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	<title>नम्रता दत्त Archives - राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन rashtriyashiksha.com</title>
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	<description>सा विद्या या विमुक्तये</description>
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	<title>नम्रता दत्त Archives - राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन rashtriyashiksha.com</title>
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		<title>शिशु शिक्षा 40 – क्षमताओं का विकास – भाग 2</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 19 Jul 2023 05:17:13 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नम्रता दत्त]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#x270d; नम्रता दत्त श्रृंखला के इस सोपान में शिशु की बौद्धिक क्षमताओं अर्थात् विज्ञानमयकोश  एवं आध्यात्मिक क्षमताओं अर्थात् आनन्दमयकोश के विकास पर संक्षिप्त चर्चा करेंगे। बौद्धिक क्षमताएं अर्थात् विज्ञानमय कोश&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"><img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/270d.png" alt="✍" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /> नम्रता दत्त</p>
<p><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone wp-image-6826" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/07/play-school_0-300x200.jpg" alt="" width="1724" height="1149" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/07/play-school_0-300x200.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/07/play-school_0-768x512.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/07/play-school_0.jpg 900w" sizes="(max-width: 1724px) 100vw, 1724px" /></p>
<p style="text-align: justify;">श्रृंखला के इस सोपान में शिशु की बौद्धिक क्षमताओं अर्थात् विज्ञानमयकोश  एवं आध्यात्मिक क्षमताओं अर्थात् आनन्दमयकोश के विकास पर संक्षिप्त चर्चा करेंगे।</p>
<ol style="text-align: justify;" start="4">
<li><strong> बौद्धिक क्षमताएं अर्थात् विज्ञानमय कोश</strong></li>
</ol>
<p style="text-align: justify;">बौद्धिक क्षमताओं को शारीरिक क्षमताओं की भांति सहजता से नहीं मापा जा सकता क्योंकि बुद्धि प्रत्यक्ष रूप से दिखाई नहीं देती। यह मन की भांति अन्तःकरण है। बुद्धि के विकास का आधार वातावरण तो है ही लेकिन इसमें मन (मनोमयकोश) के विकास की विशेष भूमिका होती है क्योंकि ज्ञानेन्द्रियों से प्राप्त अनुभूति/संवेदना सबसे पहले मन के पास ही जाती है और मन अपनी स्थिति के अनुरूप उस अनुभूति/संवेदना को विचार के रूप में बुद्धि के सम्मुख रखता है। बुद्धि का अर्थ है ज्ञान ग्रहण करना अथवा जानना। ज्ञान को ग्रहण करने के लिए बुद्धि, मन द्वारा रखी गई संवेदना/विचार को कईं कसौटी पर कसती है जैसे- निरीक्षण-परीक्षण, विश्लेषण-संश्लेषण, तर्क-अनुमान आदि के बाद विवेक से निर्णय लेती है। इसलिए मनोमय कोश से अधिक सूक्ष्म विज्ञानमय कोश को माना जाता है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>बौद्धिक विकास के आयाम         </strong></p>
<p style="text-align: justify;">१. ग्रहण करने की शक्ति का विकास &#8211; मन (संवेदना) और चित (संस्कार) के बीच बुद्धि/विवेक ही सेतु का कार्य करती है। जब निर्मल मन शुद्ध रूप में (निःस्वार्थ, बिना राग द्वेष के निर्भय होकर) ज्ञानेन्द्रियों द्वारा प्राप्त संवेदनाओं को बुद्धि के समक्ष रखता है तो बुद्धि उसे सही स्वरूप में ग्रहण कर उचित अनुभव/ज्ञान ले पाती है और चित पर श्रेष्ठ संस्कार होता है। इन श्रेष्ठ संस्कारों के कारण ही शिशु चरित्रवान बनता है।</p>
<p style="text-align: justify;">२. धारणा शक्ति का विकास &#8211; बुद्धि ने जो अनुभव ग्रहण किया उसे सदैव व्यवहार में धारण भी करना चाहिए। मजबूत धारणा शक्ति के कारण ही वह व्यवहार में उतरता है नहीं तो ग्रहण करने के बाद भी वह बुद्धि में रहता नहीं है।</p>
<p style="text-align: justify;">३. स्मृति का विकास &#8211; स्मृति में रहने के कारण ही ग्रहण एवं धारण किया हुआ अनुभव समय एवं आवश्यकतानुसार व्यवहार में प्रयोग में आता है। अतः स्मरण शक्ति का विकास भी बौद्धिक क्षमताओं के विकास का आयाम है।</p>
<p style="text-align: justify;">४. कल्पना शक्ति का विकास &#8211; कल्पना की शक्ति के द्वारा बुद्धि कल्पना (आउट ऑफ दी बॉक्स जाकर) द्वारा कुछ समस्याओं का हल करती है। अतः यह भी बौद्धिक क्षमता का आयाम है।</p>
<p style="text-align: justify;">५. निरीक्षण शक्ति का विकास &#8211; किसी भी स्थूल क्रिया का सूक्ष्मता से अवलोकन करना ही निरीक्षण कहलाता है जैसे- चिङिया दाना चुग रही है तो चोंच खोलती है, चोंच से दाना उठाती है तो खट की आवाज आती है, हल्की सी आहट होती है तो उङ जाती है आदि आदि।</p>
<p style="text-align: justify;">६. परीक्षण शक्ति का विकास &#8211; परीक्षण अर्थात् परखना। परखना अर्थात् स्थूल ज्ञान के प्रयोग से सूक्ष्म की ओर जाना हैं जैसे दो रंगों के मेल से हल्का /गहरा रंग बनाने के लिए किस रंग की मात्रा को घटाया/बढाया जाए।</p>
<p style="text-align: justify;">७. तर्क करना &#8211; एक ही कार्य को विभिन्न प्रकार से कैसे-कैसे किया जा सकता है इसका प्रयोग करना ही तर्क शक्ति है जैसे बहुमंजिला इमारत में लिफ्ट से भी चढ़ा जा सकता है और सीढी से भी।</p>
<p style="text-align: justify;">८. अनुमान शक्ति का विकास &#8211; विभिन्न स्थिति को देखकर कारण को जानना ही अनुमान शक्ति का विकास है जैसे रसोई से दुर्गन्ध आने पर अनुमान लगाना कि कुछ जल रहा है।</p>
<p style="text-align: justify;">९. विश्लेषण एवं संश्लेषण शक्ति का विकास &#8211; किसी पदार्थ या घटना को खण्ड खण्ड में जानना/समझना विश्लेषण कहलाता है जैसे समानता, भेद, तुलना आदि। इसी प्रकार खण्ड खण्ड को समग्रता में जानना संश्लेषण कहलाता है जैसे विविधता में एकता।</p>
<p style="text-align: justify;">उपरोक्त क्षमताओं के विकास के लिए शिशु को वातावरण के द्वारा अभ्यास के अवसर देने होंगे। रोचक गतिविधियों के द्वारा उसके मन को एकाग्र करना होगा। संस्कारित वातावरण से उसके मन को शान्त और व्यवहार को सदाचारी बनाना होगा। उसकी जिज्ञासा को जगाना होगा। यह सब अनौपचारिक/गतिविधि/क्रिया आधारित शिक्षा से ही सम्भव है।</p>
<p style="text-align: justify;">मनोविज्ञान के अनुसार शिशु अवस्था में बुद्धि विकसित नहीं होती यह बाल्यावस्था (6 वर्ष की आयु से&#8230;) में होती है। लेकिन यह अवस्था सीखने की नींव होती है अतः इसको बुद्धि विकास की प्रारम्भिक अवस्था कह सकते हैं। चित्त की सक्रियता के कारण इस अवस्था में सात्विक बुद्धि को विकसित किया जा सकता है। इसीलिए इस अवस्था का विशेष महत्व है। इसको औपचारिक शिक्षा के प्रयास में व्यर्थ न करके अनौपचारिक शिक्षा द्वारा समस्त क्षमताओं का विकास करना चाहिए।</p>
<p><img decoding="async" class="alignnone wp-image-6819" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/07/1476041_728547340572193_8339032606724190878_n-300x200.jpg" alt="" width="1727" height="1151" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/07/1476041_728547340572193_8339032606724190878_n-300x200.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/07/1476041_728547340572193_8339032606724190878_n-768x511.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/07/1476041_728547340572193_8339032606724190878_n.jpg 960w" sizes="(max-width: 1727px) 100vw, 1727px" /></p>
<ol style="text-align: justify;" start="5">
<li><strong> चैतसिक क्षमताएं अर्थात् आनन्दमयकोश</strong></li>
</ol>
<p style="text-align: justify;">शिशु अवस्था संस्कारक्षम होती है क्योंकि संस्कार चित्त पर होते हैं और इस अवस्था में चित्त अत्यधिक सक्रिय होता है। चित्त अर्थात् आत्मा। बालक को भगवान का स्वरूप माना जाता है क्योंकि उसकी आत्मा निर्मल होती है। उसकी यह निर्मलता आजीवन बनी रहे, यही शिक्षा का लक्ष्य है। अतः उसे ऐसा स्नेह और संस्कार से परिपूर्ण वातावरण देने की आवश्यकता है जिसमें विकार/दोष न हों। संस्कारक्षम वातावरण के कारण उसके पूर्व जन्म एवं अनुवांशिकता के संस्कारों की न्यूनता को भी दूर किया जा सकता है।</p>
<p style="text-align: justify;">चित्त की शुद्धता से ही आनन्द स्वरूप, ज्ञान स्वरूप, शान्ति स्वरूप, प्रेम स्वरूप, सुख स्वरूप, पवित्रता स्वरूप और शक्ति स्वरूप जैसे आत्मिक गुण विकसित होते हैं। इन्हीं गुणों के कारण सृजनशीलता विकसित होती है। यह सृजनशीलता पंचकोशों को पुष्ट करती है। अतः यदि अन्नमयकोश से लेकर विज्ञानमयकोश तक शिशु के विकास का ध्यान उचित देखभाल और वातावरण में किया जाए तो आनन्दमयकोश का विकास स्वतः सरलता से सम्भव है। यह परस्पर चक्रीय प्रक्रिया है। पांचकोशों का विकास ही वास्तव में क्षमताओं का विकास है।</p>
<p style="text-align: justify;">चैतसिक क्षमताओं का विकास ही सफल जन्म-मरण का आधार एवं लक्ष्य है। इसी क्षमता के विकास से शिक्षा, मोक्ष का माध्यम बनती है क्योंकि व्यष्टिगत विकास से परमेष्ठिगत विकास तक की यात्रा आत्मा ने ही करनी है। यह भारतीय जीवन दर्शन की अवधारणा है। कोई व्यक्ति शिक्षित हो या अशिक्षित उपरोक्त क्षमताओं का विकास ही उसके जीवन का समग्र विकास है। भविष्य में औपचारिक शिक्षा को ग्रहण करने में भी यह विकास सहयोगी होता है।</p>
<p style="text-align: justify;">गीत, संगीत, कहानी, नाटक, खेल, कला आदि की विभिन्न गतिविधियों के द्वारा शिशु अवस्था में इन क्षमताओं का विकास करना एक समृद्ध राष्ट्र एवं विश्व के लिए महत्वपूर्ण है।</p>
<p style="text-align: justify;">ध्यान रहे कि बच्चे व्यक्तिगत नहीं अपितु देश/विश्व की धरोहर हैं और आज के बच्चे ही कल के देश का उज्ज्वल भविष्य हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">(लेखिका शिशु शिक्षा विशेषज्ञ है और विद्या भारती शिशुवाटिका विभाग की अखिल भारतीय सह-संयोजिका है।)</p>
<p><strong>और पढ़ें : <span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/development-of-capabilities/" target="_blank" rel="noopener">शिशु शिक्षा 39 – क्षमताओं का विकास</a></span></strong></p>
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		<title>शिशु शिक्षा 39 – क्षमताओं का विकास</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 15 Jun 2023 05:31:15 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नम्रता दत्त]]></category>
		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[शिशु शिक्षा]]></category>
		<category><![CDATA[Children]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>✍ नम्रता दत्त &#160; शिशु के जीवन के प्रारम्भ्कि पांच वर्ष सीखने की नींव के वर्ष होते हैं। पांच वर्ष की यह सीख/शिक्षा सम्पूर्ण जीवन की नींव का कार्य करती&#8230; </p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"><img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/270d.png" alt="✍" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /> नम्रता दत्त</p>
<p>&nbsp;</p>
<p style="text-align: justify;">शिशु के जीवन के प्रारम्भ्कि पांच वर्ष सीखने की नींव के वर्ष होते हैं। पांच वर्ष की यह सीख/शिक्षा सम्पूर्ण जीवन की नींव का कार्य करती है। नींव मजबूत होगी तो भवन (जीवन) मजबूत होगा। अतः इस अवस्था में शिशु के विकास को समझकर ही उसे सही वातावरण दिया जा सकता है। सामान्यतः माता-पिता/परिवार के सदस्य शिशु को छोटा समझ कर उसे अपने ढंग से सिखाने का प्रयास करते हैं। परन्तु शिशु का महज शरीर ही छोटा है, उसकी अन्तःप्रेरणा बहुत बङी है। इसी के कारण वह एक साधक/योगी है। इस अन्तःप्रेरणा के कारण ही वह माँ की गोद से अपने पैरों पर चलना, स्वयं भोजन खाना, अपने भावों को हाव भाव के साथ व्यक्त करना (भाषा) आदि आदि &#8230;..सीखता है अर्थात् हाथ, पैर और वाणी की कर्मेन्द्रियों साधने का अखण्ड प्रयास करता है। शिशु की अन्तःप्रेरणा के बिना यह सब कार्य माता-पिता अनेकों प्रयास के बाद भी नहीं सीखा सकते। यह सब ही शिशु की कर्मेन्द्रियों के विकास की क्षमताएं हैं। कुछ क्षमताएं प्रत्यक्ष रूप से विकसित होती हैं जैसे शारीरिक एवं प्राणिक क्षमताएं (वृद्धि और विकास) और कुछ अप्रत्यक्ष रूप से विकसित होती हैं जैसे, मानसिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक (अन्तःकरण को प्रभावित करने वाली) क्षमताएँ। इस सोपान में 3 से 5 वर्ष तक के शिशु की क्षमताओं के विकास की ही संक्षिप्त बात करेंगे। ये क्षमताएं पांच प्रकार की होती हैं &#8211;</p>
<ol style="text-align: justify;">
<li>
<h5>शारीरिक क्षमताएं, 2. प्राणिक क्षमताएं, 3. मानसिक क्षमताएं, 4. बौद्धिक क्षमताएं और 5. आध्यात्मिक क्षमताएं। इन क्षमताओं का विकास ही व्यक्तित्व विकास का एक पक्ष है, दूसरा पक्ष व्यष्टि से परमेष्ठि है। इसे व्यक्तित्व का पंचकोशीय विकास भी कहते हैं। आइए इन्हें क्रमशः समझते हैं &#8211;</h5>
</li>
<li>
<h5><strong> शारीरिक क्षमताएं अर्थात् अन्नमयकोश</strong> &#8211; शारीरिक क्षमताओं को सहजता से देखा और मापा जा सकता है क्योंकि यह प्रत्यक्ष दिखाई देतीं हैं। इस विकास को देखने के लिए माता-पिता को निम्न पक्षों के प्रति सजग रहना चाहिए &#8211;</h5>
</li>
</ol>
<h5 style="text-align: justify;"><strong>1.1 वृद्धि</strong> &#8211; सामान्यतः शिशु की वृद्धि माता-पिता के वंशानुक्रम के अनुसार ही होती है। आयु के अनुसार उसकी ऊंचाई एवं वजन आदि को मापना चाहिए। &#8211;</h5>
<h5 style="text-align: justify;"><strong>1.2 बल</strong> &#8211; शिशु बहुत व्यस्त रहता है। स्व-विकास की अन्तःप्रेरणा के अनुसार वह कार्य ढूंढ ही लेता है। इन कार्यों को करने में उसे बल की आवश्यकता होती है। उसकी सक्रियता और निष्क्रियता ही इसका मापदण्ड है।</h5>
<h5 style="text-align: justify;"><strong>1.3 लोच</strong> &#8211; विभिन्न अंगों एवं जोङों को हिलाने डुलाने में सहजता का अनुभव करना ही लोच और स्वस्थता की निशानी है।</h5>
<h5 style="text-align: justify;"><strong>1.4 कुशलता</strong> &#8211; हाथ, पैर आदि से जुङे कार्यों को व्यवस्थित रूप से उचित गति से करना और अपने भावों को सही व्यक्त करना (भाषा) ही कुशलता का विकास है।</h5>
<h5 style="text-align: justify;"><strong>1.5 निरामयता</strong> &#8211; शरीर के आन्तरिक अंग (पाचन, रक्त संचार, श्वास-प्रश्वास आदि) ठीक से कार्य करते हों तो शिशु की शारीरिक क्षमताएं उचित दिशा में विकसित हो रही हैं।</h5>
<h5 style="text-align: justify;"><strong>1.6 तितिक्षा</strong> &#8211; सर्दी, गर्मी, भूख-प्यास और थकान आदि को सहन करने की शक्ति को ही तितिक्षा कहते हैं। बल एवं निरामयता के कारण ही तितिक्षा का विकास होता है।</h5>
<p style="text-align: justify;">घर में बना आयु के अनुरूप पौष्टिक भोजन, शान्त वातावरण में सुखद बिस्तर पर ली गई भरपूर नींद, घर में किए गए घरेलू कार्य एवं मैदान में किए गए खेल आदि के रूप में किये गये व्यायाम से शारीरिक क्षमताओं का विकास होता है।</p>
<p><img decoding="async" class="alignnone wp-image-6761" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/06/52685364-300x200.webp" alt="शिशु शिक्षा 39 – क्षमताओं का विकास" width="1523" height="1015" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/06/52685364-300x200.webp 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/06/52685364.webp 400w" sizes="(max-width: 1523px) 100vw, 1523px" /></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>अनौपचारिक शिक्षा</strong> &#8211; वैसे तो शारीरिक विकास के उपरोक्त मापदण्डों के अनुसार वृद्धि और विकास होना ही शारीरिक विकास है परन्तु इस अवस्था में ज्ञानेन्द्रियों को सही दिशा देना (अनुभव प्राप्ति हेतु) और प्राप्त अनुभव को अभिव्यक्त करने के लिए कर्मेन्द्रियों को सही वातावरण देना ही अनौपचारिक शिक्षा है। उदाहरण के लिए श्वेता अपने तीन वर्ष के बेटे और पांच वर्ष की बेटी को अपने साथ मन्दिर लेकर जाती है और जैसे पूजा अर्चना वह स्वयं करती है वैसे ही बच्चों को भी करने को कहती है। अतिथियों के आने पर वह स्वयं उन्हें सादर वंदन करती हैं और बच्चों को भी करने को कहती है। बच्चे जो भी आँख से देखते और कान से सुनकर अनुभव करते हैं वे उसकी अभिव्यक्ति अपनी कर्मेन्द्रियों (हाथ और वाणी) से करते हैं। अतः पहले करके दिखाना और फिर करने का मौका/वातावरण देना ही अनौपचारिक शिक्षा है। हाथ (पकङना, फेंकना, उछालना आदि), पैर (चलना, दौङना, कूदना आदि) वाणी (सुनकर, बोलकर और समझकर उचित जवाब देना) जैसी क्षमताओं को विकसित करने के लिए शिशुओं को सम्बन्धित गतिविधियां करने का अधिक से अधिक वातावरण देना चाहिए।</p>
<ol style="text-align: justify;" start="2">
<li><strong> प्राणिक (प्राणमयकोश) और 3. मानसिक क्षमताएं (मनोमयकोश)</strong> &#8211; तन और मन दोनों की स्वस्थता/विकास प्राणों पर ही निर्भर करता है। इसलिए प्राण केवल जीवित रहने का माध्यम ही नहीं है। प्राण बलवान नहीं तो बच्चा किसी को जोर से पुकार नहीं सकता। प्राण संतुलित न हों तो वह धीमे से कान में बात कह नहीं सकता। बीमार मनुष्य चिढचिढा हो जाता है अर्थात् उसका मन खराब रहता है ये हमने प्रत्यक्ष देखा है। साहसिक कार्य करने के लिए प्राण एकाग्र होना आवश्यक है। निर्भयता का गुण मन का होता है परन्तु निर्भयता प्राण बलवान होने से ही आती है। प्राण ही तन और मन को चलाने की ऊर्जा है। अतः प्राण बलवान, संतुलित और एकाग्र होंगे तो तन स्वस्थ और मन शान्त, एकाग्र और संवेदनशील/भावुक होगा। अतः बच्चे को अनावश्यक भय न दिखायें। इन सब क्षमताओं के विकास के लिए शिशु को कार्य करने का अवसर दें जैसे- रंग भरना, कोलाज बनाना, मिट्टी के खिलौने बनाना, ईंटों पर चलना, बाल्टी में गेंद फेंकना, अनुकूल ऊंचाई से कूदना, वजन उठाकर चलना, आदि। ऐसी गतिविधियों से शरीर, प्राण और मन तीनों की ही क्षमताएं विकसित होंगी।</li>
</ol>
<p style="text-align: justify;">अगले सोपान में बौद्धिक (विज्ञानमयकोश) और आध्यात्मिक (आनन्दमयकोश) क्षमताओं के विकास की चर्चा करेंगे।</p>
<p style="text-align: justify;">(लेखिका शिशु शिक्षा विशेषज्ञ है और विद्या भारती शिशुवाटिका विभाग की अखिल भारतीय सह-संयोजिका है।)</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>और पढ़ें : </strong><span style="color: #000080;"><strong><a style="color: #000080;" href="https://rashtriyashiksha.com/culture-and-character-building/" target="_blank" rel="noopener">शिशु शिक्षा 38 – संस्कार एवं चरित्र निर्माण</a></strong></span></p>
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		<title>शिशु शिक्षा 38 – संस्कार एवं चरित्र निर्माण</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 06 Jun 2023 09:39:39 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नम्रता दत्त]]></category>
		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[शिशु शिक्षा]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#x270d; नम्रता दत्त बाल मनोविज्ञान के अनुसार बालक का 85 प्रतिशत विकास छः वर्ष की अवस्था से भी पूर्व हो जाता है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के दस्तावेज में भी&#8230; </p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"><img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/270d.png" alt="✍" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /> नम्रता दत्त</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-6726" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/06/Tips-to-Teach-Your-Kid-About-Indian-696x464-1-300x200.jpg" alt="" width="1673" height="1115" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/06/Tips-to-Teach-Your-Kid-About-Indian-696x464-1-300x200.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/06/Tips-to-Teach-Your-Kid-About-Indian-696x464-1.jpg 696w" sizes="auto, (max-width: 1673px) 100vw, 1673px" /></p>
<p style="text-align: justify;">बाल मनोविज्ञान के अनुसार बालक का 85 प्रतिशत विकास छः वर्ष की अवस्था से भी पूर्व हो जाता है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के दस्तावेज में भी इसका उल्लेख किया गया है और बाल्यावस्था में इस विकास का माध्यम अनुभव आधारित, क्रिया आधारित, खोज आधारित अथवा खेल खेल में बताया है। यही अनौपचारिक शिक्षा है।</p>
<p style="text-align: justify;">वास्तव में तो सामान्यतः शिक्षा का अर्थ संस्कार के रूप में ही लिया जाता है। वे संस्कार जो सर्वे भवन्तुः सुखिनः और वसुधैव कुटुम्बकम् के भाव को जागृत करें। इतने भारी भरकम शब्दों का भाव क्या बालक 6 वर्ष की अवस्था में समझ पाता है यदि नहीं तो मनोवैज्ञानिक ऐसा क्यों कहते हैं और यदि हां तो यह कैसे सम्भव है?</p>
<p style="text-align: justify;">संस्कार कोई टॉफी नहीं, जो बालक को खिला दी जाए, वह कोई एनर्जी बुस्टर भी नहीं जो दूध में घोल कर पिला दिया जाए। फिर यह संस्कार 85 प्रतिशत तक बालक में कैसे विकसित होंगे। किन किन क्षेत्रों में उसे संस्कारित करें कि उसका व्यक्तित्व प्रतिभाशाली बने और वह सर्वे भवन्तुः सुखिनः की उक्ति को पूर्ण कर सके। आइए संक्षेप में विचार करते है।</p>
<p style="text-align: justify;">संस्कार एवं चरित्र निर्माण के लिए चार पक्षों पर विचार करना होगा &#8211;</p>
<ol style="text-align: justify;">
<li><strong> पूर्वजों का परिचय एवं उनसे प्रेरणा लेना</strong> &#8211; पूर्वज का अर्थ है जो हमसे पूर्व में रहे हैं, जिन्होंने राष्ट्र, समाज अथवा परिवार के लिए कुछ साकारात्मक परिवर्तन का कार्य किया है एवं अपनी परम्पराओं के संरक्षण के लिए त्याग, समर्पण तथा बलिदान किया है जैसे- भक्त प्रहलाद, लव-कुश, फतेह सिंह, जोरावर सिंह, महात्मा बुद्ध, महावीर स्वामी, गुरु नानक देव, राजा राम मोहन राय, रानी लक्ष्मीबाई, सावित्रीबाई फुले आदि आदि &#8230;&#8230;.। ऐसे महापुरुषों (पूर्वजों) के चित्र दिखाकर, इनके नाम बताकर, इनकी कहानियां एवं गीत सुनाकर खेल-खेल में उनके जीवन की घटनायें बताना ही अनौपचारिक रूप से संस्कार एवं चरित्र निर्माण की शिक्षा देना है। ज्ञानेन्द्रियों (आंख और कान) से लिया गया यह अनुभव बालकों के भावी जीवन को साहस, बुद्धिमता, त्याग, समर्पण एवं गौरवमयी जीवन जीने के संस्कार देता है।</li>
</ol>
<p style="text-align: justify;">मैं अपनी एक परिचिता से मिलने गई, परिवार उस समय घरेलू सामान (राशन) खरीद कर लाया था और उसको यथा स्थान रखने की व्यवस्था कर रहा था। राशन का कुछ सामान (आटा और दालें आदि) अलग से निकाल कर उन्होंने एक बैग में भर दिया। मित्र बोली कि कल जब मैं मन्दिर जाऊंगी तो ले जाऊंगी। उसने कहा कि हर छह मास में वह ऐसा करती हैं। पहले गांव में रहते थे खेती का अनाज आता था तो सबसे पहले मन्दिर में भेजते थे। अब खेत तो बंटाई पर दे रखे हैं वहां से फसल लाने में खर्च अधिक लगता है, इसलिए हर छह मास में हम यहीं से अनाज खरीद कर मन्दिर में दे देते हैं। कुल की परम्परा तो बनी रहती है। मेरी सास करती थी तो मैं करती हूँ, मुझे देखकर ये बच्चे भी सीख जायेंगे, उम्मीद है कि आगे यह भी ऐसा ही करेंगे।</p>
<ol style="text-align: justify;" start="2">
<li><strong> संस्कृति परिचय</strong> &#8211; प्रत्येक देश का अपना जीवन दर्शन (जीवन जीने के नीति नियम) होता है और इसी जीवन दर्शन को शिक्षा/संस्कारों से जीवित रखा जाता है। इन सतत् चलने वाले संस्कारों से ही संस्कृति बनती है। भारतीय संस्कृति सर्वश्रेष्ठ एवं प्राचीन है। भारत विश्व गुरु रहा है। छोटे बालक को यह सब संस्कार सीखाने के लिए वातावरण देना पङता है। वातावरण के वायुमंडल का प्रभाव उसको प्रभावित करता है। छोटी छोटी बातें बङा प्रभाव डालती हैं। छोटे छोटे श्लोक, सूत्रों और मंत्रों का उच्चारण उसे संस्कारित करता है। अतः ऐसे श्लोक, सूत्रों और मंत्रों का उच्चारण कराना चाहिए जैसे-</li>
</ol>
<ul style="text-align: justify;">
<li>
<h5>भारत मेरा देश है।</h5>
</li>
<li>
<h5>मेरा जीवन मेरे प्राण, भारत माता पर बलिदान।</h5>
</li>
<li>
<h5>भारत माता की जय।</h5>
</li>
<li>
<h5>धरती हमारी माता है, गाय हमारी माता है, गंगा हमारी माता है।</h5>
</li>
<li>
<h5>मातृ देवो भव्, पितृ देवो भव्, आचार्य देवो भव्।</h5>
</li>
<li>
<h5>वसुधैव कुटुम्कम्।</h5>
</li>
<li>
<h5>सर्वे भवन्तु सुखिनः।</h5>
</li>
<li>
<h5>अन्न ब्रह्म है। ईश्वर को भोग लगाकर ही भोजन खाएं, जितना खायें, उतना ही लें, झूठा न छोङे।</h5>
</li>
<li>
<h5>हम सबको ईश्वर ने बनाया है।</h5>
</li>
<li>
<h5>जल ही जीवन है, इसे बेकार न करें।</h5>
</li>
<li>
<h5>‘पुस्तक’ मां सरस्वती का स्वरूप है, उसे पैर न लगाएं।</h5>
</li>
<li>
<h5>ईश वन्दना, शांति पाठ, गायत्री मंत्र, भोजन मंत्र आदि।</h5>
</li>
</ul>
<p style="text-align: justify;">भारतीय जीवन दर्शन से जुङे ऐसे अनेक बिंदु हो सकते हैं। घर एवं विद्यालय में इनका वातावरण बनाना चाहिए। इन बिन्दुओं से जुङे गीत, कहानी, नाटक, कला, पपेट्स शो आदि भी किए जा सकते हैं। दीवारों की साज सज्जा भी इनके अनुरूप कर सकते हैं।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-6727" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/06/बच्चों-में-संस्कार-कैसे-डालें-अच्छे-संस्कार-की-10-बातें-818x490-1-300x180.png" alt="" width="1678" height="1007" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/06/बच्चों-में-संस्कार-कैसे-डालें-अच्छे-संस्कार-की-10-बातें-818x490-1-300x180.png 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/06/बच्चों-में-संस्कार-कैसे-डालें-अच्छे-संस्कार-की-10-बातें-818x490-1-768x460.png 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/06/बच्चों-में-संस्कार-कैसे-डालें-अच्छे-संस्कार-की-10-बातें-818x490-1.png 818w" sizes="auto, (max-width: 1678px) 100vw, 1678px" /></p>
<ol style="text-align: justify;" start="3">
<li><strong> सद्गुण एवं सदाचार</strong> &#8211; दूसरों के प्रति मन में अच्छे भावों को रखना सद्गुण तथा व्यवहार से दूसरों के प्रति अच्छे आचरण को सदाचार कहते हैं। यह सदगुण और सदाचार बालकों को उपदेश से सिखाना असम्भव है। ये केवल स्वयं के आचरण से ही प्रेम और आनन्द के वातावरण में ही सिखाए जा सकते हैं। ये सदगुण और सदाचार हैं जैसे-</li>
</ol>
<ul style="text-align: justify;">
<li>
<h5>अपनी एवं अपने आसपास की सफाई रखना। कूङा कूङेदान में फेंकना।</h5>
</li>
<li>
<h5>खाने की वस्तु को बांटकर खाना। खिलौने बांटकर खेलना।</h5>
</li>
<li>
<h5>अपनी बारी की इंतजार करना।</h5>
</li>
<li>
<h5>किसी दूसरे की वस्तु को न लेना। आवश्यकता पङने पर पूछ कर लेना, काम हो जाने पर धन्यवाद के साथ वापिस देना।</h5>
</li>
<li>
<h5>सामान को व्यवस्थित रखना।</h5>
</li>
<li>
<h5>दूसरों की सहायता करना।</h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align: justify;">प्रेम, दया, करुणा, परोपकार, स्नेह, सम्मान आदि गुणों की लम्बी सूची बन सकती है। बालक अनुकरण करके ही सीखता है, अतः उसे प्रेम और सौहार्द से सिखाएं।</h5>
<ol style="text-align: justify;" start="4">
<li><strong> देशभक्ति</strong> &#8211; वैसे तो उपरोक्त संस्कार भी देश भक्ति ही सिखाते हैं बशर्ते कि यह कृतिशील/व्यवहार में हो। फिर भी स्वदेशी वस्तुओं से प्रेम, प्रकृति/पर्यावरण का संरक्षण, राष्ट्रीय त्यौहारों एवं महापुरुषों की जयन्तियों पर देश की गौरवमयी बातों को गीत, कहानी, वार्तालाप, नाटक और वेश-भूषा (फैंसी शो) तथा महापुरुषों के छोटे छोटे नारे बोलकर देशभक्ति के भाव का जागरण करना चाहिए। देखकर, सुनकर, बोलकर बालक के चित्त पर चित्र बनता है और इसी चित्र से उसका चरित्र बनता है।</li>
</ol>
<p style="text-align: justify;">इस श्रृंखला के अगले सोपान में बालक की क्षमताओं के विकास के संदर्भ में चर्चा करेंगे।</p>
<p style="text-align: justify;">(लेखिका शिशु शिक्षा विशेषज्ञ है और विद्या भारती शिशुवाटिका विभाग की अखिल भारतीय सह-संयोजिका है।)</p>
<p><strong>और पढ़ें : <span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/knowledgeable-information-is-there-but-in-practice/" target="_blank" rel="noopener">ज्ञानात्मक जानकारी तो है पर व्यवहार में ???</a></span></strong></p>
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			</item>
		<item>
		<title>शिशु शिक्षा 37 – अनौपचारिक शिक्षा कैसे?</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 13 Apr 2023 11:25:26 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नम्रता दत्त]]></category>
		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[शिशु शिक्षा]]></category>
		<category><![CDATA[bhartiya shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[Children]]></category>
		<category><![CDATA[Kids]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[shishu shiksha]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#x270d; नम्रता दत्त सजीव सृष्टि का परिचय आज पार्थ की मम्मी को ऑफिस से घर लौटने में देर हो गई थी और तीन वर्ष के पार्थ ने रो रोकर घर&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"><img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/270d.png" alt="✍" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /> नम्रता दत्त</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone  wp-image-6541" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/04/wr-jordan-11-300x300.jpg" alt="" width="1467" height="1467" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/04/wr-jordan-11-300x300.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/04/wr-jordan-11-150x150.jpg 150w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/04/wr-jordan-11.jpg 523w" sizes="auto, (max-width: 1467px) 100vw, 1467px" /></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>सजीव सृष्टि का परिचय</strong></p>
<p style="text-align: justify;">आज पार्थ की मम्मी को ऑफिस से घर लौटने में देर हो गई थी और तीन वर्ष के पार्थ ने रो रोकर घर सिर पर उठा रखा था। परेशान होकर उसकी दादी मां उसे सोसायटी के पार्क में घुमाने ले गईं। शाम का समय था इसलिए पंछियों के झुंड आसमान में उङान भरते हुए अपने घोंसलों को लौट रहे थे। दादी ने जैसे ही उन पंछियों की तरफ पार्थ का ध्यान खिंचवाया तो उसकी रोने की आवाज धीरे-धीरे शान्त होने लगी। वह दादी की गोद से नीचे उतर गया और दादी को पंछी दिखाने लगा। फिर तो उसने बगीचे में उङती तितलियों का भी आनन्द लिया और पार्क में लगी हरी घास पर भी बैठकर खेलने लगा। उसकी मम्मी ने भी दादी को फोन करके बताया कि वह घर आ गई हैं। दादी ने पार्थ को घर चलने के लिए कहा परन्तु वह अब घर जाना नहीं चाहता था।</p>
<p style="text-align: justify;">यही है सजीव सृष्टि से आत्मीयता, जो शिशु को प्राकृतिक रूप से मिलती है। अबोध शिशु तो स्वाभाविक रूप से इस आत्मीयता में जीता है परन्तु अभिभावक उसे यह वातावरण देते ही नहीं। उनके पास समय का अभाव है या तो वह अपनी ही उलझनों में उलझे हैं। अतः वे बच्चे को पशु पक्षी भी मोबाइल पर ही दिखा देते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">कक्षा छट्ठी के बच्चे पिकनिक पर जाते हुए जब खेतों के पास से निकले तो खेत में फूलगोभी लगी हुई थी। वे देखकर बहुत खुश हुए और एक दूसरे को हैरानी से बताने लगे, देख, गोभी लगी हुई है। उनकी हैरानी के कारण का अनुमान तो आपने लगा ही लिया होगा और पुस्तक में पढकर भी 11 वर्ष का बच्चा कितना सीखता है इस बात का भी पता चल गया होगा। बस यही अन्तर है सजीव सृष्टि में और निर्जीव सृष्टि में। अतः जीवन में अनुभव हेतु सीखने का कार्य बाल्यावस्था में अनौपचारिक शिक्षा के माध्यम से ही संभव है।</p>
<p style="text-align: justify;">शिशु के प्राकृतिक स्वभाव का लाभ उठाते हुए अभिभावकों को उसे प्रकृति (वृक्ष, वनस्पति, कीट-पतंग, जीव-जन्तु, पशु-पक्षी) दर्शन करवाना ही चाहिए। इसमें रहकर वह न केवल प्रसन्नता/आनन्द का अनुभव करता है बल्कि उसे उनके रहने, खाने और उनकी आवाज आदि के विषय में जानकारी भी होती है। प्रकृति का यह सानिध्य उसे प्रकृति/सृष्टि से प्रेम करने का संस्कार सीखाता है। हम सबको एक ही भगवान ने बनाया है यह भाव/संस्कार जागृत करता है। प्रकृति/सृष्टि से प्रेम का यह संस्कार उसे भविष्य में प्रकृति/सृष्टि को हानि पहुंचाने से बचाता है। भावी जीवन में यही संस्कार उसे स्व/स्वार्थ अथवा परिवार (छोटा स्वरूप) से ऊपर उठकर सम्पूर्ण सृष्टि एक परिवार है (वसुधैव कुटुम्बकम्) के भाव से जोङता है। काम छोटा सा है परन्तु संस्कार निर्माण की दृष्टि से इसके परिणाम बङे हैं। अतः जब भी संभव हो उसे प्राकृति के बीच में ले जाएं और उसके दर्शन कराकर उसे प्रत्येक (वृक्ष, वनस्पति, कीट-पतंग, जीव-जन्तु, पशु-पक्षी) और नदी, पहाङ, झरने, सूर्य-चन्द्रमा आदि के विषय में बताएं।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone  wp-image-6542" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/04/JOPEG-JPEG-300x166.jpg" alt="" width="1724" height="954" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/04/JOPEG-JPEG-300x166.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/04/JOPEG-JPEG.jpg 500w" sizes="auto, (max-width: 1724px) 100vw, 1724px" /></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>मानव सृष्टि से परिचय</strong></p>
<p style="text-align: justify;">जन्म के पश्चात् धीरे-धीरे शिशु का परिचय मानव सृष्टि से बढ़ता जाता है। जन्म के पश्चात वह केवल माता को जानता है, पिता को जानता है और फिर धीरे-धीरे परिवार के अन्यों सदस्यों को भी जानने लगता है। तीन वर्ष में विद्यालय में प्रवेश लेता है तो समाज के छोटे स्वरूप से जुङ जाता है। रिश्तों को समझने लगता है। अपने और अजनबी को पहचानने लगता है। ऐसे में सभी रिश्तों और स्थानीय वातावरण की अपनी मर्यादाएं हैं, ऐसा उसे व्यवहार के द्वारा सीखाने की आवश्यकता होती है। अतः उसके सीखने और समझने के लिए उसे उचित वातावरण देकर उचित संस्कार देने की आवश्यकता है। वह तो सब काम करके सीखना चाहता है, परन्तु परिवार के सदस्य उसे हर कार्य करने से रोक देते हैं। उसकी कर्मेन्द्रियां विकासशील हैं, उन्हें काम चाहिए। वह घरवालों को जो भी काम करते हुए देखता है वह करना चाहता है जैसे &#8211; मां यदि कपङों की तह लगा रही है तो वो तह लगाना चाहता है। परन्तु मां उसके हाथ से कपङे छीन लेती हैं। परिवार के सदस्यों को ऐसा नहीं करना चाहिए। उसकी सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए उसे छोटे छोटे कार्यों में सहयोगी बनाना चाहिए जैसे &#8211; भोजन के समय बर्तन रखना। सब्जियों को छांटकर अलग-अलग करना आदि।</p>
<p style="text-align: justify;">छोटी छोटी संस्कारित कहानियों के माध्यम से उसे संस्कारित व्यवहार करना सीखाना चाहिए जैसे &#8211; अपने सामान का ध्यान रखना, उसे यथा स्थान रखना, बांटकर खाना, घर का बना भोजन खाना, अतिथियों का सत्कार करना आदि आदि। इन सबसे उसकी स्वयं तथा अन्यों (मानव सृष्टि ) के प्रति व्यवहारिक समझ विकसित होती है। इससे वह अनायास ही स्वावलम्बी, सहयोगी, स्वस्थ एवं संस्कारित होता जाएगा।</p>
<p style="text-align: justify;">इसके लिए परिवार के सदस्यों में भी अनुशासित दिनचर्या का पालन करने एवं घर को व्यवस्थित रखने के संस्कार होने आवश्यक हैं क्योंकि बच्चा अनुकरण से सीखता है। परिवार में यदि आतिथ्य सत्कार होता है और अतिथि को देव माना जाता है तो बच्चा भी यह संस्कार स्वतः ही धारण कर लेगा। इसी प्रकार धीरे-धीरे विद्यालय में कैसे रहना, मन्दिर में कैसे जाना, किसी रिश्तेदार के घर में कैसा व्यवहार करना, बगीचे में जाकर क्या क्या ध्यान रखना, दूसरों की वस्तु न लेना, सार्वजनिक सम्पति को नुकसान नहीं पहुंचाना, बङों का सम्मान करना जैसी बातें सीखाने की उचित अवस्था/आयु यही है। इसे ही राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने प्रारम्भिक बाल्यावस्था में ‘देखभाल’ कहा है। इस देखभाल में संस्कारित शिक्षा अन्तर्निहित है जो आगे चलकर शिक्षा का आधार बनेगी। इसीलिए यह अवस्था सीखने की नींव है।</p>
<p style="text-align: justify;">(लेखिका शिशु शिक्षा विशेषज्ञ है और विद्या भारती शिशुवाटिका विभाग की अखिल भारतीय सह-संयोजिका है।)</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>और पढ़ें : </strong><strong><span style="color: #000080;"><a style="color: #000080;" href="https://rashtriyashiksha.com/closest-experience-of-life-family-teacher-teaching/" target="_blank" rel="noopener">शिशु शिक्षा 36 – जीवन का घनिष्ठतम अनुभव (परिवार/आचार्य शिक्षण)</a></span></strong></p>
<p>The post <a href="https://rashtriyashiksha.com/how-about-informal-education/">शिशु शिक्षा 37 – अनौपचारिक शिक्षा कैसे?</a> appeared first on <a href="https://rashtriyashiksha.com">राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</a>.</p>
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		<title>शिशु शिक्षा 36 – जीवन का घनिष्ठतम अनुभव (परिवार/आचार्य शिक्षण)</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 14 Mar 2023 05:42:17 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नम्रता दत्त]]></category>
		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[शिशु शिक्षा]]></category>
		<category><![CDATA[Child Education]]></category>
		<category><![CDATA[Closest Experience of Life (Family/Teacher Teaching)]]></category>
		<category><![CDATA[indian education]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[shishu shiksha]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#x270d; नम्रता दत्त शिशु शिक्षा पर विशेष महत्व एवं चिन्तन का कारण है उसका समग्र विकास जो कि इस अवस्था में 85 प्रतिशत हो जाता है। इस समग्र विकास/व्यक्तित्व विकास&#8230; </p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"><img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/270d.png" alt="✍" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /> नम्रता दत्त</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-6424 " src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/03/maxresdefault-1-e1678772485308-300x171.jpg" alt="" width="1719" height="980" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/03/maxresdefault-1-e1678772485308-300x171.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/03/maxresdefault-1-e1678772485308-1024x584.jpg 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/03/maxresdefault-1-e1678772485308-768x438.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/03/maxresdefault-1-e1678772485308.jpg 1155w" sizes="auto, (max-width: 1719px) 100vw, 1719px" /></p>
<p>शिशु शिक्षा पर विशेष महत्व एवं चिन्तन का कारण है उसका समग्र विकास जो कि इस अवस्था में 85 प्रतिशत हो जाता है। इस समग्र विकास/व्यक्तित्व विकास को दो भागों में बांटकर समझा जा सकता है &#8211;</p>
<ol>
<li>व्यक्तित्व/ व्यष्टिगत/ पंचकोशात्मक विकास (अन्नमयकोश, प्राणमयकोश, मनोमयकोश, विज्ञानमयकोश और आनन्दमयकोश)।</li>
<li>समष्टिगत (परिवार, समाज, राष्ट्र, विश्व), सृष्टिगत (पर्यावरण) और परमेष्ठिगत (परमात्मा, इस सम्पूर्ण सत्ता को बनाने वाला)।</li>
</ol>
<p>गत सोपानों में अनौपचारिक शिक्षा क्या और क्यों पर विचार किया था। इस सोपान में अनौपचारिक शिक्षा ‘कैसे’ पर विस्तार से विचार करेंगे। उपरोक्त समग्र विकास हेतु बालक के मसितष्क का 85 प्रतिशत विकास पठन और लेखन/ भाषण के द्वारा सम्भव नहीं बल्कि इसका आधार अनौपचारिक शिक्षा द्वारा संस्कारों का निर्माण करना है। उल्लेखनीय है कि अनौपचारिक शिक्षा को हम शिशु की प्रारंभिक अवस्था में देखभाल मान सकते हैं जो कि बाल्यावस्था में जाकर औपचारिक शिक्षा का आधार बनेगी। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में भी इसको (ECCE) सीखने की नींव कहा गया है। तो आइए जीवन की नींव से ही प्रारम्भ करते हैं &#8211;</p>
<p><strong>जीवन का घनिष्ठतम अनुभव </strong></p>
<p>इस जीवन की प्रारम्भिक अवस्था क्या है, जिसका ज्ञान एवं ध्यान हमें सीखने/शिक्षा में सहयोगी हो सकता है। शिक्षा पेट भरने का साधन नहीं अपितु जीवन जीने की कला है। इसलिए कहा जाता है &#8211; सा विद्या या विमुक्तये।</p>
<ol>
<li>
<h4><strong> पंचमहाभूत तत्वों का परिचय</strong></h4>
</li>
</ol>
<p>यह तन जिसमें आत्मा निवास करती है, पंचमहाभूत तत्वों से बना है। जैसे मिट्टी से बना घङा मिट्टी में ही मिल जाता है, वैसे ही पांच तत्वों (पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश) से बना यह तन पांच तत्वों में ही मिल जाता है। परन्तु इस तन के माध्यम से किए गए कर्मों के संस्कार, इसमें स्थित आत्मा (जो कि अजर, अमर और अविनाशी है) अपने साथ ले जाती है। अगले जन्म में यही संस्कार उसके पूर्व जन्म के संस्कार कहलाते हैं। सृष्टि के पांचों तत्व हमारे तन/शरीर में विद्यमान होते हैं।</p>
<p>जैसे मिट्टी, रेत, कंकङ-पत्थर और धातु आदि पृथ्वी तत्व से बने हैं वैसे ही शरीर की मांसपेशियां, हड्डियां आदि भी पृथ्वी तत्व से बने हैं। शरीर में बहने वाला खून, पसीना और मल-मूत्र आदि जल का रूप हैं, आंखों के तेज और जठराग्नि में अग्नि तत्व होता है, श्वास-प्रश्वास, रक्त का प्रवाह, हृदय की धङकन, मल-मूत्र का त्याग सब वायु के ही कारण सम्भव है और शरीर में जो भी स्थान खाली है, वहां आकाश तत्व विद्यमान होता है जैसे &#8211; गला (वाणी तंत्र), श्वास नलिका और कान आदि।</p>
<p>इन पांच तत्वों से न केवल यह शरीर बनता है, इन पांच तत्वों से ही पांच ज्ञानेन्द्रिय भी बनती हैं और इन्हीं के माध्यम से हम ज्ञान प्राप्त करते हैं। इसलिए इन पंचमहाभूतों का परिचय एवं इनके गुणधर्मों के बारे में बताना ही जीवन का घनिष्ठतम अनुभव देना है।</p>
<p>अभिभावक और आचार्य को इसके महत्व की गहनता को समझना चाहिए क्योंकि शिक्षा/सीखने के लिए यह शरीर और ज्ञानेन्द्रियां ही मुख्य साधन (Main Tools) हैं और ये दोनों पंचमहाभूत से ही बने हैं। शिशु अवस्था में चित्त की सक्रियता के कारण इनके माध्यम से लिए गए अनुभव सीधे ही आत्मा के संस्कार बन जाते हैं। शिशु जैसा देखेगा (ज्ञानेन्द्रिय आंख द्वारा), जैसा सुनेगा (ज्ञानेन्द्रिय कान द्वारा) वैसा ही अनुकरण करेगा। ऐसा ही अन्य ज्ञानेन्द्रियों से प्राप्त अनुभवों के द्वारा ही संस्कार बनते हैं।</p>
<ol start="2">
<li>
<h4><strong> पदार्थो के गुणधर्म का परिचय</strong></h4>
</li>
</ol>
<p>माता के गर्भ में 9 मास तक रहने के कारण शिशु को माता से ही सर्वाधिक प्रेम, स्नेह और सुरक्षा का अनुभव होता है, उसी तरह इन पंचमहाभूतों से बना होने के कारण वह इनके बीच में रहने से ही आनन्द की अनुभूति करता है। मिट्टी-पानी में खेलना, खुली हवा में घूमना, आकाश में सूरज-चांद-तारों और उङते पक्षियों को देखना उसे भाता है। ये सब प्राकृतिक रूप से उसके स्वभाव में शामिल होता है और इन्हीं सबसे तो उपरोक्त समग्र विकास की पूर्ति होनी है। अज्ञानता वश हम इन सबके सान्निध्य से उसे रोकने का प्रयास करते हैं, जबकि हमें तो खेल खेल में उसके इस आनन्द से उसे उचित सीखने का वातावरण देना चाहिए।</p>
<p>उदाहरण के लिए पंचमहाभूतों के कुछ गुणधर्म &#8211;</p>
<ul>
<li>
<h5>सूखी मिट्टी कठोर होती है, पर गीली मिट्टी कोमल होती है।</h5>
</li>
<li>
<h4>मिट्टी पानी को सोख लेती है, पर पत्थर नहीं सोखता।</h4>
</li>
<li>
<h4>दो पत्थरों को रगङने से चिंगारी निकलती है।</h4>
</li>
<li>
<h4>पानी ऊपर से नीचे की ओर बहता है।</h4>
</li>
<li>
<h4>तेल डालने से आग जलती है, पर पानी डालने से आग बुझ जाती है।</h4>
</li>
<li>
<h4>गोल चीज लुङकती है, पर चपटी नहीं।</h4>
</li>
<li>
<h4>पानी को जिस बर्तन में डालो, वैसा ही रूप ले लेता है।</h4>
</li>
<li>
<h4>पानी में कुछ चीजें डूब जाती हैं और कुछ चीजें तैरती रहती हैं।</h4>
</li>
<li>
<h4>आग हवा के कारण ही जलती है और हवा के कारण ही बुझ भी जाती है, क्यों और कैसे ?</h4>
</li>
<li>
<h4>खुले और खाली बन्द कमरे मे आवाज गूंजती है।</h4>
</li>
</ul>
<p>यह सब भौतिक विज्ञान, इस भौतिक जगत से ही जुङा हुआ है। ऐसे ही अनेक गुणधर्मों का अनुभव केवल गतिविधियों के द्वारा अनौपचारिक रूप से इसी आयु में देना ही अनिवार्य है क्योंकि यही आयु सीखने की नींव कहलाती है। इस आयु में पढ़ना और लिखना तो उसको आता ही नहीं और मात्र भाषण से अनुभव लेना सम्भव नहीं। इसीलिए राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने भी क्रिया आधारित एवं खोज आधारित शिक्षा की शिक्षण विधियों (Padagogy) को सीखाने का माध्यम बताया है।</p>
<p>यह अनुभव केवल प्री-स्कूल/शिशुवाटिका में ही नहीं बल्कि घर में भी दिये जा सकते हैं। इसलिए अभिभावकों को भी इसका ज्ञान होना जरूरी है। शिशुवाटिका में भी इन अनुभवों को कराने के लिए सामग्री से सुसज्जित प्रयोगशाला की आवश्यकता होती है। शिशुवाटिका की आचार्य दीदी को भी समय समय पर अभिभावकों को गतिविधियों एवं उससे होने वाले विकास के बारे में बताना चाहिए।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-6425" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/03/Pre-Nursery-Schools-Near-Me-300x300.webp" alt="" width="1727" height="1727" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/03/Pre-Nursery-Schools-Near-Me-300x300.webp 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/03/Pre-Nursery-Schools-Near-Me-150x150.webp 150w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/03/Pre-Nursery-Schools-Near-Me-768x768.webp 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/03/Pre-Nursery-Schools-Near-Me.webp 924w" sizes="auto, (max-width: 1727px) 100vw, 1727px" /></p>
<ol start="3">
<li>
<h4><strong> ललित कलाओं का रसास्वादन</strong></h4>
</li>
</ol>
<p>कला के बिना मनुष्य पशु के समान माना जाता है। शिशु अवस्था में शिशुओं की चित्रकारी के शौक को कौन नहीं जानता। घर की दीवारें हों या भाई-बहन की पुस्तक-कापियां, शिशुओं की चित्रकारी से अछूती नहीं रहती।</p>
<p>किसी संस्कार पत्रिका के लेखन के लिए मेरा किन्हीं सज्जन के घर जाना हुआ। उनका लगभग 3 वर्ष का पोता मोहित उनके पास था क्योंकि उनकी बहू विद्यालय में पढ़ाने गई हुई थीं। मोहित को व्यस्त करने के लिए उन्होंने एक कागज और पेंसिल दे दी। मोहित ने कागज पर कुछ गोल गोल और आङी-तिरछी रेखायें बनाकर अपने माता-पिता, बङे भाई तथा दादा जी के चित्र बनाए। अब वह बोर होने लगा तो उन्होंने यूटयूब पर बच्चों की कविताएं चला दीं। मोहित मस्त होकर नाच-नाच कर कविता गाने लगा। हमारा कार्य भी लगभग खत्म हो गया, तो दादा जी ने उसे कहानी सुनाने के लिए कहा। मोहित ने पूरे हाव-भाव के साथ कहानी सुनाई। अभी मोहित की माँ भी विद्यालय से वापिस आ गई थीं। उन्होंने आते ही हमारे लिए भोजन पकाना शुरू किया। परन्तु मोहित अपनी माँ के साथ खेलना चाहता था। माँ ने उसे थोङा सा आटा दिया और कहा कि कल जैसे चिङिया बनानी सिखाई थी, वैसी बनाओ। मोहित तो प्रसन्न&#8230;। उसने आटे से चिङिया और सांप आदि बनाए।</p>
<p>मोहित की माँ शिशुवाटिका की आचार्य थीं। शिशु के मनोविज्ञान और उसके विकास को भली प्रकार जानती थीं। उन्होंने दादा जी को भी यह सब बता रखा था। यही सब तो ललित कलाएं हैं। चित्र बनाना, गीत गाना, कहानी सुनाना, बातें करना, नाटक करना, खिलौने बनाना आदि। खेल खेल में मोहित आनन्द से ये सभी कलायें सरलता और सहजता से सीख रहा था। मोहित की माँ जैसी जागरूकता प्रत्येक अभिभावक में होनी चाहिए।</p>
<p>ऐसी गतिविधियों से शिशु में सृजनशीलता का संस्कार आता है। ऐसा सृजनशील बालक कभी विसर्जन (तोङ-फोङ /हानि) नहीं कर सकता। यही तो है जीवन का घनिष्ठतम अनुभव।</p>
<p>समग्र विकास की इस कङी का शेष भाग अगले सोपान में &#8230;&#8230;.. ।</p>
<p>(लेखिका शिशु शिक्षा विशेषज्ञ है और विद्या भारती शिशुवाटिका विभाग की अखिल भारतीय सह-संयोजिका है।)</p>
<p><strong>और पढ़ें</strong> : <span style="color: #000080;"><strong><a style="color: #000080;" href="https://rashtriyashiksha.com/what-why-and-how-of-non-formal-education/">शिशु शिक्षा 35 – अनौपचारिक शिक्षा क्या, क्यों और कैसे?</a></strong></span></p>
<p>The post <a href="https://rashtriyashiksha.com/closest-experience-of-life-family-teacher-teaching/">शिशु शिक्षा 36 – जीवन का घनिष्ठतम अनुभव (परिवार/आचार्य शिक्षण)</a> appeared first on <a href="https://rashtriyashiksha.com">राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</a>.</p>
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			</item>
		<item>
		<title>शिशु शिक्षा 35 – अनौपचारिक शिक्षा क्या, क्यों और कैसे?</title>
		<link>https://rashtriyashiksha.com/what-why-and-how-of-non-formal-education/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 15 Feb 2023 11:43:07 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नम्रता दत्त]]></category>
		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[शिशु शिक्षा]]></category>
		<category><![CDATA[Children]]></category>
		<category><![CDATA[education]]></category>
		<category><![CDATA[formal education]]></category>
		<category><![CDATA[informal education]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#x270d; नम्रता दत्त गत सोपान में हमने जाना कि शिशु अवस्था (3 से 5 वर्ष) में शिक्षा का अर्थ पढ़ना-लिखना अर्थात् औपचारिक शिक्षा नहीं अपितु अनौपचारिक शिक्षा द्वारा सीखना होता&#8230; </p>
<p>The post <a href="https://rashtriyashiksha.com/what-why-and-how-of-non-formal-education/">शिशु शिक्षा 35 – अनौपचारिक शिक्षा क्या, क्यों और कैसे?</a> appeared first on <a href="https://rashtriyashiksha.com">राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"><img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/270d.png" alt="✍" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /> नम्रता दत्त</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-6333" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/02/youtube-696x392-1-300x169.jpg" alt="" width="1725" height="972" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/02/youtube-696x392-1-300x169.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/02/youtube-696x392-1.jpg 696w" sizes="auto, (max-width: 1725px) 100vw, 1725px" /></p>
<p><strong><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/early-childhood-education-informal-and-formal-education/" target="_blank" rel="noopener">गत सोपान</a></span></strong> में हमने जाना कि शिशु अवस्था (3 से 5 वर्ष) में शिक्षा का अर्थ पढ़ना-लिखना अर्थात् औपचारिक शिक्षा नहीं अपितु अनौपचारिक शिक्षा द्वारा सीखना होता है। अब प्रश्न यह उठता है कि यह अनौपचारिक शिक्षा है क्या, जिससे शिशु का 85 प्रतिशत विकास हो जाता है।</p>
<p>अनौपचारिक शिक्षा क्या और क्यों?</p>
<p>यह 85 प्रतिशत समग्र विकास भी वास्तव में है क्या, यह जानना भी भावी पीढी के निर्माताओं अर्थात माता-पिता और शिक्षकों को समझना अनिवार्य है। तब ही वे इस विकास को करने के लिए क्या करें, ऐसा समझने में सक्षम होंगे।</p>
<p>हम जानते हैं कि आत्मा अजर, अमर और अविनाशी होती है। इसीलिए आत्मा के संस्कार उसमें समाहित रहते हैं। एक आत्मा में पूर्व जन्म के संस्कार लगभग 70 प्रतिशत होते है, मात -पिता से प्राप्त संस्कार 20 प्रतिशत होते हैं और वातावरण से प्राप्त संस्कार 10 प्रतिशत होते हैं। जन्म के समय आत्मा को अपना पूर्व जन्म याद होता है, परन्तु कमेन्द्रियों के विकसित न होने के कारण उसके यह संस्कार उजागर नहीं हो पाते। लेकिन जैसे जैसे उसकी कर्मेन्द्रियां विकसित होने लगती हैं वे संस्कार उजागर होने लगते हैं। उन संस्कारों का उजागर होना भी अत्यन्त अनिवार्य हैं क्योकि ये संस्कार अच्छे और बुरे कैसे भी हो सकते हैं।</p>
<p>गर्भ में माता-पिता के संस्कार उसके पूर्व जन्मों के संस्कार को प्रभावित करते हैं, परन्तु संस्कारों को सही दिशा देने के लिए वातावरण द्वारा संस्कार देना सबसे श्रेष्ठकर है। इस आयु में वातावरण के 10 प्रतिशत संस्कारों के द्वारा भी उसके पूर्व जन्म के 70 प्रतिशत कुसंस्कारों को भी बदला जा सकता है क्योंकि इस आयु में चित्त की सक्रियता के कारण बच्चा नए संस्कारों को तत्काल और स्थायी रूप से ग्रहण कर लेता है।</p>
<p>यदि इन संस्कारों को उजागर होने का अवसर ही नहीं मिला तो वातावरण द्वारा इन्हें सुधारने का अवसर ही नहीं मिलेगा। वातावरण द्वारा श्रेष्ठ संस्कारों का निर्माण करना ही अनौपचारिक शिक्षा/सीखाना है। इसीलिए इस अवस्था में बच्चे को प्रेम, स्नेह और स्वतंत्रता में पालना चाहिए, ताकि उसके पूर्व जन्म के संस्कार सहजता से बाहर आ सकें।</p>
<p>इस समय में जब औपचारिक शिक्षा (पठन-लेखन) के बंधन में हम उसको बांध देते हैं तो ये संस्कार उजागर नहीं हो पाते और इनको उचित दिशा देने का अवसर ही नहीं मिल पाता। संस्कारों को मिली यही दिशा ही उसके चरित्र का निर्धारण करती है और जीवन जीने के दृष्टि देती है।</p>
<p>राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में भी प्रारम्भ्कि बाल्यावस्था देखभाल और शिक्षा (ECCE) को सीखने की नींव कहा क्योंकि मनोविज्ञान के अनुसार बच्चे के मस्तिष्क का 85 प्रतिशत विकास 6 वर्ष से पूर्व ही हो जाता है। प्रारम्भिक बाल्यावस्था (3 से 8) में इसको दो खण्डों में बांटा गया है &#8211; देखभाल (3 से 6 वर्ष) और शिक्षा (6 से 8 वर्ष, पूर्व प्राथमिक शिक्षा)। अतः स्पष्ट है कि 3 से 6 वर्ष में जो देखभाल करनी है वही अनौपचारिक शिक्षा कहलाती है और इसी से बच्चे में औपचारिक शिक्षा को ग्रहण करने की पात्रता विकसित होती है। इसमें स्वस्थ शरीर की देखभाल के साथ स्वस्थ संस्कार के प्रति भी देखभाल करना आवश्यक है क्योंकि जन्म से ही प्राप्त ज्ञानेन्द्रियों के साथ-साथ अब उसकी कर्मेन्द्रियों भी विकसित हो रही हैं जिसके कारण वह ज्ञानेन्द्रियों से जैसा भी अनुभव प्राप्त करता है, कर्मेन्द्रियों से तुरन्त उसकी अभिव्यक्ति कर देता है और यही अभिव्यक्ति उसका संस्कार बन जाती है।</p>
<p>जैसे दूध पीने की अवस्था में बच्चे को अन्न नहीं खिलाया जा सकता, वैसे ही 6 वर्ष से पूर्व उसको औपचारिक शिक्षा (पठन-लेखन) नहीं दी जा सकती। अज्ञानता वश ऐसा करने से उसके परिणाम विपरीत ही होंगे (गत सोपान में इसकी चर्चा की गई है)।</p>
<p>वास्तव में यह अवस्था संस्कार ग्रहण करने के लिए उपयोगी होती है क्योंकि इस समय सूक्ष्म बुद्धि की निष्क्रियता (यह 6 वर्ष की आयु में सक्रिय होती है) के कारण चित्त की सक्रियता रहती है और संस्कार चित्त पर ही होते हैं। सुसंस्कारों से सुसज्जित आत्मा ही आलौकित होती है। यह आलोक ही आत्मविश्वास का वाहक बनता है। इन संस्कारों के आधार पर ही चरित्र निर्माण होता है और चरित्र से ही भावी पीढ़ी श्रेष्ठ बनती है। इसीलिए कहा जाता है कि राष्ट्र का धन बैंकों में नहीं, विद्यालयों में होता है। संस्कार के अभाव में शिक्षा निरर्थक सिद्ध होती है। इसके अभाव में ही शिक्षित व्यक्ति भी भ्रष्टाचारी, व्याभिचारी, निर्दयी और स्वार्थी जैसे कुसंस्कारों से ग्रस्त हो जाता है। वह स्वार्थवश समाज एवं देश को छलता है। अतः संस्कारों के निर्माण की इस अवस्था पर सर्वप्रथम सचेत रहने की आवश्यकता है। इनके प्रति सचेत रहने वाले माता-पिता और शिक्षक ही राष्ट्र निर्माता कहलाते हैं।</p>
<p>इसी शिशु/बाल मनोविज्ञान के कारण राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने इसे सीखने की नींव कहा है।</p>
<p>जैसे श्रेष्ठ भवन बनाने के लिए मजबूत नींव की आवश्यकता होती है वैसे ही जीवन जीने की कला सीखने के लिए संस्कारों की आवश्यकता होती है। औपचारिक शिक्षा (भाषा एवं  गणित) विषय विशेष का ज्ञान तो भावी स्वाध्याय कर ज्ञान और अर्जित अनुभव को आत्मसात करने के लिए है। परन्तु भावी जीवन जीने की कला का आधार अथवा नींव इसी शिशु अवस्था की देखभाल (राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में वर्णित) अर्थात् संस्कार निर्माण से ही होगी। जैसे कच्ची मिट्टी के बर्तन को भट्टी में पकाने के बाद सुधार नहीं किया जा सकता ऐसे ही इस अवस्था में चूक जाने के बाद सुधार की संभावना बिल्कुल ऐसे ही है जैसे खेती सूखने के बाद वर्षा का होना। इस प्रारम्भिक अवस्था में देखभाल करना एक अत्यन्त महत्वपूर्ण विषय है और शिक्षा के इसके बाद का (ECCE)।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-6335" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/02/5-Daily-Habits-Every-Student-must-have-Before-and-After-School-300x200.jpg" alt="" width="1722" height="1148" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/02/5-Daily-Habits-Every-Student-must-have-Before-and-After-School-300x200.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/02/5-Daily-Habits-Every-Student-must-have-Before-and-After-School-768x512.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/02/5-Daily-Habits-Every-Student-must-have-Before-and-After-School.jpg 1024w" sizes="auto, (max-width: 1722px) 100vw, 1722px" /></p>
<p><strong>अनौपचारिक शिक्षा कैसे</strong><strong>?</strong></p>
<p>निम्नलिखित तीन विषयों एवं उपविषयों में अनौपचारिक गतिविधियों के माध्यम से देखभाल करके हम बच्चे का न केवल समग्र विकास कर सकते हैं बल्कि औपचारिक शिक्षा के लिए पूर्व तैयारी भी कर सकते हैं &#8211;</p>
<ol>
<li>
<h5><strong> जीवन का घनिष्ठत्तम अनुभव</strong></h5>
</li>
</ol>
<ul>
<li style="list-style-type: none;">
<ul>
<li>
<h5>पंचमहाभूत तत्वों का परिचय</h5>
</li>
<li>
<h5>पदार्थों के गुणधर्म का परिचय</h5>
</li>
<li>
<h5>ललित कलाओं का रसास्वादन</h5>
</li>
<li>
<h5>सजीव सृष्टि का परिचय</h5>
</li>
<li>
<h5>मानव सृष्टि का परिचय एवं आत्मीय सम्बन्ध</h5>
</li>
</ul>
</li>
</ul>
<ol start="2">
<li>
<h5><strong> संस्कार एवं चरित्र निर्माण</strong></h5>
</li>
</ol>
<ul>
<li style="list-style-type: none;">
<ul>
<li>
<h5>पूर्वजों का परिचय एवं उनसे प्रेरणा</h5>
</li>
<li>
<h5>संस्कृति का परिचय एवं उनसे प्रेरणा</h5>
</li>
<li>
<h5>सद्गुण एवं सदाचार</h5>
</li>
<li>
<h5>देशभक्ति</h5>
</li>
</ul>
</li>
</ul>
<ol start="3">
<li>
<h5><strong> क्षमताओं का विकास </strong></h5>
</li>
</ol>
<ul>
<li style="list-style-type: none;">
<ul>
<li>
<h5>शारीरिक विकास</h5>
</li>
<li>
<h5>प्राणिक विकास</h5>
</li>
<li>
<h5>मानसिक विकास</h5>
</li>
<li>
<h5>बौद्धिक विकास</h5>
</li>
<li>
<h5>चैतसिक विकास</h5>
</li>
</ul>
</li>
</ul>
<p>अगले सोपान से हम उपरोक्त विषयों पर क्रमशः चर्चा करेंगे।</p>
<p>(लेखिका शिशु शिक्षा विशेषज्ञ है और विद्या भारती शिशुवाटिका विभाग की अखिल भारतीय सह-संयोजिका है।)</p>
<p><strong>और पढ़ें : <span style="color: #000080;"><a style="color: #000080;" href="https://rashtriyashiksha.com/early-childhood-education-informal-and-formal-education/" target="_blank" rel="noopener">शिशु शिक्षा 34 – अनौपचारिक व औपचारिक शिक्षा</a></span></strong></p>
<p>The post <a href="https://rashtriyashiksha.com/what-why-and-how-of-non-formal-education/">शिशु शिक्षा 35 – अनौपचारिक शिक्षा क्या, क्यों और कैसे?</a> appeared first on <a href="https://rashtriyashiksha.com">राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</a>.</p>
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			</item>
		<item>
		<title>शिशु शिक्षा 34 – अनौपचारिक व औपचारिक शिक्षा</title>
		<link>https://rashtriyashiksha.com/early-childhood-education-informal-and-formal-education/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 16 Jan 2023 07:41:49 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नम्रता दत्त]]></category>
		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[शिशु शिक्षा]]></category>
		<category><![CDATA[Child]]></category>
		<category><![CDATA[dhilren]]></category>
		<category><![CDATA[indian education]]></category>
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		<category><![CDATA[shishu shiksha]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#x270d; नम्रता दत्त &#160; हमने शिशु शिक्षा की यह श्रृंखला 0 (शून्य) से  प्रारम्भ की थी और अब इस सोपान से हम 3 वर्ष के शिशु की शिक्षा पर पहुंच&#8230; </p>
<p>The post <a href="https://rashtriyashiksha.com/early-childhood-education-informal-and-formal-education/">शिशु शिक्षा 34 – अनौपचारिक व औपचारिक शिक्षा</a> appeared first on <a href="https://rashtriyashiksha.com">राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"><img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/270d.png" alt="✍" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /> नम्रता दत्त</p>
<p>&nbsp;</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-6201" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/01/Children-Day-Celebrations1-300x199.jpg" alt="" width="1461" height="969" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/01/Children-Day-Celebrations1-300x199.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/01/Children-Day-Celebrations1.jpg 715w" sizes="auto, (max-width: 1461px) 100vw, 1461px" /></p>
<p>हमने शिशु शिक्षा की यह श्रृंखला 0 (शून्य) से  प्रारम्भ की थी और अब इस सोपान से हम 3 वर्ष के शिशु की शिक्षा पर पहुंच गए हैं। भारतीय मनौवैज्ञानिकों ने शिशु अवस्था को 5 वर्ष तक माना है इसीलिए कहा भी गया – ‘लालयेत् पंचवर्षाणि’। स्मरण रहे कि इस अवस्था में शिशु का 85 प्रतिशत विकास हो जाता है।</p>
<p>इससे पूर्व हमने शिशु की क्षीरादावस्था (मात्र दूध पर निर्भर) और क्षीरादान्नादावस्था (दूध और अन्न पर निर्भर) पर विचार किया था। अब अन्नादावस्था (अन्न पर निर्भर) की बात करेंगे। इस आयु में उसके मुंह में दांत हैं, वह अन्न खा सकता है और आत्मनिर्भरता की ओर बढ रहा है, अतः हर काम स्वयं करना चाहता है। उसकी मौखिक भाषा भी विकसित हो रही है, अतः बात के अर्थ और भाव को समझ सकता है और अपनी बात को भाव से कह भी सकता है। इस विकास के आधार पर संस्कारों के प्रति सजग रहने के लिए हमें कुछ विषयों पर पुनः चिन्तन करना होगा क्योंकि शैशवास्था का यह अन्तिम चरण है। इसके बाद वह बाल्यावस्था में प्रवेश करता है।</p>
<p>वास्तव में शिशु के संदर्भ में शिक्षा का अर्थ &#8211; ‘सीखना’ ही होता है। सीखने का यह क्रम प्राकृतिक एवं अनौपचारिक रूप से चलता है। इसको किसी निश्चित क्रम एवं समयावधि में बांधा नहीं जा सकता। माता-पिता एवं परिवार की जिम्मेवारी भी उसकी प्राकृतिक रूप से विकसित होने की आवश्यकताओं के अनुरूप ही अनौपचारिक वातावरण एवं सुविधाएं देने की है और वे इसे पूरा भी करते हैं। बस आवश्यकता उचित दिशा की होती है।</p>
<p>वर्तमान समय में शिशु शिक्षा की विचारधारा विपरीत दिशा में ही जा रही है। औद्योगिकरण के युग में परिवार नगरों की ओर बढने लगे हैं। आर्थिक संघर्ष के चलते माता-पिता दोनों ही नौकरी/व्यवसाय करने लगे हैं। या यूं भी कह सकते हैं कि बच्चे के भविष्य को एक ओर रख अपना कैरियर बनाना माता की प्राथमिकता हो गई है। बच्चा जो उनके एवं राष्ट्र के भविष्य हेतु एक राष्ट्रीय धरोहर के रूप में उनके पास है, उसकी संभाल की दूरदृष्टि अभी उनके पास नहीं है। वह केवल स्थूल (भौतिक) दृष्टि से ही उसका पालन पोषण करते हैं। भोजन तो पशु-पक्षी भी अपने बच्चों को खिला देते हैं।</p>
<p>प्रारम्भ में तो परिवार में कोई बच्चे की देखभाल करने वाला न होने के कारण उसे स्कूल/क्रैच में भेजना माता-पिता की मजबूरी बन गई थी परन्तु अब यह परम्परा बन गयी है। परन्तु माता-पिता यह भूल गए कि परिस्थितियां बदली हैं, बच्चे के सीखने की प्रकृति/शिशु मनोविज्ञान/स्वभाव नहीं बदला।</p>
<p>इस बात को एक उदाहरण से स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है &#8211;</p>
<p>मेरे परिचित परिवार ने एक दिन के नवजात शिशु को गोद लिया। शिशु को माता का दूध मिलना सम्भव नहीं था, अतः उसे गाय का दूध बोतल से छह महीने तक पिलाया गया। क्योंकि वे जानते थे कि नन्हें शिशु को प्राकृतिक रूप से दूध की ही आवश्यकता है, वह अभी अन्न नहीं खा सकता। यदि अन्न उसको दिया गया तो वह उसके जीवन के लिए हानिकारक होगा। परिस्थितियां विपरीत हो सकती हैं, परन्तु शिशु की प्रकृति तो नहीं बदलेगी ना। उसका पाचन तंत्र तो दूध ही पचा सकता है, अन्न नहीं पचा सकता। इसी प्रकार अन्न देने की आयु में यदि दूध पिलाते रहेंगे तो भी शिशु का विकास प्रभावित होगा। यही शिशु मनोविज्ञान है। बस इसी तरह से शिशु के सीखने (शिक्षा) के लिए दिशा/ज्ञान होने की आवश्यकता है।</p>
<p>समाज की विपरीत परिस्थितियों के चलते तीन वर्ष (सम्भवतः इससे भी पहले) की आयु होते ही माता-पिता को शिशु की शिक्षा की चिन्ता होने लगती है। वे औपचारिक शिक्षा के लिए उसे विद्यालय भेजने लगते हैं। औपचारिक शिक्षा अर्थात् क्रमबद्ध शिक्षा; क ख ग घ&#8230;&#8230;. शब्द ज्ञान, वाक्य ज्ञान (भाषा ज्ञान), संख्या 1 2 3 4 5&#8230;&#8230;. जोङ, घटा, गुणा, भाग आदि। कक्षा कार्य, गृह कार्य, परीक्षा आदि। इस सब क्रमबद्धता को समझने के लिए मन की एकाग्रता एवं सूक्ष्म बुद्धि की आवश्यकता होती है जबकि तीन वर्ष के बालक का मन चंचल होता है और सूक्ष्म बुद्धि का विकास तो 6 वर्ष की आयु में होता है। अतः इस आयु में दोनों ही उसके पास नहीं हैं, इसलिए यह मनोवैज्ञानिक नहीं है। क्षमताओं के विपरीत किए गए इस कार्य से शिशु में तनाव (एग्रेशन) बढ जाता है जो उसके शारीरिक और मानसिक विकास को प्रभावित करता है, ठीक उसी तरह जैसे छह माह से पहले बच्चे को अन्न देना उसके पाचन तंत्र को नुकसान पहुंचाता है और उसके शारीरिक विकास को प्रभावित करता है।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-6198" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/01/006-300x225.jpg" alt="" width="1724" height="1293" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/01/006-300x225.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/01/006.jpg 600w" sizes="auto, (max-width: 1724px) 100vw, 1724px" /></p>
<p>वह अभी नन्हीं पौध है, उसे प्रेम, सुरक्षा और आनन्द के माहौल में मुखरित होना है क्योंकि पांच वर्ष तक लालन पालन से सीखना ही उसका मनोविज्ञान है। यह लालन पालन परिवार में ही मिल सकता है। यदि परिवार की परिस्थितियां बदल गई हैं तब भी बच्चे को वातावरण तो परिवार जैसा ही चाहिए होगा ना। इसलिए उसे स्कूल में भी घर-परिवार जैसे वातावरण एवं पालना की आवश्यकता हैं। औपचारिक शिक्षा का यह वातावरण &#8211; पढ़ना, लिखना, कक्षा कार्य, गृह कार्य, परीक्षा, अच्छे अंक लाने का माता-पिता का दबाव, अंग्रेजी भाषा में बोलना निश्चित रूप से उसको प्रेम, सुरक्षा और आनन्द तो नहीं देगा। इस अवस्था में पङे हुए इन विपरीत परिस्थितियों का दुष्प्रभाव उसमें प्रत्यक्ष देखने को मिलता है &#8211; वह जिद्दी बन जाता है, बङों का कहना नहीं मानता है, उसे भूख नहीं लगती है, किसी से बांटने का संस्कार नहीं है आदि आदि&#8230;&#8230;। कारण वह अनुकरण से सीखता है। जैसा परिवार उसे देगा, वैसा ही वह लौटाएगा। उसे विद्यालय में अवश्य भेंजें, परन्तु ऐसे विद्यालय में जहां उसे खेल खेल में सीखाया जाता हो। जहां उसे प्रेम, सुरक्षा और आनन्द मिले। यह आयु अनौपाचारिक रूप से संस्कार ग्रहण करने के लिए है, न कि औपचारिक शिक्षा में बांधने की।</p>
<p>आज तक यह सब बातें हमें व्यर्थ की लगती होंगी। लेकिन राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने भी इस शिशु मनोविज्ञान को स्वीकार किया है। प्रशासनिक दृष्टि से विद्यालय जाने की आयु पहले भी 6 वर्ष की ही थी। लेकिन सामाजिक परिस्थितियों को देखते हुए शिक्षा नीति 2020 ने भी 3 वर्ष की आयु की शिक्षा को सीखने की नींव माना है और उसे प्रारम्भिक बाल्यावस्था देखभाल एवं शिक्षा (ECCE) का नाम दिया है। 6 वर्ष में आधारभूत शिक्षा प्रारम्भ की जाती है (जबकि यह आधारभूत शिक्षा स्कूलों में नर्सरी कक्षा अर्थात् 3 वर्ष में ही देना प्रारम्भ कर देते है)। शिशु मनोविज्ञान के अनुसार आधारभूत शिक्षा के लिए वास्तविक आयु 6 वर्ष की ही है न कि 3 वर्ष। इसे शिक्षा नीति 2020 ने FLN (Foundational Literacy and Numeracy) का नाम दिया है। 3 वर्ष की आयु में खेल खेल में दी गई अनौपचारिक शिक्षा (मौखिक मात्र) देना ही शिशु के विकास के लिए उपयुक्त है क्योंकि मौखिक ज्ञान प्राप्त करने के बाद पढ़ना-लिखना सरल हो जाता है।</p>
<p>विस्तार से जानने के लिए माता पिता को शिशु मनोविज्ञान का अध्ययन अवश्य करना चाहिए तब ही वे अपने दायित्व को सही ढंग से निभा पाएंगे।</p>
<p>शिशु एक पुष्प है, उसे मुखरित होने का पूर्ण अवसर दें।</p>
<p>अगले सोपान में शिशु का विकास/ सीखना/शिक्षा में पांच महाभूत तत्वों के सहयोग के विषय में बात करेंगे।</p>
<p>(लेखिका शिशु शिक्षा विशेषज्ञ है और विद्या भारती शिशुवाटिका विभाग की अखिल भारतीय सह-संयोजिका है।)</p>
<p><strong>और पढ़ें</strong> : <span style="color: #000080;"><strong><a style="color: #000080;" href="https://rashtriyashiksha.com/arly-childhood-education-the-role-of-the-family-environment-in-the-upbringing-of-the-child/" target="_blank" rel="noopener">शिशु शिक्षा 33 – शिशु के संस्कार में पारिवारिक वातावरण की भूमिका</a></strong></span></p>
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		<title>शिशु शिक्षा 33 &#8211; शिशु के संस्कार में पारिवारिक वातावरण की भूमिका</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 28 Dec 2022 10:18:01 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नम्रता दत्त]]></category>
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		<category><![CDATA[शिशु शिक्षा]]></category>
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		<category><![CDATA[indian education]]></category>
		<category><![CDATA[Kids]]></category>
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					<description><![CDATA[<p> &#8211; नम्रता दत्त शिशु अवस्था (0 से 5 वर्ष तक) संस्कार ग्रहण करने की सर्वश्रेष्ठ अवस्था मानी जाती है, क्योंकि इस अवस्था में शिशु का अन्तःकरण (मन, बुद्धि, अहंकार और&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"> &#8211; नम्रता दत्त</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-6129" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/12/child-play-gettyimages1200-300x167.jpg" alt="" width="1247" height="694" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/12/child-play-gettyimages1200-300x167.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/12/child-play-gettyimages1200-1024x569.jpg 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/12/child-play-gettyimages1200-768x427.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/12/child-play-gettyimages1200.jpg 1200w" sizes="auto, (max-width: 1247px) 100vw, 1247px" /></p>
<p>शिशु अवस्था (0 से 5 वर्ष तक) संस्कार ग्रहण करने की सर्वश्रेष्ठ अवस्था मानी जाती है, क्योंकि इस अवस्था में शिशु का अन्तःकरण (मन, बुद्धि, अहंकार और चित्त) निर्मल होता है इसीलिए उसे भगवान का स्वरूप भी कहते हैं। अपने स्वाभाविक गुणों (अनुकरण, जिज्ञासा, पुनरावृत्ति, निरुद्देश्य और निष्काम कार्य करने की वृत्ति आदि) के कारण वह अपने आसपास के वातावरण से सीखता जाता है। यह आयु घर में ही पालन पोषण की है, अतः सीखने की दृष्टि से पहला विद्यालय घर ही होता है। जन्म देने के कारण माता को ही उसका पहला गुरु कहा जाता है, परन्तु जन्म के पश्चात् माता के साथ साथ परिवार के सदस्य एवं पारिवारिक वातावरण भी उसके गुरु होते हैं। अतः परिवार के सभी सदस्यों की जिम्मेदारी है कि वे घर के वातावरण को संस्कारित बनाए रखें ताकि शिशु सुसंस्कारित बने। इस अवस्था के संस्कार जीवन भर साथ रहते हैं और चरित्र का निर्माण करते हैं।</p>
<p>अपने बचपन में जब मैं महापुरुषों के बारे में पुस्तकों में पढ़ती थी तो उन महापुरुषों के माता पिता के नाम के साथ-साथ उनका चरित्र कैसा था, ऐसा भी लिखा होता था (जैसे &#8211; उनकी माता बङी धार्मिक और पिता समाज के प्रतिष्ठित व्यक्ति थे) और उसे भी याद करना पङता था। उस समय इसका महत्व समझ नहीं आता था। लेकिन आज समझ आता है कि इसी पारिवारिक वातावरण के कारण ही वे महापुरुष बन पाए।</p>
<p>गत सप्ताह एक सत्संग में जाना हुआ। मंच पर आसीन गुरु मां से आशीर्वाद लेने दो बच्चे यश (आयु लगभग 4 वर्ष) और देव (आयु लगभग 3 वर्ष) आए। बच्चों के हाथ में कुछ पैसे भी थे जो परिवार ने उन्हें दान देने के लिए दिए थे। गुरु मां उनकी भूरि भूरि प्रशंसा कर रही थीं। सत्संग के पश्चात् उन्होंने अपने छोटे छोटे हाथों से सब को प्रसाद दिया। अंत में अपना प्रसाद लेकर आराम से बैठकर खाया। मैं बच्चों की आयु और उनके व्यवहार को देखकर प्रभावित हुई और उनके व उनके परिवार के विषय में जानने के लिए गुरु मां से बात की तो पता चला कि वे संयुक्त परिवार में रहते हैं। उनके पिता का स्वर्गवास (कोरोना काल में) हो गया है। उनके ताऊ जी ही उनका पालन पोषण करते हैं। ताऊ जी के भी अपने तीन बच्चे हैं। पांचों बच्चे बङे प्यार से रहते हैं। घर में जो भी सामान बच्चों के लिए आता है, उसको वे सब बांटकर लेते हैं। परिवार में ताई और चाची (यश और देव की माता) दोनों को देखकर यह जानना कठिन है कि कौन सी माता किन बच्चों की माता है। दोनों बच्चे ताऊ जी को ही पापा कहते हैं और पांचों बच्चे दोनों (ताई और चाची) को ही बङी मम्मी और छोटी मम्मी कहते हैं। परिवार तन मन और धन से सत्संग की सेवा में समर्पित है।</p>
<p>परिवार के वातावरण का प्रभाव बच्चों पर स्पष्ट दिखाई दे रहा था। परिवार साक्षात् अपने व्यवहार से बच्चों को शिक्षा दे रहा है। बड़ों का सम्मान करना, दान देना, बांटकर खाना, प्रेम से रहना, प्रेम से बात करना, सत्संग में जाना जैसे संस्कार बच्चे पारिवारिक वातावरण के कारण सहज ही धारण कर रहे हैं। इन संस्कारों के साथ परोपकार, देने की भावना, सहयोग की भावना, मृदु भाषिता, ईश वन्दना, सहनशीलता, समर्पण, धैर्य आदि जैसे संस्कार अपने आप ही आ जाते हैं। यह संस्कार उसके भावी जीवन के लिए नींव का कार्य करते हैं। इनका लाभ न केवल उसके जीवन को मिलता है बल्कि परिवार, समाज, देश और विश्व को भी मिलता है। समाज सेवा, देशभक्ति और वसुधैव कुटुम्बकम् का भाव (समष्टिगत विकास), पर्यावरण संरक्षण (सृष्टिगत विकास) के साथ साथ मोक्ष प्राप्ति (परमेष्ठिगत विकास) तक का माध्यम भी यही शिशु अवस्था के संस्कार बनते हैं।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-6131" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/12/maxresdefault-1-300x169.jpg" alt="" width="1291" height="727" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/12/maxresdefault-1-300x169.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/12/maxresdefault-1-1024x576.jpg 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/12/maxresdefault-1-768x432.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/12/maxresdefault-1.jpg 1280w" sizes="auto, (max-width: 1291px) 100vw, 1291px" /></p>
<p>बहुत से संस्कार तो मैट्रो सिटिज के कारण समाप्त ही होते जा रहे हैं जैसे मल्टी स्टोरिज में रहने वाले गाय को रोटी नहीं देते, चीटियों को आटा नहीं देते। परन्तु जो परिवार ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के महत्व समझते हैं वे बच्चों को साथ लेकर गौशाला खोजकर भी गायों को चारा डालने जाते हैं। वे अपनी सोसायटी के पार्क में भी चीटिंयों को आटा डालते हैं। ऐसे कुछ परिवार मैं अपनी सोसायटी में भी देखती हूँ। सुनने में ये बात बहुत बङी नहीं लग रही होगी। लेकिन सबको देने का भाव ही तो मनुष्य को देवता बनाता है। तब ही तो हम कहते हैं कि <strong>‘सेवा का परिणाम है &#8211; नर से नारायण बनना’, ‘लेने की भावना स्वार्थ है और देने की परमार्थ’।</strong></p>
<p>यदि कोई भी साधन उपलब्ध न हो तो गीत और कहानी तो ऐसी शिक्षा के माध्यम बन ही सकते हैं और जब सम्भव हो तो ऐसा प्रत्यक्ष रूप से करना चाहिए। इतिहास इस बात का साक्षी है कि माता जीजाबाई ने दूध पीते बालक शिवा को शिशु अवस्था में ही लोरी और कहानियों के माध्यम से ही छत्रपति शिवाजी बना दिया था। ऐसे अनेकों उदाहरण न केवल प्राचीन संदर्भ में बल्कि आज के संदर्भ में भी दिखाई देते ही हैं।</p>
<p>परिवार के प्रेम, स्नेह, सुरक्षा के आनन्दपूर्ण भावावरण (वातावरण) में यह संस्कार अनायास ही उसके भावी जीवन की शैली बन जाते हैं। इसीलिए कहा जाता है – <strong>‘लालयेत् पंचवर्षाणि’</strong> अर्थात् पांच वर्ष तक शिशु का लालन पालन लाड प्यार से करें क्योंकि भय के वातावरण में सुसंस्कारों का बीजारोपण असम्भव है। अतः किसी भी प्रकार की तेज ध्वनि जैसे &#8211; बोलचाल की भाषा, लङाई-झगङे, तेज संगीत, कङकती बिजली, गरजते बादल आदि की ध्वनि से शिशु को दूर ही रखना चाहिए।</p>
<p>पारम्परिक एवं सांस्कृतिक अवसरों पर उसे छोटा बच्चा समझ कर उपेक्षा न करें बल्कि यही समय उसके सीखने के लिए उपयुक्त है , इस महत्व को समझते हुए उसे हर गतिविधि में शामिल करें।</p>
<p><strong>स्वामी विवेकानन्द जी के अनुसार ‘शिक्षा का अर्थ व्यक्ति आत्मविश्वासी</strong><strong>, </strong><strong>आत्मनिर्भर और सशक्त बनाना है’।</strong> इसके लिए आत्मा को सतोगुणी (शक्तियां, पवित्रता, सुख, प्रेम, शान्ति, ज्ञान और आनन्द) बनाना आवश्यक है और आत्मा की यह शिक्षा गर्भ से ही प्रारम्भ हो जाती है। आत्मा में उसके गुण विद्यमान हैं लेकिन वातावरण के द्वारा ही उन्हें बाहर निकाला जा सकता है। इसके लिए विद्यालय जाने की प्रतिक्षा न करें क्योंकि यह कार्य तो माता/घर- परिवार से ही प्रारम्भ होने वाला है। बच्चे के लिए विद्यालय का चयन भी सोच समझ कर करें, ताकि बच्चे को उचित वातावरण मिल सके क्योंकि पांच वर्ष तक की आयु में सम्पूर्ण जीवन के 85% संस्कारों का निर्माण हो जाता है और <strong>मनुष्यता शिशु के नन्हें पग से ही आगे बढती है।</strong></p>
<p>(लेखिका शिशु शिक्षा विशेषज्ञ है और विद्या भारती शिशुवाटिका विभाग की अखिल भारतीय सह-संयोजिका है।)</p>
<p><strong>और पढ़ें</strong> : <span style="color: #000080;"><strong><a style="color: #000080;" href="https://rashtriyashiksha.com/early-childhood-education-mother-tongue-environment-in-the-family/" target="_blank" rel="noopener">शिशु शिक्षा 32 – परिवार में मातृभाषा का वातावरण</a></strong></span></p>
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		<title>शिशु शिक्षा 32 &#8211; परिवार में मातृभाषा का वातावरण</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 28 Sep 2022 09:44:13 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नम्रता दत्त]]></category>
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					<description><![CDATA[<p> &#8211; नम्रता दत्त शिशु अवस्था संस्कार ग्रहण करने की सर्वश्रेष्ठ अवस्था है क्यों और कैसे? &#8211; इसका बहुत कुछ चिन्तन गत सोपानों में किया गया। इसी श्रृंखला में &#8211; शिशु&#8230; </p>
<p>The post <a href="https://rashtriyashiksha.com/early-childhood-education-mother-tongue-environment-in-the-family/">शिशु शिक्षा 32 &#8211; परिवार में मातृभाषा का वातावरण</a> appeared first on <a href="https://rashtriyashiksha.com">राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"> &#8211; नम्रता दत्त</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-5826" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/09/do-babies-have-memory-300x150.jpg" alt="" width="1724" height="862" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/09/do-babies-have-memory-300x150.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/09/do-babies-have-memory-768x384.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/09/do-babies-have-memory.jpg 940w" sizes="auto, (max-width: 1724px) 100vw, 1724px" /></p>
<p>शिशु अवस्था संस्कार ग्रहण करने की सर्वश्रेष्ठ अवस्था है क्यों और कैसे? &#8211; इसका बहुत कुछ चिन्तन गत सोपानों में किया गया। इसी श्रृंखला में &#8211; शिशु की अनौपचारिक/औपचारिक शिक्षा में एक मुख्य भूमिका मातृभाषा की भी है। क्योंकि शिशु का समग्र विकास उसी भाषा में सम्भव है जिसको वह गर्भावस्था से सुनता है क्योंकि वह जैसा सुनता है वैसा ही बोलता है। गर्भ के चौथे मास में ही शिशु की श्रवणेन्द्रिय (कान) विकसित हो जाती है। माता के कानों द्वारा वह भाषा सुनता है। वह जो भाषा सुनता है वह उसके चित्त में संग्रहित हो जाती है और बोलने की क्षमता विकसित होने पर वही रिकार्डिंग की हुई भाषा को वह धीरे धीरे एक से तीन वर्ष की आयु में पहले एक-एक शब्द बोलकर अपनी वाणी की यात्रा प्रारम्भ करता है, बाद में छोटे-छोटे वाक्य बोलने लगता है। गर्भ में सुने गए उन्हीं शब्दों/भाषा को जब वह पुनः परिवार के सदस्यों के द्वारा सुनता है तो उसे बोलने में सरलता होती है।</p>
<p>भाषा केवल अपने भावों को अभिव्यक्त करने का माध्यम ही नहीं अपितु यह एक भावयुक्त संस्कार है। गर्भ में शिशु मात्र शब्दों को ही नहीं सुनता बल्कि उसके भावों को ग्रहण करता है। इसलिए प्राचीन काल में जब वह गर्भ में होता था, तब भी माता उससे बात करती थी। जन्म के पश्चात् लोरी (सुलाने के लिए गीत गाना), प्रभाती (जगाने के लिए गीत गाना) सुनाने की परम्परा थी। ये लोरियां और प्रभाती भी भावपूर्ण तथा संस्कृति पर आधारित होती थीं। संस्कार सीखाने की इस कला के महत्व को न समझने के कारण माता पिता शिशु को आधी अधूरी शिक्षा (सीखना) और संस्कृति को समझाने का कारक बनते हैं।</p>
<p>लोरी गाना तो माता को आता ही नहीं। आजकल तो अलेक्सा  लोरी सुनाती है और माता कहती है कि अलेक्सा  बेबी को बेस पसन्द है &#8211; (टी.वी. पर विज्ञापन सुना होगा)। क्योंकि आज दुर्भाग्य की बात यह है कि अपने को so called highly educated कहलाने वाले न केवल अपनी मातृभूमि को छोङकर metro cities में आकर बस गए हैं, वे अपनी मातृभाषा को भी त्याग आए हैं। तभी तो भगवान की आरती अथवा दुर्गा स्तोत्र आदि करने के लिए वे यू-ट्युब का सहारा लेते हैं। यह उन्नति का नहीं अपितु विचारणीय विषय है। ऐसे माता पिता अपनी संस्कृति की विरासत अपनी संतान को दे नहीं पाते। उदाहरण के लिए यदि हम बच्चे को बताना चाहते हैं कि &#8211;</p>
<p style="text-align: center;"><strong>“रघुकुल रीति सदा चली आई</strong><strong>, </strong><strong>प्राण जाएं पर वचन न जाई।</strong><strong>”</strong></p>
<p>और हम बताएं कि Raghukul ritual has always gone, Life gone but promise does not go. तो भावपूर्ण होगा?</p>
<p style="text-align: center;"><strong>“शिक्षा का संस्कृति से नाता</strong><strong>, </strong><strong>जय जननी</strong><strong>, </strong><strong>जय भारत माता।</strong><strong>”</strong></p>
<p>अपनी संस्कृति को जानना, समझना और उस पर गौरव का अनुभव कर उसे अपनाना ही तो संस्कार है और यही आयु संस्कार धारण करने की नींव है। और भाषा ही इसका मुख्य माध्यम है। किसी भी राष्ट्र की आत्मा/प्राण उसकी संस्कृति ही तो है और उसे अपनी मातृभाषा में ही जाना जा सकता है। जननी से तात्पर्य यहां माता एवं मातृभाषा से ही है।</p>
<p>महात्मा गांधी जी के अनुसार &#8211; मनुष्य के मानसिक विकास के लिए मातृभाषा उतनी ही आवश्यक है जितना कि बच्चे के विकास के लिए माता का दूध। माता के गर्भ और दूध से ही मातृभाषा मिलती है। मानसिक विकास के आधार पर ही बौद्धिक विकास निर्धारित होता है और शैशवास्था में चित्त प्रधान होता है। बुद्धि का विकास 6 वर्ष की अवस्था में होता है। अतः मातृभाषा की जय से ही, भारत माता अथवा किसी भी राष्ट्र की जय होगी।</p>
<p>विशेष ध्यान देने योग्य बात है कि है सीखना अर्थात् शिक्षा मनुष्य की जन्मजात शक्तियों के विकास का ही दूसरा नाम है। इन शक्तियों के विकास के द्वारा ही मनुष्य का सर्वांगींण विकास (All round development) होता है। शिक्षा जब तक जीवन के मूल्य, आदर्शों एवं मान्यताओं का परिचय नहीं देती है तब तक वह शिक्षा नहीं कही जा सकती और यह केवल और केवल मातृभाषा से ही सम्भव है।</p>
<p>सृष्टि के अन्य प्राणियों की भांति ही मनुष्य भी एक प्राणी ही कहलाता है। शेर, कौआ, चिङिया आदि प्राणियों को भाषा सीखानी नहीं पङती। वे स्वयं ही बोलने लगते हैं क्योंकि यह वाणीतंत्र उन्हें DNA में मिलता है जो स्वतः और सहजता (automatic and easily) से कार्य करता है। ऐसे ही शिशु को भी यह आनुवांशिक ही प्राप्त होता है। तभी तो बच्चे की आवाज में माता पिता की आवाज जैसा स्वर सुनाई देता है। इसीलिए मातृभाषा को सीखना सहज होता है और इसे सीखाने के लिए परिवार में इसका वातावरण बनाना परिवार का दायित्व है। मातृभाषा सीखने के बाद बच्चे को कोई भी भाषा का ज्ञान (समझ कर बोलना) सरलता से हो पाता है। शिशु मनोविज्ञान के अनुसार तीन वर्ष के शिशु के पास कम से कम दो हजार शब्द संख्या का कोष अपनी मातृभाषा का होना चाहिए। इसके लिए वातावरण के अनुसार अधिक से अधिक शब्दों का उच्चारण मूर्त्त वस्तुओं को दिखाते हुए (Showing pictures or things) शिशु के सामने करना चाहिए। इससे वह मात्र सुनकर ही उन्हें अर्थ सहित समझने में सक्षम होगा। उसे जबरदस्ती रटाने की आवश्यकता नहीं होगी।</p>
<p>भाषा के शुद्ध उच्चारण के लिए छोटे छोटे गीत, कहानी, लोरी, प्रभाती और श्लोक आदि को सुनने की व्यवस्था घर में होनी चाहिए। जैसे शिशु सहजता से मातृभाषा सीख लेता है वैसे ही मातृभाषा का स्वामी होने के बाद वह अन्य भाषा को भी सहजता से समझ कर सीख सकता है।</p>
<p>मातृभाषा को भी शुद्ध उच्चारण के साथ सीखाना चाहिए। आजकल भाषा को विकृत रूप से बोलने का चलन सा हो गया है, जैसे &#8211; चाचा को चाचू, मामा को मामू, दीदी को दी आदि। ऐसा करना भाषा का अपमान करना है। ऐसा प्रचलन सभी भाषाओं में चल रहा है।</p>
<p>पार्क में घूमते हुए ध्यान में आता है कि बूढी अनपढ दादी भी पोते से कहती हैं &#8211; कम हेयर (come here) नहीं तो डॉगी (dogy) काट लेगा। सिस्टर को सिस कहना और मैडम को मैम कहना तो आम सी बात हो गई है। यह भाषा कौन सी भावनाओं को व्यक्त करने का माध्यम बन रही है &#8211; इस पर भी विचार करना होगा, वरना भाषा की परिभाषा ही बदल जाएगी।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone  wp-image-5830" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/09/80294341_wide-300x162.jpg" alt="" width="1485" height="802" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/09/80294341_wide-300x162.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/09/80294341_wide-1024x554.jpg 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/09/80294341_wide-768x415.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/09/80294341_wide.jpg 1026w" sizes="auto, (max-width: 1485px) 100vw, 1485px" /></p>
<p><strong>श्री लज्जाराम तोमरजी के अनुसार – </strong><strong>“मातृभाषा संस्कार का माध्यम होती है। इसके अध्ययन एवं प्रयोग से शिष्टाचार</strong><strong>, </strong><strong>वाणी का संस्कार</strong><strong>, </strong><strong>चरित्र निर्माण</strong><strong>, </strong><strong>भावना का परिष्कार</strong><strong>, </strong><strong>नैतिक बल एवं भारतीय संस्कृति का ज्ञान होता है।</strong><strong>”</strong></p>
<p>भाषा ही किसी व्यक्तित्व का दर्पण है और इस व्यक्तित्व रुपी दर्पण को गढने का यही उपयुक्त समय है। नहीं तो “का वर्षा, जब कृषि सुखाने”। आयु बीतने के बाद प्रयास व्यर्थ हो जाते हैं अथवा अधिक मेहनत करनी पड़ती है। ऐसे बच्चे बङे होकर किसी भी भाषा विशेष के स्वामी (master of language) नहीं बनते या यूं कहें कि उनका व्यक्तित्व प्रभावी नहीं होता।</p>
<p>इस प्रयास का प्रारम्भिक केन्द्र घर ही है। अतः माता पिता को अपनी जिम्मेवारी को शिशु एवं देश हित में सोच समझकर कुशलता से निभाना चाहिए क्योंकि आज का बालक ही कल का नागरिक अर्थात् देश की धरोहर एवं उसका भविष्य है।</p>
<p>(लेखिका शिशु शिक्षा विशेषज्ञ है और विद्या भारती शिशुवाटिका विभाग की अखिल भारतीय सह-संयोजिका है।)</p>
<p><strong>और पढ़ें</strong> : <span style="color: #000080;"><strong><a style="color: #000080;" href="https://rashtriyashiksha.com/early-childhood-education-soulful-introduction-to-the-living-world/">शिशु शिक्षा 30 – शिशु की अवांछनीय आदतें एवं निराकरण</a></strong></span></p>
<p>The post <a href="https://rashtriyashiksha.com/early-childhood-education-mother-tongue-environment-in-the-family/">शिशु शिक्षा 32 &#8211; परिवार में मातृभाषा का वातावरण</a> appeared first on <a href="https://rashtriyashiksha.com">राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</a>.</p>
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		<title>शिशु शिक्षा 31 &#8211; सजीव सृष्टि से आत्मीय परिचय</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 07 Sep 2022 11:49:13 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नम्रता दत्त]]></category>
		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[शिशु शिक्षा]]></category>
		<category><![CDATA[bhartiya shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[Early Childhood Education]]></category>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"> &#8211; नम्रता दत्त</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-5760" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/09/Bath-older-bby-2_wide-300x162.jpg" alt="" width="1531" height="827" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/09/Bath-older-bby-2_wide-300x162.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/09/Bath-older-bby-2_wide-1024x554.jpg 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/09/Bath-older-bby-2_wide-768x415.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/09/Bath-older-bby-2_wide.jpg 1026w" sizes="auto, (max-width: 1531px) 100vw, 1531px" /></p>
<p>‘शिक्षा’ मात्र पुस्तकीय ज्ञान लेना नहीं अपितु जीवन जीने की कला को जानना है। शिक्षा वही है जो जीवन के व्यवहार में उतरती है। जीवन जीने के यह संस्कार शिशु अवस्था से ही सीखाने चाहिए क्योंकि संस्कार ग्रहण करने की यही सर्वश्रेष्ठ आयु है। परमात्मा ने इस सृष्टि की रचना की है और इस सृष्टि की सर्वश्रेष्ठ रचना मनुष्य को माना जाता है। बहुत से गुण परमात्मा ने केवल मनुष्य को ही दिए हैं जैसे- प्रेम, दया, करुणा, वाणी आदि। अपने इन गुणों का सदुपयोग करते हुए इस सृष्टि की सभी रचनाओं से आत्मीय भाव रखना उसका कर्त्तव्य है।</p>
<p>इन कर्त्तव्यों के प्रति सजग रहना, उसे इसी अवस्था में सीखाना होगा। परमात्मा स्वरूप बालक तो सम्पूर्ण सृष्टि से प्रेम करता ही है। तब ही तो वह प्रकृति/सृष्टि में जाकर प्रसन्नता का अनुभव करता है। पेङ-पौधे, कीट-पतंगे, पक्षी-जानवर, बादल-वर्षा, सूर्य-चंद्रमा, नदी-झरना आदि उसको तो सब बहुत भाते हैं। परन्तु माता-पिता अथवा परिवार के सदस्य ही उसे अपने व्यवहार से इन सब से दूर कर देते हैं।</p>
<p>अनुभव के आधार पर हम देखते हैं कि यदि रोते हुए बच्चे को चिङिया या कौआ दिखाया जाए अथवा बाहर घूमाने ले जाया जाए तो वह चुप हो जाता है क्योंकि सृष्टि में रहना उसको अच्छा लगता है। पेङ-पौधों के पत्तों को हिलते हुए देखना, उन पर चढना, पत्तों को छूना, घास पर चलना/खेलना उनके मन को भाता है। इन सबसे उसका आत्मीय भाव बना रहे इसके लिए माता-पिता को कुछ अच्छे संस्कार देने चाहिए जैसे- पौधों में भी जीवन है और उनके कारण ही हम जीवित हैं क्योंकि उनसे ही हमें प्राणवायु मिलती है। वे हमें फल और छाया देते हैं। अतः उन्हें नमस्कार करना चाहिए, उनकी परिक्रमा करनी चाहिए। पौधों को भी प्यास लगती है उन्हें पानी देना, अकारण ही उनके पत्ते नहीं तोङना आदि आदि। नीम, पीपल और बरगद जैसे पेङ हमारे दादा हैं ऐसा बता कर उनसे सम्बन्ध जोङना चाहिए।</p>
<p>गाय हमारी माता है, बन्दर मामा है, बिल्ली मौसी है, हाथी दादा है, चिङिया बहना है ऐसी बातें सीखाकर माता-पिता पशु-पक्षियों से उसका सजीव सम्बन्ध जोङ सकते हैं।</p>
<p>एक टीचर ने चतुर्थ कक्षा के बच्चों को विज्ञान विषय पढाते हुए पूछा कि बताओ पृथ्वी और चन्द्रमा में क्या सम्बन्ध है तो बच्चों ने कहा कि उनमें बहन भाई का सम्बन्ध है। टीचर ने हैरान होकर पूछा &#8211; वो कैसे? बच्चों ने कहा कि धरती हमारी माता है और चन्द्रमा को हम मामा कहते हैं तो हो गया न बहन-भाई का सम्बन्ध। ऐसा बच्चों ने शिशु अवस्था में ही सुना था। इससे सिद्ध होता है कि शिशु अवस्था के संस्कार जीवन भर साथ रहते हैं।</p>
<p>शिशुओं को बताना चाहिए कि यह सारी सृष्टि, हमें बस देती ही देती है, हमसे कुछ लेती नहीं। पेङ हमें जीने के लिए फल और हवा देते हैं तो नदियां पीने के लिए पानी देती हैं। यह धरती हमारी माता है, इसकी गोद में ही हम जीवन भर पलते हैं। यह आकाश हमारा पिता है जिसके नीचे सबको रहने का स्थान मिलता है, चाहे वह अमीर हो या गरीब। चन्द्रमा हमारा मामा है तो सूरज दादा है, उसकी किरणों से ही सृष्टि पर रहने वाले सभी जीव जन्तुओं और प्राणियों को जीवन मिलता है।</p>
<p>इस सृष्टि को परमात्मा ने बनाया है और इस पर रहने वाले सभी पेङ-पौधों, कीट-पतंगों, पक्षी-जानवरों, बादल-वर्षा, सूर्य-चन्द्रमा, नदी-झरनों आदि को भी उसने बनाया है। जैसे सब, हमारे लिए हैं ऐसे ही हम, सबके लिए हैं। इन सब की रक्षा की जिम्मेदारी हमारी सबकी ही है। अतः किसी को भी नुकसान नहीं पहुंचाना चाहिए।</p>
<p>समय समय पर बच्चे को सृष्टि के सानिध्य में लेकर जाना चाहिए। चिङिया, कबूतर, मुर्गी, कौआ जैसे पक्षियों को उसके हाथ से दाना दिलवाना चाहिए। गाय, कुत्ता आदि को रोटी खिलाने का संस्कार डालना चाहिए। खाना खाने से पूर्व गो ग्रास निकालने की आदत भी इसी आयु में डालनी चाहिए। बच्चा अनुकरण से सीखता है। अतः स्वयं भी ऐसा करें और बच्चों से भी करवायें। इसी प्रकार मछलियों आदि को भी आटे की गोलियां/मुरमुरे आदि डालने का मौका देना चाहिए। इससे उसका संज्ञानात्मक विकास (cognative development) तो होता ही है और सद्गुण एवं सदाचार भी आता है।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-5762" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/09/Hindu-300x180.jpg" alt="" width="1723" height="1034" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/09/Hindu-300x180.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/09/Hindu-1024x614.jpg 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/09/Hindu-768x461.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/09/Hindu-1536x922.jpg 1536w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/09/Hindu-2048x1229.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 1723px) 100vw, 1723px" /></p>
<p>गीत एवं कहानी आदि के माध्यम से भी बच्चों को ऐसे संस्कार सरलता से दिए जा सकते हैं। रामायण की कहानियां, हनुमान जी एवं श्री कृष्ण जी की बाल लीलाओं को भी सुनाया जा सकता है। यह सृष्टि भी हमारी छोटी छोटी भावनाओं को समझती है। हवन करने से वर्षा होती है अर्थात् हमारे भाव कैसे यह सृष्टि समझती है ऐसी बातें बच्चों के बीच करनी चाहिए और उन्हें करने का अवसर भी देना चाहिए।</p>
<p>जब हम बच्चे के समग्र विकास (holistic development) का विचार करते हैं तो उसमें मैं, परिवार, समाज, राष्ट्र, विश्व, सृष्टि और परमेष्टि अर्थात् परमात्मा को जानने का विचार करते हैं। इन सभी के संस्कार की नींव यही अवस्था (शिशु अवस्था) है क्योंकि यही सीखने की अवस्था है। जैसे छोट से बीज में जङ, तना और पत्ते आदि सब समाया होता है परन्तु समय अनुसार सब प्रकट होता है। जङ, तना और पत्तों की देखभाल ठीक से की जाए तो समय आने पर फूल और फल भी उत्तम आते हैं ऐसे ही इस नन्हें शिशु में सब समाया हुआ है। माता-पिता को समय अनुसार उसकी जङों को सींचने की आवश्यकता है। जङ मजबूत होगी तो तना तो मजबूत हो ही जाएगा अर्थात् आज दिए गए यह संस्कार, कल उसे जीवन जीने की कला सीखा देंगे। वास्तव में यही तो शिक्षा है।</p>
<p>(लेखिका शिशु शिक्षा विशेषज्ञ है और विद्या भारती शिशुवाटिका विभाग की अखिल भारतीय सह-संयोजिका है।)</p>
<p><strong>और पढ़ें :</strong> <span style="color: #000080;"><strong><a style="color: #000080;" href="https://rashtriyashiksha.com/early-childhood-education-unwanted-baby-habits-and-solutions/" target="_blank" rel="noopener">शिशु शिक्षा 30 – शिशु की अवांछनीय आदतें एवं निराकरण</a></strong></span></p>
<p>The post <a href="https://rashtriyashiksha.com/early-childhood-education-soulful-introduction-to-the-living-world/">शिशु शिक्षा 31 &#8211; सजीव सृष्टि से आत्मीय परिचय</a> appeared first on <a href="https://rashtriyashiksha.com">राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</a>.</p>
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