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	<title>अध्ययन करें आनंद से - राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन rashtriyashiksha.com</title>
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	<description>सा विद्या या विमुक्तये</description>
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	<title>अध्ययन करें आनंद से - राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन rashtriyashiksha.com</title>
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		<title>मनः स्थिति बनाम परिस्थिति</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 12 May 2025 10:43:44 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अध्ययन करें आनंद से]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>✍ दिलीप बेतकेकर शाला में एक खेल खेला जाता है रस्सा खींच। एक मजबूत रस्सी के दो सिरों की बाजू में दो समूह रस्सी को पकड़े खड़े हो जाते हैं।&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"><img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/270d.png" alt="✍" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /> दिलीप बेतकेकर</p>
<p><img fetchpriority="high" decoding="async" class=" wp-image-8732" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/05/istockphoto-875961182-612x612-1-300x201.jpg" alt="" width="1582" height="1060" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/05/istockphoto-875961182-612x612-1-300x201.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/05/istockphoto-875961182-612x612-1.jpg 612w" sizes="(max-width: 1582px) 100vw, 1582px" /></p>
<p style="text-align: justify;">शाला में एक खेल खेला जाता है रस्सा खींच। एक मजबूत रस्सी के दो सिरों की बाजू में दो समूह रस्सी को पकड़े खड़े हो जाते हैं। खेल शुरु होते ही दोनों समूह रस्सी को अपनी ओर खींचते हैं। (टग आफ वार)। जो समूह रस्सी को सामने वाले समूह समूह सहित अपनी ओर खींचने में सफल हो जाए वह विजयी होगा। यह खेल केवल मैदान में नहीं अपितु हमारे जीवन में भी चलता रहता है। परिस्थिति विरूद्ध मनःस्थिति ऐसा है यह हर पल जीवन में चलने वाला खेल! जिसकी मनः स्थिति प्रबल, मजबूत उसी की विजय! अपने पास कुछ धन, दौलत, साधन सामग्री का अभाव रहते हुए भी, बगैर किसी रोने-धोने, शिकायत के, संघर्ष रत रहते हुए, जिन्होंने अपनी शिक्षा पूर्ण की है ऐसे अनेक उदाहरण दिखाई देते हैं। पहले भी थे आज भी हैं- ऐसे प्रेरक उदाहरण!</p>
<p style="text-align: justify;">एक बार एक व्यक्ति से पूछा- आपकी शिक्षा कहां और किस प्रकार हुई? उत्तर मिला- मेरी शिक्षा गरीबी की शाला में हुई। गरीबी एक श्राप, बाधा न मानकर उस पर जीत प्राप्त कर उत्तम प्रकार की शिक्षा प्राप्त करने वाले आज भी हमारे आसपास ही दिखाई देते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">किसी पत्थर को देखकर एक व्यक्ति कहता है कि यह एक रोड़ा है, बाधा है, तो दूसरे व्यक्ति की दृष्टि में वह एक ऊपर जाने वाली सीढ़ी है। (Stepping stone) फर्क है केवल दृष्टिकोण का!</p>
<p style="text-align: justify;">प्रत्येक वर्ष दसवीं-बारहवीं की परीक्षा के पश्चात, परिणाम घोषित होने पर, कई विद्यार्थियों की यशो गाथाएं पढ़ने को मिलती हैं। ऐसे सभी उदाहरणों पर दृष्टि डालें तो हमें प्रेरणा मिलती है, स्फूर्ति मिलती है। किसी ने कठिन परिश्रम, मजदूरी करके अपनी शिक्षा ग्रहण की तो किसी ने दूसरों के घर रहकर तो किसी ने प्रतिदिन लंबी दूरी पैदल चलकर शिक्षा प्राप्त की है। किसी के पास परीक्षा फीस जमा करने के लिए पैसे न थे तो कोई भूखा पेट रहकर पढ़ाई कर पाया। ऐसे उदाहरण संकलित करने पर एक बड़ा सा ग्रंथ तैयार हो सकता है। सीखने की ललक हो, तीव्र इच्छा हो तो कोई भी उसे रोक नहीं सकता। परंतु मनःस्थिति कच्ची हो, दुर्बल हो तो कोई भी मदद नहीं कर सकता। उत्तम मनः स्थिति का अर्थ तीन बातों का मेल, त्रिवेणी संगम है।</p>
<p style="text-align: justify;">१. सकारात्मक (Possitive), २. विजयी (Winning) ३. और कृतज्ञ (Gratitude) इन तीनों का मेलजोल, सहयोग आपस में रहा तो मनः स्थिति की डोर मजबूत होना निश्चित ही समझें!</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>१. सकारात्मकता :</strong> आज कुछ बाधा हो, कुछ समस्या हो, परन्तु उसका उत्तर भी उसी में छुपा है ऐसा दृढ़ विश्वास जिनका होता है वह उस समस्या से, बाधा से सुरक्षित बाहर निकलता ही है। मेघ कितना भी काला हो उसकी कहीं न कहीं चंदेरी किनार होती है। यह चंदेरी किनार जिसे दिखाई देती है, वह कभी निराश, हताश नहीं हो सकता।</p>
<p style="text-align: justify;">एडिसन के कारखाने को आग लगी। वह आग देखकर एडिसन अपने लड़के को &#8211; चार्ल्स को बोला, जाओ अपनी माँ को बुला लाओ, ऐसी आग उसे पूरे जीवनकाल में देखने को नहीं मिलेगी। इतना ही नहीं, दूसरे दिन कारखाने की राख देखकर एडिसन स्वयं से कहने लगे, ऐसी बरबादी भी बहुत मूल्यवान होती है। अपनी गलतियां भी उसमें जलकर खाक हो जाती हैं। हे परमेश्वर, मुझे नए सिरे से कारखाना बनाने का अवसर दिया इसीलिए आपका आभारी हूँ।</p>
<p style="text-align: justify;">प्रणाम है ऐसे धैर्यवान एडिसन को!</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>२. विजयी प्रवृति :</strong> अरुणिमा सिन्हा को बदमाशों ने चलती ट्रेन से बाहर फेंक दिया था, उसका एक पैर ट्रेन के नीचे दबने से चकनाचूर हो गया। कृत्रिम पैर लगने के बाद उसने एवरेस्ट शिखर पर जाने का निश्चय किया। इस अत्यंत साहसी कृत्य को न करने हेतु परा वृत्त करने का अनेक लोगों द्वारा प्रयास किया गया। परंतु वह अपने निश्चय से टस से मस नहीं हुई। मैं जीतकर ही चैन लूंगी। विजय पाकर ही रहूंगी, ऐसी जिद्द उसे एवरेस्ट शिखर पर ले गई। गोपाल नाम का एक विद्यार्थी, अत्यंत गरीब, पहनने के लिए ढंग के वस्त्र नहीं! एक ही कुर्ता, उसे रात्रि में धोकर, सुखाकर दूसरे दिन वहीं पहनता। यही गोपाल- अर्थात महाराष्ट्र के विख्यात समाज सुधारक गोपालराव आगरकर थे।</p>
<p style="text-align: justify;">डॉ. अम्बेडकर की ज्ञान साधना कितनी अलौकिक थी! अस्पृश्यता की मार झेलते हुए, आर्थिक मार भी उन्होंने झेला, और कई पदवियां प्राप्त की। विदेश में रहते हुए वे पुस्तकालय में ही अधिक समय व्यतीत करते थे, अध्ययन करते। रात्रि भोजन के ऐवज में केवल काफी और एकाध टुकड़ा पाव खाकर अपनी भूख मिटाते। ‘विद्यातुराणाम न सुखम न निद्रा’ इसका साक्षात उदाहरण हैं डॉ. ए. पी. जे. कलाम। उनके पास कहां था अध्ययन के लिए पर्याप्त धन और साधन!</p>
<p style="text-align: justify;">इसके विपरीत अपार धन और पर्याप्त साधन होते हुए भी अध्ययन के नाम से सारा गड़बड़ घोटाला ही, ऐसे उदाहरण भी दिखते हैं। अब अन्य की बातें छोड़ें! हम अपने बारे में सोचें। हम किस प्रकार का उदाहरण प्रस्तुत करेंगे?</p>
<p style="text-align: justify;">जिनके हाथ में शून्य होते हुए भी सकारात्मक एवं विजय वृत्ति के बल पर जिन्होंने विजय पताका फहराई, अथवा ईश्वर, माता पिता ने सबकुछ देते हुए भी हाथ में कद्दू ही रहेगा? इसका चयन सब स्वयं ही करेंगे। चोइज़ इज योर्स! समर्थ रामदास स्वामी कहते थे कि <strong>“उत्कट भव्य वह लेवें</strong><strong>, </strong><strong>महत्वहीन को त्याग देवें!”</strong></p>
<p style="text-align: justify;">अब ‘उत्कट भव्य’ अपनाएं अथवा नहीं इसका निर्णय करें!</p>
<p style="text-align: justify;">आप ही निर्णय अवश्य करें!</p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक शिक्षाविद, स्वतंत्र लेखक, चिन्तक व विचारक है।)</p>
<p><strong>और पढ़ें : <span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/sadhan-and-sadhna/" target="_blank" rel="noopener">साधन और साधना</a></span></strong></p>
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		<title>साधन और साधना</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 05 May 2025 09:34:03 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अध्ययन करें आनंद से]]></category>
		<category><![CDATA[दिलीप बेतकेकर]]></category>
		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>✍ दिलीप बेतकेकर महाभारत युद्ध प्रारंभ होने के पूर्व अर्जुन और दुर्योधन भगवान श्री कृष्ण से सहायता मांगने हेतु एक ही समय पर पहुंचे। श्रीकृष्ण शैय्या पर सो रहे थे।&#8230; </p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"><img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/270d.png" alt="✍" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /> दिलीप बेतकेकर</p>
<p><img decoding="async" class="alignnone wp-image-8723" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/05/788-300x169.jpg" alt="" width="1727" height="973" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/05/788-300x169.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/05/788-1024x576.jpg 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/05/788-768x432.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/05/788.jpg 1280w" sizes="(max-width: 1727px) 100vw, 1727px" /></p>
<p style="text-align: justify;">महाभारत युद्ध प्रारंभ होने के पूर्व अर्जुन और दुर्योधन भगवान श्री कृष्ण से सहायता मांगने हेतु एक ही समय पर पहुंचे। श्रीकृष्ण शैय्या पर सो रहे थे। दुर्योधन श्रीकृष्ण के सिरहाने पास जाकर बैठ गया जब कि अर्जुन श्रीकृष्ण के पैर के पास बैठे। दोनों ने ही श्रीकृष्ण के पास सहायता की मांग व्यक्त की। चतुर श्रीकृष्ण ने दो पर्याय रखे। एक के साथ सारा सैन्य और दूसरे के साथ अकेले श्रीकृष्ण रहेंगे, और वह भी शस्त्र विहीन श्रीकृष्ण! दुर्योधन ने समय न गवाते हुए तुरंत ही सैन्य मांग लिया। अर्जुन को तो श्रीकृष्ण ही चाहिए थे, अन्य कुछ नहीं! दुर्योधन खुश होकर चला गया। अर्जुन को श्रीकृष्ण ने हांस्य में कहा-</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>हार निश्चित है तेरी</strong><strong>, </strong><strong>हर दम रहेगा उदास। माखन दुर्योधन ले गया</strong><strong>, </strong><strong>छाछ बची तेरे पास।।</strong></p>
<p style="text-align: justify;">परन्तु अर्जुन भी इतना भोला न था। श्रीकृष्ण को लेकर उसने कोई भूल नहीं की थी।</p>
<p style="text-align: justify;">उसने तुरंत उत्तर दिया-</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>हे प्रभु</strong><strong>, </strong><strong>जीत निश्चित है मेरी दास नहीं हो सकता उदास। माखन लेकर क्या करू</strong><strong>, </strong><strong>जब माखन चोर है मेरे पास।।</strong></p>
<p style="text-align: justify;">साधन, उपकरण आवश्यक होते हैं। इनके उपयोग से कार्य में सुगमता होती है इसे नकारा नहीं जा सकता। फिर भी साधनों की अपेक्षा साधना बेहतर होती है, श्रेष्ठ होती है। इसके उदाहरण पूर्व में भी थे और आज भी दिखाई देते हैं। साधन अधूरे रहने पर भी सभी प्रकार के पराक्रम किए ऐसा भी देखने में आया है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>It&#8217;s not the gun that fights, but the hand behind it. -And it&#8217;s not the hand that fights but the mind behind it.</strong></p>
<p style="text-align: justify;">इसका अनुभव अनेक बार आता है। वास्तव में युद्ध तो बंदूक अथवा बंदूक पकड़ा हुआ हाथ नहीं लड़ता है वरन हाथ के भी पीछे का दृढ़ता लिया हुआ मन लड़ता है। एक संस्कृत सुभाषित है- <strong>‘क्रिया सिद्धिः सत्वे भवति महताम नोपकरणे’</strong> उपकरण और साधनों की अपेक्षा क्रिया सिद्धि महत्त्वपूर्ण है।</p>
<p style="text-align: justify;">जय कुमार वैद्य का उदाहरण अध्यतन है। कुर्ला (मुंबई) में दस आठ की छोटी सी कुठरिया में मां और दादी नानी के साथ रहने वाला युवक जयकुमार वैद्य आज अमेरिका के वर्जनिया विद्यापीठ में पी.एच.डी. हेतु अध्ययनरत है। माँ को पिता ने बाहर निकाल दिया था। उसकी माँ नौ साल से विवाह विच्छेद हेतु कोर्ट में मुकदमा लड़ रही थी, दादी नानी को संभालती और बालक जयकुमार की परवरिश करती थी। कई रातें उन माँ बेटे ने समोसा, वडा पाव और चाय पी कर गुजारी। लोगों द्वारा दिए गए वस्त्र पहने। जयकुमार अध्ययन के साथ मजदूरी भी करता था। आज जयकुमार इलेक्ट्रिकल एंड कम्प्यूटर साइंस इंजीनियरिंग विभाग में शोधकार्य कर रहा है। यह है साधना का उदाहरण!</p>
<p style="text-align: justify;">संगीत के लिए रियाज़, खेलों के लिए अभ्यास, कलाकार का अभ्यास, अध्ययन में वाचन, मनन, चिंतन यह सब मिलजुल कर के साधना होती है। ना थकते, ना टालमटोल, ना आलस, अखंडता से किसी बात को एकाग्रता पूर्वक, भूख प्यास भूलते हुए, निरंतर परिश्रम करते हुए पूर्ण करना ही है साधना!</p>
<p style="text-align: justify;">कुछ व्यक्ति अचानक ही दिमाग में कुछ सोचते हैं, संगीत, नृत्य, चित्रकला आदि की कक्षाओं की सदस्यता लेते हैं; हारमोनियम, तबला, व्यायाम की सामग्री आदि क्रय करते हैं, अनावश्यक खर्च करते हैं; चार-छह-दस दिन उत्साह दिखाते हैं, और फिर सारा ‘डप्प’! उत्साह समाप्त! यह ‘साधना’ नहीं कहलाती।</p>
<p><img decoding="async" class="alignnone wp-image-8724" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/05/147-300x169.jpg" alt="" width="1725" height="972" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/05/147-300x169.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/05/147-1024x576.jpg 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/05/147-768x432.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/05/147.jpg 1280w" sizes="(max-width: 1725px) 100vw, 1725px" /></p>
<p style="text-align: justify;">तितली एक फूल से दूसरे फूल पर, दूसरे से तीसरे पर जाती है। परन्तु सुतार पक्षी को देखें तो वह एक पेड़ पर छेद करने बैठ जाता है तो पूरा करके ही रुकता है।</p>
<p style="text-align: justify;">अधूरे साधन-सामग्री, अभावग्रस्त रहते हुए भी कुछ लोग इतनी ऊंचाइयां प्राप्त करते हैं कि लोग अचंभित हो जाते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">शिवाजी महाराज और औरंगजेब के पास के साधनों की तुलना करें तो क्या स्पष्ट दिखता है? संत ज्ञानेश्वर, स्वामी विवेकानंद आदि महापुरुषों के पास कौन से साधन थे?</p>
<p style="text-align: justify;">डॉ. आंबेडकर, डॉ. कलाम जैसी विभूतियों के पास थी केवल ‘ज्ञान साधना’! अंडमान की अंधेरी कोठरी में बंदी सावरकर जी के पास कहां थे पेन और काग़ज़? फिर भी उन्होंने की काव्य रचना! इन व्यक्तियों द्वारा किए गए कार्य ही उनकी साधना की कृति है।</p>
<p style="text-align: justify;">गुरु अपने शिष्य को उपदेश देते हैं, मंत्र देते हैं, साधना करने हेतु मार्गदर्शक बनते हैं, यह है ‘साधना’! इनका उपयोग करते हुए शिष्य को साधना करनी होती है। कोई एक शिष्य साधना करते हुए गुरु पद प्राप्त कर पाता है। साधन तो सभी शिष्यों को समान होते हैं। परन्तु सभी की प्रगति समान नहीं होती।</p>
<p style="text-align: justify;">आध्यात्मिक क्षेत्र हो अथवा विज्ञान क्षेत्र, कला हो अथवा उद्योग हो, किसी भी क्षेत्र में प्रगति, सुयश प्राप्ति हेतु कठोर साधना महत्त्वपूर्ण है। केवल साधनों द्वारा यश के शिखर पर पहुंचना सम्भव नहीं होता।</p>
<p style="text-align: justify;">निर्णायक तो ‘साधना’ ही है।</p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक शिक्षाविद, स्वतंत्र लेखक, चिन्तक व विचारक है।)</p>
<p>और पढ़ें <span style="color: #0000ff;"><strong><a style="color: #0000ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/not-useless-but-use-less/" target="_blank" rel="noopener">यूजलेस नहीं यूज लेस</a></strong></span></p>
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		<title>यूजलेस नहीं यूज लेस</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 16 Mar 2025 10:53:14 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अध्ययन करें आनंद से]]></category>
		<category><![CDATA[दिलीप बेतकेकर]]></category>
		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[Bhartitya Shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[indian education]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>✍ दिलीप बेतकेकर (USELESS नहीं USE LESS) आप युजलेस है ऐसा शिक्षक-पालक, अनेक बार कहते होंगे न? कई बार सुनने पर कुछ को तो लगने लगता होगा कि कहीं वास्तव&#8230; </p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"><img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/270d.png" alt="✍" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /> दिलीप बेतकेकर</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-8431" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/03/Teachers-Day-Kundli-Analysis-of-Great-Indian-Teachers-1-300x200.jpg" alt="" width="1419" height="946" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/03/Teachers-Day-Kundli-Analysis-of-Great-Indian-Teachers-1-300x200.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/03/Teachers-Day-Kundli-Analysis-of-Great-Indian-Teachers-1-1024x683.jpg 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/03/Teachers-Day-Kundli-Analysis-of-Great-Indian-Teachers-1-768x512.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/03/Teachers-Day-Kundli-Analysis-of-Great-Indian-Teachers-1.jpg 1200w" sizes="auto, (max-width: 1419px) 100vw, 1419px" /></p>
<p style="text-align: justify;">(USELESS नहीं USE LESS)</p>
<p style="text-align: justify;">आप युजलेस है ऐसा शिक्षक-पालक, अनेक बार कहते होंगे न? कई बार सुनने पर कुछ को तो लगने लगता होगा कि कहीं वास्तव में हम ‘यूजलेस’ तो नहीं? लेकिन ऐसा सुनते हुए स्वयं को इसी प्रकार लगने लगे तो यह अत्यंत खतरनाक साबित होगा। इसीलिए यदि मानसिक आघात हो गया तो उसमें से बाहर निकलना कठिन हो जाता है।</p>
<p style="text-align: justify;">कोई कुछ भी कहे, ‘यूजलेस’ भी कहें, तो उस ओर ध्यान देना आवश्यक नहीं। उनके इस प्रकार कहना अर्थहीन ही होता है।</p>
<p style="text-align: justify;">हाँ, इसके साथ ही दूसरी बात में अवश्य सत्यता प्रतीत होती है। उसे अनदेखा करना उचित नहीं होगा। आप या अन्य कोई ‘यूजलेस’ नहीं यह बात सौ प्रतिशत सही भी होगी, परन्तु ‘यूज-लेस’ हो रहे हैं यह बात नकारी नहीं जा सकती। इस पर ध्यान देना आवश्यक है।</p>
<p style="text-align: justify;">‘यूज लेस’ का अर्थ कम उपयोग। हमारे पास होते हुए भी उसका पर्याप्त उपयोग नहीं करना! तो अब देखें कि हमारे पास होने पर भी ऐसा क्या है जिसका हम उपयोग नहीं करते! एक सूची ही बनाते हैं इसकी!</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>१. समय :</strong> ईश्वर द्वारा हमें जीवन प्रदत्त है। तब ‘जीवन, ‘जिंदगी’ का अर्थ कितने ‘वर्ष’! एक वर्ष अर्थात बारह महीने, महीने के दिन, दिन के घंटे, फिर मिनट, और सेकंड! ऐसे ये सभी मिलकर होती हैं अपनी जिंदगी, अपना जीवन। ये सब समय ही तो है। अब हम यह देखें कि इसमें से कितना समय ‘अर्थपूर्ण’ उपयोगी व्यतीत होता है और कितना अनुपयोगी रहता है। दिनभर में बहुत सारा समय वास्तव में अर्थहीन रहता है। समय का ‘यूज’ और उपयोग कम अर्थात ‘लेस’ यह तो समझ में आया ही होगा!</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>२. बुद्धिमत्ता :</strong> ईश्वर ने हमें केवल जीवन ही नहीं, वरन ‘बुद्धिमत्ता’ का इतना विशाल भंडार उपलब्ध कराया है कि उसकी कोई कल्पना नहीं की जा सकती! कुछ विशेषज्ञों के अनुसार चालीस प्रकार की ‘बुद्धिमत्ता’ तो निश्चित उपलब्ध रहती है। परन्तु प्रो. हावर्ड गार्डनर के अनुसार आठ प्रकार की बुद्धिमत्ता तो निश्चित होती ही है। दिमाग एक ईश्वर द्वारा प्रदत्त अद्भुत तोहफा है। परन्तु वह हम कितना उपयोग में लेते हैं? ईश्वर ने तो पूरा ही प्रदत्त किया है, कुछ भी अंश स्वयं के पास नहीं रखा, फिर हम उसका पर्याप्त उपयोग करने में कंजूसी क्यों करते हैं? अर्थात ‘बुद्धिमत्ता’ तो ‘यूज’ ‘लेस’ ही न?</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>३. ज्ञानेंद्री और कर्मकेंद्री :</strong> आंख, कान, नाक, वाणी इनका भी पूर्ण उपयोग कहां होता है? कहते हैं ना ‘अपना हाथ जगन्नाथ’! दुनिया में हाथ, पैर, आँखें, कान, जीभ आदि से विहीन कई लोग हैं। ये शारीरिक न्यूनता होते हुए भी उस पर विजय प्राप्त करने वाले लोग भी हम देखते हैं। इन अपंग लोगों की अपेक्षा हम कितने सुखी हैं, कितने भाग्यवान हैं। ऐसे हाथ, पैर, उंगलियां&#8230;. आदि से विहीन लोग एकत्र हुए और ‘एबिलिटीज’ संस्था स्थापित की। (डिसेबल्ड होते हुए भी) फिर उन्होंने हाथ न पसारे कभी कहकर अनेक प्रकार के कार्य करना प्रारंभ किया। ये अपंग लोग एवरेस्ट शिखर फतेह करते हैं, पैर न होते हुए नृत्य जैसी कला प्रस्तुत करते हैं, हाथ नहीं होने पर भी मुंह में ब्रश पकड़कर चित्र बनाते हैं, और जिन्हें सुगठित शरीर मिला है, सर्व प्रकार से स्वस्थ हैं, ऐसे लोग समय का पूर्ण उपयोग नहीं करते। यही यूज लेस कहलाते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>४. शैक्षणिक साधन :</strong> कापी, पुस्तकें, पेन, पेंसिल, लैपटॉप आदि ऐसे अनेक साधन पालक अपने पाल्य के लिए उपलब्ध कराते हैं, इस हेतु पैसे खर्च करते हैं! इनकी कीमत दिखाई देती है, समझ में आती है। परन्तु असंख्य लोगों के परिश्रम, समय, बुद्धि इस हेतु खर्च हुई है तभी ये साधन उपलब्ध हुए हैं। इन साधनों का यदि उपयोग न हुआ तो परिश्रम, समय, बुद्धि ये सब व्यर्थ हुआ न! पेन, पेंसिल आदि का भी हम सर्वोत्तम उपयोग करते रहते हैं क्या? बिल्कुल न उपयोग करने का अर्थ कुशलता पूर्वक उपयोग नहीं।</p>
<p style="text-align: center;"><strong>घिसेगा चंदन इसलिए</strong><strong>, </strong><strong>घिसना बन्द किया</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>चन्दन ने कहा</strong><strong>, </strong><strong>मेरा शेष जीवन व्यर्थ गया।</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>५. शक्ति (ऊर्जा) :</strong> शरीर एक सुंदर साधन है। हमारे शरीर में शक्ति, ऊर्जा समाहित है। परन्तु इस ऊर्जा का पर्याप्त उपयोग कम होता है, या जहां आवश्यक नहीं वहां हो जाता है। अर्थात ऊर्जा का अपव्यय होता है। जीवन के लिए हानिकारक ऐसी वस्तुओं को देखना, सुनना, आदि में शक्ति का दुरुपयोग ही दिनभर में कई बार होता है। दिशाहीन, निरुद्येश्य भटकना आदि में समय ही नहीं अपितु ऊर्जा भी नष्ट होती है। और जिसे करना आवश्यक है उस कार्य हेतु ऊर्जा शेष न रहने से कार्य नहीं हो पाता, शरीर निर्बल हो जाता है। ऐसा अनुभव तो आता ही होगा!</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-8432" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/03/360_F_984099439_mICZKp17gYS25KzPiU0N9dvMtdKr2gVe-300x169.jpg" alt="" width="1354" height="763" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/03/360_F_984099439_mICZKp17gYS25KzPiU0N9dvMtdKr2gVe-300x169.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/03/360_F_984099439_mICZKp17gYS25KzPiU0N9dvMtdKr2gVe.jpg 639w" sizes="auto, (max-width: 1354px) 100vw, 1354px" /></p>
<p style="text-align: justify;">अब समय, बुद्धि, शक्ति इन साधनों का पूर्ण उपयोग करें!</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>जन्म लेने की फल प्राप्ति हेतु</strong><strong>, </strong><strong>कुछ करें सफल</strong><strong>,</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>ना ऐसा करें निर्फल</strong><strong>, </strong><strong>हम होंगे भूमि भार।</strong></p>
<p style="text-align: justify;">हम भूमि का भार न बने इसीलिए उपलब्ध साधनों का उपयोग करें।</p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक शिक्षाविद, स्वतंत्र लेखक, चिन्तक व विचारक है।)</p>
<p><strong>और पढ़ें :</strong> <span style="color: #0000ff;"><strong><a style="color: #0000ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/hey-mind-relax/" target="_blank" rel="noopener">ए मन रिलैक्स हो जा!</a></strong></span></p>
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		<title>ए मन रिलैक्स हो जा!</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 25 Jan 2025 05:29:54 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अध्ययन करें आनंद से]]></category>
		<category><![CDATA[दिलीप बेतकेकर]]></category>
		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[Adhyan Kare Anand Se]]></category>
		<category><![CDATA[indian education]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[Story]]></category>
		<category><![CDATA[आनंद]]></category>
		<category><![CDATA[मन]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>✍ दिलीप बेतकेकर अब मुझे और कुछ न कहो, थक गया हूँ मैं! दिनभर काम हो गया, अब थकान आ गई है। ये और इस संदर्भ में अनेक वाक्य हम&#8230; </p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"><img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/270d.png" alt="✍" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /> दिलीप बेतकेकर</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-8212" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/01/pngtree-person-sitting-on-water-with-fog-surrounding-them-image_2573505-300x168.jpg" alt="" width="1423" height="797" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/01/pngtree-person-sitting-on-water-with-fog-surrounding-them-image_2573505-300x168.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/01/pngtree-person-sitting-on-water-with-fog-surrounding-them-image_2573505.jpg 640w" sizes="auto, (max-width: 1423px) 100vw, 1423px" /></p>
<p style="text-align: justify;">अब मुझे और कुछ न कहो, थक गया हूँ मैं! दिनभर काम हो गया, अब थकान आ गई है।</p>
<p style="text-align: justify;">ये और इस संदर्भ में अनेक वाक्य हम अपने घर में भी सुनते रहते हैं। हमारे मुंह से भी इस प्रकार के वाक्य निकलते हैं, अनेक बार! इसमें कोई आश्चर्य नहीं, कोई गलती नहीं, थकान का होना एक स्वाभाविक क्रिया है। खेतों में, कारखानों में, खदानों में, कार्यालयों में काम करते हुए थकान की अनुभूति होती है। इसी तरह अभ्यास करने पर भी थकान आती है। थकान केवल शारीरिक श्रम करने से आती है ऐसा नहीं है। बौद्धिक कार्य करते हुए भी दिमाग थकता है। यहां इस थकान को मिटाने हेतु कुछ उपाय भी उपलब्ध हैं। अभ्यास छोड़कर भाग जाना यह कोई उपाय नहीं!</p>
<p style="text-align: justify;">काम और विश्राम इन दोनों का आपस में तालमेल होना चाहिए। अलन कोहन के अनुसार &#8211; There is virtue in work and there is virtue in rest. Use both and overlook neither.</p>
<p style="text-align: justify;">अर्थात दोनों आवश्यक हैं और किसी की उपेक्षा नहीं की जा सकती।</p>
<p style="text-align: justify;">थकान मिटाकर पुनः अध्ययन के लिए ताजे (Fresh) होकर तैयार हो जाने के लिए जो भी छोटी, सहज विधि है उनके लिए अधिक समय देना आवश्यक नहीं। अभ्यास करते हुए बीच बीच में भी उपयोग करें तो थकान कुछ क्षणों में ही दूर हो जाती है। इस हेतु कोई खर्च भी नहीं उठाना पड़ता!</p>
<p style="text-align: justify;">(१) हाथ के तलबों (हथेलियों) को दोनों आपस में रगड़कर बंद आंखों पर हल्के से रखें। आंखों को दबाएं नहीं। कुछ पल अपने हथेलियों की ऊष्मा का, हल्के स्पर्श का अनुभव लें। इसे Palming कहते हैं। कुछ क्षण पश्चात दोनों हाथों की बीच की तीन उंगलियों से हल्के से आंखों के ऊपर मस्तक को सहलाएं। तत्पक्षात नाक के दोनों ओर एक उंगली से आंखों के निचले हिस्से से नाक की दोनों ओर सहलाए। फिर दोनों हाथों से गालों पर गोलाकार सहलायें। अंत में सम्पूर्ण चेहरे पर हाथ फेरकर आंखें धीरे धीरे खोलें। यह पूरी प्रक्रिया के लिए अधिकतम तीन मिनट का समय लगेगा। इससे तीन घंटे की थकान तीन मिनट में ही दूर हो जाएगी।</p>
<p style="text-align: justify;">(२) लगभग एक घंटे अभ्यास करने के पश्चात बेसिन पर जाकर दोनों हाथों के अंजुली में पानी भरकर आंखों में हल्के से फेकें। तीन चार बार ऐसा करने से एकदम ताजापन अनुभव करेंगे।</p>
<p style="text-align: justify;">(३) नींद से जागकर अथवा बहुत देर अभ्यास करने पर उठते हुए हम हाथ पैरों को खिंचाव देने हेतु उन्हें इधर उधर हिलाते हैं। यही व्यवस्थित तरीके से, सभी दिशाओं में हिलाकर, घुमाकर देखें। दोनों हाथों की उंगलियों को आपस में फंसाकर आकाश की तरफ रखते हुए सांस लेते हुए, शरीर को थोड़ा तान दें। सांस छोड़ते हुए हाथ छाती के पास ले जाएं। इसी प्रकार बाएं और दाएं तरफ, तनाव देते हुए झुकें। दोनों ओर शरीर को दो तो शरीर एकदम ताज़ा हो जाएगा! तीन बार शरीर को तनाव दें।</p>
<p style="text-align: justify;">(४) बीच-बीच में एक-एक गिलास पानी पीते रहें (फ्रिज का नहीं)।</p>
<p style="text-align: justify;">(५) सदंती, शितलि और सितकरी प्राणायाम बीच-बीच की अवधि में करने से हल्का अनुभव करेंगे। ये तीनों प्राणायाम अत्यंत सरल हैं और प्रभावी भी! इनको कूलिंग प्राणायाम भी कहते हैं। ये प्राणायाम, विशेषकर मन की शांति हेतु अत्यंत उपयोगी है।</p>
<p style="text-align: justify;">(६) एक घंटा अभ्यास करने के पश्चात थोड़ा बाहर निकलकर बगीचे में पेड़-पौधे, फूल, पत्ती आदि की ओर देखने से भी ताजेपन का अनुभव होता है, मन को शांति प्राप्त होती है।</p>
<p style="text-align: justify;">(७) संगीत तो थकान मिटाने का उत्तम साधन है। संगीत में एक आश्चर्यजनक शक्ति रहती है। हर संभव तीक्ष्ण आवाज में संगीत नहीं बजाएं।</p>
<p style="text-align: justify;">(८) ककड़ी की गोल फांके काटकर आंखों पर रखने से भी आंखों को राहत मिलती है।</p>
<p style="text-align: justify;">(९) शवासन-केवल लेटना, शवासन नहीं कहलाता। कई लोगों को यह अत्यंत सरल लगता है। परन्तु वह इतना सरल नहीं होता है। यह किसी विशेषज्ञ से ही सीखना बेहतर है।</p>
<p style="text-align: justify;">(१०) 8, 16, 32 सांस ऐसा एक सीधा सा, सरल तंत्र है। इसमें जमीन पर पीठ के बल लेटकर (ऊपर की ओर मुंह) आठ बार सांस लेते हैं। तत्पश्चात दाएं ओर लेटकर सोलह बार सांस लेते हैं। फिर बाएं ओर लेटकर बत्तीस बार सांस लेते हैं। इतना करने से एकदम ताजगी का अनुभव करेंगे।</p>
<p style="text-align: justify;">(११) योगनिद्रा यह भी किसी जानकार से ही सीखें।</p>
<p style="text-align: justify;">(१२) हास-परिहास, चुटकुले पढ़ना, अन्यों को सुनाना जिससे हास्यमय वातावरण उत्पन्न होकर मन को प्रसन्नता मिलेगी।</p>
<p style="text-align: justify;">इन सब के अलावा हम अपनी किसी अन्य पद्धति से भी थकान मिटा सकते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">Change in work is rest ऐसा भी कहते हैं। अभ्यास करने से थकान लग रही हो तो अन्य कोई छोटा सा, सादा, सरल काम करने लग जाएं, इससे थोड़ा कार्य परिवर्तन होकर आराम मिलेगा। कपड़ों को तह करना, इस्त्री करना, रसोईघर में जाकर मां के कामों में हाथ बटाना, पेड़-पौधों में पानी देना, बगीचे में टहलना, थोड़ी साफ सफाई करना, अपने समान को ठीक से जमाकर रखना आदि। कितने ही छोटे छोटे काम हैं जिससे आलस, थकान दूर कर सकते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">बारहमासी फूल तो आप जानते ही होंगे। सदैव खिलते रहते हैं। इन फूलों की महक, सुगंध नहीं होती परन्तु सदैव खिलते रहते हैं। इन फूलों का आदर्श सामने रखकर सदैव प्रसन्न, ताजा हम भी हो जाएं। ये रहे सब बाहरी उपाय, परन्तु सही उपचार तो आंतरिक है-</p>
<p style="text-align: center;"><strong>चित्ते प्रसन्ने भुवनम प्रसन्नम!</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>चित्ते विषण्ण भुवनम विषण्णम।।</strong></p>
<p style="text-align: justify;">(मन प्रसन्न हो तो पूरी दुनिया प्रसन्न नजर आएगी, परंतु मन दुःखी होगा तो पूरी दुनिया दुखी नजर आएगी।)</p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक शिक्षाविद, स्वतंत्र लेखक, चिन्तक व विचारक है।)</p>
<p><strong>और पढ़ें : <span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/five-types-of-repetitions/" target="_blank" rel="noopener">दोहराने के पांच प्रकार</a></span></strong></p>
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		<title>दोहराने के पांच प्रकार</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 08 Dec 2024 09:29:29 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अध्ययन करें आनंद से]]></category>
		<category><![CDATA[दिलीप बेतकेकर]]></category>
		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[indian education]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[दैनिक अर्थात प्रतिदिन दोहराना]]></category>
		<category><![CDATA[मासिक दोहराना]]></category>
		<category><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>✍ दिलीप बेतकेकर दोहराने को अंग्रेजी में &#8216;Revision&#8217; कहते हैं। Review (पुनः अवलोकन) भी कहते हैं। आइए हम इन अंग्रेजी के दोनों शब्दों को समझें- Revision अर्थात Re और vision&#8230; </p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-8134" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/12/121-300x200.jpg" alt="" width="1422" height="948" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/12/121-300x200.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/12/121.jpg 626w" sizes="auto, (max-width: 1422px) 100vw, 1422px" /></p>
<p style="text-align: right;"><img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/270d.png" alt="✍" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /> दिलीप बेतकेकर</p>
<p style="text-align: justify;">दोहराने को अंग्रेजी में &#8216;Revision&#8217; कहते हैं। Review (पुनः अवलोकन) भी कहते हैं। आइए हम इन अंग्रेजी के दोनों शब्दों को समझें-</p>
<p style="text-align: justify;">Revision अर्थात Re और vision ऐसे दो शब्दों को जोड़ने से बना है। Re का अर्थ है &#8216;पुनः&#8217; और vision का अर्थ है &#8216;दृष्टि&#8217;। Review में भी उसी प्रकार दो शब्दों का Re और View का जुड़ाव है। &#8216;तळशु&#8217; का अर्थ है देखना । Review अर्थात पुनः देखना पुनः दृष्टि डालना। अर्थात दोनों ही शब्दों का अर्थ &#8216;दोहराना&#8217; है।</p>
<p style="text-align: justify;">अध्ययन के लिए यह दोहराना अत्यंत आवश्यक है। (मराठी में इसे &#8216;उजलणी&#8217; कहते हैं अर्थात &#8216;उजाला&#8217; मतलब प्रकाश)। यदि दोहराना अर्थात उजाला अभ्यास के लिए न होगा तो उजाला न हो अर्थात &#8216;अंधेरा&#8217; ही! इसका अर्थ यह हुआ कि अभ्यास के लिए पुनः अवलोकन न होना अंधेरे के समान है, मतलब व्यर्थ है। स्मृति दो प्रकार की होती है- &#8216;अल्प स्मृति&#8217; जो कम अवधि के लिए याद रहती है, और &#8216;दीर्घ स्मृति&#8217; &#8211; जो अधिक समय तक याद रहती है। हम जो देखते-सुनते हैं वह कम समय तक याद रहता है। अधिक समय तक याद रखने हेतु उसे बार बार देखना सुनना पड़ता है, पढ़ना पड़ता है। ऐसा करने से कम अवधि की याद का रूपांतर (अल्पस्मृति) &#8216;दीर्घ स्मृति&#8217; में हो जाता है। अन्यथा सब भूल जाते हैं। कहते हैं अगला पाठ पिछला सपाट&#8217;! हरमन एरिंग हास एक विख्यात स्मृति संशोधक के द्वारा कई संशोधन किए गए। तदनुसार यदि ये दोहराने की क्रिया न की जाए तो सब कैसे सपाट हो जाता है- अर्थात भूल जाता है यह सिद्ध कर दिखाया है। Time is the thief of memory.</p>
<p style="text-align: justify;">हम स्वयं भी एक प्रयोग कर देख सकते हैं। पन्द्रह शब्दों की एक सूची बनाएं&#8230;.. कागज पर उसे लिखें। इस कागज को पलट कर रख दें। अब सूची के शब्दों को याद कर लिखें। अब सूची के कितने शब्द याद हैं यह देखें। अब चार छह बार दोहराकर दुबारा लिखें। अब देखें की दोनों बार की सूचियों में क्या अंतर है। दोहराने के कारण अधिक शब्द ध्यान में रहें है ऐसा अनुभव अवश्य होगा। इसीलिए &#8216;दोहराना&#8217; एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। सामान्यतः हम दोहराते कब हैं? सत्र के अंत में परीक्षा का समय निकट आने पर ही! तब तक तो सब भूल गए होते हैं। चौबीस घंटे की अवधि में सामान्यतः हम अस्सी प्रतिशत भूल जाते हैं। इसलिए दोहराना आवश्यक है। तो फिर यह विधि अपनाएंगे ना? अब ये दोहराने की प्रक्रिया कैसे करते हैं देखें –</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>१. दैनिक अर्थात प्रतिदिन दोहराना</strong> &#8211; शाला से घर आने पर थोड़ा विश्राम कर, &#8216;फ्रेश&#8217; होलें। शांति से, प्रसन्नता से अपनी आंखों के समक्ष यह ध्यान करने का प्रयास करें की दिनभर में, अलग अलग विषयों की कक्षाओं में शिक्षकों द्वारा क्या पढ़ाया गया, क्या विशेष कहा गया! बीच की अवधि में कापी का सहारा ले सकते हैं। जो जो याद हो ऐसे शब्द, चित्र, आकृति, कागज पर बगैर किसी तनाव के, लिख लें, क्रम से न हो तो भी, जैसे याद आता जाए वैसा लिखते चलें! इसे क्रमवार ही याद हो ऐसी आवश्यकता नहीं। बाद में उसे क्रमवार जोड़ने का प्रयास करें। यथा सम्भव जोड़ने की प्रक्रिया अपनाते हुए क्या, कौन, कब, कहां, क्यों और कैसे इन प्रश्नों का सहारा लें।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>२. साप्ताहिक दोहराना</strong> – सप्ताह के अंत में शनिवार, रविवार को सप्ताह भर में पढ़ाया हुआ उपरोक्त अनुसार दृष्टिगत करें। केवल नजर घुमाना ही उपयोगी नहीं, दोहराते समय हाथ में पेंसिल, मार्कर, हाईलाइटर अवश्य रखें। आवश्यकतानुसार चिन्ह, निशान लगाना, हाईलाइट करना, आवश्यक लगे तो मुंह से उच्चारण करना, प्रश्न निर्माण करना, ऐसी विविध कृति, क्रिया उपयोग में ली जाए तो दोहराना अर्थपूर्ण, परिणाम कारक होगा। अन्यथा कापी, और पुस्तकों के पृष्ठ केवल पलटना ही होगा।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>३. मासिक दोहराना</strong> &#8211; प्रत्येक माह के अंत में दो चार दिन उक्त माह में पढ़ा हुआ अंश उपरोक्त पद्धति से दोहराएं।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>४. वार्षिक दोहराना</strong> &#8211; सामान्यतः दिसम्बर तक सारा पाठ्यक्रम पूर्ण हो ही जाता है। जनवरी माह से अधिकतर समय दोहराना, प्रश्न पत्र हल करना, शुरू हो जाता है। यह कार्य यांत्रिक प्रकार न रहकर रस पूर्ण, अर्थपूर्ण, विविध पद्धति से और विशेषतः सक्रियता बढ़ाते हुए दोहराना कैसे करेंगे इस पर विचार कर क्रियान्वयन करें। एकसुरी पन, आलस्य को दूर करने हेतु दोहराने के कार्य में विविधता कैसे निर्मित की जाए इसका ध्यान रखें तो अधिक लाभदायक होगा।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-8135" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/12/360_F_791466918_4E1gUZ8EIw17jcZ1kRIWskZw9CO75Yee-300x200.jpg" alt="" width="1421" height="947" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/12/360_F_791466918_4E1gUZ8EIw17jcZ1kRIWskZw9CO75Yee-300x200.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/12/360_F_791466918_4E1gUZ8EIw17jcZ1kRIWskZw9CO75Yee.jpg 540w" sizes="auto, (max-width: 1421px) 100vw, 1421px" /></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>५. परीक्षा के दिन दोहराना </strong>&#8211; (LMR Last minute Revision) – परीक्षा प्रारंभ होने के समय से एक दो घंटे पूर्व से परीक्षा केंद्र पर कैसा वातावरण होता है इसका चित्र मजेदार होता है। कई विद्यार्थी कापी, पुस्तक, गाइडस, नोटस आदि लेकर परीक्षा शुरू होने के पूर्व के अंतिम क्षण तक इन सामग्रियों से लड़ते हुए नजर आते हैं। पाठ्यक्रम की विशालता को सोचकर घबराए हुए होते हैं, नर्वस रहते हैं। परीक्षा प्रारंभ होने का घंटा बजने तक, परीक्षा कक्ष में पहुंचने तक कापी, पुस्तकों का उपयोग करते रहते हैं। वास्तव में तो परीक्षा प्रारंभ होने के एक घंटा पूर्व से ही पूर्ण शांति आवश्यक है। कुछ पढ़ना, आपस में पूछना, अनावश्यक रूप से बन्द रखना चाहिए। यह अवधि है केवल स्वयं सूचना देने की! घर से निकलते समय एक बार दोहराएं, किन्तु अलग पद्धति से! कुछ समय पूर्व LMR की तैयारी करें। कापी के हाशिए पर जो भी महत्तवपूर्ण शब्द (Key words) लिखें हो तो परीक्षा प्रारंभ होने के पूर्व, इसके पूर्व घर से निकलते समय, और इससे पूर्व प्रातः जागने पर उनका वाचन करें, बार बार उन पर दृष्टि डालें। यह अत्यंत लाभकारी होगा।</p>
<p style="text-align: justify;">दोहराने की प्रक्रिया के लिए अंतिम समय तक का इंतजार न करें। टुकड़ों टुकड़ों में (Instalments) दोहराएं। बार बार दोहराएं, सफलता आपके हाथों में ही होगी!!</p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक शिक्षाविद, स्वतंत्र लेखक, चिन्तक व विचारक है।)</p>
<p><strong>और पढ़ें : </strong><span style="color: #0000ff;"><strong><a style="color: #0000ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/practice-like-this-1/" target="_blank" rel="noopener">ऐसे करें अभ्यास-१</a></strong></span></p>
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		<title>ऐसे करें अभ्यास-१</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 16 Nov 2024 04:20:17 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अध्ययन करें आनंद से]]></category>
		<category><![CDATA[दिलीप बेतकेकर]]></category>
		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[Aadhyann karen aanand se]]></category>
		<category><![CDATA[chaatr]]></category>
		<category><![CDATA[class]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[student]]></category>
		<category><![CDATA[छात्र]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>✍ दिलीप बेतकेकर सामान्यतः विद्यार्थी अभ्यास करने के लिए दो प्रकार की पद्धति अपनाते हैं- वाचन और पाठांतर! दोनों ही आवश्यक और उपयोगी हैं। वाचन तो सभी प्रकार के अध्ययन&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"><img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/270d.png" alt="✍" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /> दिलीप बेतकेकर</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-8024" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/10/2424-300x225.jpg" alt="" width="1201" height="901" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/10/2424-300x225.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/10/2424.jpg 720w" sizes="auto, (max-width: 1201px) 100vw, 1201px" /></p>
<p style="text-align: justify;">सामान्यतः विद्यार्थी अभ्यास करने के लिए दो प्रकार की पद्धति अपनाते हैं- वाचन और पाठांतर!</p>
<p style="text-align: justify;">दोनों ही आवश्यक और उपयोगी हैं। वाचन तो सभी प्रकार के अध्ययन कौशल्य की जननी है, पहला पायदान है। परन्तु अध्ययन के लिए केवल वाचन ही पर्याप्त नहीं, कारण यह कि वाचन की दो मर्यादाएं हैं। एक साथ और बहुत अधिक समय तक वाचन न होना और वाचन किया हुआ ध्यान में न रहना! (भूल जाना)।</p>
<p style="text-align: justify;">कई लोग पाठांतर को अधिक महत्व देते हैं। पालकगण भी बच्चों को पढ़ो-पढ़ो कहते रहते हैं। अध्ययन-अभ्यास करना, अर्थात पाठांतर करना यही समीकरण अधिकांश लोगों के दिमाग में होता है। पाठांतर उपयोगी है परन्तु उसकी भी सीमाएं हैं। सभी विषयों में पाठांतर संभव नहीं है। उच्च शिक्षा के लिए पाठांतर करके अभ्यास असंभव है। बाल्यावस्था में जितना पाठांतर होता है उतना युवावस्था में नहीं हो पाता। पाठांतर का उपयोग व्याख्या, सूत्र, कविता आदि के लिए अवश्य हो पाता है। वाचन और पाठांतर पर ही निर्भर होकर अभ्यास अधिक समय तक नहीं हो पाता, और प्रभावी भी नहीं रहता। इन दोनों का उपयोग आवश्यकतानुसार कर सकते हैं। अध्ययन के लिए अन्य भी बहुत पद्धतियां उपलब्ध हैं। एक ही पद्धति से अभ्यास करने से वह नीरस, एक सूरी और अटपटा लगने लगता है। कम भी होता है। विविध पद्धतियों से अभ्यास करने पर हम अधिक समय तक अभ्यास कर पाते हैं और उसमें आनंद, प्रसन्नता होती है और प्रभावी भी रहता है। अब हम इस संदर्भ में विचार करेंगे।</p>
<p style="text-align: justify;">१. मुख्य शब्द और संकल्पना &#8211; (Keywords) हम जिस शब्द को अपनी कॉपी में लिखते हैं उनमें से कुछ महत्तवपूर्ण होते हैं। ये शब्द, संकल्पना अर्थात उत्तरों का हृदय स्थान, प्राण! ये शब्द, संकल्पना समझ में आए तो उनके आधार पर हम उत्तर का विस्तृत विवेचन कर सकते हैं। ऐसे महत्त्वपूर्ण शब्द पेंसिल से हाशिए पर लिखें। ये कार्य अध्याय करने के पश्चात, उत्तर लिखने के पश्चात तुरंत करना चाहिए। इन शब्दों का प्रयोग उत्तर में बार बार करें। परीक्षा के समय विषय की सभी पुस्तकें, कापियां न पढ़ते हुए केवल यह महत्त्वपूर्ण शब्द, कल्पनाएं बारंबार वाचन करें। अर्थात इसके लिए तैयारी शुरू से ही करनी चाहिए।</p>
<p style="text-align: justify;">ये शब्द पेंसिल से हाशिए में लिखने का उद्देश्य यह है कि शुरुआत में दो चार शब्द लिखें होने पर उन्हें बार बार दोहराने पर, शायद इतने शब्दों की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। दो शब्दों से ही उनकी ‘लिंक’ जुड़ जाएगी। फिर हाशिए के पेंसिल से लिखे शब्द रबर द्वारा मिटाए जा सकते हैं। ऐसा ही कार्य पुस्तक में भी किया जा सकता है। इस पद्धति से हम अधिक बार उस अध्याय का अथवा कॉपी में लिखे गए उत्तर का वाचन कर सकेंगे।</p>
<p style="text-align: justify;">२. स्मृति-चिट्ठियां (Memory cards/Flash cards) &#8211; अपनी जेब में समा जाए, इस आकार के थोड़े मोटे कागज के टुकड़े एक समान काट लें! इसके लिए कांपी से अथवा लेखन के लिए हम जो कागज उपयोग करते हैं, उसे उपयोग में नहीं लेना है। वह सामान्यतः पतला होता है। जल्दी खराब हो जाता है। ये काडर्स हमें वर्षभर उपयोग में लाने है। पुराने ग्रीटिंग काडर्स, निमंत्रण पत्र, अथवा दिवाली काडर्स आदि का उपयोग इस कार्य हेतु किया जा सकता है।</p>
<p style="text-align: justify;">अब हमारे पास इतिहास की भी पुस्तकें हैं और कांपी भी! अब हमें तैयार करना है इतिहास विषय के ‘मेमोरी कार्ड’! इसी तरह से अन्य विषयों के लिए भी तैयार करें। इन काडर्स पर मुख्य, महत्वपूर्ण शब्द, संकल्पना, दिनांक, घटना थोड़े बड़े अक्षरों में लिखें। एक ही कार्ड पर अत्यधिक शब्द, आदि नहीं लिखें। दो पंक्तियों के बीच पर्याप्त जगह छोड़ें। इस प्रकार आवश्यकतानुसार एक अध्याय के काडर्स तैयार करें। (कम से कम संख्या में)। ये कार्डस सदैव अपनी जेब में रखें। इस प्रकार इन कार्डस को हम कहीं भी, कभी भी पढ़ सकते हैं। (परीक्षा कक्ष में नहीं)। शाला में आते जाते समय, भोजन करते समय, किसी मित्र के घर अथवा उत्सव समारोह में, ये कार्डस समय मिलने पर पढ़ सकते हैं। हम इन्हें बार बार पढ़ने के कारण अच्छी प्रकार से याद कर सकते हैं। अध्ययन के लिए इसी का उपयोग करें और इसके परिणाम को देखे!</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-8025" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/10/dscn4166.webp" alt="" width="1211" height="908" /></p>
<p style="text-align: justify;">३. तख्ते (Charts) &#8211; इस पद्धति से हम पूरे घर में अभ्यास ही अभ्यास कर सकेंगे। सफेद कागज पर रंगीन स्केच पेन या मार्कर से तख्ते बनाए। सूत्र, व्याख्या, संकल्पना, आकृति इन तख्तों पर रेखांकित कर घर में आवश्यक अनेक सुविधाजनक स्थानों में लगा दें। बाथरूम में भी लगा सकते हैं। पुराने कैलेण्डर का पिछला हिस्सा भी इस कार्य हेतु उपयोग कर सकते हैं। घर पर जिन स्थानों पर अपना आना जाना अधिक हों उन सब स्थानों पर सब विषयों के चार्टस लगा दें। आते जाते उन पर दृष्टि डालें। अभ्यास सहजता से हो जाएगा! अपनी स्मरण शक्ति आश्चर्यजनक कार्य करती है। फोटोग्राफिक मेमोरी जैसी! हमने कौन सा चार्ट कहां लगाया है, किस चार्ट पर किस रंग से क्या लिखा है, कौन सी आकृति कहां है, आदि स्पष्ट और साफ आंखों के समक्ष आ जाता है। अपने को जो आवश्यक नहीं ऐसी कई बातें अपने ध्यान में रहती हैं। और वह भी बगैर किसी प्रयास के! फिर प्रयास करने से हमें जो चाहिए, जिसकी आवश्यकता है, जो महत्त्वपूर्ण है, वह कैसे ध्यान में नहीं रह सकता? योजना पूर्वक प्रयास चाहिए।</p>
<p style="text-align: center;"><strong>फैलाएं पूरे घर में अभ्यास।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>अभ्यास</strong><strong>, </strong><strong>अध्ययन</strong><strong> </strong><strong>एक</strong><strong> </strong><strong>ध्यास।</strong></p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक शिक्षाविद, स्वतंत्र लेखक, चिन्तक व विचारक है।)</p>
<p><strong>और पढ़ें : <span style="color: #000080;"><a style="color: #000080;" href="https://rashtriyashiksha.com/enemies-of-study-3/" target="_blank" rel="noopener">अध्ययन के शत्रु – 3</a></span></strong></p>
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		<title>अध्ययन के शत्रु – 3</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 11 Sep 2024 11:40:09 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अध्ययन करें आनंद से]]></category>
		<category><![CDATA[दिलीप बेतकेकर]]></category>
		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[Addhyann karen aanand se]]></category>
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		<category><![CDATA[Shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[student]]></category>
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		<category><![CDATA[अधयन्न करें अआनद से]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>✍ दिलीप बेतकेकर अभावग्रस्त नियोजन युद्ध के लिए केवल सेना और शस्त्र का होना ही पर्याप्त नहीं। केवल इन्हीं के आधार पर युद्ध में विजय प्राप्त नहीं होती। केवल धन&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"><img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/270d.png" alt="✍" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /> दिलीप बेतकेकर</p>
<figure id="attachment_7940" aria-describedby="caption-attachment-7940" style="width: 1227px" class="wp-caption alignnone"><img loading="lazy" decoding="async" class=" wp-image-7940" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/09/Hin-640x480-1-300x225.jpg" alt="" width="1227" height="920" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/09/Hin-640x480-1-300x225.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/09/Hin-640x480-1.jpg 640w" sizes="auto, (max-width: 1227px) 100vw, 1227px" /><figcaption id="caption-attachment-7940" class="wp-caption-text"><span style="text-align: justify; font-size: 16px;">आज हम अध्ययन के अन्य शत्रुओं से सामना करेंगे।</span></figcaption></figure>
<p style="text-align: justify;"><strong>अभावग्रस्त नियोजन </strong></p>
<p style="text-align: justify;">युद्ध के लिए केवल सेना और शस्त्र का होना ही पर्याप्त नहीं। केवल इन्हीं के आधार पर युद्ध में विजय प्राप्त नहीं होती। केवल धन और कल्पना के आधार पर उद्योग-व्यापार में यश प्राप्त नहीं होता है। साधन-सामग्री भरपूर हो परन्तु नियोजन ठीक न हो तो अपेक्षित सुयश नहीं मिलता है। इस हेतु व्यवस्थापन, उचित नियोजन ये महत्त्वपूर्ण घटक होते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">हम यदि अपना नियोजन नहीं करेंगे, अपने आपको &#8216;मैनेज&#8217; नहीं करेंगे तो बाकी अन्य लोग हमें ही नियोजित-मैनेज करने लगेंगे ये ध्यान रखने योग्य पहलू है। विद्यार्थी होने के नाते किन बातों का नियोजन आवश्यक है? सबसे महत्वपूर्ण घटक है समय का नियोजन! महत्वपूर्ण होने के कारण इसका विस्तृत विवेचन करेंगे &#8211;</p>
<p style="text-align: justify;">किसी एक शालेय वर्ष (सत्र) का विचार करें तो उस सत्र के लिए एक निश्चित अभ्यास क्रम, पाठ्य क्रम तय होता है। इसमें से थोड़ा थोड़ा, टुकड़ों टुकड़ों में पाठ्यंश कक्षा में पूर्ण करते हैं। क्रमवार इसे शिक्षक कक्षा में पूर्ण करते हैं। ये हुआ शिक्षक द्वारा नियोजन। अब हमें अपना भी नियोजन करना। है। अध्ययन के लिए अपनाई गई पद्धति दूसरे विषय के लिए भी उतनी ही उपयुक्त होगी यह आवश्यक नहीं। इस हेतु किस विषय के लिए कौन सी पद्धति अपनाई जाए, कौन सा पूरक साहित्य, सामग्री की आवश्यकता होगी, किस समय, किस विषय को, किसकी सहायता ली जाए, इन सबका विचार पूर्वक निश्चय करना ही नियोजन कहलाता है।</p>
<p style="text-align: justify;">बहुत से कार्य छोटे-मोटे होते हैं, उनसे दूर भागना भी उचित नहीं। बस आवश्यकता प्रधान्य क्रम तय करने की! योजना बनाना तो आसान है परन्तु उसका क्रियान्वयन करना उतना ही कठिन।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>Plans are only good intentions until you carry them out.</strong></p>
<p style="text-align: justify;">इसीलिए –</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>Plan the work, and work the plan.</strong></p>
<p style="text-align: justify;">ये सूत्र ध्यान में रखना चाहिए।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-7939" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/09/Shatru-300x200.jpg" alt="" width="1419" height="946" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/09/Shatru-300x200.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/09/Shatru-768x511.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1419px) 100vw, 1419px" /></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>टी.वी. </strong></p>
<p style="text-align: justify;">इस संदर्भ में क्या लिखें? कोई इसे ड्राइंग रूम का दैत्य कहते हैं, तो कोई इसे इडियट बाक्स कहकर बुलाते हैं। एक बात तो सोचने योग्य है कि यदि टी.वी. एक इडियट बॉक्स है तो उसके समक्ष घंटों गुजार देने वालों को क्या कहेंगे! सुपर इडियट ही न! कई लोग कितना समय टी.वी. देखने में निकाल देते हैं, ये वे तय कर सकते हैं न!</p>
<p style="text-align: justify;">टी.वी. को &#8216;अध्ययन की बाधा&#8217; बोलने वाले बहुत लोग हैं; परन्तु ग्रवचो मार्क्स टीवी को ऐसे कहते हैं &#8211; T.V. has played great part in my education. Whenever somebody turns it on, I leave the room and read a book. (मेरी शिक्षा में टी वी की भूमिका महत्वपूर्ण रही है, जब भी कोई टी. वी. शुरू करता था, मै वहां से उठ जाता था और कहीं जाकर कोई पुस्तक पढ़ने लगता था।) किसी का चलता हुआ टी.वी. तो बंद नहीं कर सकते परन्तु स्वयं उठकर कहीं जाकर अपना अधिक महत्तवपूर्ण कार्य अवश्य कर सकते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">टी.वी. के प्रतिकूल परिणामों को देखते हुए कई लोगों ने लिखा भी है। डॉ. अलका वाडकर द्वारा लिखी गई पुस्तक &#8216;टी वी आणि मुलं&#8217; (मराठी में) शिक्षक, पालक और बालकों के लिए पठनीय है। टी.वी. के चलते उत्सर्जित किरणें मस्तिष्क को हानि पहुंचती हैं, मन और शरीर के लिए भी हानिकारक है।</p>
<p style="text-align: justify;">एफ. एल राइट के अनुसार- टेलीविजन आंखों के लिए च्युइंग गम है।</p>
<p style="text-align: justify;">टीवी की एक धनात्मक विचारधारा भी है, उस ओर कोई गंभीरता पूर्वक नहीं देखता। कई टीवी चैनल्स उपयोगी, ज्ञान देने वाले, जानकारी उपलब्ध कराने वाले भी हैं। उदाहरण &#8211; डिस्कवरी, नैशनल जियोग्राफिक आदि। परन्तु इन्हें देखने वाले कम ही लोग हैं। समाचार शुरू होते ही लोग उठकर चाय, नाश्ता अथवा भोजन के लिए जाना पसंद करते हैं। टीवी को शुरू-बन्द करने हेतु, आवाज कम-अधिक करने हेतु, चैनल बदलने हेतु&#8230;&#8230;.. अर्थात टीवी को नियंत्रित करने हेतु रिमोट होता है। आजकल तो किसका रिमोट कंट्रोल किसके हाथ में है यह प्रश्न सामने आता है।</p>
<p style="text-align: justify;">प्रेक्षकों के हाथ टी.वी. का &#8216;रिमोट कंट्रोल&#8217; या टी.वी. के हाथ में प्रेक्षकों का कंट्रोल?</p>
<p style="text-align: justify;">अध्ययन के कुछ शत्रुओं को हमने पहचाना। संस्कृत विद्वानों ने छः प्रकार के दोष (विकार अथवा शत्रु कहें) ऐश्वर्य की इच्छा रखने वालों के लिए निषेधात्मक बताया गया है:-</p>
<p style="text-align: justify;">अफसोस, छह दोषों से युक्त व्यक्ति को यहां हारना पड़ता है जो सुख की इच्छा रखता है। नींद उनींदापन भय क्रोध आलस्य लंबे धागे।</p>
<p style="text-align: center;"><strong>षड् दोषा</strong><strong>: पुरुषेणेह हातव्या भूतिमिच्छता।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>निद्रा तन्द्रा भयं क्रोध आलस्यं दीर्घसूत्रता।।</strong></p>
<p style="text-align: justify;">(निद्रा, तंद्रा (ऊंघना), भय, क्रोध, आलस्य और शिथिलता ये छह दोष हैं)</p>
<p style="text-align: justify;">अभी तक देखे गए ये दोष कहां होते हैं? वे कहां बसते हैं, कहां स्थित हैं? वे कहीं बाहर नहीं होते, वे हम सब में ही उपस्थित हैं। अर्थात मैं स्वयं ही मेरा शत्रु और स्वयं ही मेरा मित्र!</p>
<p style="text-align: justify;">हेनरी फोर्ड कहते थे &#8211; आप आपकी सहायता करने वाले हाथों को खोज रहे हैं क्या? यह हाथ तो आपके अपने पास ही हैं!</p>
<p style="text-align: justify;">ये हाथ किसी दूसरे के नहीं, अपने स्वयं के हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">अपना हाथ जगन्नाथ !!</p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक शिक्षाविद, स्वतंत्र लेखक, चिन्तक व विचारक है।)</p>
<p>और पढ़ें: <span style="color: #0000ff;"><strong><a style="color: #0000ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/enemies-of-study-2/" target="_blank" rel="noopener">अध्ययन के शत्रु – 2</a></strong></span></p>
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		<title>अध्ययन के शत्रु – 2</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 08 Aug 2024 03:47:18 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अध्ययन करें आनंद से]]></category>
		<category><![CDATA[दिलीप बेतकेकर]]></category>
		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[Addhyann kare aanand se]]></category>
		<category><![CDATA[bhartiya shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[gyan ki baat]]></category>
		<category><![CDATA[indian education]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[अध्यन करें आनंद से]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>✍ दिलीप बेतकेकर अनावश्यक भय हमारा कैसे नुकसान करता है यह हमने पूर्व में ही देखा। इच्छा शक्ति के अभाव से भी प्रगति में कैसे बाधा पहुंचती है यह भी&#8230; </p>
<p>The post <a href="https://rashtriyashiksha.com/enemies-of-study-2/">अध्ययन के शत्रु – 2</a> appeared first on <a href="https://rashtriyashiksha.com">राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"><img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/270d.png" alt="✍" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /> दिलीप बेतकेकर</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-7847" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/08/Hindu-300x200.jpg" alt="" width="1344" height="896" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/08/Hindu-300x200.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/08/Hindu-768x512.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/08/Hindu.jpg 960w" sizes="auto, (max-width: 1344px) 100vw, 1344px" /></p>
<p style="text-align: justify;">अनावश्यक भय हमारा कैसे नुकसान करता है यह हमने पूर्व में ही देखा। इच्छा शक्ति के अभाव से भी प्रगति में कैसे बाधा पहुंचती है यह भी ध्यान में आया। अब और कारणों पर विचार करते हैं &#8211;</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>३. कम क्षमता आंकना &#8211;</strong> हम स्वयं की ओर किस प्रकार से देखते हैं, अपने स्वयं को कैसा आंकते हैं? इसे ‘स्व-प्रतिमा’ अर्थात स्वयं की प्रतिमा कहते हैं। स्वयं की उचित पहचान सही आंकलन न होने से हम क्या कर सकते हैं इस संबंध में हम असमंजस में रहते हैं। एक प्रयोग हम बच्चों से करवाते हैं। सभी कर सकते हैं। एक मिनिट में हम कितने शून्य एक कागज में लिख सकते हैं, इसका अनुमान करना, कल्पना करना, और उस संख्या को कागज पर लिखना। फिर प्रत्यक्ष एक कागज पर शून्य लिखना, और घड़ी में समय मापन कर, एक मिनिट में कितने शून्य लिखे इसकी गणना करना। अनुभव ऐसा पाया गया कि अनुमान पचास साठ शून्य का था और वास्तव में सौ-सवा सौ शून्य लिखे गए। इस प्रयोग से क्या समझ में आता है?</p>
<p style="text-align: justify;">स्वयं को अपनी क्षमता, शक्ति का अंदाजा नहीं होता है। मुझे ज्यादा करना संभव नहीं लगता, मेरे से फलां कार्य नहीं बनेगा, ऐसी धारणा बन जाती है। इसी को कम क्षमता आंकना कहते हैं। गणित एक कठिन विषय है। मुझे वह समझ में नहीं आएगा, मुझमें इतनी बुद्धिमत्ता नहीं है इस प्रकार की भावना, धारणा हम अनावश्यक ही अपने आप में पाले हुए हैं। स्वयं ही अपने हाथों पैरों में बेड़ियां पहना रहे हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">आत्म सम्मान (self-esteem) जब कमजोर होगा तो हम कमजोर ही रहेंगे। बलवान नहीं होंगे। इसीलिए कहते हैं-मन की कमजोरी को झटक कर फेंक दें। कुछ पर कम क्षमता हावी है तो कुछ पर अहम भाव हावी होता है। दोनों ही घातक हैं! दोनों ही नुकसानदायक हैं! इसलिए दोनों को त्यागना पड़ेगा।</p>
<p style="text-align: justify;">मैं क्षुद्र हूँ, ‘नगण्य हूँ’ ऐसी भी धारणा न रखें, और ‘मै सर्वज्ञ हूँ’ ‘सर्वश्रेष्ठ हूँ’ ऐसा गर्व का अनुभव भी न करें।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>४. तनाव &#8211;</strong> ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं होगा जिसे बिल्कुल तनाव न हो। तनाव होना चाहिए अथवा नहीं इस पर सदैव वाद विवाद होते रहते हैं। तनाव रहित होने पर भी कार्य क्षमता पर परिणाम होता है और अधिक तनाव से भी क्षमता प्रभावित होती है। सीमित, मर्यादा में तनाव रहना सर्वोत्तम! परन्तु सामान्यतः ऐसा होता नहीं, कुछ बच्चे पढ़ाई के कारण अत्यंत तनाव ग्रस्त रहते हैं। उन्हे तनावग्रस्त न रहने के लिए कहना पड़ता है। उसके विपरीत कुछ बच्चे इतने बेफिक्र, मस्तमौला, मनमौजी होते हैं कि उन्हें अभ्यास, परीक्षा और अन्य किसी भी बात की चिंता नहीं रहती, वे तनाव रहित रहते हैं। कुछ लोग अति तनाव के कारण दबे रहते हैं तो कुछ तनाव रहित होने से कहीं भी हवा में भी उड़ने समान रहते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">तनाव दूर करने के अनेक मार्ग हैं। ध्यान, योग, प्राणायाम ये तो है ही, परन्तु इनके अतिरिक्त शिथिलीकरण की कुछ छोटी छोटी क्रियाएं है। इस संबंध में अलग से विचार करेंगे, तब विस्तृत विचार होगा।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>५. आलस्य</strong><strong>, </strong><strong>टालमटोल</strong><strong>, </strong><strong>सुस्ती &#8211;</strong> आलस्य यह मानव का सबसे बड़ा शत्रु है। यह वाक्य हमने कई बार पढ़ा-सुना है, इसीलिए इसकी गंभीरता अब महत्त्वपूर्ण नहीं लगती। ईश्वर द्वारा शरीर प्रदत्त है, जीवन प्रदत्त है, किन्तु उसका मोल अनजाना हो जाता है। इसका कारण आलस्य आकर वह अनुपयोगी हो जाते हैं। समर्थ रामदास कहते हैं-</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>करंटया आळस आवडे! येत्न कदापि नावडे</strong><strong>,</strong></p>
<p style="text-align: justify;">(करंटा = आलसी व्यक्ति)</p>
<p style="text-align: justify;">अर्थात आलसी व्यक्ति को सावधान करते हैं और सुझाव देते हैं –</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>म्हणोंनि आलस सोड़ावा। येले साक्षेपें जोड़ावा।</strong></p>
<p style="text-align: justify;">किसी ने मजाक में ही कहा है कि &#8211; Doing nothing is a tiresome job because it&#8217;s impossible to stop and take a rest. यशस्वी व्यक्ति की विशेषता यह होती है कि उसे ढिलाई, टालमटोल बिल्कुल पसंद नहीं। सामान्य व्यक्ति आज का कार्य कल के लिए टाल देते हैं। ‘काल करे सो आज कर, आज करे तो अब’ ये कहना आसान है परन्तु आचरण में लाना उतना ही कठिन। कहते हैं न ढिलाई एक समय चुराने वाला चोर है।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-7848" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/08/study1.webp" alt="" width="1185" height="659" /></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>Procrastination is the thief of time.</strong></p>
<p style="text-align: justify;">आलसी, सुस्त, टालमटोल करने वाले व्यक्ति कभी ऊंचे सपने नहीं देखते।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>कष्टाविण फळ ना मिळते, तुज कळते परि ना वळते</strong></p>
<p style="text-align: justify;">(कष्ट के बिना फल नहीं मिलता।)</p>
<p style="text-align: justify;">ये सारा संसार समझता है, परंतु करता कोई नहीं। और कहते हैं &#8211; <strong>असेल माझा हरि तर देइल खाटल्यावरी</strong> (अर्थात, मेरा ईश्वर मेरा ध्यान रखेगा, तो मुझे खटिया पर बैठे बैठे सब कुछ दे देगा)</p>
<p style="text-align: justify;">इस प्रवृति से जीवन में कुछ प्राप्त नहीं हो सकेगा।</p>
<p style="text-align: center;"><strong>सुचेना सुखाहुन काहि आम्हाला</strong><strong>, </strong><strong>हवे सौख्य ते देह कष्टा विना।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>न तारा ही छेडावया हात हाले, कशी झंकृति गोड देईल वीणा।।</strong></p>
<p style="text-align: justify;">अर्थात, सुख के अतिरिक्त हमें कुछ चाह नहीं, बगैर कष्ट किए सुख चाहिए, वीणा के तारों को हाथ न लगाते हुए, उसमें से मधुर झनकार की अपेक्षा करना व्यर्थ है।</p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक शिक्षाविद, स्वतंत्र लेखक, चिन्तक व विचारक है।)</p>
<p><strong>और पढ़ें : <span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/enemy-of-studies-1/" target="_blank" rel="noopener">अध्ययन के शत्रु – 1</a></span></strong></p>
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		<title>अध्ययन के शत्रु – 1</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 08 Jul 2024 07:21:45 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अध्ययन करें आनंद से]]></category>
		<category><![CDATA[दिलीप बेतकेकर]]></category>
		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[Addhyan Karen aanad se]]></category>
		<category><![CDATA[bhartiya shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[Study]]></category>
		<category><![CDATA[अध्यन करें आनद से]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>✍ दिलीप बेतकेकर एक चार बच्चे के माँ-पिताजी मिलने आए। चेहरे पर चिंता थी। कुर्सी पर बैठते ही पिताजी बोले – ‘हमारा अभिमन्यु अध्ययन के लिए बैठता ही है कि&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"><img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/270d.png" alt="✍" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /> दिलीप बेतकेकर</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone  wp-image-7745" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/07/of-emotional-dynamic-pose-indian-kid-in-school-ai-generative-photo-300x226.jpg" alt="" width="1419" height="1069" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/07/of-emotional-dynamic-pose-indian-kid-in-school-ai-generative-photo-300x226.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/07/of-emotional-dynamic-pose-indian-kid-in-school-ai-generative-photo.jpg 531w" sizes="auto, (max-width: 1419px) 100vw, 1419px" /></p>
<p style="text-align: justify;">एक चार बच्चे के माँ-पिताजी मिलने आए। चेहरे पर चिंता थी। कुर्सी पर बैठते ही पिताजी बोले – ‘हमारा अभिमन्यु अध्ययन के लिए बैठता ही है कि सब शत्रु उसे घेर लेते हैं।‘ ‘हो तो!’ माता जी संभाषण का सूत्र अपने हाथ लेते हुए बोली।</p>
<p style="text-align: justify;">“एक तो पढ़ाई करने बैठने की इच्छा ही नहीं होती उसे। बैठता है तो उबासी लेता रहता है। कैसा आलसी हो गया है? हम जरा इधर उधर हुए नहीं कि मोबाइल में ‘गेम्स’ शुरू! अब दिनभर क्या उसकी ही रखवाली करते बैठें? हमें भी तो अपने व्यवसाय, नौकरी-धंधे देखना है ना? हम घर से बाहर जाते हैं तो टीवी चलाकर देखता रहता है।”</p>
<p style="text-align: justify;">“और, ये क्रिकेट ने तो कहर बरपा दिया है।” पिताजी ने पुष्टि करते हुए कहा। “हम घर में नहीं है ये पता चलते ही क्रिकेट के मित्र आकर इसे ले जाते हैं।” प्रत्येक घर में बच्चों को शत्रुओं ने घेर रखा है, ऐसा ध्यान में आता है। मोबाइल, टीवी, आलस्य, क्रिकेट का आकर्षण यह दिखाई देने वाले शत्रु हैं। परन्तु ना दिखाई देने वाले शत्रुओं की संख्या अधिक है। हम उन शत्रुओं की एक सूची तैयार करते हैं जिससे उनसे लड़ना आसान होगा।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>१. भय &#8211;</strong> भय कई प्रकार का हो सकता है। परन्तु पराभव अथवा अपयश का भय, हमारी कुछ गलती तो नहीं होगी, इस बात का भय, और एक अन्य भय यह भी है कि लोग क्या कहेंगे, लोग हंसेगे, लोग मजाक उड़ाएंगे; कक्षा में शिक्षक प्रश्न पूछते है, फलक पर बुलाकर कोई प्रश्न को हल करने को कहते हैं, तब क्या होता है? कितने विद्यार्थी स्वयं प्रेरित होकर उत्तर देने के लिए फलक पर उत्साह से आकर प्रश्न हल करते हैं? अनेक बार तो उत्तर मालूम होते हुए भी उसे बोलने में भय लगता है, कहीं गलत हो गया तो? फिर कक्षा हंसेगी, मजाक उड़ाएगी, फजीहत होगी, इससे अच्छा है चुप रहें यही धारणा है!</p>
<p style="text-align: justify;">शिक्षक पढ़ाते समय बीच में ही दो प्रश्न सहसा पूछते हैं। देश के किसी भी शाला में देखें तो यह प्रश्न शिक्षक द्वारा साधारणतः पूछे जाते हैं। प्रथम प्रश्न है समझे क्या? और बच्चों का सामूहिक उत्तर होता है- हां सर! फिर शिक्षक का दूसरा प्रश्न होता है- कुछ कठिन है क्या? फिर सामूहिक उत्तर &#8211; नहीं सर! वास्तव में समझे क्या का सही उत्तर होना चाहिए था नहीं और दूसरे प्रश्न &#8211; कुछ कठिन है क्या? का प्रामाणिक उत्तर हां में होना चाहिए था। अनेक बार सब कुछ ही कठिन लगता है फिर भी उत्तर नहीं होता है। फिर बच्चे सच क्यों नहीं कहते उस समय? उत्तर आसान है इसका &#8211; भय के कारण।</p>
<p style="text-align: justify;">चीनी भाषा में एक कहावत है &#8211; आपने अगर प्रश्न पूछ लिया तो लोग हंसेगे, मूर्ख कहेंगे, परन्तु केवल यह पांच मिनट के लिए होगा, परन्तु प्रश्न न पूछा जाए तो जीवनभर मुर्ख रहेंगे, उत्तर न आने के कारण। अतः जीवनभर मुर्ख, अज्ञानी, रहने की अपेक्षा पांच मिनट रहना बेहतर है।</p>
<p style="text-align: justify;">और इसी प्रकार कई बातों में भय के कारण हम स्वयं का ही नुकसान करते हैं। भित्या मागे ब्रह्मराक्षस अर्थात Cowards die hundred deaths.</p>
<p style="text-align: justify;">ऐसा भी हम कई बार सुनते रहते हैं। इस भय को मिटाना होगा, नष्ट करना होगा!</p>
<p style="text-align: justify;">स्वामी विवेकानंद के जीवन का एक प्रसंग ज्ञात ही होगा &#8211;</p>
<p style="text-align: justify;">एक बार स्वामी जी काशी में एक सकरी गली से जा रहे थे। एक बंदर उनके पीछे पड़ गया। स्वामी जी घबराकर भागने का प्रयास करने लगे। बंदर अधिक जोश से पीछे पड़ गया। यह दृश्य देखकर एक स्थानिक द्वारा उन्हें सलाह दी गई कि भागे नहीं, वहीं रुककर, पीछे मुड़कर बंदर की ओर उसकी आंख से आंख मिलाकर देखे। दूसरा कोई पर्याय स्वामी जी के पास न था। अतः उस स्थानिक की सलाह पर स्वामी जी ने पीछे मुड़कर बंदर की आंखों में अपनी आंखे गड़ाकर देखने लगे। परिणास्वरूप बंदर भाग गया। स्वामी जी अपने व्याख्यान में इस प्रसंग का उल्लेख करते थे।</p>
<p style="text-align: justify;">शत्रु से संकट आने पर भागो नहीं, दृढ़ता पूर्वक उनका सामना करो।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-7741" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/07/1.webp" alt="" width="1364" height="767" /></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>२. इच्छा शक्ति की कमी &#8211; जहां चाह वहां राह।</strong> जहां चाह वहां राह यह कई बार सुनते आ रहे हैं। कुछ सीखने की, कुछ करके दिखाने की इच्छा न हो तो कोई सहायता नहीं कर सकता। कठिन इच्छा शक्ति यह एक बड़ी जमापूंजी है। दृढ़ इच्छाशक्ति के बलबूते मार्क इंगलिश, दोनों पैर न होते हुए भी, कृत्रिम पैर के आधार से, एवरेस्ट शिखर पर जा सके। अभिनन्दन जैसा व्यक्ति पाकिस्तान के कब्जे में रहकर भी हताश नहीं हुआ। इच्छाशक्ति के बलबूते, विपरीत परिस्थिति का सामना करते हुए, संघर्ष करते हुए, अपनी शिक्षा पूर्ण की। उद्योग, व्यवसाय स्थापित कर सुयश प्राप्त किया। कला, क्रीड़ा क्षेत्र में भी अपना विशेष योगदान भी दशनि वाले अनेक व्यक्ति हैं। हाथ में जिनके ‘शून्य’ था उन्होंने शून्य से विश्व निर्माण किया। जिनके पास इच्छाशक्ति का अभाव हो उन्हें कोई सहायता नहीं कर सकता। और यह भी सत्य है कि जिनके पास इच्छाशक्ति है उनको सहसा किसी की सहायता की भी आवश्यकता नहीं होती। और यदि आवश्यक हो भी जाए तो सहायता करने के लिए सैकड़ों हाथ आगे बढ़ते हैं। घोड़े को पानी तक ले जाया जा सकता है, पानी पीना अथवा नहीं यह घोड़े की इच्छा पर निर्भर करता है। अध्ययन के लिए एक सुंदर प्रभावी, अनुकूल वातावरण, सकारात्मक वातावरण, घर पर माता-पिता और शाला में शिक्षक, निर्मित कर सकते हैं। परन्तु अन्य कोई भी अपने मन को ‘इच्छा शक्ति’ का इंजेक्शन नहीं दे सकता।</p>
<p style="text-align: justify;">“We don’t walk on our legs, but on our will.” “हम अपने पैरों पर नहीं, बल्कि अपनी इच्छा से चलते हैं।”</p>
<p style="text-align: justify;">बुद्धिमत्ता है, ताकत है परन्तु इच्छाशक्ति ही न हो तो?</p>
<p style="text-align: justify;">“Skill is nill without will.” “इच्छाशक्ति के बिना कौशल शून्य है।”</p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक शिक्षाविद, स्वतंत्र लेखक, चिन्तक व विचारक है।</p>
<p style="text-align: justify;">और पढ़ें : <strong><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/study-friends/" target="_blank" rel="noopener">अध्ययन – मित्र</a></span></strong></p>
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		<title>अध्ययन &#8211; मित्र</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 10 Jun 2024 08:42:02 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अध्ययन करें आनंद से]]></category>
		<category><![CDATA[दिलीप बेतकेकर]]></category>
		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[Study]]></category>
		<category><![CDATA[Study with joy]]></category>
		<category><![CDATA[अध्यन करें आनंद से]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>✍ दिलीप बेतकेकर अब देखते हैं कि अध्ययन के मित्र कौन हैं, साथी कौन हैं! पुस्तकें हमारी प्रथम मित्र हैं! कुछ पुस्तकें उस शालेय सत्र के लिए उस सत्र तक&#8230; </p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"><img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/270d.png" alt="✍" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /> दिलीप बेतकेकर</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone  wp-image-7677" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/06/Global-Studies-Homepage-Hero_217008452-300x130.jpg" alt="" width="1117" height="484" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/06/Global-Studies-Homepage-Hero_217008452-300x130.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/06/Global-Studies-Homepage-Hero_217008452-1024x444.jpg 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/06/Global-Studies-Homepage-Hero_217008452-768x333.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/06/Global-Studies-Homepage-Hero_217008452.jpg 1500w" sizes="auto, (max-width: 1117px) 100vw, 1117px" /></p>
<p style="text-align: justify;">अब देखते हैं कि अध्ययन के मित्र कौन हैं, साथी कौन हैं! पुस्तकें हमारी प्रथम मित्र हैं! कुछ पुस्तकें उस शालेय सत्र के लिए उस सत्र तक के लिए ही होती है। अगली कक्षा में आने पर पुस्तकें बदल जाती हैं। नई कक्षा में नई पुस्तकें आती हैं, परन्तु कुछ पुस्तकें ऐसी होती हैं जो केवल उच्च कक्षा ही नहीं अपितु जीवन भर के लिए उपयोगी रहती हैं। ये पुस्तकें जीवनभर का साथ देती हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">इनमे सबसे पहले आता है शब्दकोश! ‘शब्दकोश’ का नाम सुनते ही हमारे समक्ष दिखता है हिन्दी-अंग्रेजी, मराठी-अंग्रेजी, हिंदी-मराठी शब्दकोश! पहले सामान्यतः ये ही शब्दकोश होते थे। आजकल प्रत्येक विषय के शब्दकोष बाज़ार में उपलब्ध हैं। इनमें भौतिक शास्त्र, रसायन शास्त्र, संगणक, गणित, मेडिकल आदि सभी विषयों के शब्दकोष उपलब्ध हैं। यदि सभी शब्दकोष (आवश्यकतानुसार) एक साथ लेना संभव न हो तो प्रतिमाह एक एक करके भी क्रय कर सकते हैं। थिसारस यह एक शब्दकोष का प्रकार है। यह बहुत ही उपयोगी है। अपने मोबाइल में भी यह सुविधा उपलब्ध है। अनेक प्रकार के ‘ऐप्स’ मोबाइल में उपलब्ध हैं। कहावतें, युक्तियां, वाक्य प्रचार, व्याकरण आदि की भी पुस्तकें होती हैं। ‘यू-ट्यूब’ पर भी बहुत साहित्य सामग्री उपलब्ध है।</p>
<p style="text-align: justify;">पृथ्वी का गोल (ग्लोब) यह एक उपयुक्त साधन है। परिवार के लिए भी यह एक अच्छा शैक्षणिक साधन है। छोटे मोटे रोल अप बोर्ड कल्पकता से उपयोग में ला सकते हैं। याद रखने की जानकारी, याद करने के सूत्र (कंठस्थ), नए शब्द आदि आदि अनेक बातें इस रोल अप- बोर्ड पर, भिन्न भिन्न रंगों के चाक से लिखकर घर में सुविधाजनक स्थानों पर लगाएं। आते-जाते, चलते-फिरते सहजता से इन्हें देखने से सब सरलता से कंठस्थ हो जाएगा, पता ही नहीं चलेगा।</p>
<p style="text-align: justify;">समाचार पत्र यह रोज सहज रूप से और अल्प कीमत में उपलब्ध होने वाला, और अनेक प्रकार के सहायक, सभी का का मित्र कहलाता है। शाला में जो भी पढ़ते हैं, उन सभी विषयों का समाचार में स्थान रहता है। रोज प्रातः मिलने वाली यह एक पुस्तक ही है विशेषकर शनिवार, रविवारीय पूरक परिशिष्ट में बहुत सा साहित्य होता है। उसमें विविधता, सामान्य ज्ञान, अन्य अनेक ज्ञानवर्धक माहिती उपलब्ध होती है। रूड यार्ड किप्लिंग, एक प्रख्यात अंग्रेजी लेखक कहते थे- मैंने अपनी सहायता के लिए छः ईमानदार मित्रों को रखा है। उन्होंने मुझे बहुत सिखाया, अभी भी सीखा रहे हैं। I have six honest friends. They taught me all I know.</p>
<p style="text-align: justify;">हम भी उन छः मित्रों से मित्रता कर सकते हैं। वे मित्रता के लिए सदैव तत्पर रहते हैं। हमे स्वयं ही इस मित्रता के लिए पहल करनी चाहिए। हम यदि ईमानदारी और निष्ठापूर्वक उनकी मित्रता हेतु पहल करेंगे तो वे मित्र भी हमसे एकनिष्ठ होकर रहेंगे। आपको अब यह उत्सुकता अवश्य होगी कि ये छः मित्र कौन हैं? ये छः एकनिष्ठ मित्र हैं- क्या, कौन, कब, कहां, कैसे और क्यों।</p>
<p style="text-align: justify;">आश्चर्य हुआ न! अब मन में शंकाएं, प्रश्न उठ रहे होंगे। ये कैसे मित्र हुए? ये क्या मदद कर सकते हैं? परन्तु वास्तव में ये बहुत अच्छे मित्र हैं। ये सदैव साथ रहते हैं, कभी धोखा नहीं देते।</p>
<p style="text-align: justify;">वे क्या और कैसी सहायता कर सकते हैं यह देखना है? एक उदाहरण देखें- मान लीजिए कि हमें प्रदूषण विषय में निबंध लिखना है, या व्याख्यान देना है, अथवा प्रकल्प पूर्ण करना है। यह सब करने के लिए ये मित्र ही सहायता कर सकते हैं। ‘प्रदूषण’ इस शीर्षक को, विषय के अनुसार क्या, कौन, कब, कहां, कैसे और क्यों? ऐसे प्रश्न पूछते जाएं। प्रदूषण और क्या ऐसे दो शब्द लेकर जितने प्रश्न संभव हो उतने पूंछे। उनके उत्तर लिखना। पांच-सात प्रश्न तो सहज ही मिल सकते हैं। इसी प्रकार क्रमवार शेष पांच मित्रों को पूंछे और उनके उत्तर लिखें। इस तरह सामान्य स्तर का विद्यार्थी भी पच्चीस-तीस प्रश्नोत्तर तैयार कर सकता है। इस प्रकार प्रत्येक प्रश्न की एक दो पंक्तियां भी लिखी जाएं, तो लगभग चालीस पचास पंक्तियां तैयार हो जाएंगी। बस हो गया। चालीस-पचास पंक्तियों का निबंध तैयार हो जाएगा।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone  wp-image-7678" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/06/JI-300x218.jpg" alt="" width="1183" height="860" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/06/JI-300x218.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/06/JI-1024x744.jpg 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/06/JI-768x558.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/06/JI.jpg 1130w" sizes="auto, (max-width: 1183px) 100vw, 1183px" /></p>
<p style="text-align: justify;">एक बार ऐसी आदत हो जाए, अभ्यास हो जाए इसका, तो फिर निश्चित ही आदत हो जाएगी। इस प्रकार से विचार करने से सहजता आती है। जैसे जैसे हमें कैसे, क्यों आदि के संदर्भ में अधिक प्रश्न उभरते हैं, वैसे अपनी वैचारिक क्षमता में वृद्धि होती जाती है, स्तर गहन हो जाता है। ऐसा विचार करना, मनन करना, चिंतन करना ही ‘शिक्षण’ ‘अध्ययन’ है। क्या और कौन जैसे प्रश्नों के उपरांत कैसे और क्यों इन प्रश्नों की दिशा में प्रयत्न पूर्वक जाना चाहिए।</p>
<p style="text-align: justify;">इस पद्धति को अपनाने से प्रसन्नता में वृद्धि होती है, अपने स्वयं की स्वयं के बारे में धारणा स्पष्ट होती है। स्वयं की क्षमता, स्व-सामर्थ्य, वैचारिक क्षमता आदि की वास्तविक पहचान होती है।</p>
<p style="text-align: justify;">फिर हमें अनुभव होता है कि मैं ही स्वयं का प्रामाणिक मित्र हूँ!</p>
<p style="text-align: justify;">To have a friend, be a friend.!!</p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक शिक्षाविद, स्वतंत्र लेखक, चिन्तक व विचारक है।)</p>
<p><strong>और पढ़ें : <span style="color: #000080;"><a style="color: #000080;" href="https://rashtriyashiksha.com/practice-tools/" target="_blank" rel="noopener">अभ्यास के औजार</a></span></strong></p>
<p>The post <a href="https://rashtriyashiksha.com/study-friends/">अध्ययन &#8211; मित्र</a> appeared first on <a href="https://rashtriyashiksha.com">राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</a>.</p>
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