह सकती क्या? इससे यह हो रहा है कि भारत की निर्यात प्रचंड मात्रा मे होने के कारण, भारतीय माल के बदले में हमें उतना ही (अर्थात, भरपूर) सोना देना पड़ रहा है। हमारा सब सोना भारत में जा रहा है।”</p>
<p style="text-align: justify;">हमारे व्यापार करने की क्षमता पर प्लिनी जैसे इतिहासकार ने इतने स्पष्ट रूप से लिख कर रखा है। पर हमारा दुर्भाग्य की ‘भारत का वैश्विक व्यापार में इतना मजबूत स्थान था’ यह हमें किसी ने, कभी सिखाया ही नहीं।</p>
<p style="text-align: justify;">डार्लिंपल के अनुसार, यूरोप के साथ व्यापार करते समय भारतीय बहुत महंगी या कीमती वस्तुएं आयात नहीं करते थे। ओलिव ऑयल, वाइन जैसी वस्तुएं आयात होती थी। लेकिन यूरोपीय देशों का इससे उल्टा था। वह अत्यंत महंगी वस्तुएं आयात करते थे। हीरे, माणिक, मोती के गहने, मसाले, सूती वस्त्र, नील&#8230;. अर्थात, इस व्यापार में भारत हमेशा ‘जमा’ वाली स्थिति (ट्रेड सरप्लस) में रहता था, और यूरोपीय देशों का ‘ट्रेड डिफिसिट’ रहता था। इसलिए भारत में हजारों की संख्या में प्राचीन रोमन सिक्के मिले हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">‘पेरीप्लस ऑफ द एरीथ्रिरियन सी’ इस पुस्तक में भडोच का उल्लेख आता है। उस समय वहां ‘नहपान’ नाम का शक राजा राज्य करता था। भडोच से नील, हांथीदात की वस्तुएं, गहने, सूती कपड़ा, सूती वस्त्र, रेशीम, लॅपिसलझुली (रत्न), काली मिर्च आदी मौल्यवान वस्तूएं रोम में निर्यात होती थी।</p>
<p style="text-align: justify;">महाराष्ट्र के शुर्पारक (आज के नालासोपारा), कल्याण, चौल आदि बंदरगाहों में ग्रीक जहाज आते थे, ऐसा उल्लेख इस पुस्तक में आया है।</p>
<p style="text-align: justify;">मुख्यतः भारत के पश्चिमी किनारे से इजिप्त और यूरोप के साथ होने वाला व्यापार हमने देखा। उसके कारण भारत में आई हुई प्रचंड समृद्धि भी हमने देखी।</p>
<p><strong><span style="color: #ff0000;">और पढ़े:</span></strong> <span style="color: #3366ff;"><strong><a style="color: #3366ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/treasure-of-bharatiya-knowledge-bharat-ranked-highest-in-trade-1/" target="_blank" rel="noopener">भारतीय ज्ञान का खजाना-40 (व्यापार में सर्वोच्च स्थान पर रहा भारत – १)</a></strong></span></p>
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		<title>भारतीय ज्ञान का खजाना-40 (व्यापार में सर्वोच्च स्थान पर रहा भारत &#8211; १)</title>
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		<pubDate>Tue, 22 Sep 2026 02:04:40 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>&#x270d; प्रशांत पोळ प्रोफेसर अंगस मेडिसन के नाम का उल्लेख ‘भारतीय ज्ञान का खजाना’ में हुआ है। प्रोफेसर मेडिसन (1926-2010) मूलतः ब्रिटिश थे, लेकिन वह अनेक वर्षों तक नीदरलैंड के&#8230; </p>
<p>The post <a href="https://rashtriyashiksha.com/treasure-of-bharatiya-knowledge-bharat-ranked-highest-in-trade-1/">भारतीय ज्ञान का खजाना-40 (व्यापार में सर्वोच्च स्थान पर रहा भारत &#8211; १)</a> appeared first on <a href="https://rashtriyashiksha.com">राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"><img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/270d.png" alt="✍" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /> प्रशांत पोळ</p>
<p style="text-align: justify;">प्रोफेसर अंगस मेडिसन के नाम का उल्लेख ‘भारतीय ज्ञान का खजाना’ में हुआ है। प्रोफेसर मेडिसन (1926-2010) मूलतः ब्रिटिश थे, लेकिन वह अनेक वर्षों तक नीदरलैंड के ग्रोनिंगन विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के प्रमुख रहे। दुनिया उनको जानती है, उनके अर्थशास्त्र के इतिहास के संदर्भ में किए हुए शोध के लिए। अंगस मेडिसिन ने अनेक वर्ष, अथक परिश्रम करके दुनिया का आर्थिक इतिहास तैयार किया। पूरे विश्व में मान्यता मिली है, ऐसी उनकी अनेक पुस्तकें है। उनमें से ‘द वर्ल्ड इकोनॉमी: ए मिलेनियल पर्स्पेक्टीव्ह’ यह पुस्तक बहुत प्रसिद्ध है। इसमें उन्होंने आंकड़े देकर, किस शताब्दी में दुनिया की कुल अर्थव्यवस्था में और व्यापार में कौन से देश आगे थे, और कौन से देश पीछे, इसका विस्तार से वर्णन किया है।</p>
<p style="text-align: justify;">प्रोफेसर अंगस मेडिसन के आंकड़े ईसा के जन्म से प्रारंभ होते हैं। इन आंकड़ों के अनुसार पहली सदी में वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारत का हिस्सा 33% से अधिक था। अर्थात विश्व के कुल व्यापार का एक तिहाई व्यापार हम कर रहे थे। अगले हजार-डेढ़ हजार वर्ष, वैश्विक व्यापार में अपना सर्वोच्च स्थान अबाधित था। मुस्लिम आक्रांताओं ने किए हुए अत्याचारों के कारण, और बाद में अंग्रेजों ने ध्वस्त की हुई व्यवस्थाओं के कारण, वैश्विक व्यापार में हमारी हिस्सेदारी कम होती गई।</p>
<p style="text-align: justify;">अर्थात ईसा पूर्व कालखंड का अध्ययन किया, तो साधारणतः दो हजार से ढाई हजार वर्ष, हम वैश्विक व्यापार में निर्विवाद रूप से सर्वोच्च स्थान पर थे। हमारा निर्यात जबरदस्त था।</p>
<p style="text-align: justify;">इसका दूसरा अर्थ यह है, कि हमारे जहाज भारत में तैयार हुआ माल लेकर दुनिया के हर कोने में जाते थे, व्यापार करते थे और भारत में समृद्धि, संपन्नता लाते थे।</p>
<p style="text-align: justify;">लेकिन हम सबको बचपन में शाला में क्या पढ़ाया गया? ‘भारत की खोज’ वास्को डी गामा ने सन 1498 में की। ऐसा विकृत इतिहास हमने पढ़ा। यह हमारा दुर्भाग्य है..!</p>
<p style="text-align: justify;">हजारों वर्ष पहले हम नौकायन क्षेत्र में अत्यंत प्रगत थे। उस समय के अत्याधुनिक जहाज हम बनाते थे। हमने तैयार किए हुए जहाज, हम अन्य देशों को बेचते भी थे। हमारा समुद्र का दिशा-ज्ञान बहुत अच्छा था। लगभग सवा दो हजार वर्ष पूर्व, भारतीय नाविक जिस ‘दिशा दर्शक’ (मरीन कंपास) का उपयोग करते थे, वह उपलब्ध है। उसे ‘मच्छ यंत्र’ कहते थे। ऐसे ही दिशा की अचूकता नापने के लिए, दो बिंदुओं के बीच के कोण का मूल्य निकालना होता है। यह काम करने वाला यंत्र, वर्तमान में सेक्सटंट (Sextant) कहलाता है। हमारे नविक ऐसे यंत्र का उपयोग करते थे। इसका नाम था, ‘वृत्त शंख भाग’।</p>
<p style="text-align: justify;">कुल मिलाकर, व्यापार के लिए हमारे उद्योगपति, व्यापारी और नाविकों ने दुनिया भर में संचार किया। विश्व में अनेक स्थानों पर पहली बार हमारे व्यापारी गए हैं। प्राचीन भारत के व्यापार के संदर्भ में कई लोगों ने लिखकर रखा है। उसमें पश्चिमात्य प्रवासी प्रमुखता से है।</p>
<p style="text-align: justify;">सिझर ऑगस्टस, (ईसा पूर्व 63 वर्ष &#8211; वर्ष 14) इस प्रसिद्ध राजा के राज्य शासन में ‘स्ट्राबो’ नाम का ग्रीक इतिहासकार था। उसने उस समय बहुत प्रवास किया। स्ट्राबो ने लिखकर रखा है कि, ‘सीजर ऑगस्टस के समय भारत का रोम से बहुत व्यापार होता था। उस कालखंड में लगभग 120 जहाज प्रतिवर्ष भारतीय माल लेकर केवल रोम साम्राज्य में, इजिप्त होते हुए, जाते थे।</p>
<p style="text-align: justify;">इजिप्त में उस समय दो प्रमुख बंदरगाह थे। मायोस हार्मोस (Mayos Hormos) और बेरेनिके (Berenike / Berenice)। इनमें से बेरेनिके का उल्लेख ‘भारतीय ज्ञान का खजाना’ में आया है। बेरेनिके इजिप्त का प्राचीन बंदरगाह था। टोलेमी (द्वितीय) ने अपनी मां की स्मृति में इसको बनवाया था। नब्बे के दशक में यहां उत्खनन प्रारंभ हुआ। अनेक देश और अनेक अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं मिलकर यह उत्खनन कर रहे हैं। विश्व के सभी उत्खननों में यह सबसे बड़ी परियोजना है। यहां अभी भी उत्खनन चल रहा है।</p>
<p style="text-align: justify;">लगभग 20 वर्ष पहले, इस उत्खनन में 8 किलो काली मिर्च, भारतीय बाटिक प्रिंट के वस्त्र ऐसी अनेक वस्तुएं, एक बड़े लकड़ी के बक्से में मिली थी। इस सशक्त प्रमाण के मिलने से, ‘भारत का यूरोप से व्यापार करने का मसाला मार्ग (Spice Route &#8211; समुद्री मार्ग) था’, यह सिद्ध हुआ।</p>
<p style="text-align: justify;">कोरोना के बाद प्रारंभ हुए उत्खनन में, मार्च 2022 में, बेरेनिके में बुद्ध की एक मूर्ति मिली। आधुनिक तकनीकी का उपयोग करते हुए उस मूर्ति की आयु निकाली गई। वह वर्ष 90 से वर्ष 140 (पहले और दूसरे शताब्दी के मध्य) इस कालखंड की निकली। इसी स्थान पर संस्कृत में लिखा हुआ एक शिलालेख मिला है, जो तत्कालीन रोमन सम्राट ‘फिलिप द अरब’ (वर्ष 204 से 249। इसमे सम्राट पद का कालखंड है &#8211; वर्ष 244 से 249, अर्थात तीसरी सदी) को संबोधित करते हुए लिखा है। साथ ही यहां सातवाहन राजवंश के सिक्के मिले हैं, जो दूसरे सदी के है।</p>
<p style="text-align: justify;">दक्षिण भारत में पुडुचेरी (पांडिचेरी) के पास एक बंदरगाह है, अरिकामेडू (Arikamedu)। इसका प्राचीन नाम है पोदुके (Poduke)। यहां नब्बे के दशक में उत्खनन प्रारंभ हुआ, और भारत रोम व्यापार के अनेक प्रमाण मिले। रोमन शैली में बने हुए सोने के मणी, कांच सामान, दिए और अनगिनत रोमन सिक्के मिले। आरिकामेडू भारत के दक्षिण-पूर्व दिशा में है। इसका अर्थ, यहां से भी रोमन साम्राज्य के साथ व्यापार होता था। भारतीय जहाज श्रीलंका होते हुए हिंद महासागर में जाते थे, और वहां से इजिप्त की दिशा में प्रस्थान करते थे।</p>
<p style="text-align: justify;">भारत के दक्षिण-पश्चिम के बंदरगाहों से भारत-रोमन व्यापार के अनेक प्रमाण मिले हैं। तुलना में यह मार्ग छोटा और आसान था। श्रीलंका को चक्कर मार कर भारत के पूर्व तट पर जाने की आवश्यकता नहीं थी। इसमें एक प्रमुख जगह है, पट्टनम। केरल के एर्नाकुलम जिले का एक छोटा सा गांव। कोचीन से 25 किलोमीटर उत्तर दिशा में।</p>
<p style="text-align: justify;">सन 2007 में जब यहां उत्खनन प्रारंभ हुआ तब से भारत-रोमन व्यापार के अनेक प्रमाण मिलने लगे। कुछ इतिहासकार इस जगह को प्राचीन काल का मुझिरिस शहर मानते हैं, तो कुछ इतिहासकार केरल के त्रिशूर जिले के कोंडुगल्लूर गांव को मुझिरिस मानते हैं। इस मुझिरिस का इतना महत्व क्यों है? रोमन साम्राज्य के कालखंड में, अर्थात पहली शताब्दी में, लिखे गए ‘पेरीप्लस ऑफ द एरिथ्रियन सी’ ( एरिथ्रियन समुद्र में भ्रमण) इस पुस्तक में मुझिरिस का भारत-रोमन व्यापार में एक महत्वपूर्ण केंद्र होने का उल्लेख आया है। भारत-रोमन व्यापार के मसाला मार्ग का मुझिरिस यह एक आवश्यक बंदरगाह था।</p>
<p style="text-align: justify;">महत्वपूर्ण व्यापारिक व्यवहार (बही खाता) लिखकर रखने के लिए इजिप्त में पेपरस (या पपाईरस) नाम के मोटे कागज का उपयोग किया जाता था। केरल में दूसरे सदी के प्रारंभ के कुछ कागज मिले हैं, जिन्हें ‘मुझिरिस पेपिरस’ नाम से जाना जाता है।</p>
<p style="text-align: justify;">यह ‘मुझिरिस पेपिरस’ यानी अलेक्जेंड्रिया में रहने वाले एक रोमन इजिप्शियन व्यापारी के, भारत से किए गए व्यापार का लेखा जोखा है। उस व्यापारी का एक जहाज मुझिरिस से इटली आने वाला था, उसका नाम था ‘हर्मापोलन’। इस जहाज में काली मिर्च और अन्य मसाले थे, जो यह व्यापारी भारत से आयात करता था।</p>
<p style="text-align: justify;">इस सामान की क्या कीमत होगी? विलियम डार्लिंपल कहते हैं, ‘उस जमाने में इजिप्त में 24 एकड़ की सबसे अच्छी खेती खरीदी जा सकती थी, या इटली के बड़े शहर की प्रमुख, महत्वपूर्ण और विशाल ऐसी जगह आसानी से खरीद सकते थे’, इतनी कीमत उस एक जहाज के सामान की थी।</p>
<p style="text-align: justify;">केवल एक जहाज में इतना बेशकिमती माल होगा, तो भारत का कितना बड़ा व्यापार उस समय रोमन साम्राज्य के साथ होता होगा? अकेले इजिप्त में ही भारत के बड़े-बड़े ऐसे लगभग 120 जहाज, ठसाठस माल भर के, साल भर में जाते थे, ऐसा स्ट्राबो इस इतिहासकार ने लिखकर रखा है। आगे चलकर इन जहाजों की संख्या दोगुनी हुई।</p>
<p style="text-align: justify;">भारत में से आने वाले माल के कर से रोमन साम्राज्य को जितनी कमाई होती थी, वह कमाई उनके सरकारी तिजोरी की, अर्थात कुल कमाई की, एक तिहाई थी..!</p>
<p style="text-align: justify;">कुल मिलाकर, केवल रोमन साम्राज्य से भारत इतना प्रचंड व्यापार करता था। फिर अन्य देशों के साथ हो रहे व्यापार को इससे जोड़ दे, तो भारत के समृद्धि का कुछ अंदाजा लगाया जा सकता है। कुछ कल्पना की जा सकती है।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>और पढ़े:</strong></span> <span style="color: #3366ff;"><strong><a style="color: #3366ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/treasure-of-bharatiya-knowledge-bharat-invented-advanced-farming-1/" target="_blank" rel="noopener">भारतीय ज्ञान का खजाना-32 (उन्नत खेती का अविष्कारक – भारत – 1)</a></strong></span></p>
<p style="text-align: justify;">क्रमशः</p>
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		<title>भारतीय ज्ञान का खजाना-39 (ओपनहायमर तो मान गए! लेकिन&#8230; – 2)</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 07 Mar 2026 11:54:22 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>&#x270d; प्रशांत पोळ अब ‘इलास्टिसिटी’ इस पदार्थ के गुणधर्म का उदाहरण लेते हैं। आधुनिक विज्ञान के मतानुसार  ‘इलास्टिसिटी’ का गुणधर्म सबसे पहले खोजा, रॉबर्ट हुक नाम के अंग्रेज पदार्थ विज्ञान&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"><img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/270d.png" alt="✍" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /> प्रशांत पोळ</p>
<p><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone wp-image-9268" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/03/Portrait_of_a_Mathematician_1680c-e1772884335156-300x226.jpg" alt="" width="1669" height="1257" /></p>
<p style="text-align: justify;">अब ‘इलास्टिसिटी’ इस पदार्थ के गुणधर्म का उदाहरण लेते हैं। आधुनिक विज्ञान के मतानुसार  ‘इलास्टिसिटी’ का गुणधर्म सबसे पहले खोजा, रॉबर्ट हुक नाम के अंग्रेज पदार्थ विज्ञान वैज्ञानिक ने, वर्ष 1660 में। वर्ष 1667 में उन्होंने उसे सिद्धांत के रूप में रखा। आगे चलकर यह ‘हुक का नियम’ (Hook’s Law) नाम से प्रसिद्ध हुआ। इस नियम अनुसार, ‘किसी भी पदार्थ के लंबाई या चौड़ाई में परिवर्तन, यह उस पदार्थ पर लगाए गए बल के समानुपाती रहता है’।</p>
<p style="text-align: justify;">अब इसके 600-700 वर्ष पीछे जाते हैं। बंगाल के हुगली जिले के ‘भुरीश्रेष्ठ’ गांव के ‘श्रीधराचार्य’ नाम के विद्वान व्यक्ति ने, दसवीं सदी में ‘न्याय कंदली’ ग्रंथ लिखा। आज की भाषा में यह ग्रंथ ‘मटेरियल साइंस’ पर लिखा हुआ ग्रंथ है। इस ग्रंथ के एक श्लोक में श्रीधराचार्य कहते हैं –</p>
<p style="text-align: center;"><strong>ये घना निबिडाः अवयवसंन्निवेशः तैः विशिष्टेषु</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>स्पर्शवत्सु द्रव्येषु  वर्तमानः स्थितिस्थापकः स्वाश्रयमन्यथा</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>कथामवनामितं यथावत् स्थापयति पूर्ववदृजुः करोति।।</strong></p>
<p style="text-align: justify;">संस्कृत समझने वाला कोई भी व्यक्ति इस श्लोक का अर्थ सहजता से समझ सकता है। ‘स्थिति स्थापक’ इस शब्द का अर्थ है ‘इलास्टिसिटी’।</p>
<p style="text-align: justify;">अर्थात इस श्लोक का अर्थ है, ‘घनत्व से बने हुए पदार्थ का आकार, यदि किसी बाह्य बल के कारण बदलता है, तो उसे पुनश्च एक बार, अपनी पूर्व स्थिति में लाने वाला गुणधर्म है, इलेस्टीसिटी।’</p>
<p style="text-align: justify;">इतने स्पष्ट रूप से लिखने के बाद भी, आज हम विद्यार्थियों को पढ़ा रहे हैं कि इलास्टिसिटी का आविष्कार रॉबर्ट हुक ने किया। सच में हमारे जैसे दुर्भागी हम ही हैं। हुक्स का नियम (Hook’s Law) क्यों? श्रीधराचार्य का नियम (Shridharacharya’s Law) क्यों नहीं?</p>
<p style="text-align: justify;">गुरुत्वाकर्षण के संदर्भ में भी यही कहानी..</p>
<p style="text-align: justify;">हम सब बचपन से सुनते आ रहे हैं, पढ़ते आ रहे हैं कि गुरुत्वाकर्षण का आविष्कार न्यूटन ने किया। वर्ष 1887 में लिखे गए ‘प्रिन्सीपिया’ इस ग्रंथ में, उसने सर्वप्रथम गुरुत्वाकर्षण की संकल्पना रखी। हमारे शिक्षकों ने, ‘न्यूटन ने पेड़ से सफरचंद को गिरते हुए देखा, और इस पर से उन्होंने गुरुत्वाकर्षण की खोज की’ ऐसा पढ़ाया।</p>
<p style="text-align: justify;">परंतु सत्य स्थिति कुछ और है। उपनिषदों का काल खंड साधारणतः दो हजार से साढ़े चार हजार वर्ष पुराना माना जाता है। इन उपनिषदों में से 10 उपनिषदों पर आद्य शंकराचार्य जी ने भाष्य लिखे हैं। उसमें से एक है ‘प्रश्नोपनिषद’। अर्थात प्रश्नोपनिषद कम से कम दो हजार वर्ष पुराना हैं। उस पर शंकराचार्य जी ने लिखा हुआ भाष्य भी कम से कम 1300 वर्ष पुराना है। इस भाष्य के तीसरे अध्याय का आठवां श्लोक है &#8211;</p>
<p style="text-align: center;"><strong>तथा पृथ्वीव्यामभिमानिनी या देवता प्रसिद्धा सैषा।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>पुरुषस्य अपानवृत्तिमवष्टभ्याकृष्य  वशीकृत्याध एव।।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>अपकर्षेंण अनुग्रह कुर्वंति वर्तत इत्यर्थः।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>हि शरिरं गुरुत्वात् पतेत् सावकाश वोद्गच्छेत।।</strong></p>
<p style="text-align: justify;">अर्थात, ‘पृथ्वी यह देवता, मानव के अंदर के ‘अपान’ को आकर्षित करती है। उस पर नियंत्रण रखती है। उसे स्थिर रखती है। पृथ्वी का अगर यह गुण नहीं रहता, तो मानव शरीर, उसके वजन के कारण जमीन पर गिर जाता या आकाश में मुक्त रूप से संचार करता रहता’।</p>
<p style="text-align: justify;">केवल आद्य शंकराचार्य जी ही नहीं, तो हमारे प्राचीन ऋषि मुनियों ने गुरुत्वाकर्षण के गुणधर्म के संदर्भ में अनेकों बार लिखकर रखा है।</p>
<p style="text-align: justify;">ब्रह्मगुप्त ने वर्ष 628 में ‘पृथ्वी में गुरुत्वाकर्षण बल है’ ऐसा स्पष्ट रूप से कहा था। उन्होंने ही सर्वप्रथम ‘गुरुत्वाकर्षणम्’ इस शब्द का उपयोग किया। उन्होंने लिखा है, ‘उल्का पिंड पृथ्वी पर गिरते हैं, क्योंकि पृथ्वी का स्वभाव पिंडों को आकर्षित करने का है’। आगे वह उनके ‘ब्राह्मस्फुट सिद्धांत’ इस ग्रंथ में लिखते हैं, ‘सभी भारी (वजनी) वस्तुएं पृथ्वी के केंद्र की ओर आकर्षित होती है। वस्तुओं को आकर्षित करना, और अपने पास खींचना, पृथ्वी का स्वभाव है’।</p>
<p style="text-align: justify;">इसके बाद, साधारणतः 400 वर्षों के पश्चात, भास्कराचार्य ने ‘सिद्धांत शिरोमणि’ इस ग्रंथ के, गोलाध्याय के भुवन कोष के छठवें श्लोक में लिखा है &#8211;</p>
<p style="text-align: center;"><strong>आकृष्ट शक्तिश्च मही तया यत्र खंस्थं</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>गुरु स्वाभिमुखं स्वशक्तया।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>आकृष्यते तत् पतती भाति</strong><strong>,</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>समें समंतात क्व पतत्वियं खेल।।</strong></p>
<p style="text-align: justify;">अर्थात, ‘पृथ्वी में आकर्षण शक्ति है। इस शक्ति के कारण वह भारी वस्तुओं को अपनी ओर खींच लेती है। और इसी कारण वस्तुएं जमीन पर गिरती है’।</p>
<p style="text-align: justify;">अर्थात, हजारों वर्षों से, अत्यंत स्पष्ट शब्दों में अपने पूर्वज, पृथ्वी के गुरूत्वाकर्षण शक्ति के संदर्भ में लगातार बोलते, कहते आ रहे हैं। लेकिन हम अंग्रेजी मानसिकता के गुलाम, आज भी अपने बच्चों को ‘गुरुत्वाकर्षण का आविष्कार न्यूटन ने किया’ यही पढ़ा रहे हैं..!</p>
<p style="text-align: justify;">मैंने स्कूल में पढ़ा है, कि वर्ष 1543 में कोपर्निकस इस पोलिश वैज्ञानिक ने सर्वप्रथम आविष्कार किया कि ‘अंतरिक्ष का केंद्र बिंदु सूर्य है, और पृथ्वी सूर्य के चारों ओर से घूमती है’। आधुनिक विज्ञान के अनुसार यह एक क्रांतिकारी और ऐतिहासिक शोध था, क्योंकि इसके पूर्व पाश्चात्य जगत बाइबल में लिखे अनुसार ‘पृथ्वी चपटी है’, ऐसा मानता था। साथ ही, सूर्य पृथ्वी के चारों ओर घूमता है ऐसा भी माना जाता था।</p>
<p style="text-align: justify;">लेकिन इसके हजारों वर्ष पहले, अपने पूर्वज अत्यंत स्पष्ट रूप से कहते आ रहे थे कि पृथ्वी गोल है और सूर्य के चारों ओर घूमती है।</p>
<p style="text-align: justify;">साधारणतः ढाई हजार वर्ष पूर्व के विष्णु पुराण के दूसरे भाग में आठवें अध्याय का 15वां श्लोक देखिए &#8211;</p>
<p style="text-align: center;"><strong>नैवास्त मनमर्कस्थ नोदयः सर्वदा स्तर।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>उदयास्तमनाख्यं हि दर्शनादर्शनं रवेः।।</strong></p>
<p style="text-align: justify;">अर्थात, ‘सत्य यह है कि सूर्य का उदय और अस्त नहीं होता है। वह एक ही स्थान पर स्थिर रहता है’।</p>
<p style="text-align: justify;">ऐसे ही प्राचीन यजुर्वेद के आरण्यक में आठवें अनुवाक का तीसरा वर्ग है &#8211;</p>
<p><img decoding="async" class="alignnone wp-image-9269" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/03/202412100957186d5e3-239x300.webp" alt="" width="1572" height="1973" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/03/202412100957186d5e3-239x300.webp 239w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/03/202412100957186d5e3.webp 438w" sizes="(max-width: 1572px) 100vw, 1572px" /></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>दाधर्व पृथ्वी भितो मयुखैः</strong></p>
<p style="text-align: justify;">अर्थात, ‘सूर्य पृथ्वी को सभी दिशाओं से (बाजूओं से) उसके किरणों की सहायता से बांधकर रखता है’।</p>
<p style="text-align: justify;">ऐसे अनेक उदाहरण है। चुंबक के बारे में भी वही है&#8230;</p>
<p style="text-align: justify;">चुंबक का आविष्कार अंग्रेज वैज्ञानिक विलियम गिलबर्ट ने सन 1600 में किया, ऐसा माना जाता है। अपने प्राचीन ग्रंथो में अनेक स्थानों पर चुंबक का नामोल्लेख आता है। विलियम गिलबर्ट के 500 वर्ष पहले, ‘रसार्णव’ इस रसायन विज्ञान के ग्रंथ में चुंबक का स्पष्ट और परिपूर्ण उल्लेख आता है। इस ग्रंथ के 40 वे अध्याय का 21 वा श्लोक है &#8211;</p>
<p style="text-align: center;"><strong>भ्रामकं चुंबकं चैव कर्षकं द्रावकं तथा।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>एवं चतुर्विधं कांतं रोमकांतंचं पंचमम् ।।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>एकद्वित्रीचतुः पंच सर्वतोमुखमेंव तत्।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>पीतं कृष्णं तथा रक्तं त्रिवर्णं स्यात् पृथक् पृथक्।।</strong></p>
<p style="text-align: justify;">अर्थात, इस श्लोक में केवल चुंबक का वर्णन या गुण नहीं है, अपितु पांच प्रकार के चुंबक बताए गए हैं।</p>
<ol style="text-align: justify;">
<li>ब्रह्मकम् 2. चुंबकम् 3. कर्षकम्  4. द्रावकम 5. रोम कंटकम।</li>
</ol>
<p style="text-align: justify;">इसमें से प्रत्येक चुंबक यह एक मुखी, द्विमुखी, त्रिमुखी आदि होते हैं। प्रत्येक चुंबक का रंग पीला, काला या लाल हो सकता है।</p>
<p style="text-align: justify;">ऐसे अनगिनत उदाहरण है। पाश्चात्य विद्वानों ने किए हुए अनेक आविष्कार, अनेक सिद्धांत हमारे पूर्वजों को पहले से ही ज्ञात थे। समाज में भी इस ज्ञान का सहजता से उपयोग होता था। और इसीलिए हो सकता है, ओपनहायमर जैसे वैज्ञानिकों को प्राचीन भारतीय ज्ञान ने आकर्षित किया होगा।</p>
<p><strong>और पढ़ें :</strong> <span style="color: #0000ff;"><strong><a style="color: #0000ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/oppenheimer-agreed-but-1/" target="_blank" rel="noopener">भारतीय ज्ञान का खजाना-38 (ओपनहायमर तो मान गए! लेकिन… – 1)</a></strong></span></p>
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		<title>भारतीय ज्ञान का खजाना-38 (ओपनहायमर तो मान गए! लेकिन&#8230; – 1)</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 06 Mar 2026 04:52:51 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>&#x270d; प्रशांत पोळ गत 2023 के 21 जुलाई को, क्रिस्टोफर नोलन का ‘ओपनहायमर’ चलचित्र, भारतीय सिनेमाघरों में प्रदर्शित हुआ। जे रॉबर्ट ओपनहायमर को सारा विश्व, ‘अणुबम’ के जनक के रूप&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"><img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/270d.png" alt="✍" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /> प्रशांत पोळ</p>
<p><img decoding="async" class="alignnone wp-image-9254" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/03/Geata-300x215.jpg" alt="" width="1508" height="1081" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/03/Geata-300x215.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/03/Geata-768x550.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/03/Geata.jpg 1024w" sizes="(max-width: 1508px) 100vw, 1508px" /></p>
<p style="text-align: justify;">गत 2023 के 21 जुलाई को, क्रिस्टोफर नोलन का ‘ओपनहायमर’ चलचित्र, भारतीय सिनेमाघरों में प्रदर्शित हुआ। जे रॉबर्ट ओपनहायमर को सारा विश्व, ‘अणुबम’ के जनक के रूप में जानता है। इसलिए, इस सिनेमा के बारे में लोगों के मन में उत्सुकता थी। भारत में यह सिनेमा चर्चित हुआ, वह अलग ही कारणों से। रॉबर्ट ओपनहायमर की भूमिका करने वाला किलीयन मर्फी, फ्लोरेंस बंग के साथ एक अंतरंग दृश्य में, ‘भगवद् गीता’ की कुछ पंक्तियां बोलता है, ऐसा एक दृश्य सिनेमा में दिखाया है। इस दृश्य के कारण यह सिनेमा भारत में विवादित हुआ। और विवादित होने के कारण हिट भी हुआ। इस दृश्य को छोड़ दे, तो भी सामान्य व्यक्ति के मन में एक बात पक्की बैठ गई, कि रॉबर्ट ओपनहायमर भारतीय दर्शन का प्रशंसक था, अनुगामी था। और भगवद् गीता का उसे गहरा अभ्यास था।</p>
<p style="text-align: justify;">रॉबर्ट ओपनहायमर मूलतः अमेरिकी भौतिक शास्त्रज्ञ थे। शोधकर्ता थे। धर्म से ज्यू थे। उनका जन्म न्यूयॉर्क का था, लेकिन उन्होंने भौतिक विज्ञान में डॉक्टरेट की, जर्मनी के गोटिंगगन विश्वविद्यालय से। वह वर्ष था 1927। इसी समय उनका परिचय भारतीय दर्शन से हुआ। जर्मन विश्वविद्यालयों में उन दिनों में भी संस्कृत का अध्ययन करने वाले और पढ़ाने वाले अनेक थे। इसलिए ओपनहायमर को भारतीय दर्शन, तत्वज्ञान और प्राचीन ग्रंथो में रुचि उत्पन्न हुई।</p>
<p style="text-align: justify;">आगे चलकर ओपनहायमर जब अमेरिका में बर्कले के कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय में पढ़ाने लगे, तब उन्होंने आर्थर राइडर इस संस्कृत प्राध्यापक की मदद से अनेक प्राचीन भारतीय ग्रथों का का अध्ययन किया। उनकी विशेष रुचि भगवद् गीता में थी। उनकी राय थी कि, ‘भगवद् गीता, विश्व के किसी भी भाषा के सबसे सुरीले दर्शन का गीत है’।</p>
<p style="text-align: justify;">(Bhagavad-Gita is the most beautiful philosophical song).</p>
<p style="text-align: justify;">उनके अध्ययन टेबल पर भगवद् गीता रखी रहती थी। अपने परिचितों को वह भगवद् गीता का अंग्रेज़ी अनुवाद भेंट के रूप में देते थे। आगे चलकर उन्होंने न्यू मैक्सिको के लॉस अलामोस के निकट, अलामोगार्दो में विश्व के पहले परमाणु बम का परीक्षण किया। इसलिए लॉस अलामोस के ब्रेडबरी साइंस म्यूजियम में, जो ‘यु एस नेशनल सिक्योरिटी रिसर्च सेंटर’ है, उस सेंटर में, ओपनहायमर की दो व्यक्तिगत वस्तुएं रखी है। एक है कुर्सी, जिस पर बैठकर अलामोस के उस ऑफिस में, ओपनहायमर ने, परमाणु विखंडन की बारिकियों पर काम किया था। दूसरी चीज है भगवद् गीता की वह प्रतिलिपि (कॉपी), जिसके प्रथम पृष्ठ पर ओपनहायमर ने उनके अद्याक्षर (initials) लिखे है।</p>
<p style="text-align: justify;">दूसरे विश्व युद्ध के समय अमेरिका को परमाणु बम तैयार करने की जल्दी थी। इसलिए लॉस अलामोस में 1943 के अप्रैल माह में एक प्रयोगशाला (लैब) प्रारंभ हुई। इसके प्रमुख के नाते ओपनहायमर की नियुक्ति हुई थी। इस प्रयोगशाला के पास ही, अलामोगार्दो यह परमाणु परीक्षण का स्थान था। विश्वयुद्ध अपने अंतिम चरण में था, तब रॉबर्ट ओपन हायमर ने, 16 जुलाई 1945 को, स्थानीय समय अनुसार, प्रात: 5:29 पर अलामोगार्दो में परमाणु का छोटा सा परीक्षण किया। इस परीक्षण को उन्होंने ‘ट्रिनिटी टेस्ट’ यह नाम दिया।</p>
<p style="text-align: justify;">यह परीक्षण एक जबरदस्त अनुभव था। लॉस अलामोस और आलामोगार्दो यह पूरा रेगिस्तान का प्रदेश है। इस प्रदेश में परीक्षण के समय अत्यंत प्रखर,अत्यंत तेजस्वी ऐसा प्रकाश निर्माण हुआ, और जबरदस्त ऊर्जा (ऊष्मा) निर्माण हुई।</p>
<p style="text-align: justify;">यह प्रकाश देखते ही रॉबर्ट ओपनहायमर को भगवद् गीता के ग्यारहवें अध्याय का 12वां श्लोक याद आया। अर्थात ओपनहायमर को संपूर्ण गीता कंठस्थ थी, और उसका अर्थ भी पता था।</p>
<p style="text-align: justify;">ओपनहायमर को जिस श्लोक का स्मरण आया, वह श्लोक था &#8211;</p>
<p style="text-align: center;"><strong>दिवी सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>यदि भाः सद्रृशी सा स्याद्धासस्तस्य महात्मा।।</strong></p>
<p style="text-align: justify;">बालमोहन लिमये ने इस श्लोक का अर्थ देते समय अर्जुनवाडकर जी के ‘गीतार्थ दर्शन’ की पंक्तियां दी है वह इस प्रकार है &#8211;</p>
<p style="text-align: center;"><strong>“हजारों सूरज की रोशनी होगी यदि प्रकट आकाश में एक ही समय।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>तो वह होगी शायद उस रोशनी जैसी जो है उस परमात्मा की।।”</strong></p>
<p style="text-align: justify;">कौरव पांडव युद्ध में अर्जुन को उपदेश करते समय भगवान श्रीकृष्ण जिस प्रकार अपने प्रखर और तेजस्वी रूप में प्रकट होते हैं, बिल्कुल वैसा ही अनुभव ओपनहायमर को परमाणु परीक्षण के समय आया है।</p>
<p style="text-align: justify;">सनद रहे, ओपनहायमर भावनाओं में बहकर, कुछ भी बोलने वाले व्यक्ति नहीं थे। वह विश्व के, पदार्थ विज्ञान के सर्वश्रेष्ठ वैज्ञानिक थे। वह परमाणु शास्त्रज्ञ थे।</p>
<p style="text-align: justify;">इस विश्व के, सबसे पहले, छोटे से परमाणु बम का विस्फोट होने के बाद, जमीन पर और आसमान में जो अभूतपूर्व स्थिति निर्माण हुई थी, उसके कारण रेगिस्तान की रेत पिघल कर उससे हल्के हरे रंग की कांच बन गई। यह स्थिति  अत्यंत भयावह थी। यह सब देखकर ओपनहायमर को गीता के 11वें अध्याय का 32वां श्लोक याद आया &#8211;</p>
<p style="text-align: center;"><strong>कालो</strong><strong>sस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो लोकांन्समाहतुमिहपम प्रवृत्ति।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>ऋते</strong><strong>sपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे यsवास्थितः प्रत्यनीकेषु योद्धा।।</strong></p>
<p style="text-align: justify;">अर्थात,</p>
<p style="text-align: justify;">विनाश का रूप हूँ मैं, दुर्दांत काल हूं मैं।</p>
<p style="text-align: justify;">लोगों का विनाश करने, प्रवृत्त हूँ मैं।।</p>
<p style="text-align: justify;">तू युद्ध कर, न कर, समाप्त होंगे सारे योद्धा।</p>
<p style="text-align: justify;">जो खड़े हैं, शत्रु के सैन्य में।।</p>
<p style="text-align: justify;">‘एक विश्व प्रसिद्ध, पदार्थ विज्ञान शोधकर्ता, परमाणु वैज्ञानिक, भारत के प्राचीन ग्रंथों से इतना प्रभावित है’ इतना ही इसका महत्व नहीं है। हमारे प्राचीन ज्ञान परंपरा में अनेक बातों की स्पष्टता थी, जो ओपनहायमर जैसे लोगों के समझ में आई, और उनके मन को छू गई।</p>
<p style="text-align: justify;">केवल गीता ही नहीं, तो भर्तुहरी के ‘शतकत्रय’ जैसे ग्रंथों का भी उन्होंने अध्ययन किया था। भर्तुहरि ने सौ-सौ श्लोकों के ‘नीति शतक’, ‘श्रृंगार शतक’, और ‘वैराग्य शतक’ लिखे। यह तीनों जिस ग्रंथ में है, वह ग्रंथ है ‘शतकत्रय’। विशेषतः जीवन से संबंधित तत्वज्ञान का, दर्शन का, सर्वांगीण विचार करने वाला यह ग्रंथ, ओपनहायमर संस्कृत में पढ़ते थे, यह विशेष है।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-9255" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/03/72894773_605-300x169.jpg" alt="" width="1614" height="909" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/03/72894773_605-300x169.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/03/72894773_605-1024x576.jpg 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/03/72894773_605-768x432.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/03/72894773_605.jpg 1199w" sizes="auto, (max-width: 1614px) 100vw, 1614px" /></p>
<p style="text-align: justify;">अनेक पदार्थ विज्ञान के वैज्ञानिकों को संस्कृत ग्रंथों का आकर्षण था, क्योंकि पदार्थ विज्ञान के अनेक मूलभूत सिद्धांत इन प्राचीन ग्रंथों में पहले से ही दिए हैं। ओपनहायमर का ही उदाहरण लेते हैं। पहले परमाणु विस्फोट के 7 वर्षों के बाद, ओपनहायमर रोचेस्टर विश्वविद्यालय में ‘परमाणु विखंडन’ इस विषय पर भाषण देने गए। भाषण के बाद प्रश्न-उत्तर के लिए समय था। उनमें एक विद्यार्थी ने ओपन हायमर को प्रश्न पूछा, “आलमोगार्दो में, मैनहैटन परियोजना में जो परमाणु का विस्फोट किया गया, वह पहला परमाणु विस्फोट था क्या?”</p>
<p style="text-align: justify;">ओपनहायमर ने तत्काल, बड़ी सहजता से जवाब दिया, “हां, आधुनिक कालखंड में निश्चित रूप से।”</p>
<p style="text-align: justify;">इस उत्तर से ओपन हायमर को वास्तव में क्या कहना था?</p>
<p style="text-align: justify;">(क्रमशः)</p>
<p><strong>और पढ़ें :</strong> <strong><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/ancient-bhartiya-justice-system-4/" target="_blank" rel="noopener">भारतीय ज्ञान का खजाना-37 (प्राचीन भारतीय न्याय व्यवस्था – ४)</a></span></strong></p>
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		<title>भारतीय ज्ञान का खजाना-37 (प्राचीन भारतीय न्याय व्यवस्था &#8211; ४)</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 05 Mar 2026 04:51:27 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[भारतीय ज्ञान का खजाना]]></category>
		<category><![CDATA[AncientJusticeSystem]]></category>
		<category><![CDATA[IndianHistory]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#x270d; प्रशांत पोळ विजयनगर साम्राज्य में न्याय व्यवस्था यह अनेक स्तरों पर रची हुई थी। ग्राम स्तर पर निर्णय ग्राम सभा लेती थी। यह ग्राम सभा गांव के बुजुर्ग, जानकार&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"><img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/270d.png" alt="✍" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /> प्रशांत पोळ</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-9245" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/03/ION-300x199.jpg" alt="" width="1728" height="1146" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/03/ION-300x199.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/03/ION-1024x678.jpg 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/03/ION-768x509.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1728px) 100vw, 1728px" /></p>
<p style="text-align: justify;">विजयनगर साम्राज्य में न्याय व्यवस्था यह अनेक स्तरों पर रची हुई थी। ग्राम स्तर पर निर्णय ग्राम सभा लेती थी। यह ग्राम सभा गांव के बुजुर्ग, जानकार लोग आपस में चर्चा करके तय करते थे। ग्राम सभा, साधक-बाधक और निःष्पक्ष रूप से निर्णय लेती थी। अगर यह निर्णय किसी व्यक्ति को मान्य नहीं होता था, तब वह व्यक्ति निर्णय के लिए शासकीय अधिकारी के पास जाती थी। वहां भी अगर समाधान नहीं मिला तब यह प्रकरण दंडनायक के पास जाता था। दंडनायक एक प्रकार से उसे क्षेत्र का न्यायालयीन प्रमुख होता था। दंडनायक के पास भी समाधान नहीं हुआ तो, महाप्रधानी के पास जाते थे। महाप्रधानी, सभा में प्रकरण को (केस को) चलाते थे। उनसे भी उचित निर्णय नहीं हुआ तो आवेदक राजा तक जा सकता था। राजा, मुख्य न्यायाधीश होता था। उसका धर्मशास्त्र का अध्ययन रहता था। और राजा का निर्णय अंतिम होता था। दोनों पक्षों को उसे स्वीकारना अनिवार्य होता था।</p>
<p style="text-align: justify;">विजयनगर साम्राज्य की स्थापना के प्रारंभिक काल में, जब बुक्का राय राज्य के प्रमुख थे, तब सन 1368 में जैन और वैष्णव पंथों में विवाद हुआ। किसी भी न्यायालय स्तर पर इस विवाद का निराकरण नहीं हो पाया। इसलिए यह विवाद बुक्का राय के सामने आया। राजा ने पूरा मामला संज्ञान में लिया। धर्मशास्त्र का आधार लिया,और अपना न्याय किया। यह न्याय दोनों पक्षों को सहर्ष मान्य हुआ। और दोनों पंथों के बीच का विवाद समाप्त हुआ।</p>
<p style="text-align: justify;">सन 1406 में दो गांवों में हुए विवाद के संदर्भ में जो कागज मिले हैं, उसमें विस्तृत जानकारी दी गई है। चिंगल पेट जिले के दो गांवों में पानी के कारण संघर्ष खड़ा हुआ। अंत में यह मामला महाप्रधानी के पास आया। उन्होंने उस प्रकरण को सफलता से सुलझाया। ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">सन 1446 में देवराया (द्वितीय), विजयनगर साम्राज्य के राजा थे, तब &#8216;पडाईवीडू&#8217; राज्य ने न्याय व्यवस्था में संशोधन (amendment) किया। इस राज्य ने कन्या शुल्क, अर्थात दहेज को गैर कानूनी बनाया। और उसके अनुसार कानून लागू किया। इसका अर्थ है, उस समय, किसी एक स्तर तक, साम्राज्य के मांडलिक राज्यों को सामान्य जनों के कल्याण के लिए, कानून में बदलाव करने की अनुमति थी।</p>
<p style="text-align: justify;">सन 1532 में अच्युतदेव राय राजा थे। उस समय विजयनगर साम्राज्य के उत्तर पूर्व में एक छोटा सा गांव था, &#8216;कवतला&#8217;। इस गांव के नागरिक, शासकीय अधिकारियों के जुल्म से, उन्होंने लगाए हुए जुल्मी करों के कारण और उन पर जो अन्याय हो रहा था उससे त्रस्त हो गए थे। इसी कारण से उन्होंने &#8216;कवतला&#8217; छोड़कर &#8216;मसावेया&#8217; इस गांव में स्थानांतरित होने का निर्णय लिया। अन्याय के कारण हुए इस स्थानांतरण का समाचार सुनकर, उसे क्षेत्र के महामंडलेश्वर &#8216;सलकाया देवासिका तिरुमला राजा महा&#8217; ने इस घटना की सुओ मोटो (Suo Moto) अर्थात, स्वयं आगे जाकर, जानकारी ली। वह उन स्थानांतरित नागरिकों से आकर मिले। उनकी शिकायतें सुनी। जुल्म ढाने वाले, अन्याय करनेवाले अधिकारियों पर पर मुकदमा चलाया। और उन सब स्थानांतरित नागरिकों को कवतला यह उनके स्वयं के गांव में पुनः स्थापित किया।</p>
<p style="text-align: justify;">व्यक्तिगत स्तर से लेकर राजनीति के स्तर तक, अनेक दीवानी और फौजदारी मामले, विजयनगर साम्राज्य के कालखंड में चलाए गए। इनमें से अधिकतम मामले इन ऐतिहासिक कागजों में मिलते हैं। इन सब मामलों में &#8216;धर्मशास्त्र&#8217; की अर्थात, याज्ञवल्क्य स्मृति, कात्यायन स्मृति, मिताक्षर आदि ग्रंथों की सहायता ली हुई है। इसलिए निर्णय निष्पक्ष रूप से, न्याय पूर्ण पद्धति से होते थे। यह निर्णय सामान्य जनता को मान्य होते थे। इसीलिए विजयनगर साम्राज्य में कानून व्यवस्था उच्च स्तर की थी। कहीं भी असंतोष नहीं था। ऐसा अनेक तत्कालीन विदेशी यात्रियों ने लिखकर रखा है।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-9246" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/03/D9FA2X1UEAA0ERE-300x168.jpg" alt="" width="1721" height="964" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/03/D9FA2X1UEAA0ERE-300x168.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/03/D9FA2X1UEAA0ERE.jpg 630w" sizes="auto, (max-width: 1721px) 100vw, 1721px" /></p>
<p style="text-align: justify;">आगे चलकर, महाराष्ट्र में 6 जून 1674 को जब छत्रपति शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक हुआ, तब उन्होंने राजकाज चलाने के लिए अष्टप्रधानों की नियुक्ति की। इन अष्टप्रधानों में दो पद विशेष रूप से कायदा &#8211; कानून और परंपरा जतन करने के लिए थे।</p>
<ol style="text-align: justify;">
<li>न्यायाधीश 2. पंडित राव</li>
</ol>
<p style="text-align: justify;">इनमें से पंडित राव यह पद प्रमुखता से धार्मिक विधि और परंपराओं की व्यवस्था देखने के लिए था। किंतु पंडित राव के पद पर रहने वाली व्यक्ति, धार्मिक और पारंपरिक विवादों में न्याय दान का भी काम करती थी। स्वराज के प्रथम पंडित राव थे &#8211; मोरेश्वर पंडित।</p>
<p style="text-align: justify;">निराजी पंत रावजी यह हिंदवी स्वराज्य के पहले सर न्यायाधीश थे। दीवानी और फौजदारी दोनों प्रकार के मामलों में निर्णय देकर जनता को न्याय दिलाने का काम करते थे।</p>
<p style="text-align: justify;">निराजी रावजी के ही पुत्र प्रहलाद निराजी यह छत्रपति संभाजी महाराज के समय, अर्थात 1682 से 1688 इस कालखंड में, स्वराज्य के मुख्य न्यायाधीश थे। यह  कालखंड अस्थिरता का और युद्ध का कालखंड था। फिर भी इस कालखंड में न्याय दान का कार्य व्यवस्थित रूप से चल रहा था।</p>
<p style="text-align: justify;">पेशवाओं के कार्यकाल में भी न्याय दान की पद्धति सुव्यवस्थित थी। ग्राम स्तर पर &#8216;गोतसभा&#8217; या &#8216;ग्राम सभा&#8217; न्याय देने वाली प्रारंभिक सीढ़ी थी। सर्वोच्च स्थान पर न्यायाधीश यह पद था, जो पुणे में रहता था। औरंगजेब के मृत्यु के बाद मराठाशाही स्थिर हो रही थी। तब 1709 से 1719 तक सखो विट्ठल यह मुख्य न्यायाधीश थे।</p>
<p style="text-align: justify;">आगे चलकर, रामशास्त्री प्रभुणे 1750 में पेशवा के शास्त्री मंडल में दाखिल हुए। पुणे दरबार के न्यायाधीश इस पद पर उनकी नियुक्ति हुई। माधवराव पेशवा ने उन्हें सर न्यायाधीश नियुक्त किया। नारायण राव पेशवा की हत्या के जुर्म में उन्होंने प्रत्यक्ष रघुनाथ राव पेशवा को ही देहांत प्रायश्चित, अर्थात मृत्यु की सजा सुनायी।</p>
<p style="text-align: justify;">कुल मिलाकर, अंग्रेजों का राज आने तक, भारत में एक व्यवस्थित दस्तावेजीकरण (Well documented) से परिपूर्ण, न्याय प्रणाली कार्यरत थी। इस न्याय व्यवस्था का आधार धर्मशास्त्र के ग्रंथ थे। यहां &#8216;धर्म&#8217; यह रिलिजन के अर्थ से उपयोग नहीं होता था। इन धर्म ग्रंथों द्वारा दिए गए निर्णय सर्वमान्य होते थे। इसीलिए इस्लामी आक्रांता आने तक अपने देश में व्यवस्था के प्रति असंतोष नहीं था। क्योंकि राज्य यह &#8216;धर्म &#8216;से चलने वाला राज्य होता था।</p>
<p style="text-align: justify;">अंग्रेजों ने उनके प्रारंभिक कालखंड में, अर्थात बंगाल पर उनके शासन स्थापित होने के बाद, न्याय देते समय हिंदू धर्म ग्रंथों का आधार लिया था। परंतु वह केवल प्रारंभ में। बाद में उन्होंने अपने कायदे-कानून चलाना प्रारंभ किया।</p>
<p style="text-align: justify;">इंग्लैंड के जो कानून भारत में लगाए गए, उनका मुख्य आधार &#8216;व्यक्ति का अधिकार&#8217; था। यह कल्पना हमारे न्याय व्यवस्था के बिल्कुल विपरीत थी। भारतीय न्याय व्यवस्था का आधार यह &#8216;व्यक्ति का अधिकार&#8217; नहीं था, अपितु &#8216;व्यक्ति का कर्तव्य&#8217; था। प्राचीन पारंपरिक हिंदू न्याय शास्त्र में &#8216;व्यक्ति के अधिकार&#8217; यह विषय ही नहीं था। संपूर्ण न्याय शास्त्र ही &#8216;सामान्य नागरिकों का कर्तव्य&#8217; इस विषय पर आधारित था।</p>
<p style="text-align: justify;">अर्थात, मूल संकल्पना ही बदल गई। इसके कारण हमारा समाज जीवन भी बदला। लोगों का न्याय मिलने वाले पद्धति को देखने का दृष्टिकोण भी बदला। और लाखों मामले, प्रलंबित अवस्था में वर्षों तक रहने लगे।</p>
<p><strong>और पढ़ें : <span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/ancient-bhartiya-justice-system-3/" target="_blank" rel="noopener">भारतीय ज्ञान का खजाना-36 (प्राचीन भारतीय न्याय व्यवस्था – ३)</a></span></strong></p>
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		<title>भारतीय ज्ञान का खजाना-36 (प्राचीन भारतीय न्याय व्यवस्था &#8211; ३)</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 03 Mar 2026 09:44:56 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[भारतीय ज्ञान का खजाना]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#x270d; प्रशांत पोळ प्राचीन भारत के न्याय व्यवस्था की चर्चा करते हुए पिछले भाग में हमने कुछ &#8216;स्मृतियों&#8217; की चर्चा की। कात्यायन स्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति जैसे ग्रंथ अपने प्राचीन न्याय&#8230; </p>
<p>The post <a href="https://rashtriyashiksha.com/ancient-bhartiya-justice-system-3/">भारतीय ज्ञान का खजाना-36 (प्राचीन भारतीय न्याय व्यवस्था &#8211; ३)</a> appeared first on <a href="https://rashtriyashiksha.com">राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"><img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/270d.png" alt="✍" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /> प्रशांत पोळ</p>
<p style="text-align: justify;">प्राचीन भारत के न्याय व्यवस्था की चर्चा करते हुए पिछले भाग में हमने कुछ &#8216;स्मृतियों&#8217; की चर्चा की। कात्यायन स्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति जैसे ग्रंथ अपने प्राचीन न्याय व्यवस्था के आधार स्तंभ थे।</p>
<p style="text-align: justify;">मात्र इन दो-ढाई हजार वर्ष पुराने ग्रंथों के आधार पर भारत में न्याय होता था, यह कहना पूर्ण सही नहीं है। भारतीयों की, अर्थात हिंदुओं की, विशेषता है कि वह देश-काल-परिस्थिति अनुसार अपने व्यवस्थाओं और नियमों को युगानुकूल परिष्कृत करते जाते हैं। &#8216;जो पुराना है, प्राचीन है, वही सब अच्छा है&#8217; यह कुएं के मेंढकों की मानसिकता अपनी (हिंदुओं की) नहीं है। इस परिप्रेक्ष्य में हमारे देश में &#8216;भाष्य&#8217; यह समयानुसार, लिखे गए वेदों को / उपनिषदों को / स्मृतियों को परिष्कृत करने की एक सर्वमान्य पद्धति थी।</p>
<p style="text-align: justify;">इसी कारण धर्मशास्त्र पर (अर्थात न्याय प्रणाली पर) लिखे गए लगभग सभी ग्रथों पर, समय-समय पर भाष्य लिखा गया। इस्लामी आक्रांता भारत में आने तक यह परंपरा कायम थी। आगे चलकर वह कम होती चली गई।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone  wp-image-9236" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/03/90ec5920e6037b5705e6340f19f2f1ee-300x231.jpg" alt="" width="1723" height="1327" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/03/90ec5920e6037b5705e6340f19f2f1ee-300x231.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/03/90ec5920e6037b5705e6340f19f2f1ee.jpg 600w" sizes="auto, (max-width: 1723px) 100vw, 1723px" /></p>
<p style="text-align: justify;">याज्ञवल्क्य स्मृति पर मिथिला नगर के वाचस्पती मिश्र ने भाष्य लिखा। सन 900 से 980 यह उनका कार्यकाल था। उनके अनेक ग्रथों में से &#8216;न्याय सूचि निबंध&#8217; और &#8216;न्याय वर्तिका तात्पर्य टीका&#8217;, यह दो ग्रंथ न्याय व्यवस्था पर है। इनमें से पहला ग्रंथ अर्थात, &#8216;न्यायसूचि निबंध&#8217; यह, अक्षय पद गौतम के &#8216;न्याय सूत्र&#8217; इस ग्रंथ पर प्रमुखता से भाष्य करता है। अक्षयपद गौतम का कालखंड यह ईसा पूर्व 200 वर्ष का था। इसी &#8216;न्याय सूत्र&#8217; पर, आगे चलकर उद्योतकर, भविविक्त, अविधा कर्ण, जयंत भट आदि अनेक विद्वानों ने भाष्य लिखे हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">ग्यारहवी सदी में, दक्षिण में चालुक्यों के राज्य में, &#8216;विज्ञानेश्वर&#8217; नाम के न्यायाधीश ने याज्ञवल्क्य स्मृति पर भाष्य लिखा है। यह भाष्य &#8216;मिताक्षरा&#8217; नाम से प्रसिद्ध है। इस &#8216;मिताक्षरा&#8217; ग्रंथ में अन्य विषयों के साथ ही, &#8216;जन्म के साथ मिलने वाला उत्तराधिकार&#8217; (Inheritance by birth) इस विषय पर विस्तृत विवेचन है।</p>
<p style="text-align: justify;">विज्ञानेश्वर ने लिखे हुए इस ग्रंथ के लगभग 100 वर्षों के बाद, बंगाल के &#8216;जीमूतवाहन&#8217; इस परिभद्र कुल के व्यक्ति ने &#8216;दायभाग&#8217; यह ग्रंथ &#8216;उत्तराधिकार&#8217; इसी विषय पर लिखा।</p>
<p style="text-align: justify;">अगले 800 वर्ष, बृहद बंगाल (आज के बांग्लादेश सहित) और असम प्रांत में, उत्तराधिकारी संबंधित सभी न्याय दान में &#8216;दायभाग&#8217; यह ग्रंथ प्रमाण माना गया है। लेकिन शेष भारत के उत्तराधिकार संबंधित मामलों में, &#8216;मिताक्षरा&#8217; इस ग्रंथ के आधार पर न्याय दिया जाने लगा। आगे चलकर पन्द्रहवीं सदी में, चैतन्य महाप्रभु के सहपाठी रह चुके, बंगाल के ही रघुनंदन भट्टाचार्य ने &#8216;दायभाग&#8217; पर भाष्य लिखा। कई स्थानों पर यह भाष्य प्रमाण माना जाता था। अंग्रेजों के शासन के प्रारंभिक काल खंड में, न्याय देते समय हिंदू विधि का उपयोग किया जाता था। अंग्रेजों की पहली सत्ता बंगाल में स्थापन होने के कारण देश का पहला हाई कोर्ट, वर्ष 1862 में कोलकाता में स्थापना हुआ। इस कोलकाता उच्च न्यायालय ने, उत्तराधिकार इस विषय में रघुनंदन भट्टाचार्य के &#8216;दायभाग&#8217; पर लिखा गया भाष्य प्रमाण माना था।</p>
<p style="text-align: justify;">मिताक्षरा&#8217; यह शेष भारत में सर्वमान्य संदर्भ ग्रंथ माना जाता था, लेकिन उसके पांच अलग-अलग प्रकार (variants) थे।</p>
<ol style="text-align: justify;">
<li>काशी 2. मिथिला 3. मद्रास      4. मुंबई       5. पंजाब</li>
</ol>
<p style="text-align: justify;">सन 2005 में न्यायमूर्ति मार्कंडेय काटजू ने &#8216;मिताक्षरा का आज के संदर्भ में महत्व&#8217; इस विषय पर एक दीर्घ लेख लिखा। इसमें वह कहते हैं कि, &#8216;पचास के दशक में भारतीय संसद ने सब पुराने हिंदू कानून रद्द करके नए कानून तैयार किये। इसलिए दैनंदिन न्याय प्रणाली में मिताक्षरा के संदर्भ समाप्त हुए। फिर भी, भारतीय न्यायालय व्यवस्था समझने के लिए मिताक्षरा आज भी उपयुक्त है।&#8217;</p>
<p style="text-align: justify;">अर्थात इन स्मृतियाओं का, या उन पर लिखे गए भाष्य का, विचार किया तो साधारणतः ढाई से तीन हजार वर्ष पहले के ग्रंथों से हमें सुव्यवस्थित न्याय व्यवस्था का विस्तृत विवरण मिलता है। यह न्याय व्यवस्था केवल कात्यायन स्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति, मिताक्षरा, दायभाग ऐसे ग्रंथों तक सीमित नहीं थी, तो प्रत्यक्ष समाज में इसका उपयोग होता था। इस्लामी आक्रांताओं ने जो विध्वंस किया, उसके कारण हमारे पास पुराने आलेख, पुराने कागजात उपलब्ध नहीं है। लेकिन जो मिले हैं, जो शिलालेख, ताम्रपट मिलते हैं, उनसे यह स्पष्ट होता है कि, भारत में एक परिपूर्ण सुव्यवस्थित न्याय व्यवस्था थी। सत्ता किसी की भी हो, राजा कोई भी हो, परंतु धर्मशास्त्र ने दी हुई यह न्याय व्यवस्था सर्वमान्य थी और सबके लिए बंधनकारक थी।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone  wp-image-9235" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/03/896-300x200.jpg" alt="" width="1727" height="1151" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/03/896-300x200.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/03/896-1024x683.jpg 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/03/896-768x512.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/03/896-1536x1025.jpg 1536w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/03/896-2048x1366.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 1727px) 100vw, 1727px" /></p>
<p style="text-align: justify;">विजयनगर साम्राज्य (वर्ष 1336 -1646) के बाद छत्रपति शिवाजी महाराज के हिंदवी स्वराज्य में और आगे चलकर, पेशवा के राज्य में भी, न्याय व्यवस्था अच्छी थी। विजयनगर साम्राज्य की जो पांडुलिपियां मिली है, उनसे उस समय की समाज व्यवस्था, न्याय पद्धति, दंड शासन आदि बातों का स्पष्ट चित्र हमारे सामने आता है। विजयनगर साम्राज्य के आदि गुरु विद्यारण्य अर्थात माधवाचार्य ने पाराशर स्मृति पर &#8216;प्रसार माधवीय&#8217; ग्रंथ लिखा है। इस ग्रंथ के &#8216;व्यवहार कांड&#8217; प्रकरण में न्याय व्यवस्था के यम-नियम विस्तार से दिए हैं। मंगलौर के भास्कर आनंद सालटोर की, विजयनगर साम्राज्य की न्याय व्यवस्था के संदर्भ में एक अच्छी पुस्तक उपलब्ध है, &#8211; &#8216;Justice System of Vijaynagara&#8217;। इसमें उन्होंने विजयनगर साम्राज्य के न्याय व्यवस्था का विस्तार से वर्णन किया है। साथ ही विजयनगर साम्राज्य में घटित अनेक महत्वपूर्ण न्याय दानों की, अर्थात, कानूनी मामलों के निर्णयों की, जानकारी भी दी है।</p>
<p style="text-align: justify;">(क्रमशः)</p>
<p><strong>और पढ़ें : <span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/ancient-bhartiya-justice-system-2/" target="_blank" rel="noopener">भारतीय ज्ञान का खजाना-35 (प्राचीन भारतीय न्याय व्यवस्था – २)</a></span></strong></p>
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		<title>भारतीय ज्ञान का खजाना-35 (प्राचीन भारतीय न्याय व्यवस्था &#8211; २)</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 03 Mar 2026 05:19:11 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[भारतीय ज्ञान का खजाना]]></category>
		<category><![CDATA[कात्यायनस्मृति]]></category>
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		<category><![CDATA[न्यायप्रणाली]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#x270d; प्रशांत पोळ संपूर्ण कात्यायन स्मृति में, न्यायालय की परिभाषा से लेकर, विविध प्रसंगों में किस प्रकार से न्यायदान करना चाहिए, इस पर विस्तार से चर्चा की है। न्यायालय की&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"><img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/270d.png" alt="✍" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /> प्रशांत पोळ</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-9229" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/03/ANawabHoldingCourt-19ThCentury-IndianVintageMiniaturePainting-VintageIndianMiniatureArtPainting_large-300x256.jpg" alt="" width="1724" height="1471" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/03/ANawabHoldingCourt-19ThCentury-IndianVintageMiniaturePainting-VintageIndianMiniatureArtPainting_large-300x256.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/03/ANawabHoldingCourt-19ThCentury-IndianVintageMiniaturePainting-VintageIndianMiniatureArtPainting_large.jpg 480w" sizes="auto, (max-width: 1724px) 100vw, 1724px" /></p>
<p style="text-align: justify;">संपूर्ण कात्यायन स्मृति में, न्यायालय की परिभाषा से लेकर, विविध प्रसंगों में किस प्रकार से न्यायदान करना चाहिए, इस पर विस्तार से चर्चा की है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>न्यायालय की परिभाषा</strong></p>
<p style="text-align: justify;">धर्मशास्त्र विचारेण मूलसार विवेचनम्</p>
<p style="text-align: justify;">यत्राधिक्रियते स्थाने, धर्माधिकरणम् हितत्  ।।52।।</p>
<p style="text-align: justify;">(The place, where the decision of the truth of the plaint, i.e. lit, the cause or root of the dispute, is carried on by a consideration of the (rules of the) sacred law is (called) the Hall of Justice.)</p>
<p style="text-align: justify;">धर्माधिकरण याने न्यायालय।</p>
<p style="text-align: justify;">मजेदार बात यह है कि, कात्यायन स्मृति में फिर्यादी को किस प्रकार के प्रश्न पूछने चाहिए इसका भी विस्तार से वर्णन किया ह,।</p>
<p style="text-align: justify;">प्रश्न प्रकार &#8211;</p>
<p style="text-align: center;"><strong>काले कार्यार्थिनं पृच्छेत प्रणतंपुरतःस्थितं।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>किं कार्य  का च ते पीडा मा भैषीब्रूहि मानव।।86।।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>केन कस्मिकंदाकस्मातपृच्छे  देवं सभागतः।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>एवं पृष्ठः सयद्ब्रूयात्तत्सभ्यै ब्राह्मणैः सहः ।।87।।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>विमृश्य कार्यं न्यायंचेदाव्हानार्थमतः परम्।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>मुद्रां वा निक्षेपेत्तस्मिन्पुरुषं वा समादिशेत ।।88।।</strong></p>
<p style="text-align: justify;">अर्थात, न्यायाधीश ने पक्षकार को (जो फरियाद लेकर आया है), न्यायालय के उचित समय पर, प्रश्न पूछना चाहिए। यह पूछते समय, पक्षकार ने न्यायाधीश के सामने आदब से खड़ा रहना है। न्यायाधीश पूछेंगे, “आपकी शिकायत क्या है? आपको कहीं चोट तो नही आई हैं? डरिए मत&#8230;” आदि।</p>
<p style="text-align: justify;">इसके बाद न्यायाधीश ने पूछना है, “किसके कारण, कहां, कब, (दिन के किस समय) और क्यों ? आपको तकलीफ हुई, या आप क्यों शिकायत कर रहे हैं?” इन प्रश्नों पर पक्षकार जो कहता है, वह न्यायालय ने शांति से सुनना है। उस न्यायालय में उपस्थित मूल्यांकन कर्ताओं की (आज की भाषा में ‘जूरी सदस्य’) मदद से, उनकी सलाह पर, न्यायमूर्ति ने यह तय करना है कि यह शिकायत / यह प्रकरण न्याय प्रविष्ट होने योग्य है या नहीं? अगर है, तो न्यायमूर्ति ने संबंधित गुनहगार को हाजिर करने के लिए संबंधित अधिकारियों को आज्ञा देनी है।</p>
<p style="text-align: justify;">कितना अद्भुत है यह सब..! पां. वा. काणे के कहे अनुसार, हम आश्चर्यचकित हो जाते हैं, यह सब पढ़कर! कितने विस्तार से पूरी न्याय प्रणाली (न्याय की पद्धति / प्रक्रिया) समझायी है। सनद रहे, कम से कम दो-ढाई हजार वर्ष पूर्व, अपने देश में इतनी व्यवस्थित, और ठीक से दस्तावेजीकरण (Well documented) की हुई, न्याय व्यवस्था अस्तित्व में थी।</p>
<p style="text-align: justify;">और हमें पढ़ाया गया कि भारत में न्याय व्यवस्था लायी, वह अंग्रेजों ने..!</p>
<p style="text-align: justify;">एक हजार से अधिक श्लोक कात्यायन स्मृति में है। यह ग्रंथ विस्तृत धर्मशास्त्र का एक हिस्सा है। इस का अर्थ है, हमारे पूर्वजों ने एक सुव्यवस्थित न्याय प्रणाली विकसित करके उसका उपयोग किया था।</p>
<p style="text-align: justify;">इसीलिए समाज में किसी पर भी अन्याय नहीं होता था, और कानून व्यवस्था सही रूप में लागू की जा रही थी।</p>
<p style="text-align: justify;">धर्मशास्त्र का (अर्थात न्याय शास्त्र का), विस्तृत विवेचन करने वाला कात्यायन स्मृति यह एकमात्र ग्रंथ नहीं था। साधारणत: ढाई हजार वर्ष पुराना, या उससे भी प्राचीन, ‘याज्ञवल्क्य स्मृति’ यह ग्रंथ भी, भारतीय न्याय पद्धति की विस्तृत विवेचना करता है। इस ग्रंथ में कुल 1003 श्लोक है, जो तीन खंडों में विभाजित है।</p>
<ol style="text-align: justify;">
<li>आचार कांड &#8211; इसमें तेरह अध्याय है। ब्रह्मचारी, विवाह, गृहस्थ, भक्ष्याभक्ष्य, द्रव्यशुद्धी, दान, श्राद्ध, राज धर्म इत्यादि विषयों पर इसमें विवेचन किया है।</li>
<li>व्यवहार कांड &#8211; 25 अध्याय के इस कांड में सीमावाद, स्वामीपालवाद, अस्वामी विक्रम, दत्तक प्रधानिक (गोद लेना), वेतन, दान, वाकपारूष्य आदि विषय और उनके यम-नियम का वर्णन है।</li>
<li>प्रायश्चित कांड &#8211; इसमें 6 अध्याय है। शौच प्रकरण, आपधर्म प्रकरण, वानप्रस्थ, यति धर्म प्रकरण, प्रायश्चित प्रकरण जैसे विषय इसमें आते हैं।</li>
</ol>
<p style="text-align: justify;">अंग्रेजों का शासन भारत में जब तक अच्छी तरह स्थिर नहीं हुआ था, तब तक, मुख्य रूप से ‘याज्ञवल्क्य स्मृति’ के आधार पर न्यायदान के काम चलते थे। याज्ञवल्क्य ऋषि मिथिला के थे। शुक्ल यजुर्वेद और ‘शतपथ ब्राह्मण’ उपनिषद के रचयिता थे।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone  wp-image-9232" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/03/Yajnavalkya_and_Janaka-300x225.jpg" alt="" width="1728" height="1296" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/03/Yajnavalkya_and_Janaka-300x225.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/03/Yajnavalkya_and_Janaka-1024x768.jpg 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/03/Yajnavalkya_and_Janaka-768x576.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/03/Yajnavalkya_and_Janaka-1536x1152.jpg 1536w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/03/Yajnavalkya_and_Janaka.jpg 1600w" sizes="auto, (max-width: 1728px) 100vw, 1728px" /></p>
<p style="text-align: justify;">याज्ञवल्क्य स्मृति में, पंचायत समिति (ग्राम पंचायत) में व्यवस्था कैसी होनी चाहिए इस विवेचन से लेकर, राज्य के मुख्य न्यायाधीश ने, या राजा ने, किस प्रकार से न्याय देना चाहिए, इसकी विस्तार से चर्चा की है।</p>
<p style="text-align: justify;">पिछले कुछ वर्षों से अपने देश में ‘मनुस्मृति’ की बहुत चर्चा हुई है। ‘भारत की प्राचीन समाज व्यवस्था और न्याय व्यवस्था मनुस्मृति के ही आधार पर चलती थी’ ऐसा चित्र निर्माण किया गया हैं। यह गलत है।</p>
<p style="text-align: justify;">भारत के न्याय व्यवस्था के संदर्भ में मनुस्मृति यह मुख्य संदर्भ ग्रंथ कभी नहीं था। अनेक संदर्भ ग्रंथों में से एक था, यह सच है। ‘दंड विधान’ में, अर्थात सजा देने मे मनुस्मृति का कुछ अंशों में उपयोग होता था, यह भी सच हैं। किंतु केवल इतना ही..! जो महत्व कात्यायन स्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति, पाराशर स्मृति को था, उतना महत्व मनुस्मृति को निश्चित रूप से नहीं था।</p>
<p style="text-align: justify;">किंतु ‘इन दो-ढाई हजार वर्ष पुरानी स्मृतियों के आधार पर ही, भारत की न्याय व्यवस्था चलती थी’ यह विधान पूर्ण सत्य नहीं है। यह अर्ध सत्य है।</p>
<p style="text-align: justify;">(क्रमशः)</p>
<p>ओर पढ़ें : <a href="https://rashtriyashiksha.com/ancient-bhartiya-justice-system/" target="_blank" rel="noopener">भारतीय ज्ञान का खजाना-34 (प्राचीन भारतीय न्याय व्यवस्था – १)</a></p>
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		<title>शिक्षा का नया सूर्योदय : भारत 2025</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 20 Jan 2026 05:51:42 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>जब इतिहास भविष्य से हाथ मिलाता है, तब परिवर्तन केवल दिखाई नहीं देता—वह अनुभव किया जाता है। वर्ष 2025 भारत की शिक्षा व्यवस्था के लिए ऐसा ही एक वर्ष रहा,&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-9205" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/01/WhatsApp-Image-2026-01-20-at-12.50.46-PM-300x224.jpeg" alt="" width="1631" height="1218" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/01/WhatsApp-Image-2026-01-20-at-12.50.46-PM-300x224.jpeg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/01/WhatsApp-Image-2026-01-20-at-12.50.46-PM-1024x765.jpeg 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/01/WhatsApp-Image-2026-01-20-at-12.50.46-PM-768x573.jpeg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/01/WhatsApp-Image-2026-01-20-at-12.50.46-PM.jpeg 1200w" sizes="auto, (max-width: 1631px) 100vw, 1631px" /></p>
<p style="text-align: justify;">जब इतिहास भविष्य से हाथ मिलाता है, तब परिवर्तन केवल दिखाई नहीं देता—वह अनुभव किया जाता है। वर्ष 2025 भारत की शिक्षा व्यवस्था के लिए ऐसा ही एक वर्ष रहा, जिसने यह स्पष्ट कर दिया कि शिक्षा अब केवल परीक्षा पास करने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि राष्ट्र के पुनर्निर्माण की यात्रा है।</p>
<p style="text-align: justify;">बीते वर्षों में शिक्षा सुधारों की अनेक घोषणाएँ हुईं, पर 2025 वह वर्ष बना जब नीतियाँ काग़ज़ से निकलकर कक्षा-कक्ष तक पहुँचीं। वर्ष 2025 में घटी 12 बड़ी घटनाएं इस परिवर्तन का दर्पण है, जिसमें भारत की शिक्षा अपने पुराने स्वरूप को त्यागकर आत्मबोध और आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ती दिखाई देती है।</p>
<p style="text-align: justify;">उच्च शिक्षा के क्षेत्र में विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक, 2025 ने एक नए अध्याय की शुरुआत की। यह विधेयक नियमन की जटिलताओं को सरल बनाकर संस्थानों को अधिक स्वायत्तता और उत्तरदायित्व देता है। इससे विश्वविद्यालय अब केवल डिग्री बाँटने वाले केंद्र नहीं, बल्कि ज्ञान-सृजन और नवाचार के जीवंत मंच बनने की ओर अग्रसर हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">विद्यालयी शिक्षा में 2025 का एक महत्वपूर्ण दृश्य वह है, जहाँ प्रार्थना सभा में बच्चों के स्वर में ‘वंदे मातरम्’ गूँजता है। उत्तर प्रदेश और राजस्थान में यह निर्णय शिक्षा को भावनात्मक और सांस्कृतिक धरातल पर मजबूती देता है। यह बताता है कि शिक्षा केवल मस्तिष्क को नहीं, हृदय को भी संस्कारित करती है।</p>
<p style="text-align: justify;">स्वास्थ्य और शिक्षा का संगम तब दिखाई देता है, जब 10,650 नई MBBS सीटों की घोषणा होती है। यह केवल आँकड़ा नहीं, बल्कि आने वाले वर्षों में लाखों जीवन को बेहतर चिकित्सा मिलने की आशा है। यह कदम दर्शाता है कि शिक्षा अब समाज की वास्तविक आवश्यकताओं से जुड़ रही है।</p>
<p style="text-align: justify;">तकनीक के बिना भविष्य की कल्पना अधूरी है, और 2025 ने इसे स्वीकार भी किया। SOAR Initiative और NIELIT डिजिटल विश्वविद्यालय जैसे प्रयास बताते हैं कि भारत अब आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस और डिजिटल कौशल को विलासिता नहीं, बल्कि आवश्यक साक्षरता मान रहा है। गाँव-कस्बों तक डिजिटल शिक्षा की पहुँच, शिक्षा के लोकतंत्रीकरण की दिशा में बड़ा कदम है।</p>
<p style="text-align: justify;">भारतीय ज्ञान परंपरा के संरक्षण की दृष्टि से ज्ञान भारतम् पोर्टल का शुभारंभ एक सांस्कृतिक उत्सव जैसा है। सदियों पुरानी पांडुलिपियाँ, जो अब तक अलमारियों और संग्रहालयों तक सीमित थीं, डिजिटल संसार में प्रवेश कर रही हैं। यह पहल भारत को फिर से ज्ञान का वैश्विक केंद्र बनाने की दिशा में सार्थक प्रयास है।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone  wp-image-9198" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/01/2.1-300x134.jpg" alt="" width="1726" height="771" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/01/2.1-300x134.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/01/2.1-1024x457.jpg 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/01/2.1-768x343.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/01/2.1.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 1726px) 100vw, 1726px" /></p>
<p style="text-align: justify;">साक्षरता के मोर्चे पर भी 2025 उम्मीदों से भरा रहा। हिमाचल प्रदेश, मिज़ोरम, त्रिपुरा और गोवा का पूर्ण साक्षर घोषित होना यह प्रमाण है कि शिक्षा अब केवल नीति नहीं, जन-आंदोलन बन रही है। यह उपलब्धि उन शिक्षकों, स्वयंसेवकों और छात्रों की मेहनत का प्रतिफल है, जिन्होंने शिक्षा को घर-घर पहुँचाया।</p>
<p style="text-align: justify;">उच्च शिक्षा का अंतरराष्ट्रीयकरण भी इस वर्ष नई ऊँचाइयों पर पहुँचा। विदेशी विश्वविद्यालयों के भारतीय परिसरों और IIM अहमदाबाद के दुबई कैंपस ने यह संदेश दिया कि भारतीय शिक्षा अब आत्मविश्वास से वैश्विक मंच पर कदम रख रही है।</p>
<p style="text-align: justify;">NCERT द्वारा पाठ्यक्रम संशोधन ने शिक्षा को उसकी जड़ों से जोड़ने का प्रयास किया। भारतीय इतिहास, संस्कृति और राष्ट्रीय नायकों का समावेश विद्यार्थियों में आत्मगौरव और पहचान की भावना विकसित करता है।</p>
<p style="text-align: justify;">अंततः, वर्ष 2025 की शिक्षा व्यवस्था यह कहती प्रतीत होती है—“शिक्षा केवल भविष्य की तैयारी नहीं, वह स्वयं भविष्य का निर्माण है।” यदि यही दिशा बनी रही, तो भारत की शिक्षा न केवल देश को सशक्त बनाएगी, बल्कि विश्व को भी मार्गदर्शन देने में सक्षम होगी।</p>
<p style="text-align: justify;">(स्रोत- Report: Education in Bharat &#8211; Big movements of 2025)</p>
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		<title>भारतीय ज्ञान का खजाना-34 (प्राचीन भारतीय न्याय व्यवस्था &#8211; १)</title>
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		<pubDate>Sat, 04 Oct 2025 03:07:08 +0000</pubDate>
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		<category><![CDATA[भारतीय ज्ञान का खजाना]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>✍ प्रशांत पोळ सामान्यतः ऐसा माना जाता है (और जो शालेय/ महाविद्यालयीन शिक्षा से और दृढ़ होता गया है) कि, न्याय प्रणाली, न्यायालय, न्यायमूर्ती, वकील&#8230;. यह सब व्यवस्थाएं अंग्रेजों ने&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"><img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/270d.png" alt="✍" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /> प्रशांत पोळ</p>
<p style="text-align: justify;">सामान्यतः ऐसा माना जाता है (और जो शालेय/ महाविद्यालयीन शिक्षा से और दृढ़ होता गया है) कि, न्याय प्रणाली, न्यायालय, न्यायमूर्ती, वकील&#8230;. यह सब व्यवस्थाएं अंग्रेजों ने भारत में लायी। अंग्रेज आने से पहले भारत में यह कुछ भी नहीं था। यदि जनता की कोई शिकायतें होती थी, तो वह सीधे राजा के सामने रखी जाती थी। राजा उसके मनमर्जी से, या उस समय उसकी जो मनस्थिति रही होगी, उस प्रकार निर्णय देता था।</p>
<p style="text-align: justify;">परंतु वास्तविक चित्र क्या है?</p>
<p style="text-align: justify;">हजारों वर्षों से अपने देश में सुव्यवस्थित न्याय प्रणाली कार्यरत थी। इस न्याय प्रणाली का आधार था &#8211; धर्मशास्त्रों का,अलग-अलग स्मृतियों का। इस न्याय व्यवस्था को समाज मान्यता थी। इस व्यवस्था के कारण उस समय के अखंड और विशाल भारत देश में स्वस्थ, सुदृढ और सशक्त समाज व्यवस्था का अस्तित्व था। महेश कुमार शरण ने उनकी पुस्तक ‘कोर्ट प्रोसिजर इन एन्शंट इंडिया’ में लिखा है &#8211;</p>
<p style="text-align: justify;">‘It is just possible that elements of Hindu law were adopted by Romans thourgh Greek and Egyptian channels’</p>
<p style="text-align: justify;">अर्थात, विश्व में परिपूर्ण न्याय व्यवस्था सर्वप्रथम भारत में ही विकसित हुई है। यह न्याय व्यवस्था ग्रीक और मिस्त्र देश के माध्यम से रोमन्स (युरोपियन्स) ने अपनायी होगी।</p>
<p style="text-align: justify;">महेश कुमार शरण ने आगे लिखा है &#8211;</p>
<p style="text-align: justify;">‘It should be a pride and satisfaction to a Hindu to know that his / her ancestors had scaled great heights not only in literature, philosophy and religion, but had advanced very far in the domain of law’ &#8211; (Court procedures in Ancient India)</p>
<p style="text-align: justify;">(अर्थात, एक हिंदू के लिए इसकी जानकारी होना अत्यंत गर्व और समाधान की बात है कि उसके पुरखों ने केवल साहित्य, दर्शन और धर्म में ही अपनी कीर्ति ध्वजा फहराई थी, ऐसा नहीं है। तो न्याय के क्षेत्र में भी उन्होंने कीर्तिमान रचा था।)</p>
<p style="text-align: justify;">आगे लिखा है-</p>
<p style="text-align: justify;">‘The rule and evidence were as complete and perfect, as we can find them today. The administration of justice was regular and the system was well defined, as no aspect was left arbitrarily, capricious or uncertain. Judiciary had the highest regard and supreme position.</p>
<p style="text-align: justify;">(अर्थात, ‘नियम’ और ‘प्रमाण’ इन की परिभाषा इतनी परिपूर्ण और निर्दोष थी, जितनी आज है। न्याय प्रणाली एक नियमित व्यवस्था थी। परिभाषा सुस्पष्ट थी। इसमें कोई भी अनियंत्रितता नहीं थी, अनिश्चितता नहीं थी। न्याय व्यवस्था सर्वोच्च स्थान पर थी और उस व्यवस्था को सर्वाधिक आदर और सम्मान मिलता था।)</p>
<p style="text-align: justify;">इसी पुस्तक में महेश कुमार शरण ने आगे लिखा है &#8211;</p>
<p style="text-align: justify;">Besides this, the whole procedure is completely indigenous and nothing has been imported into it from any other system, whatsoever.’</p>
<p style="text-align: justify;">(अर्थात, इस न्याय व्यवस्था की संपूर्ण प्रक्रिया पूर्णतः स्वदेशी थी। इसमें कोई भी बाहरी (देशों से) बिंदु या व्यवस्था को स्वीकार नहीं किया गया था।)</p>
<p style="text-align: justify;">भारत की यह संपूर्ण न्याय व्यवस्था, स्मृतियों के आधार पर खड़ी थी। कात्यायन स्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति, पाराशर स्मृति आदि प्रमुख स्मृतियां थी।</p>
<p style="text-align: justify;">यह स्मृति क्या होती है? यह कितनी पुरानी है?</p>
<p style="text-align: justify;">एक सुव्यवस्थित समाज रचना निर्माण करने के लिए, हजारों वर्षों से अपने पूर्वजों ने कुछ ग्रंथों का निर्माण किया हैं। इन ग्रंथों के अनुसार ही अपने समाज में प्रथा, परंपरा, व्यवस्थाएं निर्माण हुई। इन ग्रंथों के आधार पर अपना समाज चल रहा था। इसलिए, इतने सारे आक्रमणों के बाद भी हमारी पहचान कायम रही, बनी रही।</p>
<p style="text-align: justify;">इन ग्रंथों में वेद है, उपनिषद है, श्रुति है, स्मृति है, पुराण है। हजारों वर्षों से हमारे ऋषि मुनियों ने, समाज महर्षियों ने, जिस ज्ञान का संचय किया है, वह संचय यानी स्मृतियां। एक प्रकार से परंपराओं का संकलन होने के कारण इन्हें ‘स्मृति’ यह नाम दिया गया है। यह स्मृति मानो हमारा धर्मशास्त्र है। भारत का और पौर्वात्य प्राचीन साहित्य का अध्ययन करने वाले जो पाश्चात्य विद्वान है, उनके अनुसार इन स्मृतियों की रचना ईसा पूर्व 500 वर्षों से लेकर तो ईसा के बाद पांचवें सदी तक हुई है। तक्षशिला विश्वविद्यालय में जिस काल खंड में आर्य चाणक्य अर्थशास्त्र लिख रहे थे, उसी कालखंड में स्मृतियों की रचना हुई है, ऐसा पश्चिम के विद्वानों का मत है। परंतु उपलब्ध संदर्भों के अनुसार स्मृतियों का कालखंड इससे भी बहुत प्राचीन है।</p>
<p style="text-align: justify;">इन स्मृतियों में से ‘कात्यायन स्मृति’ यह ऋषि कात्यायन द्वारा लिखी गई है, ऐसा माना जाता है। कात्यायन यह याज्ञवल्क्य ऋषि के पुत्र थे। इनका कार्यकाल ईसा पूर्व कुछ हजार वर्ष माना जाता है। अर्थात ‘कात्यायन स्मृति’ यह ग्रंथ, कात्यायन ऋषि ने लिखे हुए सूत्र और उनके अन्य शिष्यों के साहित्य का संकलन है। इसलिए कात्यायन स्मृति में केवल ऋषि कात्यायन के श्लोक नहीं है। देवल  पितामह, प्रजापति, वशिष्ठ, मनु आदि ॠषियों का सहभाग भी इस कात्यायन स्मृति में है।</p>
<p style="text-align: justify;">इस स्मृति में कात्यायन ऋषि ने उनके पहले, इस न्याय के क्षेत्र में जिन्होंने काम किया था, उनका उल्लेख किया है। भृगु, बृहस्पति, गार्गीय, तम, कौशिक, लिखिता, मनु, मानव आदि..! प्राचीन भारत में जो न्याय प्रणाली विकसित हो रही थी, उसमें कात्यायन ऋषि के बाद, लगभग 1000 वर्ष तक, इसमें विशिष्ट सुधार होते रहे। कात्यायन स्मृति में उसका प्रभाव दिखता है। इस स्मृति में प्रत्यक्ष कात्यायन ऋषि ने लिखे हुए श्लोक अंत में दिए हुए हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">महामहोपाध्याय डॉक्टर पांडुरंग वामन काणे (1880 &#8211; 1972) ने प्राचीन भारतीय न्याय शास्त्र के क्षेत्र में, अत्यंत गहन शोध और भरपूर लेखन किया है। ‘भारतीय धर्मशास्त्र का इतिहास’ इस विषय पर उनका 6500 पृष्ठों का, पांच खंडों में लिखा हुआ साहित्य प्रकाशित हुआ है। स्वयं न्याय शास्त्र के विद्वान तो थे ही, साथ में उन्होंने संस्कृत ग्रंथों का का गहन अध्ययन किया। वर्ष 1963 में महामहोपाध्याय काणे जी को भारत का सर्वोच्च सम्मान, ‘भारत रत्न’ दिया गया।</p>
<p style="text-align: justify;">ऐसे पां. वा. काणेजी ने, कात्यायन स्मृति के बारे में बहुत कुछ लिख रखा है। वे लिखते हैं &#8211; ‘कात्यायन स्मृति में न्याय प्रणाली के संदर्भ में जो विषय आएं है, वह अद्भुत और आश्चर्य जनक है। क्योंकि आज के आधुनिक न्याय शास्त्र जैसी पद्धति और नियम, कात्यायन स्मृति में हैं।’</p>
<p style="text-align: justify;">[Some of his (sage Katyayan’s) rules, such as those about the contents and characteristics of good points and written statements, about the evidence of witness and about documents, about constructive res judicata are startling in their modernity].</p>
<p style="text-align: justify;">कात्यायनी स्मृति में आए हुए विषय &#8211;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8211; न्यायालय, न्यायालय की प्रक्रिया / पद्धति</p>
<p style="text-align: justify;">&#8211; कागजात</p>
<p style="text-align: justify;">&#8211; परिक्षण (बहस)</p>
<p style="text-align: justify;">&#8211; शपथ लेकर दी हुई साक्ष्य / बयान</p>
<p style="text-align: justify;">&#8211; भागीदारी</p>
<p style="text-align: justify;">&#8211; भेंट वस्तु (gift)</p>
<p style="text-align: justify;">&#8211; अनुबंध तोड़ना</p>
<p style="text-align: justify;">&#8211; जो मालिक नहीं हैं, ऐसे व्यक्ति ने की हुई वस्तुओं की बिक्री</p>
<p style="text-align: justify;">&#8211; परंपराओं का / नियमों का उल्लंघन</p>
<p style="text-align: justify;">&#8211; विवादों की सीमा</p>
<p style="text-align: justify;">&#8211; पैतृक संपत्ति का बंटवारा / विवाद</p>
<p style="text-align: justify;">&#8211; वाकपारुष्य (आज की भाषा में ‘हेट स्पीच’)</p>
<p style="text-align: justify;">&#8211; दंड पारुष्य (कठोर सजा)</p>
<p style="text-align: justify;">&#8211; प्रकीर्णक (विविध / अनेक प्रकार के यम-नियम)</p>
<p style="text-align: justify;">(क्रमशः)</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>और पढ़े : <span style="color: #3366ff;"><a style="color: #3366ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/treasure-of-bharatiya-knowledge-bharat-invented-advanced-farming-1/" target="_blank" rel="noopener">भारतीय ज्ञान का खजाना-32 (उन्नत खेती का अविष्कारक – भारत – 1)</a></span></strong></span></p>
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		<title>भारतीय ज्ञान का खजाना-33 (उन्नत खेती का अविष्कारक &#8211; भारत &#8211; 2)</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 30 Aug 2025 01:49:06 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>✍ प्रशांत पोळ वराह मिहिर के पश्चात, लगभग 200 वर्षों के बाद, पाराशर ऋषि ने ‘कृषि पाराशर’ ग्रंथ लिखा। प्राचीन कृषि शास्त्र का संकलन और उस पर भाष्य, ऐसा इस&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"><img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/270d.png" alt="✍" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /> प्रशांत पोळ</p>
<h4 style="text-align: justify;">वराह मिहिर के पश्चात, लगभग 200 वर्षों के बाद, पाराशर ऋषि ने ‘कृषि पाराशर’ ग्रंथ लिखा। प्राचीन कृषि शास्त्र का संकलन और उस पर भाष्य, ऐसा इस ग्रंथ का स्वरूप है। यह ग्रंथ बहुत बड़ा नहीं है, परंतु जिस शास्त्र शुद्ध पद्धति से और अत्यंत वैज्ञानिक तरीके से भारतीय कृषक खेती करते थे, उसका विस्तार से वर्णन हैं, और ठोस प्रमाण भी!</h4>
<p style="text-align: justify;">पाराशर ऋषि की दृढ धारणा थी कि, बारिश की पूर्व सूचना, या बारिश की पूरे वर्ष की रूपरेखा, अगर वर्ष के प्रारंभ में ही पता चलती है, तो उसके अनुसार ‘कौन सा अनाज लेना ठीक रहेगा’ यह तय कर सकते है। इसलिये वे लिखते है-</p>
<p style="text-align: center;"><strong>वृष्टिमूला कृषिः सर्वा वृष्टिमूलं च जीवनम।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>तस्मादादौ प्रयत्नेन वृष्टिज्ञानं समाचरेत्।।</strong></p>
<p style="text-align: justify;">अर्थात, संपूर्ण कृषि का मूल कारण वृष्टि (बारिश) है। वृष्टि अपने जीवन का भी मूलाधार है। इसीलिए, प्रारंभ में ही वर्षा का पूर्ण ज्ञान होना आवश्यक है।</p>
<p style="text-align: justify;">ऋषि पाराशर के मतानुसार, दो या तीन दिन के बारिश के पूर्वानुमान का किसान को कतई उपयोग नहीं है। किंतु उसे पूरे वर्ष का बारिश का पैटर्न (आकृति बंध) अगर पता चलता है, तो किसान उस हिसाब से अपने खेती का नियोजन कर सकता है।</p>
<p style="text-align: justify;">पूरे वर्ष के बारिश के पैटर्न का अनुमान निकालने के लिए, पाराशर ऋषि ने एक विधि विकसित की थी। इस विधि के अनुसार, पौष महीने के 30 दिन के वायु (हवा) की गति और दिशा के आधार पर, पूरे वर्ष के बारिश का पैटर्न तैयार कर सकते है। 30 दिन के घंटे होते हैं, कुल 30×24 = 720 घंटे। इन 720 घंटों को 60 घंटों का एक भाग करके विभाजित किया, तो बारा भाग तैयार होते हैं। अर्थात, बारा महिने। इन बारा भागों में, प्रत्येक भाग के प्रत्येक दिन, (अर्थात तीस दिन) सुबह-शाम वायु की गति और दिशा का अध्ययन किया, तो पूरे वर्ष में आने वाले बारिश का पैटर्न निश्चित रूप से विकसित कर सकते है। हर भाग को एक मास (एक महिना) माना, तब 12 भागों का मैपिंग बारा महिने में कर सकते है। एक भाग के दो घंटों को एक दिन माना जायेगा। (कुल साठ घंटे अर्थात तीस दिन)। उन दो घंटों में से पहला घंटा दिन और बाद का घंटा रात।</p>
<p style="text-align: center;"><strong>सार्ध्द दिनद्वयं मानं कृत्वा पौषादिना बुधः।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>गणयेन्मासिकीं वृष्टिमवृष्टिं वानिलक्रमात।।</strong></p>
<p style="text-align: right;">        (वृष्टिखंडः / 21)</p>
<p style="text-align: justify;">अर्थात पौष माह के पहले ढाई दिन में (अर्थात 60 घंटों में), अगर हवा पश्चिम और उत्तर दिशा में बह रही हो, तो उस कालखंड से संबंधित महीने के उस दिन बारिश होगी।</p>
<p style="text-align: justify;">कितना अद्भुत है यह सब..!</p>
<p style="text-align: justify;">मजेदार बात यह है कि, ‘कृषि पाराशर’ इस संस्कृत ग्रंथ का हिंदी अनुवाद करने वाले रामचंद्र पांडे ने, सन 1966 में ‘कृषि पराशर’ ग्रंथ में दिये हुए विधि से, काशी नगर में प्रयोग किया। इस प्रयोग में उन्हें काशी नरेश डॉक्टर विभूती नारायण सिंह और काशी के संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के प्राध्यापक डॉक्टर धुनीनाम त्रिपाठी का मार्गदर्शन प्राप्त हुआ।</p>
<p style="text-align: justify;">विश्वविद्यालय के छत पर टेंट लगाकर, प्रतिदिन उन्होंने हवा की (वायु की) गति और दिशा का अध्ययन किया। ऐसा ही अध्ययन, काशी के रामनगर चौक में रहने वाले डॉक्टर आनंद स्वरूप गुप्त के छत पर भी किया गया। दोनों जगह के अध्ययन के आधार पर, उन्होंने पूरे वर्ष की बारीश की तालिका तैयार की। सन 1967 में पूरे वर्ष, प्रतिदिन, उस तालिका के अनुसार ग्रहों/नक्षत्रों की आकाशीय स्थिति, वृष्टि, अनावृष्टि आदि का अध्ययन किया गया। रामचंद्र पांडे लिखते है कि, ‘इसका परिणाम अच्छा मिला। सीमित संसाधनों को लेकर किये गये प्रयोग के अनुसार, वार्षिक बारिश का अनुमान 76 प्रतिशत सही रहा!</p>
<p style="text-align: justify;">यह सभी अर्थो मे अद्भुत है। न कोई सेटेलाइट, न कोई वेदर सेन्सिंग उपकरण।।। ढेड हजार वर्ष पहले, हमारे विद्वान पुरखो ने किये हुए निरीक्षणों के आधार पर निकाला गया सटिक अनुमान।।!</p>
<p style="text-align: justify;">दुर्भाग्य से शिक्षा क्षेत्र ने यह प्रयोग आगे नही बढाया। विश्वविद्यालय के फाईलों मे कही दब गया।</p>
<p style="text-align: justify;">पाराशर ऋषि ने बादलों के चार प्रकार का वर्णन किया है।</p>
<ol style="text-align: justify;">
<li>आवर्त 2. समर्थ 3. पुष्कर  4.  द्रोण</li>
</ol>
<p style="text-align: center;"><strong>आवर्तश्चैव संवर्तः पुष्करो द्रोण एव च।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>चत्वरो जलदः प्रोक्ता आवर्तादि यथा क्रमम।।</strong></p>
<p style="text-align: right;">(वृष्टिखंडः / 15)</p>
<p style="text-align: justify;">इन बादलों से कब पानी गिर सकता है, या यूं कहे, किस प्रकार के बादल से, किस प्रकार का पानी, और कब गिर सकता, या नहीं गिर सकता, इसका भी विस्तार से वर्णन उन्होंने किया है। किसानों ने इन बादलों का अध्ययन करना चाहिए, ऐसा उन्होंने लिखा है।</p>
<p style="text-align: justify;">पाराशर ऋषि ने अधिक अनाज कब आ सकता है यह भी लिखकर रखा है।</p>
<p style="text-align: center;"><strong>चित्रास्वातीविशाखासु ज्यैष्ठेमासी निरभ्रता।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>तास्वेव श्रावणे मासि यदि वर्षति वासवः।।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>तदा संवत्सरो धन्यो बहुशस्य फलप्रदः।।</strong></p>
<p style="text-align: right;">(वृष्टिखंडः / 48)</p>
<p style="text-align: justify;">अर्थात, जेठ के माह में चित्रा, स्वाती, विशाखा नक्षत्रों के समय आसमान निरभ्र होगा, साफ होगा। इन तीन नक्षत्रों के ही समय, सावन माह में अगर बारिश आती है, तो यह वर्ष अनाज के अधिकतम उत्पादन का वर्ष होता है।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="wp-image-8962 aligncenter" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/08/उन्नत-खेती-300x167.webp" alt="उन्नत खेती" width="575" height="320" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/08/उन्नत-खेती-300x167.webp 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/08/उन्नत-खेती-768x427.webp 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/08/उन्नत-खेती.webp 800w" sizes="auto, (max-width: 575px) 100vw, 575px" /></p>
<p style="text-align: justify;">महत्वपूर्ण बात यह है कि, पाराशर ऋषि ने खेत जोतने के लिए आदर्श हल कैसा होना चाहिये, इसका शास्त्र शुद्ध वर्णन किया है। ‘कृषि पाराशर’ इस ग्रंथ का दुसरा भाग ‘कृषि खंड’ है। इसके 34वें श्लोक में उन्होंने हल के आठ प्रमुख अंग बताये है।</p>
<p style="text-align: center;"><strong>ईषायुगहलस्थाणुर्नि यौलस्तस्य पाशिकः।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>अड्डचल्लश्च शौलश्च पच्चनीच हलाष्टकम्।।</strong></p>
<p style="text-align: right;">   (कृषिखंडः / 34)</p>
<p style="text-align: justify;">अर्थात,</p>
<ol style="text-align: justify;">
<li>ईषा 2. युग  3. हलस्थाणू  4. निर्योल  5. पाशिकाये  6. अड्डचल  7. शौल और 8. पच्चनी</li>
</ol>
<p style="text-align: justify;">यह हल के आठ अंग है।</p>
<p style="text-align: justify;">ग्रंथ के 35 से 42 श्लोकों में हल के प्रत्येक अंग का आवश्यक नाप और वर्णन दिया है। आदर्श हल के ‘इंजिनियरिंग डिटेल्स’ इसमें मिलते है।</p>
<p style="text-align: justify;">‘सर्वोत्तम बीजों के संग्रहण’ को पाराशर ऋषि ने अधिक महत्त्व दिया है। इस ग्रंथ के 900 वर्षों के बाद, संत तुकाराम जी ने कहा है &#8211;</p>
<p style="text-align: center;"><strong>शुद्ध बीजापोटी। फळे रसाळ गोमटी।।</strong></p>
<p style="text-align: justify;">अर्थात, शुद्ध बीज बोने से रसदार फल मिलते हैं और उत्तम दर्जे का अनाज प्राप्त होता है।</p>
<p style="text-align: justify;">पाराशर ऋषि ने बीजों से संबंधित अनेक सूचनायें तथा बहुत सी आवश्यक जानकारी भी दी है।</p>
<p style="text-align: center;"><strong>माघे व फाल्गुने मासि सर्वबीजानि संहरेत्।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>शोषयेदातपे सम्यक् नैवाधो हो  विनिधापयेत।।</strong></p>
<p style="text-align: right;">          (कृषिखंडः / 77)</p>
<p style="text-align: justify;">अर्थात, माघ और फाल्गुन माह में, सभी बीजों का संग्रहण करना चाहिये। उन्हें धूप में व्यवस्थित सुखाना चाहिए। लेकिन उन्हें नीचे नहीं रखना चाहिए।</p>
<p style="text-align: justify;">अगले अनेक श्लोकों में बीज संग्रहण और बीज वपन (अर्थात बीजों को बोना) की शास्त्र शुद्ध जानकारी दी है। अनाज तैयार होने के बाद, उसको निकालने की विधि भी विस्तार से दी है। पाराशर ऋषि लिखते है कि, ‘खेती-किसानी करने वाले व्यक्ति को खेती के साथ-साथ आसपास के प्रकृति के स्वभाव की भी पूरी जानकारी होना आवश्यक है।’</p>
<p style="text-align: justify;">आज से 1200 वर्ष पूर्व, अत्यंत वैज्ञानिक पद्धति से होने वाली खेती के तंत्र का यह डॉक्युमेंटेशन है। विश्व में सबसे अच्छी खेती भारत कर रहा था और इसलिये समृद्ध था, संपन्न था।</p>
<p style="text-align: justify;">ये हुआ केवल खेती के बारे में।।। लेकिन खेती से संबंधित वृक्ष, फलों के पेड़, आदि के बारे में भी हमारे पूर्वजों का वैज्ञानिक ज्ञान जबरदस्त था। वह उन्होंने लिखकर भी रखा है।</p>
<p style="text-align: justify;">‘वृक्षायुर्वेद’ इस नाम से अलग अलग काल खंडों में ग्रंथ लिखे गये है। चाणक्य के कालखंड में तक्षशिला विश्वविद्यालय जब अपने पूर्ण वैभव पर था तब, अर्थात, आज से 2400 वर्ष पहले, ‘वृक्षायुर्वेद’ नाम का ग्रंथ, ‘शालीहोत्र’ ने लिखा था। शालीहोत्र मूलतः आद्य पशु चिकित्सकों मे से एक थे। उनका घोडों से संबंधित अध्ययन सबको आश्चर्यचकित करने वाला हैं। उनके ‘वृक्ष आयुर्वेद ग्रंथ’ में कुल 12 अध्याय है। भूमि निरुपणा, बीजोत्पविधी, पादप विविक्षा, रोपण विधान।।। आदि। इसमें उन्होंने जहां पेड़ लगाने है, उस जगह की, उस जमीन की परीक्षा, वहां के अंतर्गत जल स्त्रोतों की जानकारी, दो पेड़ों के बीच में कितना अंतर होना चाहिये, मृदा का, मिट्टी का वर्गीकरण और विश्लेषण, (परीक्षण और soil selection), नए वृक्षों के लिए जननतंत्र, बीजों पर प्रक्रिया (Seed Treatment), पेड़ों पर होने वाले रोग, आदि विषयों का विस्तार से वर्णन किया है।</p>
<p style="text-align: justify;">आगे चल कर, पाचवीं शताब्दी में वराहमिहिर ने ‘बृहत्संहिता’ में ‘वृक्षायुर्वेद’ इसी नाम से एक अध्याय लिखा है। इस 55वें अध्याय में कुल 31 श्लोक है, जो वृक्ष लगाने और उद्यान के संबंधित विषय का विस्तार से विवेचन करते है।</p>
<p style="text-align: justify;">बाद में ग्यारहवीं शताब्दी में सूरपाल ने ‘वृक्षायुर्वेद’ इसी नाम से ग्रंथ लिखा, जो प्रसिद्ध है। इसकी ताम्रपट पर लिखी हुई एक ही मूल प्रति उपलब्ध है, वह भी ब्रिटन के ऑक्सफर्ड युनिव्हर्सिटी के बोडेलियन ग्रंथालय में। इस ग्रंथ में सुरपाल ने औषधीय पौधों को शास्त्रीय पद्धति से कैसे लगाते है, उनके क्या गुणधर्म है, इसके बारे में विस्तार से लिखा है। इसमें उन्होंने तुलसी, नीम, पलाश, जामुन, आंवला आदि अनेक औषधीय वृक्षों की जानकारी दी है। कौन से वृक्ष घर के आसपास लगाना चाहिए और कौन से नहीं लगाना चाहिए, इसकी जानकारी दी है।</p>
<p style="text-align: justify;">मजेदार बात यह है कि, सुरपाल ने बीज से वृक्ष बनने की प्रक्रिया कैसी होती हैं, इसका विस्तार से वर्णन किया है। यह आज से 900 वर्ष पहले का ग्रंथ है। इस ग्रंथ के बहुत बाद, पाश्चात्य जगत ने इस प्रक्रिया को ठीक से जाना। Carl Linnaeus जैसे वैज्ञानिकों ने ‘बीज से वृक्ष’ बनने की प्रक्रिया पर काम किया। किंतु हमारे यहाँ, ग्यारहवीं शताब्दी में, ॠषि सुरपाल ने यह पूरी प्रक्रिया विस्तार से समझायी हैं!</p>
<p style="text-align: justify;">कुल मिलाकर, हजारों वर्षों से हमारे देश में अत्यंत वैज्ञानिक और शास्त्र शुद्ध पद्धति से खेती की जाती थी। खेती और बारिश का तालमेल उस जमाने में खोजा गया था। उसी के अनुसार खेती होती थी। इसीलिए विपुल मात्रा में अनाज निकलता था। आज के जैसे आधुनिक संसाधन ना होते हुए भी, हमारे पुरखों ने यह सब कैसे खोजा होगा, यह आज भी रहस्य है!</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>और पढ़े :</strong></span> <span style="color: #0000ff;"><strong><a style="color: #0000ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/treasure-of-bharatiya-knowledge-bharat-invented-advanced-farming-1/" target="_blank" rel="noopener">भारतीय ज्ञान का खजाना-32 (उन्नत खेती का अविष्कारक – भारत – 1)</a></strong></span></p>
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