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	<title>कथा/कहानी - राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन rashtriyashiksha.com</title>
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	<description>सा विद्या या विमुक्तये</description>
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	<title>कथा/कहानी - राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन rashtriyashiksha.com</title>
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		<title>सौम्या की सखी</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 15 Aug 2026 04:04:48 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[कथा-कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[कथा/कहानी]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#8211; गोपाल माहेश्वरी सौम्या आज बहुत उदास थी। आज उसके विद्यालय के छात्रावास में विभिन्न प्रतियोगिताओं में विद्यालय का प्रतिनिधित्व करने हेतु चयन प्रक्रिया चल रही थी। गीत गायन, कहानी&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;">&#8211; गोपाल माहेश्वरी</p>
<p style="text-align: justify;">सौम्या आज बहुत उदास थी। आज उसके विद्यालय के छात्रावास में विभिन्न प्रतियोगिताओं में विद्यालय का प्रतिनिधित्व करने हेतु चयन प्रक्रिया चल रही थी। गीत गायन, कहानी कथन, श्लोक वाचन, तत्काल भाषण, वाद प्रतिवाद चित्रकला आदि कितनी ही प्रतियोगिताओं के लिए बच्चों का चयन हो रहा था। लेकिन उसका चयन तो किसी में भी नहीं हुआ।</p>
<p style="text-align: justify;">विद्यालय में ही एक ओर कुछ बच्चे रंगोली, चित्रकला और मूर्तिकला का अभ्यास कर रहे थे। सौम्या ठिठकी फिर स्वयं ही बुदबुदाते हुए आगे बढ़ गई। इनमें से कुछ भी उससे हो पाएगा ऐसा उसे स्वयं नहीं लगा। वह अपने विचारों में उलझी विद्यालय के मैदान की ओर बढ़ चली।</p>
<p style="text-align: justify;">मैदान में एक ओर गोला फेंक, चक्का फेंक, भाला फेंक की चयन परीक्षा चल रही थी। सुधीर जी बच्चों को अवसर दे रहे थे। उन्होंने सौम्या से भी पूछा “सौम्या! तुम भी प्रयास करोगी?” सौम्या के मन पर पड़ी निराशा की कठोर परत में जैसे एक दरार सी बनी। उसे लगा कुछ ऐसा है जो उसके मन में बाहर निकलने को छटपटा रहा है। उसने भाला पकड़ा और उछाल दिया लेकिन यह क्या! वह सीधे जाने की अपेक्षा वहाँ खड़े बच्चों की ओर जाकर गिर गया। सब उपहासपूर्वक  हँस पड़े।</p>
<p style="text-align: justify;">“लक्ष्मीबाई राणा प्रताप बनने का प्रयास करें तो ऐसा ही होता है।” पता नहीं बच्चों की भीड़ में से किसने मुंह छुपाकर यह जुमला उछाला था पर व्यंग्य का यह भाला पहले से निराश सौम्या के मन में गहरे धंस गया। वह संभवतः रो देती पर तभी परिदृश्य बदल गया। सहपाठियों में हास्यविनोद चलता रहता है लेकिन कोई महापुरुषों को लेकर उपहास करे यह सुधीर जी को बिल्कुल पसंद न था। वे खेल और अनुशासन का संबंध बहुत गहरा मानते थे। खेल यानी उद्दंडता कभी नहीं, जरा भी नहीं।</p>
<p style="text-align: justify;">वे क्रोध से आगबबूला बने बच्चों की भीड़ में घुसे और पीछे खिसक चुके लक्षित को पकड़ कर सबके बीच ले आए। वे आवाज से पहचान चुके थे कि यह उद्दंडता उसी की है। अब लक्षित थरथर काँप रहा था।</p>
<p style="text-align: justify;">कान पकड़ कर गिड़गिड़ाने लगा “अब नहीं करूंगा, माँ कसम।”</p>
<p style="text-align: justify;">एक झन्नाटेदार थप्पड़ और पड़ा “माँ की कसम खाते हो? निभा पाओगे? माँ का महत्व समझते हो?” बात बढ़ती देख सुशांत जी ने उसे छुड़वाया “माफी मांगों सौम्या से और अब कभी मैदान में दिखना मत। समझे?”</p>
<p style="text-align: justify;">लक्षित ने सौम्या से क्षमा तो मांगी पर जाते-जाते धीरे से फुसफुसाता गया “देख लूँगा तुझे तो।”</p>
<p style="text-align: justify;">सौम्या डरी। उसकी तो कोई गलती ही न थी। प्रतियोगिता में चयन तो दूर एक नया ही बखेड़ा खड़ा हो गया था।</p>
<p style="text-align: justify;">वह आशंका और अनमनेपन के साथ वहाँ से चल पड़ी। एक एकांत कोने में खड़े बूढ़े पीपल के नीचे बने चबूतरे की धूल झाड़ कर बैठ गई। पतझर आरंभ हो चुका था। पीपल के सूखे पत्ते हवा से टूटकर गिर रहे थे। चारों ओर सूखे पत्ते बिखरे थे। सौम्या अपने ही विचारों में उलझी उन पर चलने लगी। चरमर चरमर की आवाज से उसके पैरों के नीचे आने वाले पत्ते चूरचूर हो रहे थे। उसने झुककर थोड़ा चूरा हथेली पर रखा और फूंक से उड़ाते हुए बोली “सौम्या”। उसे लगा उसका भविष्य भी इन सूखे पत्तों जैसा ही है। उसका यह विद्यालय में अंतिम वर्ष था। क्या उसे खाली हाथ ही विद्यालयीन जीवन को विदा देनी है? उसे खोजते हुए उसकी सहेली स्वरिता उधर आ गई। सौम्या का ध्यान नहीं था वह तो अपने विचारों के शोर में ऐसी खोई हुई थी कि उसे स्वरिता के आने की आहट भी न सुनाई दी।</p>
<p style="text-align: justify;">स्वरिता ने उसे पत्तों का चूरा उड़ाते देख लिया था। उसे मैदान वाली घटना भी पता लगी थी। वह सौम्या के कांधे पर हाथ रखे बोली “पतझर हमेशा नहीं रहता।” सौम्या चुपचाप रही। स्वरिता ने अपनी सहेली का हाथ हाथों में लिया और बोली “भगवान ने सबके हाथ में कोई न कोई रेखा बनाई है सौम्या! ऐसा कोई भी नहीं जिसके हाथ में कुछ भी नहीं।” तभी पेड़ पर कोई अनजानी-सी चिड़िया ने अलग-सी आवाज निकाली। पीपल की एक कोमल कोंपल टूटकर अपनी हथेली गिरी।</p>
<p style="text-align: justify;">“लो, ईश्वर ने संकेत भी दे दिया।” सौम्या की अंगुली उस तांबे जैसे रंग के रेशम जैसे सुकोमल कोमल पत्ते पर घूमने लगी।</p>
<p style="text-align: justify;">चिड़िया फिर बोली। स्वरिता ने कहा “यह कौनसी चिड़िया है?”</p>
<p style="text-align: justify;">“पता नहीं।” सौम्या का मौन टूटा। वह उस पत्ते को डंडी से पकड़ चुटकी में पकड़ घुमाते हुए बोली।</p>
<p style="text-align: justify;">स्वरिता कहने लगी “यह मैना नहीं, कोयल या बुलबुल नहीं, न ही गौरैया या श्यामा है। इसका नाम मुझे नहीं पता, तुम्हें नहीं पता, शायद इसे भी पता न हो, पर यह इस पतझड़ में इस पेड़ पर गाने चली आयी। कौन सुनेगा इसे यहाँ? पर इसे गाना है। कोई सुने तो शायद इसे गाना भी न माने क्योंकि यह कोयल, मैना या बुलबुल जैसी नहीं है।”</p>
<p style="text-align: justify;">“फिर कैसी है?” सौम्या के मुख से उदासी दूर जाती दिखी।</p>
<p style="text-align: justify;">“यह इसी के जैसी है। इसका नाम प्रसिद्ध नहीं। इसकी विशेषता यहाँ कोई नहीं जानता। इसकी योग्यता का अभी कोई नाम नहीं पर यह अपने को व्यक्त कर रही है। परमात्मा के प्रति इस विश्वास के साथ कि उसे भी खाली नहीं भेजा है उसने इस संसार में।”</p>
<p style="text-align: justify;">सौम्या मुस्कुराई। चिड़िया फिर बोली जैसे उसका समर्थन कर रही हो। दोनों सहेली अपने छात्रावास के कक्ष की ओर चल पड़ीं। पर मन का क्षोभ अभी पूरा हटा न था। उसने पानी की बोतल ली, अपनी साइकिल उठाई और स्वरिता को पीछे केरियर पर बिठाकर घूमने चल दी।</p>
<p style="text-align: justify;">छात्रावास से थोड़ी ही दूर चौराहे पर दाहिनी ओर मोटर साइकिल से कोई गिरा हुआ था तीन-चार लोग उसे घेरे खड़े थे। पास से गुजरते हुए इन सहेलियों ने उसे पहचान लिया तो साइकिल में ब्रेक जैसे अपने आप लग गए। यह तो लक्षित ही था। उसकी दशा बता रही थी कि न केवल वह दुर्घटनाग्रस्त था बल्कि उसकी धुनाई भी हुई थी। कोई संदेह नहीं कि यह महाशय ही किसी से भिड़े हों और बदले में अच्छी पूजापत्री हो गई हो। स्वरिता ने सुशांत जी को मोबाइल पर सूचना दी। वे तीन-चार विद्यार्थियों को लेकर पहुँचे तब तक स्वरिता ने उसे पानी की बोतल से पानी पिलाया। लक्षित के सिर से खून बह रहा था। सौम्या को कुछ उपाय न सूझा तो अपनी चुन्नी ही उसके सिर पर कसकर बांध दी। तमाशा देख रहे लोगों में से किसी लड़के ने जुमला कसा “ओऽऽहो”।</p>
<p style="text-align: justify;">अधलेटे लक्षित के दाएं हाथ का भरपूर वार उस लड़के के पैरों पर पड़ा वह लड़खड़ाकर घुटनों पर आ गया और एक भरपूर झन्नाटेदार थप्पड़ खाकर वह भौचक्का रह गया।</p>
<p style="text-align: justify;">सुशांत जी के साथ ही सुधीर जी भी आ चुके थे।</p>
<p style="text-align: justify;">सुधीर जी ने एंबुलेंस में चढ़ाते हुए लक्षित से पूछा “देख लिया सौम्या को?”</p>
<p style="text-align: justify;">“क्षमा कर दो सौम्या आज से तुम्हारी इज्जत मेरी पगड़ी है बहन!” उसने सिर पर बंधी सौम्या की चुन्नी को छूकर कहा। उसकी आँखें बरस पड़ी। एंबुलेंस उसे चिकित्सा के लिए ले जा रही थी पर उसकी सोच की चिकित्सा हो चुकी थी।</p>
<p style="text-align: justify;">मानव में प्रतिभा होना प्रशंसनीय है पर सकारात्मक और संवेदनशीलता मानव की सबसे उत्तम प्रतिभा है। जिनके बिना प्रत्येक विशेषता कांतिहीन है, फीकी है।</p>
<p style="text-align: justify;">विद्यालय के दीक्षांत समारोह में लक्षित अपने अनुभव कथन के लिए खड़ा हुआ तो साथियों ने सोचा अब यह कुछ ऊटपटांग हास्य-व्यंग्य भरी बातें कहेगा। लेकिन वह पूरी गंभीरता से यह घटना सुनाते हुए रो पड़ा। अपनी बात पूरी करते-करते वह सौम्या के पैरों छूकर क्षमा मांगने बढ़ा तो सौम्या ने उसे बीच में ही रोक लिया “नहीं भैया! तुमने मुझे मुझसे मिलने का अवसर दिया है। मैं कोई कलाकार या खिलाड़ी नहीं तो क्या अच्छी से अच्छी मानव बनने का प्रयास करूंगी।” तालियों की गड़गड़ाहट से सबने लक्षित और सौम्या का स्वागत किया।</p>
<p style="text-align: justify;">प्राचार्य जी के दीक्षांत उद्बोधन के भी अंतिम वाक्य थे “मानव में प्रतिभा होना प्रशंसनीय है पर सकारात्मक और संवेदनशीलता मानव की सबसे उत्तम प्रतिभा है। जिनके बिना प्रत्येक विशेषता कांतिहीन है, फीकी है। मैं शुभकामनाएं करता हूँ कि तुम सब अपनी-अपनी योग्यतानुसार कीर्ति अर्जित करो, जो चाहो सो बनो पर मानव अवश्य बने रहो।”</p>
<p style="text-align: justify;">जाने कहाँ से वह पीपल वाली चिड़िया आकर सौम्या के हाथ पर बैठ गयी। स्वरिता ने पूछा “पहचाना सौम्या कौन है यह?” सौम्या खिलखिलाकर हँसी और बोली “ मैं इसका नाम रख ही हूँ ‘सौम्या की सखी’।”</p>
<p style="text-align: justify;">दोनों सहेलियां हाथों पर ताली देकर हँस पड़ी। चिड़िया भी अपने नाम से प्रसन्न होकर पेड़ पर ऊँचे जा बैठी।</p>
<p><span style="color: #0000ff;"><strong>और पढ़े: <a style="color: #0000ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/the-village-of-younger/" target="_blank" rel="noopener">छोटे का गांव</a></strong></span></p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक इंदौर से प्रकाशित ‘देवपुत्र’ बाल मासिक पत्रिका के संपादक है।)</p>
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		<title>प्रेरणा के फूल</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 18 May 2026 06:43:45 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[कथा-कहानी]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#8211; गोपाल माहेश्वरी स्वदेशचंद्र जी आज सुबह से ही कुर्ता धोती पहनकर तैयार हो गए तो बेटे शिरीष ने पूछा &#8220;बाबूजी! आज कहाँ?&#8221; संघ की कोई बैठक है या कोई&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;">&#8211; गोपाल माहेश्वरी</p>
<p><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone  wp-image-9300" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/05/5.3-300x200.jpg" alt="" width="1601" height="1067" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/05/5.3-300x200.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/05/5.3-768x511.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/05/5.3.jpg 1014w" sizes="(max-width: 1601px) 100vw, 1601px" /></p>
<p style="text-align: justify;">स्वदेशचंद्र जी आज सुबह से ही कुर्ता धोती पहनकर तैयार हो गए तो बेटे शिरीष ने पूछा &#8220;बाबूजी! आज कहाँ?&#8221; संघ की कोई बैठक है या कोई कार्यक्रम?&#8221; पिता-पुत्र दोनों ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक थे पर उनकी शाखाएं अलग अलग। स्वदेश चंद्र जी जिन्हें सब संघी मित्र सुदेश जी पुकारते थे और अन्य मिलने जुलने वाले सुदेश बाबू, वे प्रौढ़ शाखा के स्वयंसेवक थे, जबकि शिरीष जी तरुणों की शाखा के। संघ तो एक ही है बस आयुवर्ग से कार्यालय कालखंड थोड़े अलग रखे जाते हैं। शाखा से लौटकर पिताजी को यह वेश पहनते देखा तो शिरीष को आश्चर्य हुआ उसने जिज्ञासा से ही उन्हें टोका था।</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;हाँ शिरीष! आज देश का एक बहुत बड़ा दिन है। बेटा! बताओ क्या है?&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">शिरीष सोचने लगे &#8221;वर्षप्रतिपदा तो निकल गई और हिन्दू साम्राज्य दिनोत्सव अभी आया नहीं? फिर क्या है आज?&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;बहुत बड़ा दिन है बेटा! तारीख कौनसी है आज?&#8221; सुदेश जी अपनी काली टोपी ठीक करते-करते बोले।</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;आज तो दस मई है। आज क्या है? याद नहीं आ रहा।&#8221; शिरीष को कार्यालय जाने का समय हो रहा था वह स्नानघर में घुस गया। सुदेश जी मुस्कुराकर रह गए।</p>
<p style="text-align: justify;">तभी उनकी बहू मालती ने कहा &#8220;बाबूजी! अल्पाहार करके जाइए, पता नहीं आपको किता समय लगेगा। आप अकेले जी जाएँगे या कोई संघी-साथी आ रहे हैं?&#8221; वह मेज पर अल्पाहार लगाते-लगाते पूछ रही थी।</p>
<p style="text-align: justify;">सभी ने एक साथ बैठकर अल्पाहार किया।&#8221; आप अकेले जा रहे हैं कहीं?&#8221; शिरीष ने पूछा।</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;बस यहीं एमवाय तक।&#8221; सुदेश जी ने सहज ही उत्तर दिया पर बेटे-बहू चौंक पड़े। इन्दौर में एमवाय एक बहुत बड़ा अस्पताल है, महाराजा यशवंतराव होलकर चिकित्सालय। लोग संक्षेप में एम वाय एच कहते हैं पर बोलचाल में इंदौरी लोग उसे एमवाय ही कह लेते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">बेटे-बहू का चिंतापूर्ण भाव समझ कर सुदेश जी खिलखिलाकर हँसे और कहने लगे &#8220;बीमार नहीं हूँ, न भर्ती होना है &#8230;. अस्पताल कोई यह वेश पहनकर जाता है क्या?&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;तो अस्पताल नहीं जा रहे हैं?&#8221; बहू ने पूछा।</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;जा तो वहीं रहा हूँ।&#8221; वे बातों के रस का आनंद लेने लगे।</p>
<p style="text-align: justify;">शिरीष को जल्दी जाना था। वह उठते हुए बोला &#8220;किसी का स्वास्थ्य  देखने या फल वगैरह बाँटने जाना होगा। अच्छा मैं तो चला, आपको वहाँ तक छोड़ दूँ?&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;नहीं नहीं छावनी से एमवाय इतना दूर भी नहीं, मैं पैदल ही जाऊँगा।&#8221; वे बोले।</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;हाँ पर ट्राफिक खूब रहता है, सम्हलकर जाइए। अच्छा राम-राम।&#8221; शिरीष ने प्रतिदिन की भांति जाते समय पिता के चरण छुए।</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;दादाजी! मैं चलूं?&#8221; उनके दस वर्षीय पोते नवीन ने उनका हाथ पकड़कर मनुहार की।</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;चलना है?&#8221; वे सहमत होने के स्वर में बोले।</p>
<p style="text-align: justify;">तभी सात वर्ष की भारती हठ करने लगी &#8220;भैया जाएगा तो मैं भी जाऊँगी, मैं भी जाऊँगी।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">मालती बोल पड़ी &#8220;बिलकुल नहीं। दादाजी को अपने काम से जाना है। वे अभी मंदिर नहीं जा रहे और बगीचे में शाम को ले जाएँगे। तंग मत करो। यहीं बैठकर ड्राईंग बनाना।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;वैसे बहू! मैं भी बच्चों को वहाँ लेजाना चाहता हूँ।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;येऽऽऽ&#8221; बच्चे ताली बजाकर उछलने लगे।</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;पर बाबूजी! अस्पताल में बच्चों को ले जाना ठीक होगा? उस पर सड़क पर इतना ट्राफिक, आपको परेशानी होगी।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;हम अस्पताल के अंदर रोगियों के बीच नहीं जा रहे और बच्चे जा रहे हैं तो ई-रिक्शा ले लेंगे। निश्चिंत रहो, परेशानी नहीं आनंद होगा। अभी तुम कह रही थी मैं मंदिर नहीं जा रहा हूँ। वैसे जा तो मंदिर ही रहा हूँ पर राम मंदिर या शिव मन्दिर नहीं।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;आप ले जाइए बाबूजी! भोजन के समय तक लौट आएंगे न?&#8221; मालती ने विश्वास और विनम्रतापूर्वक कहा।</p>
<p style="text-align: justify;">घर के सामने से ही जा रहे ई-रिक्शा को रोक कर तीनों में फिर एक रोचक बहस छिड़ गई। बड़ों के साथ जाते हैं तो बच्चों को न उनके न चाहने पर भी सुरक्षा की दृष्टि से बीच में बैठाया जाता था। पर आज तो बड़े केवल एक थे यानि दादाजी और बच्चे दो। नवीन ने मौका देखकर कहा &#8220;भारती सबसे छोटी है वह बीच में बैठेगी।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;नहीं भैया! साइड में, तो मैं भी साइड में ही बैठूंगी।&#8221; भारती ने हठपूर्वक प्रतिवाद किया।</p>
<p style="text-align: justify;">कोई बहुत लंबी दूरी तक तो जाना न था इसलिए सुदेश जी बोले &#8220;अच्छा, बीच में मैं बैठता हूँ।&#8221; उन्होंने सोचा बीच में बैठने से दोनों हाथों से दोनों बच्चों को सम्हालना सरल होगा। पर बच्चे भी नए युग के थे। भारती तपाक् से बोली &#8220;हाँ, दादाजी को सम्हालना हमारी जिम्मेदारी है, हम दोनों उन्हें सम्हाल लेंगे।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">दादाजी के साथ रिक्शे वाला भी यह सुनकर ठहाका लगाए बिना न रह सका। दस मिनट भी न लगे कि रिक्शा गंतव्य पर आ लगा।</p>
<p style="text-align: justify;">रिक्शेवाले ने पूछा &#8220;बाबूजी! अस्पताल का गेट जरा आगे है, वहाँ उतारू।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;नहीं भाई! हमें यहाँ ही उतार दो। अस्पताल नहीं जाना है।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">वे सड़क से पंद्रह बीस कदम अंदर चले गए। अंदर एक छोटे से पक्की झोंपड़ी जैसे स्थान में एक शाही पगड़ी पहने रौबीली मूछों वाले किसी महापुरुष की केवल छाती तक की प्रतिमा लगी थी। दादाजी ने उन्हें शीश झुकाया।</p>
<p style="text-align: justify;">बच्चों ने भी प्रणाम किया। नवीन ने पत्थर पर लिखा नाम पढ़ा &#8216;राणा बख्तावर सिंह&#8217;।</p>
<p style="text-align: justify;">भारती ने पूछा &#8220;दादाजी! ये कौन हैं? हम यहाँ क्यों आए हैं?&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;बच्चो! ये हैं अमझेरा के राजा राणा बख्तावर सिंह जी। अंग्रेजों के विरुद्ध मालवा व निमाड़ के वनवासियों को संगठित कर स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ते-लड़ते बलिदान देने वाले रणबांकुरों में इनका नाम सदैव अमर रहेगा।&#8221;</p>
<p><img decoding="async" class="alignnone  wp-image-9302" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/05/5.4-1-300x225.jpg" alt="" width="1615" height="1211" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/05/5.4-1-300x225.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/05/5.4-1.jpg 730w" sizes="(max-width: 1615px) 100vw, 1615px" /></p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;लेकिन दादाजी! यहाँ लिखा है कि ये 10 फरवरी को बलिदान हुए थे तो हम आज यहाँ क्यों आए हैं?&#8221; नवीन ने कोतूहल से पूछा।</p>
<p style="text-align: justify;">भारती भैया से पीछे कैसे रहती? उसने भी एक प्रश्न पूछा &#8220;आप कह रहे थे ये अमझेरा के राजा थे तो हम यहाँ क्यों आए हैं?&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">सुदेश जी के लिए उत्तर देना आवश्यक था बल्कि बच्चों को यहाँ लाने का उद्देश्य भी इस बातचीत में पूरा हो रहा था। वे बोले &#8220;यहाँ इसलिए आए हैं कि ये नीम का पेड़ देख रहे हो न?&#8221; सुदेश जी ने पास ही स्थित एक नीम के पुराने पेड़ उस पेड़ के तने को छूकर हाथ मस्तक से लगाया। भावुकता से उनका कंठ भर आया &#8220;दुष्ट अंग्रेजों ने इसी पेड़ पर राणाजी को फांसी दी थी एकबार नहीं दो बार।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;दो बार!! दो बार क्यों? दादाजी!&#8221; नवीन ने पूछ ही लिया।</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;दो बार इसलिए कि राणाजी इतने हृष्ट-पुष्ट और बलशाली थे कि फांसी की रस्सी उनका भार ही न सह पाई, टूट गई।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;अच्छा!!!&#8221; बच्चों ने आश्चर्य प्रकट किया।</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;हाँ, और तब सारे नियम ताक पर रखकर उन्हें दोबारा फांसी दी गई। तब से यह पेड़ यहीं खड़ा, उस महान बलिदानी वीर की याद दिलाता रहता है।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">भारती के प्रश्न का तो उत्तर मिल गया था पर नवीन का प्रश्न छूट रहा था। उसने प्रश्न दुहराया तो दादाजी बोले &#8220;बेटा! दुःख की बात है कि लाखों की जनसंख्या वाले इस इन्दौर महानगर में अधिकतर लोगों को तो पता भी नहीं है कि यह कितनी ऐतिहासिक जगह है। कुछ देशभक्तों के प्रयत्न से यह पेड़ कटने से बचा है। वे गिनती के लोग आते हैं उनके बलिदान दिवस पर यहाँ। लेकिन&#8230;..&#8221; वे कहते-कहते कहते जैसे वे कहीं खो गए, एमवायएच के सामने के भरपूर भीड़ वाली कोलाहल भरी सड़क का सारा शोर जैसे उनके लिए गायब हो चुका था। वे एक हाथ से उस नीम के वृक्ष को छूते हुए आकाश की ओर देखते कहने लगे &#8220;कैसे कोई बलिदानी इतने व्यस्त और बड़े महानगर में भीड़ में एकांत काट रहा है शताब्दी दर शताब्दी। मनुष्य को फांसी दी जाती है पर उसकी स्मृतियों को भी कोई ऐसे फांसी पर लटकाए रखता है क्या? स्वतंत्रता पाकर इतने कृतघ्न हो गए हैं हम?&#8221; ये उद्गार बच्चों को समझ में नहीं आ सकते पर उन्हें समझाना ही होगा यह हर दादाजी-दादीजी का कर्तव्य है कि अपने पोते-पोतियों को यह समझाएँ कि स्वतंत्रता नहीं मिली है बिना खड्ग बिना ढाल।</p>
<p style="text-align: justify;">वे कहने लगे &#8220;बच्चो! आज दस मई है। अठारह सौ सत्तावन में आज ही हमारी स्वतंत्रता के पहले महासंग्राम का आरंभ हुआ था। इतनी व्यापक क्रांति इसके पहले नहीं हुई थी कि तेरह बरस की मैना से लेकर अस्सी बरस के बाबू कुंवर सिंह एक साथ अपने-अपने स्थान पर लड़े, बलिदान हुए। तुम जानना चाहते हो न कि मैं आज यहाँ क्यों आया हूँ। अलग-अलग शरीर होते हुए भी देश की स्वतंत्रता के लिए मर-मिटने वाले सभी वीरों वीरांगनाओं का ध्येय एक ही था। देहरूप भिन्न पर ध्येयरूप एक ही। इसलिए अपने-अपने क्षेत्र के ऐसे वीर बलिदानियों को आज क्रांति दिवस पर याद कर हम उन एकात्म महापुरुषों को स्मरण करें तो उनके कभी न चुकाए जा सकने वाले ऋण को संभवतः अंशमात्र तो चुका पाएँ।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">धोती के पल्लू से अपने बहते आंसू पोंछते हुए वे बच्चों सहित राणाजी को प्रणाम करके पैदल ही सड़क की भीड़ में धंस गए। पास ही चौराहे पर हनुमान मंदिर था। वे प्रणाम करने रुके। शीश झुकाए नवीन बुदबुदाते हुए कह रहा था &#8220;हे हनुमानजी महाराज! मुझे भी राणाजी जैसा वीर बनाना।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">अचानक हवा का एक झोंका नीम के कुछ फूल उड़ाकर नवीन के झुके शीश पर बरसा गया। पता नहीं फूल उसी पेड़ के थे या दूसरे किसी के पर दादाजी को लगा मानो राणाजी की आत्मा आशीष देकर गुजरी है वहाँ से। फूलों की कड़वी शीतलता कितनी आरोग्यकारी थी।</p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक इंदौर से प्रकाशित ‘देवपुत्र’ बाल मासिक पत्रिका के संपादक है।)</p>
<p><strong>और पढ़ें : <span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/the-resolve-of-new-bharat/" target="_blank" rel="noopener">नए भारत का संकल्प</a></span></strong></p>
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		<title>नए भारत का संकल्प</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 18 May 2026 06:23:50 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[कथा-कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[कथा/कहानी]]></category>
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		<category><![CDATA[स्वदेशी_विचार]]></category>
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					<description><![CDATA[<p> &#8211; गोपाल माहेश्वरी &#8220;अरी मीनू! अपने पिताजी को कहना गैस सिलेंडर बुक किया कि नहीं।&#8221; &#8220;क्या माँ! अभी नया सिलेंडर लगाए चार दिन भी नहीं हुए और आपको दूसरा भरवाना&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"> &#8211; गोपाल माहेश्वरी</p>
<p><img decoding="async" class="alignnone wp-image-9296" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/05/5.1-300x200.jpg" alt="" width="1679" height="1119" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/05/5.1-300x200.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/05/5.1-1024x683.jpg 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/05/5.1-768x512.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/05/5.1.jpg 1536w" sizes="(max-width: 1679px) 100vw, 1679px" /></p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;अरी मीनू! अपने पिताजी को कहना गैस सिलेंडर बुक किया कि नहीं।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;क्या माँ! अभी नया सिलेंडर लगाए चार दिन भी नहीं हुए और आपको दूसरा भरवाना है!&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;रसोई मुझे बनानी पड़ती है बेटी! तुम बाप-बेटी को किसी दिन भोजन एक-आध घंटा देरी से मिले तो ताना मिलता है मुझे, रहने दो, आनलाइन कुछ मंगवा लेते हैं। समझी? लेकिन समझ लो, गैस की कमी होने वाली है और बाजार में भी कई रेस्टोरेंट्स बंद हो गए हैं। गैस न मिली तो क्या पकाएंगे और क्या खाएंगे?&#8221; माँ का स्वर बहुत चिंताभरा था।</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;क्या माँ! ईरान की तरह मिसाइलें दाग रही हो। अरे, ऐसा कोई संकट नहीं है हम चालीस से अधिक देशों से क्रूड आइल खरीदते हैं। प्रधानमंत्री जी ने कहा है, पेनिक न हों, देश में अभी ऊर्जा का ऐसा कोई संकट नहीं है जिसका समाधान नहीं हो सके।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;थोड़ा बहुत मैं भी समझती हूँ बेटी! आज नहीं तो कल, युद्ध लंबा खिंच गया तो प्रधानमंत्री भी क्या कर लेंगे?&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">तभी पिताजी बाहर से आए। उनके हाथों में एक समाचार पत्र था। पहले ही पृष्ठ पर आधे पन्ने का बड़ा-सा चित्र छपा था जिसमें पेट्रोल पंपों पर भारी भीड़ दिख रही थी। वे बोले &#8220;हद है मूर्खता की किसी ने कहा, कौआ कान ले गया तो कान नहीं देखेंगे कौए के पीछे दौड़ने लगेंगे।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;क्या हुआ? किसे मूर्खता का प्रमाणपत्र बांट रहे हो?&#8221; माँ का स्वर थोड़ा व्यंग्य भरा था।</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;ये पेट्रोल डीजल के लिए बिना जरूरत भीड़ लगाने वालों को।&#8221; वे समाचार पत्र पर चित्र दिखाने लगे।</p>
<p style="text-align: justify;">माँ जैसे उनसे सहमत न थी, बोलीं &#8220;जमाने को जाने दो, आपने अपनी कार और दोनों टूव्हीलर में फुलटैंक करवा लिया है न?&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">पिताजी चिढ़ गए &#8220;अच्छा ऐसा करो कुछ ड्रम-कनस्तर भी दे दो, वह भी भरवा लेता हूँ। कहो तो लीटर दो-दो लीटर पी भी लें। थोड़ा स्टोर हो जाएगा।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">मीना समझ गई। घर में भी पेट्रोल और गैस महायुद्ध मचवा देंगे। अब उसे जैसे युद्धरत देशों में भारत जैसी भूमिका निबाहना थी। वह माता-पिता की चिंता समझ रही थी। लेकिन पिताजी वास्तविक परिस्थिति  से परेशान थे और माँ काल्पनिक चिंता से ग्रसित थीं। तीन दिन का ईंधन उनकी गाड़ियों में भी था और दो महिने की गैस रसोई में भी। लेकिन अफवाहों का बाजार गर्म था एकदम निराधार संकट का आभासी भय अधिकांश को निर्बुद्ध बना रहा था।</p>
<p style="text-align: justify;">मीना ने वातावरण बदलने का प्रयास करते हुए कहा &#8220;माँ! पिताजी! मेरा परीक्षा-परिणाम आ गया है और मैं हमेशा की तरह प्रथम आई हूँ।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;अरे वाह! शाबास बेटी! बधाई, बधाई।&#8221; पिताजी ने उसे बगल में सटाते हुए कहा। माँ भी रसोई से निकलकर हाथ पोंछते हुए आई &#8220;शाबास मेरी बेटी! तेरी सारी मेहनत सफल हुई।&#8221; वे ममता से बेटी के सिर पर हाथ फेर रहीं थीं।</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;ना माँ पिताजी! ऐसे खाली-माली बधाई नहीं, आपने वचन दिया था जो मांगूंगी मिलेगा।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;हाँ हाँ, बता क्या चाहिए?&#8221; पिताजी ने कहा।</p>
<p style="text-align: justify;">माँ ने भी प्रोत्साहित करते हुए बोली &#8220;बता बता, क्या चाहिए?&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;मुझे जाना है पूरी छुट्टी कहीं घूमने।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;घूमने? पर बेटा अभी जैसी परिस्थिति चल रही है उसमें बाहर कहीं फंस गए तो गाड़ी का और अपना पेट भरना कठिन हो जाएगा।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">पिताजी बोले तो मीना के मस्तिष्क ने तुरंत खतरे की घंटी बजा दी कि कहीं फिर वही विषय न छिड़ जाए? क्योंकि पिताजी भी कहीं मन के एक कोने में आशंका तो पाले बैठे ही थे।</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;पिताजी! मैं और मेरे सभी सहपाठियों ने इस बार एक अनोखी योजना बनाई है। हम सब इन छुट्टियों में सपरिवार अपने उन रिश्तेदारों से मिलने जाएंगे जो गांवों में रहते हैं।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;और इससे क्या होगा?&#8221; माँ ने पूछा।</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;इससे मेरे देश को सहायता मिलेगी।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;कैसी सहायता? गाँव जाने से देश की समस्या का क्या संबंध?&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;संबंध है। यह ऊर्जा संकट हमेशा नहीं रहेगा। अभी यदि इसके बढ़ने की जितनी भी संभावना है उससे निपटने के लिए हम चलें अपने गांवों की ओर। एक तो वहाँ ऊर्जा के विकल्प सुलभ हैं। हम अपने फ्लेटों में चूल्हा नहीं जला सकते पर गांवों में सब जगह लकड़ी कंडे हैं, चूल्हे हैं। कई जगह गोबर गैस प्लांट है।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;इंडक्शन चूल्हे तो यहाँ भी ले रहे हैं लोग।&#8221; माँ ने कहा।</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;माँ! गर्मियों में वैसे ही बिजली की खपत अधिक होती है। सब गैस की जगह इंडक्शन चलाएंगे तो बिजली का भी संकट होने लगेगा। भोजन बनाने के अलावा कितने ही काम हैं जिनमें बिजली चाहिए ही चाहिए। तब?&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;मैं तो सोलर कूकर लाने की भी सोच रहा हूँ।&#8221; पिताजी ने जोड़ा।</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;सोलर कूकर के लिए सबको छत या खुला आँगन चाहिए, वह शहरों में सबको कहाँ मिलेगा? यह एक अच्छा उपाय है पर सबके लिए संभव नहीं।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;ऐसे तो सब शहर छोड़कर गाँव चल दिए तो गाँव इतने मेहमानों के बोझ से ही समाप्त हो जाएंगे। सब लकड़ी जलाएंगे तो बचे-खुचे जंगल भी गंजे हो जाएंगे रेगिस्तान बन जाएंगे।&#8221; पिताजी जैसे बेटी की प्रसन्न होकर परीक्षा ले रहे थे।</p>
<p style="text-align: justify;">मीना ने अपनी तार्किक क्षमता का परिचय देते हुए कहा &#8220;जी नहीं पिताजी! सबको नहीं, जो जा सकते हैं उतनों के ही जाने से काम चल जाएगा। जिन्हें बहुत आवश्यक है या जिनके कोई रिश्तेदार गांवों में नहीं हैं वे यहीं रहें न? पेट्रोल, डीजल, गैस बिल्कुल खत्म तो नहीं हुए हैं। उपयोग कम होगा तो लंबे समय इस बिन बुलाए संकट की घड़ी को पार कर जाएंगे हम। दूसरे आपने कहा पेड़ नहीं बचेंगे। बताइए पिताजी! बिजली तो हर व्यक्ति नहीं बना सकता पर पेड़ तो लगा सकता है न? ठीक है पेड़ दो-चार दिन में नहीं बढ़ते पर दो-चार पीढ़ियों तक चलते हैं, उनसे आवश्यकता भर ईंधन लेना हो तो पूरा काट देना मूर्खता है, जैसे सोने का अंडा देने वाली मुर्गी को लालच में मार डालने वाले मूर्ख की कहानी है। या चमड़े के लिए भैंस मार देने का मुहावरा। हो सकता है गाँव पहुँचने वाले अतिथि न बनकर, अपने बन कर रहें तो उपयोग की गई लकड़ी से अधिक ही पेड़ गांवों को मिल जाएं।&#8221;</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-9297" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/05/5.2-300x200.jpg" alt="" width="1616" height="1077" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/05/5.2-300x200.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/05/5.2-1024x683.jpg 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/05/5.2-768x512.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/05/5.2-1536x1024.jpg 1536w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/05/5.2.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 1616px) 100vw, 1616px" /></p>
<p style="text-align: justify;">पिताजी संतुष्ट दिखे फिर भी एक प्रश्न और उछाल ही दिया &#8220;लकड़ी, कंडे प्रदूषण नहीं फैलाएंगे?&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;हाँ, कुछ प्रदूषण होगा पर शहरों के एसी और वाहनों से कम। फिर ये जो लड़ने वाले देश बारूदी धुंए का जहर हवा में घोल रहे हैं इसे अपने देश की सीमाओं तक ही तो रोके नहीं रहेंगे, यह तो लड़ने, न लड़ने वाले सब देशों के प्राणी मात्र के लिए अचूक खतरा है न पिताजी! चूल्हे का धूंए का प्रदूषण तो किसी सीमा तक तो प्राकृतिक एयर क्यूरीफायर यानि पेड़ सोंख लेंगे पर युद्ध की ये रासायनिक गैसें?&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;ठीक है बेटी! तुम्हारा प्रस्ताव उचित है। हम कल ही अपने गाँव चलेंगे। मैं आठ-दस दिन रहकर लौट आऊंगा। तुम पूरी छुट्टियां बिताकर आ सकते हो।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;धन्यवाद पिताजी! मुझे अपना पुरस्कार मिल गया। बहुत-बहुत धन्यवाद।&#8221; मीना ने हर्ष व्यक्त किया।</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;अच्छा आपके विचार से प्रभावित होकर एक आलेख लिखने का मन बना है अनुमति है मीना जी!&#8221; पिताजी थोड़ी नाटकीयता के साथ कहने लगे तो सबके मुखड़े खिल उठे।</p>
<p style="text-align: justify;">उत्साहित मीना ने तपाक् से कहा &#8220;पहले हमें बताइए लेखक महोदय! आप विषय की अभिव्यक्ति कैसे करेंगे, तब अनुमति रहेगी।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">पिताजी ने हँसते हुए कहा &#8220;जो आपकी इच्छा।&#8221; फिर वे थोड़ी गंभीरतापूर्व क कहने लगे &#8220;देखो, विश्व समस्या में है, हमारा देश संभावित बड़े संकट की आहट अनुभव कर रहा है ऐसे में सरकार को कोसने या उसी के भरोसे बैठे रहने की अपेक्षा हमें अपने स्तर पर कुछ समाधान खोजना चाहिए यह हमारा नागरिक कर्तव्य है। हम प्रकृति की रक्षा और प्रदूषण कम करने के उपाय सोच रहे हैं यह पर्यावरण संरक्षण है। गाँव जाना, परिवार और रिश्तेदारों से मिलना उनके साथ रहना कुटुंब व्यवस्था सुदृढ़ करने का ही महत्वपूर्ण उपक्रम है। हम अपनी परंपराओं में आश्रय खोजें, अपनी धरती, संस्कृति और परंपराओं में रचें-बसें और अपने हर संभव त्याग से जिन्हें अधिक आवश्यकता है उनके लिए सुविधा कर सके यह हमारी संस्कृति है। हम शहरवासी अधिक सभ्य हैं और गांवों में रहने वाले गंवार यह भेद मिटाकर उनकी सरलता, निश्छलता और अपनत्व को अपनाना यह समरसता है। हाँ, यह अपनत्व अभी हम संकट में हैं इसलिए अनुभव करें यह स्वार्थ होगा पर संकट के कारण ही सही इस प्रकार उनका महत्व अनुभव हो, उनसे लगाव बढ़े यह बड़ी महत्वपूर्ण पहल होगी। इसलिए इन छुट्टियों में ऊर्जा संकट से निपटने के बहाने ही सही हमें अपनी ग्रामवासिनी भारत माता की सेवा करने, ममता पाने का अवसर मिल जाए और यह हमारे मन में सच्ची भक्ति और लगाव बन जाए तो भारत को वह अक्षय ऊर्जा प्राप्त रहेगी जो हर संकट पर भारी होगी।&#8230;&#8230;क्या कहतीं हैं आप, ठीक है यह?&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;एक बात रेखांकित आप भूल रहे हैं लेखक महोदय! यह उपाय बच्चों ने सुझाया है यानि यह है नए भारत का शुभ संकल्प।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">सभी ने ताली बजाकर इस परिवार सभा का विसर्जन किया उन्हें गाँव जाने की तैयारी जो करनी थी।</p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक इंदौर से प्रकाशित ‘देवपुत्र’ बाल मासिक पत्रिका के संपादक है।)</p>
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		<title>देश के लिए जियें</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 06 Mar 2026 04:36:05 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[कथा/कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[गोपाल माहेश्वरी]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#8211; गोपाल माहेश्वरी अगले सप्ताह वार्षिक परीक्षाऍं आरंभ होने वाली थीं इसलिए मधुकर दिन रात पढ़ाई में जुटा हुआ था। सायं के छ: बजने वाले थे। प्रतिदिन की भांति संदीप&#8230; </p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;">&#8211; गोपाल माहेश्वरी</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-9250" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/03/20241221_XMP015-300x169.jpg" alt="" width="1725" height="972" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/03/20241221_XMP015-300x169.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/03/20241221_XMP015-1024x576.jpg 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/03/20241221_XMP015-768x432.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/03/20241221_XMP015.jpg 1280w" sizes="auto, (max-width: 1725px) 100vw, 1725px" /></p>
<p style="text-align: justify;">अगले सप्ताह वार्षिक परीक्षाऍं आरंभ होने वाली थीं इसलिए मधुकर दिन रात पढ़ाई में जुटा हुआ था।</p>
<p style="text-align: justify;">सायं के छ: बजने वाले थे। प्रतिदिन की भांति संदीप जी की आवाज सुनाई पड़ी &#8220;मधुकर जी! मधुकर जी! चलिए शाखा का समय हो रहा है।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">मधुकर ने द्वार खोला और संदीप जी से शिष्टतापूर्वक कहा &#8220;भाईसाहब! अगले सप्ताह मेरी परीक्षाएं आरंभ हो रही हैं। माताजी का कहना है कि यदि बीस- बाईस दिन शाखा न जाकर पूरा ध्यान पढ़ाई पर केंद्रित करूं तो मैं बहुत अच्छी श्रेणी में उत्तीर्ण हो सकूंगा। इसलिए यदि आज से मैं शाखा न आऊं तो &#8230;.&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">संदीप जी दो पल मौन रहे फिर बोले &#8220;कोई बात नहीं। मैं शाखा से लौटकर मिलने आता हूँ।&#8221; उनकी साईकिल आगे बढ़ गई।</p>
<p style="text-align: justify;">साढ़े सात के लगभग वे मधुकर के घर आए तो द्वार माताजी ने ही खोला। नमस्ते का आदान-प्रदान हुआ।</p>
<p style="text-align: justify;">माता जी ने कहा &#8220;मधु पढ़ाई के कमरे में है आप वहीं चले जाइए। और हाँ, आप भोजन यहीं करके जाइएगा, बस आधे घंटे में तैयार हो जाएगा।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">मधुकर की मेज पर कुछ पुस्तकें और कापी खुले रखे थे वह नोट्स बनाने में व्यस्त था। संदीप जी की आवाज से उसका ध्यान भंग हुआ, वे कह रहे थे &#8220;भारत माता आपको देखकर कितनी प्रसन्न हो रही होगी कि उसके भविष्य रूपी आप जैसे विद्यार्थी कितने परिश्रम और मनोयोग से पढ़-लिखकर तैयार हो रहे हैं जिससे योग्य प्रकार से राष्ट्र सेवा कर सके।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">मधुकर ने कुर्सी से खड़े होकर नमस्ते की, फिर बोला &#8220;इसमें भी राष्ट्रीय भाव!&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;हाँ भाई! क्यों नहीं? पढ़-लिखकर अपना और अपने परिवार का पेट भरने और खूब पैसा कमाने का उद्देश्य तो बहुत अधूरा है। जब तक उसमें समाज और राष्ट्र का हित सम्मिलित न हो। एक भ्रष्टाचारी भी बहुत कमा सकता है लेकिन वह समाज और राष्ट्र का कोई भला नहीं करता बल्कि हानि ही करता है। इसलिए मैं मानता हूँ हम अपनी आँखों में अपने सपनों से अधिक भारत माता के सपनों को बसाएं, उन्हें पूरा कर सकें इस योग्य अपने को तैयार करें।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;आप समझाना क्या चाहते हैं? आप जानते हैं मैं कितने परिश्रमपूर्वक परीक्षा की तैयारी कर रहा हूँ, इसीलिए तो आज से कुछ दिनों शाखा जाना भी बंद।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;देखो मधु जी! स्वयंसेवक का अर्थ ही है स्वयं की प्रेरणा से कार्य करने वाला। आप अपने विचार  को सुनिश्चित रखने के लिए स्वतंत्र हैं पर यह सुझाव है कि किसी एक लक्ष्य को साधने में बाकी की सर्वथा उपेक्षा उचित नहीं है। दिन में आठ-दस-बारह घंटे मस्तिष्क और मन बहुत काम कर ले इससे शरीर की बाकी आवश्यकता पूरी नहीं हो जाती ऐसे में शरीर मनोमस्तिष्क को पूरा सहयोग नहीं करेगा अंततः वे भी शरीर के ही अंग हैं।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;मैं स्पष्ट रूप से समझा नहीं? मैं चाहता हूँ, बड़ा होकर अच्छा वैज्ञानिक बनूं, खूब कमाऊंगा तो समाज के लिए भी सहयोग कर सकूंगा। और&#8230;&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">संदीप जी हँसे&#8221;&#8230;और फिर अच्छी पढ़ी-लिखी लड़की से विवाह करके अच्छी घर गृहस्थी&#8230;.&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">मधुकर शर्मा गया &#8220;नहीं नहीं भाईसाहब! इतना आगे अभी नहीं सोचा है मैंने।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;पर अधिकतर किशोर ऐसा ही सोचते हैं।..पर सोचो अगर भगतसिंह, स्वतंत्रता के लिए दीवाने न होते, फांसी के फंदे को वरमाला और स्वतंत्रता को दुल्हन न मान लेते तो? तो आज हम उनका बलिदान दिवस न मना रहे होते। वे और उनके जैसे छात्र बने रहने की आयु में अपने प्राण न्यौछावर करने वाले नवयुवक करोड़ों देशवासियों की प्रेरणा हैं। दूसरा उदाहरण डॉ. हेडगेवार हैं आज संघ का विराटवट उन्हीं के बोये संघ-बीज का परिणाम है। अपने बाकी सरसंघचालक और संघ के कितने ही स्वयंसेवक जो अपना व्यक्तिगत करियर ही बनाते तो देश के प्रथम श्रेणी के लोग बनते लेकिन वे सामान्य सफलताओं से प्रथम न बने वे राष्ट्र को प्रथम बनाने हेतु अग्रणी बने।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;भगतसिंह का दौर अलग था।&#8221; मधुकर ने तर्क किया।</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;सही है, वह युग था जब देश पर मरने वालों की अधिक आवश्यकता थी पर स्वतंत्र भारत को जग सिरमौर बनाने हेतु देश के लिए जीना अधिक आवश्यक है और राष्ट्र की आवश्यकता के अनुसार आज के वैश्विक स्पर्धा के युग में और अधिक योग्यता, दक्षता, कुशलता वाले नवयुवक चाहिए।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;खूब पढ़ना भी है, और शाखा भी&#8230;. समझा नहीं।&#8221; मधुकर बोला।</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;अरे भाई! पढ़ाई के साथ-साथ थोड़ा खेलकूद, व्यायाम, प्राणायाम भी आवश्यक नित्यकर्म ही है। नींद भी और सात्विक और पौष्टिक भोजन भी जरूरी है। और खेलकूद व्यायाम प्राणायाम के लिए शाखा एक बहुउपयोगी माध्यम नहीं है क्या? जहाँ शरीर, मन और मस्तिष्क को एकसाथ पोषण और राष्ट्र के लिए स्वयं को योग्य बनाने का वातावरण मिलता है। बौद्धिक दृष्टि से पढ़ाई-लिखाई से उत्तम सफलता पाकर भी निर्बल शरीर, दुर्बल स्वास्थ्य रहा तो भी उद्देश्य पूरा होगा क्या? अभी परीक्षाएं पास हैं तो केवल शाखा आ सकते हो, संपर्क आदि संभव हो तो ठीक नहीं तो बाकी स्वयंसेवक कर लेंगे।&#8221;</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-9258" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/03/896-300x169.webp" alt="" width="1827" height="1029" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/03/896-300x169.webp 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/03/896-768x432.webp 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/03/896.webp 1024w" sizes="auto, (max-width: 1827px) 100vw, 1827px" /></p>
<p style="text-align: justify;">तभी माताजी का बुलावे की आवाज आई &#8220;भोजन तैयार है, हाथ-मुंह धोकर आ जाओ, भोजन सब साथ ही करेंगे।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">भोजन करके संदीप जी बोले &#8220;अच्छा मधु जी! चलता हूँ।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;अब किधर?</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;अभी सोहन जी के यहाँ जाऊँगा।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;क्यों? प्रोफेसर साहब की ही कह रहे हैं न? उनके यहाँ क्यों?&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;भाई! मेरी भी महाविद्यालय की परीक्षा चल रही है। अपने वर्षप्रतिपदा के उत्सव में अतिथि बनकर आए थे तो प्रा. सोहन जी बोले थे, &#8216;शाखा के किसी भी स्वयंसेवक को गणित, विज्ञान आदि में कुछ समझना-पूछना हो तो मेरे पास आ सकता है।&#8217; बस गणित की कुछ समस्या सुलझाने हेतु जा रहा हूँ। परसों परीक्षा है।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;आपकी परीक्षा है और आप मुझे समझाने चले आए! और मैं हूँ कि शाखा के एक घंटे के लिए भी छुट्टी चाह रहा था।&#8221; मधुकर का स्वर आश्चर्य और पश्चाताप से भरा था।</p>
<p style="text-align: justify;">संदीप जी विद्यार्थी विस्तारक थे। उनका संपर्क सफल हुआ। &#8220;देश के लिए जियें, समाज के लिए जियें। ये धड़कनें ये प्राण हो जन्मभूमि के लिए&#8221; गुनगुनाते हुए उनकी साईकिल गली के मोड़ पर मुड़कर ओझल हो गई।</p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक इंदौर से प्रकाशित ‘देवपुत्र’ बाल मासिक पत्रिका के संपादक है।)</p>
<p>और पढ़ें : <span style="color: #3366ff;"><a style="color: #3366ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/dada-ji-ka-chamatkar/" target="_blank" rel="noopener"><strong>दादा जी का चमत्कार </strong> </a></span></p>
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		<title>दादा जी का चमत्कार       </title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 10 Jan 2026 07:09:23 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[कथा/कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[गोपाल माहेश्वरी]]></category>
		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[गुरु_शिष्य_परंपरा]]></category>
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		<category><![CDATA[शिक्षा_में_आनंद]]></category>
		<category><![CDATA[संतुलित_जीवनशैली]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>           &#8211; गोपाल माहेश्वरी स्मृति इन दिनों दसवीं बोर्ड की परीक्षा के लिए खूब परिश्रमपूर्वक पढ़ रही थी। उसने ठान लिया था कि इस बार उसे&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;">           &#8211; गोपाल माहेश्वरी</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone  wp-image-9181" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/01/phioto-1-300x231.jpg" alt="" width="1727" height="1330" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/01/phioto-1-300x231.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/01/phioto-1-768x590.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/01/phioto-1.jpg 1021w" sizes="auto, (max-width: 1727px) 100vw, 1727px" /></p>
<p style="text-align: justify;">स्मृति इन दिनों दसवीं बोर्ड की परीक्षा के लिए खूब परिश्रमपूर्वक पढ़ रही थी। उसने ठान लिया था कि इस बार उसे प्रावीण्य सूची में आना ही है, इसलिए अति आवश्यक कामों को छोड़कर वह पूरे समय अपनी पाठ्य-पुस्तकों में खोई रहती थी। पिताजी और माॅं दोनों ही उसे समझा चुके थे कि अति हर बात की बुरी होती है। इसलिए पढ़ाई से थोडा़ समय निकालकर कुछ योग-व्यायाम, खेलकूद भी कर लिया करो। लेकिन स्मृति को तो जैसे पुस्तकों की एक-एक पंक्ति रट लेने का भूत सवार था। कभी कभी वह बहुत निराश-सी होकर सिर पकड़े उदासी में डूब जाती। माॅं उसे ऐसे देखकर चिंतित हो उठती। रात को दो बजे हों या सुबह चार बजे का समय हो माॅं की नींद जब भी खुलती स्मृति या तो हाथों मैं पुस्तक लिए कमरे में चक्कर लगा रही होती या खुली पुस्तक पर सिर टिकाए अनजाने में ही सोई मिलती। माॅं उसे बिस्तर पर लेटाने या शाॅल ओढ़ाने का प्रयत्न करती तो वह चौंक कर जागती। कभी नहीं जाग पाती तो उठते ही माॅं पर खीज निकालती &#8220;मुझे ओढ़ाया क्यों? नींद लग गई न मेरी, मुझे पढ़ना था।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">माॅं समझातीं &#8220;स्मृति इस तरह तो तुम बीमार होकर रहोगी। परीक्षा-वरीक्षा सब धरी रह जाएगी।&#8221; लेकिन यह समझाइश बेकार ही जाती। जब कभी वह थोड़ा सोती तब भी कई बार नींद में पाठ्यक्रम की ही गड्डमड्ड सी बातें ही बड़बड़ाती रहती। जबसे पिताजी ने यह देखा वे बहुत चिंतित थे। इस तरह तो यह लड़की पागल हो जाएगी या गंभीर रूप से बीमार। लेकिन स्मृति को रोकना कठिन था फिर कोई माता पिता अपनी बेटी को पढ़ने से कैसे रोके?यह बुद्धि संकट भी था।</p>
<p style="text-align: justify;">किसी के सुझाव पर एक दिन परिवार ने एक स्थानीय पर्यटन स्थल पर जाने का कार्यक्रम बनाया लेकिन स्मृति ने जाने से मनाकर दिया। माॅं ने बताया कि स्मृति पिछले माह अपनी मौसी के बेटे के विवाह में भी नहीं गई थी और पिछले सप्ताह अपनी सहेली सरिता के जन्मदिन पर भी नहीं।</p>
<p style="text-align: justify;">चिंतित पिता ने अपने पिता से एक दिन यह बताया। गाॅंव में रहने वाले स्मृति के दादाजी वैद्य थे और संगीतमय भागवत कथा भी कहते थे। बेटे से स्मृति की स्थिति समझकर उन्होंने बेटे के पास शहर आने का निर्णय किया। माॅं ने जब स्मृति को सूचना दी तो यह नहीं बताया कि दादाजी आ रहे हैं उसे बताया कि गाॅंव से कोई मेहमान आ रहे हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">स्मृति भड़क उठी &#8220;परीक्षा के दिनों में कोई अपने घर मेहमान बुलाता है क्या?&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">माॅं ने मुस्कुराते हुए कहा &#8220;अब वे तो शाम तक आ ही रहे हैं।&#8221; स्मृति पैर पटकते हुए माॅं को अपने कमरे से धकेलते हुए बाहर करना चाहा।</p>
<p style="text-align: justify;">माॅं की हॅंसी फूट पड़ी &#8220;जाती हूॅं बाहर पर उनका बिस्तर तो इसी कमरे में लगाना होगा न? जरा किताबें जमा लो मैं कमरा ठीक-ठाक कर दूॅं।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;क्या?? वे रुकेंगे भी इसी कमरे में? आपकी मुझसे कोई दुश्मनी तो नहीं है फिर ऐसा क्यों?&#8221; स्मृति का पारा सातवें आसमान पर पहुॅंच गया था।</p>
<p style="text-align: justify;">माॅं के मुख पर आज एक विचित्र समाधान झलक रहा था। एक तो खीजने के बहाने ही सही स्मृति की गंभीरता का मानसिक आवरण टूटा था दूसरे उसे पूरा विश्वास था कि श्वसुर जी स्मृति समस्या सुलझाने में बहुत सफल होंगे ही।</p>
<p style="text-align: justify;">स्मृति बुरी तरह चिढ़ चुकी थी। उसने भी अपना ब्रह्मास्त्र चलाया। तुरन्त गाॅंव  पर दादाजी को फोन लगा दिया, वे परिवार के सर्वोच्च न्यायाधीश जो थे।</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;दादाजी! जय श्रीराम! मैं यहाॅं बहुत परेशान हूॅं, मेरी न पिताजी सुनते हैं न माॅं। कभी घूमने जाना है तो कभी शादी पार्टी में।आज तो मेरी पढ़ाई में विघ्न डालने मेहमान भी बुलाए जा रहे हैं। दादाजी!आप सुन रहे हैं न?&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;हाॅं सुन रहा हूॅं सुन रहा हूॅं&#8221; उधर से दादाजी की आवाज आई। &#8220;तो अब मैं क्या करूॅं?&#8221; स्मृति सचमुच परेशान थी। दादाजी ने कहा&#8221;यहाॅं गाॅंव आ जाओ। छुट्टियाॅं तो हैं हीं तुम्हारी।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;ओफ्फो! दादा जी आप भी क्या कह रहे है? अगले महिने परीक्षा है मेरी। अभी मेरी पढ़ाई के लिए छुट्टी है प्रिपरेशन लिव, न कि गर्मी की छुट्टी। इतनी किताबें कापियाॅं लेकर गाॅव कैसे आ जाऊॅं?&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;चलो फिर मैं ही आता हूॅं। ठीक है? पर घर में मेहमान आ रहे हैं ओ मैं कहाॅं रुकूॅंगा?&#8221; &#8220;मेरा कमरा है न? आप हमेशा वहीं रुकते तो हो फिर कोई और रुककर डिस्टर्ब करे उससे आपका रुकना मेरे लिए बहुत अच्छा होगा।आप जल्दी से जल्दी आ जाइए।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">माॅं दूध का गिलास लिए स्मृति के कमरे में आई तो स्मृति को कमरा व्यवस्थित करते देख चकित थी। उसके मुख पर अभी तनाव था न आक्रोश। उसने चुपचाप गिलास लिया और फूॅंक-फूॅंक पीने लगी। वह एक विजयी रहस्यभरी मुस्कान के साथ बोली &#8220;माॅं, आपके मेहमान अब यहाॅं नहीं रुकेंगे। यहाॅं मेरे दादाजी आ रहे हैं। &#8220;स्मृति को लगा माॅं चौंकेगी। लेकिन आलमारी के दर्पण में माॅं-बेटी के मुखपर एक जैसे भावभरी मुस्कान थी जिसका रहस्य स्मृति के लिए अधिक गहरा था।</p>
<p style="text-align: justify;">शाम को दादाजी आए माता-पिता के साथ दौड़कर उनका स्वागत किया माता-पिता ने चरणस्पर्श किए, स्मृति भी पैर छूनेलगी तो दादाजी ने बीच में ही थामकर अपने से चिपका लिया &#8220;अरे कन्या से पैर छुआ कर मुझे नर्क में जाना है क्या? &#8220;एक जोरदार आत्मीयता भरी मुक्त हॅंसी के साथ दादाजी ने घर में प्रवेश किया।</p>
<p style="text-align: justify;">रात को दस बजे दादा जी बोले &#8220;बिटिया हम बाहर जाकर सो रहे हैं यहाॅं तो रातभर बत्ती जलेगी हम सो न पाऍंगे।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">स्मृति एक पल सोच में पड़ी फिर बोली &#8220;नहीं आप कहीं न जाऍंगे।&#8221; उसे डर था दादा जी ने जगह खाली की तो जाने कोई और मेहमान न आ धमके यहाॅं? और पिछले कई दिनों से रात-रात भर जलने वाली ट्यूबलाइट को आज आराम मिला। आज स्मृति भी गहरी नींद सोई।</p>
<p style="text-align: justify;">सुबह छः बजे दादा जी बोले &#8220;बिटिया! थोड़ा घूम आऍं।&#8221; स्मृति ने किताबों की ओर देखा फिर एक अज्ञात से सम्मोहन में बॅंधी दादा जी के साथ चल पड़ी। दादा जी रह में अनेक वनस्पतियों का परिचय कराते बगीचे के अंदर स्थित देवालय में जा पहुॅंचे। सुबह की स्वच्छ वायु से स्मृति तरोताजा अनुभव कर रही थी।</p>
<p style="text-align: justify;">देवालय में आशनेक प्रतिमाऍं थीं। महर्षि वेदव्यास की भी  प्रतिमा लगी थी। दादा जी बोले &#8220;व्यास जी को विशाल बुद्धि कहा जाता है? वेदों के विभागकर्ता, अठारह पुराणों के, महाभारत के रचयिता, स्मृति ग्रन्थ के रचनाकार वेदव्यास जैसा विलक्षण ज्ञानी ,मेधावी भला संसार मैं कौन होगा? लाखों श्लोक रचे जिनमें संसार के लगभग समस्त विषय समाहित हुए।&#8221; दादा जी ने देखा स्मृति कुछ सोच रही है। दूसरी और लवकुश को पढ़ाते महर्षि वाल्मीकि की प्रतिमा थी।</p>
<p style="text-align: justify;">दादाजी बोले &#8220;अहो! कितने विलक्षण गुरु-शिष्य हुए हैं ये। चौबीस हजार श्लोकों की रामायण इन किशोर बालकों लवकुश ने न केवल कंठस्थ कर ली थी बल्कि राम दरबार में बिना भूले गाकर सुना भी दी।&#8221; स्मृति का आश्चर्य और गहरा गया। अंदर के कक्ष में कृष्ण-बलराम व सुदामा को पढ़ाते महर्षि सांदीपनि विराजमान थे। दादा जी बोले &#8220;केवल चौदह दिन में चौदह विद्याऍं और समस्त कलाऍं सीखनेवाले  विलक्षण विद्यार्थी श्रीकृष्ण हैं ये।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">वे मंदिर से निकल कर बाहर एक विशाल पीपल के चबूतरे  बैठ गए। स्मृति ने कहना आरंभ किया &#8220;मैं तो कितना भी रट्टा मारूॅं। एक प्रश्न का उत्तर याद करूॅं तो दूसरा भूल जाती हूॅं। कभी-कभी लगता है कि दिमाग की पटरी पर कई ट्रेनें एक साथ दौड़ रही हैं और मैं एक से दूसरी पर कूदती डिब्बे बदल रही हूॅं। उन पर सवार हूॅं पर कहाॅं जा रही हूॅं पता नहीं। न ट्रेनें रुकती हैं न मैं कहीं पहुॅंचती हूॅं।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;देखो बिटिया! तुम्हारी समस्या कुछ अलग है। तुम्हारी स्मरणक्षमता अच्छी है पर याद करने का तरीका ठीक नहीं। केवल रटना समस्याका हल ही नहीं है। विषय समझो, रटो मत। हम सैकड़ों किलो अनाज अब तक खा चुके होंगे पर एक दिन में नहीं, धीरे-धीरे पचाते हुए। एक दिन में इसका सौवां, हजारवां भाग भी खा लें तो बीमार हो जाऍं।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;फिर भी दादा जी! अच्छे अंक लाना है तो पढ़ना ही पड़ता है परीक्षा सिर पर है।&#8221; स्मृति की चिता स्वाभाविक थी।</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;परीक्षा है इसीलिए पढ़ना है तो तनाव बढ़ेगा ही, पढ़ना पड़ता है यह विवशता है और विवशता हमेशा बोझिल ही होती है क्योंकि काम शरीर का हो या बुद्धि का मन साथ न दे तो कई गुना कठिन हो जाता है।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;फिर कैसे करें?&#8221; स्मृति ने चिंतित होकर पूछा तो दादाजी बोले &#8220;जैसे लवकुश ने श्रीकृष्ण ने या वेदव्यास ने किया। देखा नहीं उनके मुख पर कैसी शांति, कैसा आनंद, होठों पर मुस्कराहट थी। अरे मनचाहा कुछ मिले तो आनंद होता है यह आनंद ही अमरत्व है विद्या अमृत है तो विद्या प्राप्ति आनंद देने वाली ही होगी। जिसे पाते हुए ही आनंद नष्ट होकर तनाव होता हो तो उसे पाकर आनंद कैसे मिलेगा?&#8221;</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone  wp-image-9182" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/01/Sacve-2-300x200.jpg" alt="" width="1706" height="1137" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/01/Sacve-2-300x200.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/01/Sacve-2-1024x683.jpg 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/01/Sacve-2-768x512.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2026/01/Sacve-2.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 1706px) 100vw, 1706px" /></p>
<p style="text-align: justify;">दादा जी ने बगीचे के बाहर एक फल वाले से ताजे अमरूद खरीदे और एक स्मृति को दिया दूसरा आप खाने लगे। स्मृति का अमरूद थोड़ा कम पका था दादा जी का पूरा पका नरम-सा। उन्होंने हथेली से दबाया और टुकड़ा कर खाने लगे। स्मृति ने दाॅंतों से काटने की कोशिश की उसके मसूड़े छिल गए। दादा जी ने कहा कच्चा है तब तक कठोर है उसे थोड़ा थोड़ा कुतरो पका होने पर अधिक भी एक साथ खा सकते हैं। ऐसा ही पढ़ाई में भी है। है न?&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">स्मृति ने स्वीकार सूचक सिर हिलाया फिर बोली &#8220;आप जिनकी बात कर रहे हैं वे कृष्ण जी भगवान थे व्यास जी महान ऋषि और लव-कुश भगवान राम के बेटे, उनसे हमारी क्या तुलना?&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;वे भगवान हों, ऋषि-मुनि या देवपुत्र लेकिन इसी भारत में जन्मे मानव थे।हम उनकी ही परंपरा में जन्मीं भारत संतानें हैं। उतना भी कर सकते हैं उतना नहीं तो अपनी आवश्यकता जितना तो कर ही सकते हैं। बस उस पद्धति को याद रखना होगा।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;और क्या पद्धति है वह?&#8221;अमरूद कुतरते हुए स्मृति उसके मीठे गूदे तक पहुॅंच चुकी थी, अब अमरूद आनंद दे रहा था।</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;इस सबने किताबी कीड़ा बनकर अध्ययन नहीं किया।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>आहार-विहार, योग, कला, प्रकृति का सान्निध्य, गुरुओं से मन लगाकर सीखकर, सीखा हुआ दुहराकर, साथियों से चर्चा कर उसे मांझकर, क्रिया करके, अनुभव करके वे यह सब आनंदपूर्वक कर सके, हम भी कर सकते हैं।&#8221;</strong></p>
<p style="text-align: justify;">स्मृति ने पूछा&#8221; यह सतयुग,त्रेता और द्वापर की बातें आज संभव हैं क्या?&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;तब से आज तक मनुष्य होना संभव है तो वैसा कर पाना भी संभव है। अभी पिछले दिनों बालक चाणक्य के बारे में सुना नहीं था, और अभी अभी वेदों का कठिन दण्डक्रम पारायण करने वाला युवा देवव्रत रेखे, इसी युग के हैं न। श्रीनिवास रामानुजम्, विवेकानंद, शंकराचार्य ऐसे अनेक विलक्षण मेधावी इसी युग में हुए हैं। हम महापुरुषों को चित्र और मूर्ति बनाकर स्थापित कर देते हैं लेकिन ऐसा करने का उद्देश्य भूल जाते हैं, उनके जैसे बनने का प्रयास करना, प्रेरित होना। सामान्य लोग और महापुरुष के बीच न लांघी जाने वाली काल्पनिक रेखा हमने ही बना ली है अन्यथा असंभव कुछ नहीं।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">वे घर की ओर चल दिए। सायं भोजन करते हुए बोले अभी रात्रि की बस से गाॅंव लौटना होगा। स्मृति से मिलना था लगता है उसमें थोड़ा मिला हूॅं। स्मृति मुस्कुरा दी। माता-पिता को कुछ कहना ही न पड़ा। स्मृति ने पूछा &#8220;माॅं!आपके मेहमान?</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;वे नहीं आऍंगे। &#8220;माॅं मुस्कुरा दी। पिताजी हॅंसे &#8220;वे दादाजी&#8230;&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;मुझे पता चल गया है पिताजी! आखिर आपकी ही बेटी हूॅं। वे दादाजी ही थे।&#8221; सबका सम्मिलित ठहाका गूॅंज उठा।</p>
<p style="text-align: justify;">स्मृति अब भी खूब पढ़ती है पर समय पर सोती है, जल्दी उठती है, समय पर भोजन सुबह घूमना और योगाभ्यास भी उसकी दिनचर्या में सम्मिलित है। माॅं प्रसन्न थी जब उसे हॅंसते ठहाके लगाते फोन सहेलियों से पढ़ाई की बातें करते सुना। स्मृति की पढ़ाई अब एक आनंद उत्सव में बदल चुकी थी।</p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक इंदौर से प्रकाशित ‘देवपुत्र’ बाल मासिक पत्रिका के संपादक है।)</p>
<p><strong>और पढ़ें : </strong></p>
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		<title>केसरिया सांझ</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 10 Dec 2025 06:26:30 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[कथा-कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[कथा/कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[गोपाल माहेश्वरी]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#8211; गोपाल माहेश्वरी श्याम आज विद्यालय से लौटते हुए बहुत ही उदास था। उसका मन ही नहीं हो रहा था कि वह घर लौटे। वह हनुमान मंदिर के सामने वाले&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;">&#8211; गोपाल माहेश्वरी</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone  wp-image-9144" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/12/PO-1-300x164.jpeg" alt="" width="1725" height="943" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/12/PO-1-300x164.jpeg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/12/PO-1-768x419.jpeg 768w" sizes="auto, (max-width: 1725px) 100vw, 1725px" /></p>
<p style="text-align: justify;">श्याम आज विद्यालय से लौटते हुए बहुत ही उदास था। उसका मन ही नहीं हो रहा था कि वह घर लौटे। वह हनुमान मंदिर के सामने वाले मैदान के किनारे पड़े एक पेड़ के कटे हुए सूखे तने पर बैठ गया। उसकी आँखों के सामने जैसे कोई फिल्म चल रही हो इस तरह अनेक दृश्य तैरने लगे। सामने के मैदान का सूनापन उसकी आँखों में पसरा पड़ा था।</p>
<p style="text-align: justify;">उसे याद आया कि आज कक्षा में उसके कुछ सहपाठी मध्यावकाश में कल रविवार को कहीं घूमने जाने की योजना बना रहे थे। अपने-अपने घरों से बना हुआ भोजन ले जाकर गाँव के तालाब के पास की अमराई में दिनभर खाते-खेलते बिताने की बातें हो रही थीं।</p>
<p style="text-align: justify;">श्याम का भी मन हुआ उनके साथ जा मिले और योजना में सम्मिलित हो जाए। वह सहजभाव से उनकी ओर बढ़ा। बच्चों की पीठ उसकी ओर थी इसलिए वे उसे देख नहीं पा रहे थे। थोड़ा पास पहुँचा तो उल्लास से वह उन्हें पुकारने ही वाला था कि उसे उनकी चर्चा में अपना नाम सुनाई दिया। वह ठिठक गया। कुछ वाक्य सुनते ही उसके पैर मानों जम से गए। चर्चा हो रही थी।</p>
<p style="text-align: justify;">“श्याम नहीं! उसके घर का खाना हम खाएंगे?” एक बोला।</p>
<p style="text-align: justify;">“मुझे तो उसके साथ देख भी लिया तो मेरे घर वाले ठंडे पानी से कपड़ों सहित नहलाए बिना घर में नहीं आने देंगे।” दूसरे ने कहा।</p>
<p style="text-align: justify;">“जानते हो उसके घर मरे हुए पशुओं का चमड़ा निकालने का काम होता था।” कहने वाले ने बनावटी उबकाई लेते हुए कहा।</p>
<p style="text-align: justify;">“लेकिन उसके पिता तो हमारे विद्यालय में ही शिक्षक हैं!” पहले ने कहा।</p>
<p style="text-align: justify;">“उससे क्या पर है तो वही?” तीसरे ने कहा।</p>
<p style="text-align: justify;">श्याम के पिता पिछले सप्ताह ही यहाँ स्थानांतरित होकर आए थे। स्वाभाविक ही था कि श्याम ने भी यहीं प्रवेश ले लिया। यद्यपि यह सही है कि उसके परिवार में पारंपरिक रूप से यह काम होता रहा है लेकिन पिता संघर्षरत रहते हुए खूब परिश्रम से पढ़-लिख कर शिक्षक बन गए तो अब वे पुराने दिन इतिहास बन गए। फिर यह भी तो कड़ुआ सच है कि चमड़े के चप्पल-जूते, बेल्ट-बटुए सबको चाहिए पर उन्हें बनाने वाले पसंद नहीं?</p>
<p style="text-align: justify;">वह पलट गया। संविधान में जातिगत भेदभाव करना अपराध है, लेकिन मन को तो संस्कार बदलते हैं कानून का उस पर बहुत वश नहीं चलता। शिकायत की जा सकती है। कानून सजा तक दे सकता है पर इससे हृदय में बैर ही पनपेगा, घृणा ही गहराएगी। तो क्या यह परिदृश्य कभी न बदलेगा? श्याम सोच रहा था।</p>
<p style="text-align: justify;">वह शोक भरे सोच की गहराइयों में खोया हुआ था कि विद्यालय के प्रधानाचार्य पाठक जी उधर से निकले। उन्होंने अपनी फटफटी रोकी और श्याम के कांधे पर हाथ रखते हुए पूछा “क्यों,श्याम! यहाँ अकेले कैसे बैठे हो?”</p>
<p style="text-align: justify;">श्याम सकपकाया। एकदम खड़े होकर हड़बड़ाते हुए बोला “नहीं कुछ नहीं। बस यों ही बैठा था।”</p>
<p style="text-align: justify;">पाठक जी बड़े अनुभवी प्रधानाचार्य थे, वे ऐसी कुछ नहीं को खूब समझते थे और उपचार भी बहुत अच्छे से जानते थे। बोले “कुछ नहीं कर रहे हो तो मेरे घर तक चलो, तुम्हारे पिताजी को पढ़ने के लिए एक पुस्तक देनी है।”</p>
<p style="text-align: justify;">श्याम क्या कहता? पर माथे पर चंदन का टीका लगाए, सिर पर चोंटी रखने वाले अपने प्रधानाचार्य की फटफटी पर पीछे बैठे अपने उन सहपाठियों के मोहल्ले से गुजरते हुए वह गर्व से भरा हुआ था। सहपाठियों ने उसे देख भी लिया। प्रधानाचार्य जी को नमस्ते कहते हुए वे श्याम को देखकर भौचक्के रह गए थे।</p>
<p style="text-align: justify;">पाठक जी ने घर पहुँचकर श्याम को एक पुस्तक दी ‘सामाजिक समरसता के दो डाक्टर: डाक्टर भीमराव आंबेडकर और डाक्टर केशवराव हेडगेवार ‘।</p>
<p style="text-align: justify;">“यह पुस्तक तुम्हारे पिताजी को दे देना।” फिर बोले “अच्छा तुम भी पढ़ोगे कुछ? लो यह मिठाई खाओ तब तक तुम्हारे लिए भी एक पुस्तक लाता हूँ।”</p>
<p style="text-align: justify;">मिठाई की प्लेट उसके सामने रखते हुए वे पुनः कमरे में अंदर चले गए। श्याम ने डरते हुए संकोच से मिठाई का एक टुकड़ा उठाकर कुतरा ही था कि पाठक जी की आवाज से डरकर उसे फिर प्लेट में रख दिया। पाठक जी अंदर से ही बोले थे “श्याम! अंदर ही चले आओ, मिठाई भी लेते आना।”</p>
<p style="text-align: justify;">श्याम अंदर पहुँचा। वह अनेक पुस्तकों से सजा पाठक जी का अध्ययन कक्ष था। संकेत पाकर श्याम बैठ गया। पाठक जी ने एक टुकड़ा मिठाई उसी की प्लेट से उठाई। श्याम अचरज में पड़ गया। पाठक जी ने दो छोटी-छोटी पुस्तकें दी एक का शीर्षक था ‘बालासाहब देवरस के जीवन प्रसंग’, दूसरी पुस्तक भी प्रेरक प्रसंगों की ही थी। श्याम ने पुस्तकें ले कर अपने बस्ते में रख लीं।</p>
<p style="text-align: justify;">पाठक जी बोले “पढ़कर लौटा देना? किसी और के भी काम आ जाएगी।” उसी समय पाठक जी का बेटा प्रशांत आ गया। वह श्याम से एक कक्षा आगे था।</p>
<p style="text-align: justify;">श्याम को देखकर उसने प्रसन्नता से स्वागत किया। “अरे श्याम! कैसे हो? अभी तो विद्यालय में नयापन लगता होगा? अधिक मित्र भी न बने होंगे?” उसने मिठाई की प्लेट से वही टुकड़ा उठा लिया जिसने श्याम ने थोड़ा सा कुतर कर रख दिया था। मित्र बनने की बात पर श्याम वैसे ही आज की घटना से असहज था कि प्रशांत को वह टुकड़ा मुंह तक ले जाते देख उसने घबराकर उसका हाथ पकड़ लिया “वह नहीं दूसरा टुकड़ा खा लो।”</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-9140" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/12/525252-300x150.jpg" alt="" width="1728" height="864" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/12/525252-300x150.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/12/525252-768x384.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/12/525252.jpg 860w" sizes="auto, (max-width: 1728px) 100vw, 1728px" /></p>
<p style="text-align: justify;">प्रशांत समझा नहीं पर सहज हास्य करते हुए बोला “क्यों यह तुम खाओगे? खालो।” उसने वह टुकड़ा श्याम के मुंह में डाला और उसी से बचाकर आधा टुकड़ा अपने मुंह में डालते हुए अपना वाक्य पूरा किया “पर अकेले नहीं बांटकर खाएंगे।”</p>
<p style="text-align: justify;">श्याम के लिए यह व्यवहार कल्पनातीत था।</p>
<p style="text-align: justify;">प्रशांत ने पूछा “कल क्या कर रहे हो श्याम?”</p>
<p style="text-align: justify;">“कुछ खास नहीं।” श्याम बोला।</p>
<p style="text-align: justify;">“कल घर में जो भी भोजन बना हो टिफिन में लेकर नौ बजे हनुमान मंदिर के सामने आ जाना चार बजे तक लौटेंगे। घर पर बता देना।”</p>
<p style="text-align: justify;">“क्यों? कहीं जाना है?” श्याम ने पूछा।</p>
<p style="text-align: justify;">प्रशांत हँसा “ यह रहस्य है कल ही पता चलेगा कहाँ जाएंगे?”</p>
<p style="text-align: justify;">प्रशांत की बहिन मुक्ता अंदर से आते हुए बोली “भैया! श्याम नया नया है। बता क्यों नहीं देते कि कल आपकी बाल शाखा का वनसंचार है?”</p>
<p style="text-align: justify;">“शाखा क्या?” श्याम उत्साहित था।</p>
<p style="text-align: justify;">“चलो बताता हूँ।” प्रशांत ने कहा। वे श्याम के घर उसका बस्ता रखते हुए पहुँचे। बिना किसी भेदभाव के पन्द्रह बीस बच्चे हनुमान मंदिर के मैदान में मस्त होकर खेल रहे थे। प्रशांत के बताए अनुसार श्याम ने भगवा ध्वज को ध्वज प्रणाम किया। लेकिन एक घंटे खेलकूद, व्यायाम, गीत, कहानी में रहकर प्रार्थना के समय पुनः ध्वज प्रणाम किया तो उसकी श्रद्धा कई गुना बढ़ चुकी थी। उसे लगा समाज में इतने अच्छे लोग भी हैं जिनके लिए सब बहुत अपने हैं। जिनके मन में भेदभाव की काली छाया का अंश मात्र भी नहीं है। घर लौटते हुए श्याम के रास्ते में समरसता का केसरिया प्रकाश ही प्रकाश फैला हुआ था। उस शाम उसे अपने जीवन में एक नया सूरज ऊगता प्रतीत हो रहा था।</p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक इंदौर से प्रकाशित ‘देवपुत्र’ बाल मासिक पत्रिका के संपादक है।)</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>और पढ़ें :</strong> <span style="color: #0000ff;"><strong><a style="color: #0000ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/the-story-of-syama-kakis-teej-hun/" target="_blank" rel="noopener">स्यामा काकी की तीज की कथा – हूँ…</a></strong></span></p>
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		<title>स्यामा काकी की तीज की कथा &#8211; हूँ&#8230;</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 10 Nov 2025 05:35:21 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[कथा-कहानी]]></category>
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		<category><![CDATA[स्यामा काकी की तीज की कथा]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#8211; किसलय पंचोली आज सांगली गांव की पुरखन श्यामा बाई चौधरी को जरा फुर्सत नहीं है। भला हो भी कैसे? वे पूरे गांव में, मतलब जहां प्रधानमंत्री सड़क योजना की&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;">&#8211; किसलय पंचोली</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-9084" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/11/7896-300x169.jpg" alt="" width="1539" height="867" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/11/7896-300x169.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/11/7896-768x432.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/11/7896.jpg 800w" sizes="auto, (max-width: 1539px) 100vw, 1539px" /></p>
<p style="text-align: justify;">आज सांगली गांव की पुरखन श्यामा बाई चौधरी को जरा फुर्सत नहीं है। भला हो भी कैसे? वे पूरे गांव में, मतलब जहां प्रधानमंत्री सड़क योजना की पतली सड़क, कीकर के दो जुड़वां पेड़ों तले, सुतारी मोहल्ले आ सांस लेती है, से दूर दूसरे छोर पर बसी हरिजन बस्ती पारकर सांस छोड़ती है, वहां तलक उन्हें एक सुर में स्यामा काकी पुकारा जाता है। कौन स्यामा काकी? वही तीज वाली स्यामा काकी! वे साल-दर-साल राखी के तुरंत बाद आने वाली, भादो मास की कृष्ण पक्ष की तृतीया के दिन सातुड़ी तीज की पूजा जो करवाती हैं। और चांद निकलने पर उसकी कथा वार्ता भी सुनाती हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">वही सातुड़ी तीज, जिसे नीमड़ी तीज, कजरी तीज या बड़ी तीज भी कहा जाता है। इसके महती पूजन के लिए शाम घिरते ही गांव के बम्मन और माहेश्वरी समाज की, तीज का व्रत रखने वाली, सभी बहू बेटियां यानि तत्संबंधित परिवारों की तमाम महिलाएं एक-एक कर उनके घर इकठ्ठा होने लगी हैं। यह कोई छोटी नहीं, बहुत बड़ी जिम्मेदारी है। और जिम्मेदारी से भी बढ़कर सम्मान की बात है। मानदार जिम्मेदारी का भाव उनसे सब काम करवा ले रहा है।<br />
आज सुबह से ही श्यामा काकी काम के चलते अपने घुटनों का दर्द पूरी तरह भुला बैठी हैं। अन्यथा ‘ओ बाई म्हारा गोडा भोत दुखे हो’ कहते-कहते ही उनका हर दिन बीतता है। आज वे जब मुंह अंधेरे नहाने के तुरंत बाद, अल सुबह ही दीवाल पर नीमड़ी माता मांडने चलीं तो उनके पति काका साहब ने कहा ‘इना साल माता कोई सुहागन मांड दे तो अच्छो। तू थकी जाएगी।’ पर यह खासम-खास काम उन्होंने अभी तक किसी को नहीं दिया है। सो खुद ने ही माता उकेरी। हालांकि उन्हें लगा उम्र के साथ उनके हाथ अब कुछ कांपने लगे थे सो माता कुछ अजीब-सी बन गई। पर उनमें उसे दुरुस्त करने की हिम्म्मत नहीं बची। उकडू बैठ कर माता मांडने में कमर जो जवाब दे गई। उन्होंने जैसी बनी उसी में तसल्ली कर ली। ‘हो अच्छी मंडी हे। हंसमुख मुंडा वाली म्हारी कजरी माता।’</p>
<p style="text-align: justify;">कमर सीधी कर उन्होंने जेठानी की बहू क्षमता की मदद से और जरूरी तैयारियां कर लीं। मसलन हलवाइयों के काम वाली, बाहर से टोचेदार और अंदर से कलाई की हुई, पीतल की बड़ी-सी परात राख से मंजवा, चमकवा दी। उसके आधे हिस्से में बारीक छनी हुई भीगी काली मिट्टी थिपवा दी। और बचे आधे हिस्से में कच्चा दूध और शुद्ध जल भरवाकर तलैया बनवा दी। थेपी हुई मिट्टी में नीम की एक डगाल भी अच्छे से दबाकर खुंसवा दी। ताकि पूजा के समय वह गिर न पड़े। पीतल का दीपक पीतांबरी से रगड़वाकर झकास साफ कर जलवा दिया। चमचमाते तांबे के लोटे में पानी भरकर रख लिया। एक धामें में पूजा उपरांत प्रसाद में बंटने वाले बताशे भी सहेज लिए कि ‘आखिरी आज हेला नी पाड़णो पड़े’। पूजा के लिए इस हिदायत के साथ के ‘तोड़ता बखत सुंघनो नी हे’, गेंदे और गुड़हल के फूल चुनवा और गीले टाट में लिपटवा के धर लिए।</p>
<p style="text-align: justify;">धीरे-धीरे पूजा स्थल के आस-पास, सिर पर पल्ला संभालती-न-संभालती स्त्रियां, आ-आकर बैठने लगीं।<br />
अपनी-अपनी जान और समझ-बूझ अनुसार गोटा किनारी की साड़ी या लुगड़े में सजी-संवरी विभिन्न वय स्त्रियां। धीरे-धीरे डोलती वृद्धाएं। थुलथुल अधेड़ औरतें। यौवन से जाने-अनजाने अनभिज्ञयता दिखातीं युवा स्त्रियां। सुंदर कमसिन तरुणियां और कलियों-सी खिलती किशोरियां सभी। अभिवादनों का आदान-प्रदान होने लगा। ‘वा कसी हे तू?’ ‘कई दिना में दिखी हो’। श्यामा ने सभी का हँस-हँसकर स्वागत किया। सोचा कितरा ई ऑइल पेंट की निसानी पैंदा में पाड़ि दो। गिलास उन तो अदली बदली जाए ही। ने फेर इतनी ओरतां वास्ते पुराए थोड़ी। सो उन्होंने क्षमता को स्टील के दो तीन प्रकार के गिलासों में पानी पिलवा देना इसकी अनुमति दे दी और कांच के गिलास न निकालने की ताकीद भी।</p>
<p style="text-align: justify;">सब को जहां जगह मिली वहां बैठ जाने के बाद श्यामा ने माता की विधि-विधान अनुसार पूजा शुरू की। सबसे पहले जल के छींटे दे माता को प्रतीकात्मक स्नान करवाया। सामान्य पूजा-सामग्री जैसे कंकू, चावल और इस पूजा के लिए अनिवार्य पूजा-सामग्री जैसे सत्तू, नाड़ा, ककड़ी आदि से पूजा की गई। परात में बनी तलैया के किनारे इस तरह दीपक जलाया कि उसकी परछाई तलई में दिखे।</p>
<p style="text-align: justify;">फिर श्यामा ने सभी को परात की तलई के धुंधले दुधिया पानी में समीप कुछ उंचाई पर एक तसलेनुमा बर्तन में ऊपर तक भरे सत्तू के लड्डूओं की परछाईं देखने को कहा। बारी-बारी से सभी औरतों द्वारा परछाइयां बाकायदा देखी दिखाई गईं। दीपक के मद्धिम प्रकाश में कोण बदल-बदलकर, झुक-झुकाकर ‘हां दिख री हे।’ ‘म्हारे बी दिखी गी।’ ‘हो दनाक दिनी से दिख गई।’ आदि कहा गया। किसी ने यह नहीं कहा कि ‘काकी, म्हारे नी दिखी परछाईं।’ कोई कहती भी कैसे? उसकी भद्द न उड़ जाती? वह हँसी की पात्र बन जाती। ऐसा माना जाता है कि ‘जिसे जितनी साफ परछाई दिखे, उसका सुहाग उतनी लंबी उम्र पाए।’ सबने देखा-देखी में ‘हां’- ‘हां’ भर दी। कोई अपने पति की उम्र कम थोड़ी चाहेगी!<br />
इसके बाद श्यामा ने सभी व्रतधारी महिलाओं से गोबर से लिपी और फिर चूने से पुती सूखी दीवाल पर अनामिका उंगली से गीले कंकू, हल्दी, मेहंदी, और काजल की 16,16 टिपकियां लगवाईं। दीवाल के उस हिस्से में क्रमशः लाल, पीले, हरे और काले रंगों की बुंदकियों का कोलाज-सा रच गया। रंग और उनका क्रम बेहतरीन संयोजन बना रहा था। यह अलग बात है कि किसी की बुंदकियों की साइज छोटी थी। किसी की बुंदकियों के बीच की दूरी कम ज्यादा थी। किसी की पंक्तियां सीधान में थीं। किसी की तिरछी जा रही थीं। किसी ने हौले से हल्की बुंदकी लगाई। किसी ने जोर से दबाकर गाढ़ी नीचे लरकती। हां, पर आस्था के घोलक की सांद्रता सबकी बुंदकियों में एक-सी भरपूर थी।<br />
चांद निकलने पर श्यामा कथा सुनाने जा ही रही थी कि शहर में रहने और नौकरी करने वाली, पीठ पर पिठू बैग टांगे, लगभग भागते हुए भतीजी पुष्पा का आना हुआ। उसने आते ही नाराजगी से कहा- ‘सामू काकी, फोन किया था न मैं आ रही हूं। क्या थोड़ा रुक नी सकती थी? पूरे 10 साल बाद मैं सातुड़ी तीज पर मायके आई हूं और मेरे आए बिना आपने पूजा शुरू करवा दी।’</p>
<p style="text-align: justify;">‘अब बेटी, ये सब जनी खोटी हो रई थीं। क्या करती? तू भी आ जा। आज काले पूजा ने वारता के लिए दो दफे कोई नि आए। एक ही बारी आए हे सब जनी। पहले तू जल्दी से पूजा कर ले। टिपकी दे दे। ने परछाई देख ले। फिर ही वारता सुनाउंगी। बस सुरु करने वाली थी अभी।’ काकी ने कहा।</p>
<p style="text-align: justify;">पुष्पा ने फटाफट सब कुछ कर लिया और सब तरफ नजरें दौड़ा फिर पूछने लगी- ‘पहले मुझे यह बताओ&#8230; काकी, अपने यहां सातुड़ी तीज पर खड़े नीम की पूजा होती थी। और अब यह खाली माली डगाल क्यों पूजा में रखी है? नीम का वह लहलहाता पेड़ कहां गया?’</p>
<p style="text-align: justify;">‘अरे बिटिया, उसे पिछले साल ही काटना पड़ा।’ काकी ने पल्ला ठीक करते हुए भारी उदास और रुंधे स्वर में उत्तर दिया।</p>
<p style="text-align: justify;">‘क्या? हरा भरा इतना पुराना पेड़ काट दिया? और आपने काकी कटने दिया? मैं पूछती हूँ क्यों?’<br />
‘उसके होने से कितनी ठंडी हवा रहती थी।’ उस पर चिड़ियाएं चहकती थीं। गिलहरियां फुदकती थीं। उसके हरे कच्च पत्ते कितनी खूबसूरती से सरसराते थे। हम उसकी मोटी-मोटी शाखाओं पर डले रस्सी वाले झूले झूलते थे। ऊंची-ऊंची पींगे भरते थे। उसके नीचे खटिया बिछा बाबा सुस्ताते थे। आप ही ने बताया था पीढ़ियों से सातुड़ी तीज पर उसे ही पूजा जाता रहा है। फिर कटवाने का पाप क्यों सिर लिया? पुष्पा ने नीम के पेड़ से जुड़ी यादों, बातों का जीवंत चित्र खींचते हुए काकी को आड़े हाथों लिया।</p>
<p style="text-align: justify;">‘मैं एकली करती तो कई करती? काका को एक बड़ा कमरा और निकालना था बेटी। भंडार छोटो पड़तो थो। काम चला तो किराए की एक खोली भी निकाल दी। चार पइसा मिल जाएगा। और जगह कहां थी कि कमरा बन सके।’ काकी ने अपनी असहाय स्थिति बयां कर दी।</p>
<p style="text-align: justify;">‘काकी, मुझे यह पूजा, पूजा ही नहीं लग रही। बाहर नीम के पेड़ की पूजा, पूजा लगती थी।’ पुष्पा ने रुंआसे स्वर से कहा।</p>
<p style="text-align: justify;">‘सच्ची छोरी तूने की तो म्हारा दिल की वात है। यह पूजा खाली माली पूजा को ढोंग लगे हे। पूजा इसी घर में होना थी। सो यो रास्तो निकालयो के खड़ा नीम नौ तो उकी डगाल ही पूज लां। पीढ़ियां हुई गी इना घर सेज सगला गांव की तीज पुजाए।’ भी पूजा जिसकी परंपरा चली आ रही हो, कभी-ना-कभी, किसी-न-किसी इंसान ने ही तो शुरू की होगी ना?’ ‘हां, या बात तो हे।’</p>
<p style="text-align: justify;">उसने काकी को कुछ सलाह दी। जिसे सुन उन्होंने खुश से हां में गर्दन हिलाई। और कहने लगीं ‘हो म्हारे कई दिक्कत नी। ऐसो के दूंगी।’ और बाहर आकर अपनी चिर परिचित शैली में लगी कथा सुनाने।</p>
<p style="text-align: justify;">‘मुं कथा सुनाऊं नीमड़ी माता री। बरोबर हुंकारों भर जो सब जनी हां।’ ‘हां, काकी सुनाओ तम। हम भरांगा हुंकारा।’ ‘नई वारता सुनाऊं इना साल। पार साल से फरक। ध्यान से सुन जो हो छोरी हुन।’</p>
<p style="text-align: justify;">‘हूं काकी।’ ‘एक गांव-मा सातुड़ी तीज रो त्योहार आयो।’</p>
<p style="text-align: justify;">‘हूं..।’<br />
‘उना दिन नीमड़ी माता री पूजा होनी थी।’</p>
<p style="text-align: justify;">‘भरो हुंकारों। इतनी जनी बठी हो&#8230; ने मने लोटो टन टनानो पड़ी रियो हे।’</p>
<p style="text-align: justify;">‘हूं..हां।’</p>
<p style="text-align: justify;">‘फेर सुरु से सुनाऊं। एक बार की वात है। आपनो सांगली गांव जैसो एक चोखो गांव थो। उना गांव में सातुड़ी तीज को त्यौहार आयो।’</p>
<p style="text-align: justify;">‘हूं..।’</p>
<p style="text-align: justify;">‘वां एक बामणी का घर मा नीम को पेड़ होतो थो। पूजा होती थी। एक साल उ नीम को पेड़ कटी गयो। कोई बूढ़ी डोकरी ने रस्तो सुझायो के ‘नीम को पेड़ नी। वा जद। कोई वात नी। दूसरा नीम का पेड़ की डगाल खोंसी ने पूजा करी लो।’ उना साल विपत्ति तो आई पन थोड़ी घणी।’</p>
<p style="text-align: justify;">‘हूं..।’</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-9085" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/11/12662-kajari-teej-300x185.jpg" alt="" width="1725" height="1064" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/11/12662-kajari-teej-300x185.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/11/12662-kajari-teej-1024x631.jpg 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/11/12662-kajari-teej-768x474.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/11/12662-kajari-teej.jpg 1200w" sizes="auto, (max-width: 1725px) 100vw, 1725px" /></p>
<p style="text-align: justify;">‘फेर एक साल बित्यो। ने सातुड़ी तीज पड़ी। पुष्पा ने न जाने क्या सोचा। वह काकी को अंदर ओसारे में ले गई। और उनसे कहने लगी- ‘काकी, कोई दुसरो पेड़ भी कटी गयो सो कनी कारण डगाल भी नी वीणा मिली। तो कोई ने कियो ऐसा करो दूसरा गांव से खाली पांच पत्ता ले आओ ने रखी लो। ने पूजा करी लो। अबकी बारी जास्ती आपदा आई।’<br />
‘हूं..।’</p>
<p style="text-align: justify;">‘एक और साल बीती गयो। बामनी के सातुड़ी तीज पेला वाली रात के नीमड़ी माता सपना में आई ने वा उसे केवा लागी &#8211; ‘ऐसा है या कथा वारता सुननो, ने हुंकारों भरनो, पूजा पाठ करनो, ने व्रत उपवास रखनो नी रखनो, अपनी जगो जो भी है अच्छी वात है।’</p>
<p style="text-align: justify;">‘हूं..।’</p>
<p style="text-align: justify;">‘हूं&#8230;।’</p>
<p style="text-align: justify;">‘के कुंवारी कन्या इके सींचे&#8230;?</p>
<p style="text-align: justify;">‘हूं&#8230;।’</p>
<p style="text-align: justify;">‘तो सुहागन को सुहाग बन्यो रेवे..’</p>
<p style="text-align: justify;">‘हूं&#8230;।’</p>
<p style="text-align: justify;">‘ने कन्या के अच्छो घर वर मिले&#8230;’</p>
<p style="text-align: justify;">‘काकी आप भेद-भाव करती हो। मैं पिछले साल ही आपसे कह रही थी नीम का पेड़ कट गया है तो क्यों न हम नीम के रोपों की पूजाकर उन्हे रोप दें। इस बार पुष्पा दीदी ने कहा तो आपने मान लिया। है ना?’ क्षमता ‘पण तू अब की बारी सातुड़ी तीज पर नीमड़ी भाभी तनिक नाराजगी से बोल पड़ी।</p>
<p style="text-align: justify;">माता की कथा में या वात जोड़&#8230;’</p>
<p style="text-align: justify;">‘कसी वात काकी?’</p>
<p style="text-align: justify;">‘कई कियो नीमड़ी माता ने?’</p>
<p style="text-align: justify;">‘सवाल नी पूछे। बस हुंकारों भरो जाए कथा मा।’</p>
<p style="text-align: justify;">‘हूं..।’</p>
<p style="text-align: justify;">‘नीमड़ी माता ने कियो के जो सुहागन सातुड़ी तीज का दिन नीम का पौधा रोपे&#8230;’</p>
<p style="text-align: justify;">लाज से दोहरी हो गईं। उनके बूढ़े कपोलों पे बला की लाली छा गई। और सब औरतें खिल-खिलाकर हँस पड़ी।</p>
<p style="text-align: justify;">(साभार वीणा पत्रिका)</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>और पढ़ें : <span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/mothers-lap/" target="_blank" rel="noopener">माँ का आँचल</a></span></strong></p>
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		<title>माँ का आँचल</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 21 Sep 2025 02:54:05 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[कथा-कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[कथा/कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[गोपाल माहेश्वरी]]></category>
		<category><![CDATA[Bhartiya Education]]></category>
		<category><![CDATA[bhartiya shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[IKS]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[भारतीय ज्ञान परम्परा]]></category>
		<category><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#8211; गोपाल माहेश्वरी देव आज शाला से थोड़ा विलंब से ही घर पहुँचा था। उसे जोरों की भूख लगी थी। घर में घुसते ही वह चौंका। वहाँ लगे दर्पण के&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;">&#8211; गोपाल माहेश्वरी</p>
<p style="text-align: justify;">देव आज शाला से थोड़ा विलंब से ही घर पहुँचा था। उसे जोरों की भूख लगी थी। घर में घुसते ही वह चौंका। वहाँ लगे दर्पण के सामने कोई महिला जींस-टॉप पहने खड़ी थी। दरवाजे की ओर पीठ होने से वह समझ न पाया कि यह आखिर है कौन? एक पल को तो लगा वह किसी दूसरे के घर में तो नहीं आ गया है! पर नहीं घर उसी का था, सब चीजें उसकी जानी-पहचानी। उसे शंका हुई यह कोई मेहमान है या वैसे ही कोई घर में घुस तो नहीं आया?</p>
<p style="text-align: justify;">देव के आने की आहट से भी जब वह नहीं पलटी तो वह थोड़ा डर-सा गया। &#8220;माँ-माँ&#8221; पुकारते हुए अंदर का कमरा लाँघ कर रसोई तक देख आया। माँ कहीं नहीं थी। वह घबराकर बाहर लौटा अब उसे दो चिंताऍं सता रही थीं पहली यह महिला कौन है? दूसरी घर खुला पड़ा है और माँ कहाँ है?</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;माँऽऽ&#8221; देव लगभग चीख पड़ा उसका स्वर रुंआसा हो चला था। वह बैठक तक दौड़ा आया तो वह महिला खिलखिला पड़ी। पहले पल देव और डर गया पर अगले ही पल चौंका, यह तो माँ की ही हँसी थी। वह महिला पलटी तो माँ को पहचान कर भी आश्चर्य में पड़े देव से रहा न गया। दौड़कर माँ से लिपट गया और माँ पर मुट्ठियाँ बरसाने लगा।&#8221; ये क्या है माँ! ये क्या पहना है आपने?&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;क्यों, यह पहनने से मैं तेरी माँ नहीं रही क्या?&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;माँ हो, पर इस वेश में मेरी माँ जैसी नहीं लगतीं।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;क्यों? नया जमाना है हमें कुछ नया करना चाहिए न?&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;ऐसा नया!! हमेशा सुंदर सुंदर साड़ी में देखा है मैंने आपको बचपन से, भला ये जीन्स टॉप पहने आप माँ होकर भी मेरी माँ जैसी तो नहीं लगोगी न?&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;अच्छा!! ऐसा है क्या? अरे, जरा मेरा मोबाइल फोन तो लाना।&#8221; देव ने मेज पर रखा मोबाइल उठाया। माँ ने उस पर वाट्सएप खोलकर देव का शाला से भेजा गया उसी का संदेश दिखाया &#8216;Maa mai aaj thodi der se aaunga.&#8217; &#8220;पढो इसे।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">देव ने पढ़ा &#8220;माँ मैं आज देर से आऊंगा। ठीक तो है?&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;यह किस भाषा में है देव!&#8221; माँ ने पूछा।</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;हिन्दी में&#8221; देव ने कंधे उचका दिए।</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;ये कौनसी हिन्दी है? हमने तो हिन्दी में ये एम ए ए, माँ कभी नहीं पढ़े।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;अरे माँ! वो हिन्दी में टाइप करने में कठिनाई होती है, रोमन लिपि में मात्राओं का झंझट नहीं है। हिन्दी में अक्षर भी बहुत और मात्राएँ भी अलग अलग। कोई ऊपर कोई नीचे कोई आगे कोई पीछे। अंग्रेजी सही है। इसलिए आजकल सब ऐसे ही लिखते हैं।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;तो अंग्रेजी में लिखो।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;वो अपनी भाषा थोड़े ही है, सब बात अंग्रेजी में करना न हमारे मुंह में न दिमाग में और न ही मन में सुहाती है। अंग्रेजी बोलना सरल है पर अंग्रेजी में सोचना &#8230;कठिन है माँ!&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;बेटा! मुझे भी इतनी घुमावदार लंबी-चौड़ी साड़ी पहनने में कठिनाई होती है रे! इसलिए ये जींस टॉप सही है। नए लोग इसीलिए तो पहनते हैं इन्हें।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">अब देव को सारा नाटक समझ आ गया था। वह सिर झुकाए सोचने लगा। जैसे उसे अपनी माँ अपने स्वाभाविक वेश में ही अच्छी लगती है हिन्दी भाषा भी देवनागरी में ही अपनी लगती है। हिन्दी को रोमन में लिखना माँ को साड़ी की जगह जींस-टॉप पहनाने जैसा ही है। उसे विश्वास था माँ साड़ी जितनी सरलता और शीघ्रता से पहन सकती है जींस-टॉप नहीं।</p>
<p style="text-align: justify;">देव के सारे संशय मिट गए थे और एक निश्चय जन्म ले चुका था उसने सिर उठाया तब तक तो माँ सामने साड़ी पहने मुस्कराती खड़ी थीं। वह दौड़कर माँ से लिपट गया। साड़ी का पल्लू ममता का आँचल बन उसके मस्तक पर छा गया था।</p>
<p style="text-align: justify;"><span style="color: #ff0000;"><strong>और पढ़े :</strong></span> <span style="color: #0000ff;"><strong><a style="color: #0000ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/raksha-sutra/" target="_blank" rel="noopener">रक्षा सूत्र</a></strong></span></p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक इंदौर से प्रकाशित ‘देवपुत्र’ बाल मासिक पत्रिका के कार्यकारी संपादक है।)</p>
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		<title>पानी पूरी का ठेला</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 17 Aug 2025 02:23:56 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[कथा-कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[कथा/कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[कहानी@पंच परिवर्तन]]></category>
		<category><![CDATA[श्री रवि कुमार जी]]></category>
		<category><![CDATA[IKS]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[पंच परिवर्तन]]></category>
		<category><![CDATA[पर्यावरण संरक्षण]]></category>
		<category><![CDATA[भारतीय ज्ञान परम्परा]]></category>
		<category><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#8211; रवि कुमार ‘पानी पूरी’ नाम सुनते ही मुंह में पानी आ जाता है। मारवाड़ के एक नगर के मोहल्ले के नुक्कड़ पर पानी पूरी का ठेला लगता है। मोहल्ले&#8230; </p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;">&#8211; रवि कुमार</p>
<p style="text-align: justify;">‘पानी पूरी’ नाम सुनते ही मुंह में पानी आ जाता है। मारवाड़ के एक नगर के मोहल्ले के नुक्कड़ पर पानी पूरी का ठेला लगता है। मोहल्ले के सब लोग बच्चे-बड़े-जवान, महिला-पुरुष अपनी इच्छानुसार उस ठेले से पानी पूरी खाते हैं। पानी पूरी स्वादयुक्त होने के कारण नियमित रूप से बिक्री बढ़ ही रही है। अब आसपास के मोहल्ले के लोग भी आने लगे हैं। अलग-अलग स्थानों पर पानी पूरी को गोल-गप्पे, पानी-पतासे आदि भी कहते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">एक दिन 12 वर्ष की कोमल ठेले के पास आकर खड़ी होती है। ठेले का निरीक्षण करती है और चली जाती है। ठेले वाले का विशेष ध्यान उसकी ओर नहीं जाता। ऐसा सामान्यतः नहीं होता कि ठेले वाले का अपने ग्राहक की ओर ध्यान न जाए।</p>
<p style="text-align: justify;">कोमल अगले दिन, और उससे अगले दिन भी यही करती है और बिना पानी पूरी खाए चली जाती है। पहले दिन भीड़ अधिक थी, अगले दो दिन सामान्य भीड़ थी तो ठेले वाले का ध्यान कोमल की ओर गया। उसके मन में कुछ प्रश्न उठने लगे कि कोमल ऐसा क्यों कर रही है। पूर्व में तो ऐसा किसी व्यक्ति ने नहीं किया। फिर कोमल क्या व क्यों ऐसा कर रही है। अपनी जिज्ञासा शान्त करने के लिए ठेले वाला कोमल की प्रतीक्षा करता है। चौथे दिन कोमल ठेले पर नहीं आती। तब यह जिज्ञासा और बढ़ जाती है। फिर कोमल के आने की प्रतीक्षा&#8230;</p>
<p style="text-align: justify;">पांचवें दिन जैसे ही कोमल ठेले पर आती है तो ठेले वाला तुरन्त प्रश्न पूछ लेता है, &#8220;कोमल! तुम आती हो और बिना पानी पूरी खाए ही चली जाती हो। ऐसा क्यों?&#8221; ‘ऐसा क्यों?’ में मानो बहुत प्रश्न ठेले वाले ने कोमल की ओर बढ़ा दिए हो।</p>
<p style="text-align: justify;">कोमल कुछ कहती नहीं। पुनः निरीक्षण कर चली जाती है। अब जिज्ञासा अपने चरम पर..कल फिर पूछुंगा यह सोचकर ठेले वाला शेष ग्राहकों को पानी पूरी खिलाने लग जाता है।</p>
<p style="text-align: justify;">छठवें दिन, कोमल के आने की प्रतीक्षा..। आज वह प्रतिदिन की बजाय थोड़ी देरी से आई। तब तक ग्राहक बहुत कम हो गए थे। ठेले वाले ने तुरन्त कोमल से पूछा &#8220;मेरे कल के प्रश्न पर तुम कुछ बोली नहीं।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">कोमल चुप्पी तोड़ती है और कहती है- &#8220;भैया, आपके ठेले पर पहले स्टील की कटोरी में पानी पूरी खिलाते थे। अब डिस्पोजल में क्यों खिलाते है।&#8221; 12 वर्ष की कोमल का यह मात्र प्रश्न नहीं था, बल्कि आज के समाज की वस्तु स्थिति है कि सब ओर डिस्पोजल का ही बोलबाला है।</p>
<p style="text-align: justify;">एक ग्राहक तुरन्त बोला &#8220;आजकल तो सब जगह डिस्पोजल ही चलते हैं।&#8221; ठेले वाले ने उसकी हाँ में अपने स्वर में हाँ मिलाया। फिर कहा- &#8220;स्टील की कटोरी धोने की व्यवस्था भी अलग से करनी पड़ती है। डिस्पोजल में सुविधा है। धोने की जरूरत भी नहीं और उपयोग में सरलता भी।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">यह सुनकर कोमल ऊंचे स्वर में बोली &#8220;पर भैया, पर्यावरण का क्या होगा इससे! आपने कभी सोचा है?&#8221; यह कहकर कोमल ने बहुत बड़ा प्रश्न ठेले वाले व वहां खड़े ग्राहकों के सामने खड़ा कर दिया। अब इस प्रश्न का उत्तर कौन देवे।</p>
<p style="text-align: justify;">पर्यावरण को सबसे अधिक हानि पहुंचाने का काम प्लास्टिक डिस्पोजल ने किया है। मानव जीवन की निर्भरता इस दानव रूपी तत्व पर बढ़ गई है। पर्यावरण के साथ साथ मानव स्वास्थ्य को यह दानव हानि पहुंचा रहा है। मानव शरीर में माइक्रो प्लास्टिक के कणों के रूप में यह दानव अनेक रोगों व बीमारियों का कारण बन रहा हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">उत्तर तो कोमल के इस प्रश्न का किसी ने नहीं दिया, पर उस मोहल्ले में लोगों ने अवश्य सोचना शुरू कर दिया कि डिस्पोजल के प्रयोग से पर्यावरण का क्या होगा!</p>
<p style="text-align: justify;"><span style="color: #ff0000;"><strong>और पढ़े :<span style="color: #0000ff;"> <a style="color: #0000ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/path-to-swadeshi/" target="_blank" rel="noopener">स्वदेशी का पथ</a></span></strong></span></p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक विद्या भारती जोधपुर प्रान्त के संगठन मंत्री है।)</p>
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		<title>रक्षा सूत्र</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 16 Aug 2025 12:18:11 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[कथा-कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[कथा/कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[गोपाल माहेश्वरी]]></category>
		<category><![CDATA[Bhartiya Education]]></category>
		<category><![CDATA[IKS]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[भारतीय ज्ञान परम्परा]]></category>
		<category><![CDATA[रक्षाबंधन]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#8211; गोपाल माहेश्वरी &#8220;जय जय श्रीमन्नारायण&#8221; कहते हुए परिवार के पुरोहित जी ने घर में प्रवेश किया। घर में एकदम शांति पसर गई। बच्चे बड़े सभी बैठक में पुरोहित जी&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;">&#8211; गोपाल माहेश्वरी</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;जय जय श्रीमन्नारायण&#8221; कहते हुए परिवार के पुरोहित जी ने घर में प्रवेश किया। घर में एकदम शांति पसर गई। बच्चे बड़े सभी बैठक में पुरोहित जी के आसपास एकत्र होकर उन्हें प्रणाम करते हुए बैठ गए। माँ सीधा सामान ले आई। एक थाली में पर्याप्त आटा, घी, गुड़, चावल, दाल और मसाले आदि रखे थे। आम का मौसम था। केलों की ऋतु थी इसलिए दस बारह पके हुए केले भी रखे हुए थे। यह सब भोजन बनाने की कच्ची सामग्री सीधा कहलाती है ऊपर से इस पर कुछ दक्षिणा भी रखी जाती है। पुरोहित जी हर पूर्णिमा और अमावस्या को हमारे यहाँ सीधा लेने आते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">चौड़े ललाट पर बड़ा-सा रामानंदी तिलक, घुटे हुए सिर के बीचोंबीच मोटी-सी चोंटी, गले में कमलगट्टे की लंबी माला और तुलसी की कंठी, कांधे पर लाल अंगोछा,सफेद धोती यह वेशभूषा बच्चों के लिए आश्चर्यजनक लगती जिसे बड़े श्रद्धा में परिणत करने के प्रयास में हर बार आंशिक सफलता पा रहे थे।</p>
<p style="text-align: justify;">पुरोहित जी ने कपड़े की अलग-अलग पोटलियों में सारी सामग्री बांधी फिर खाली थाली में थोड़ी मिश्री व तुलसी पत्र रखे और &#8220;नारायण मंगल करें। लक्ष्मी जी प्रसन्न रहें&#8221; का आशीष दिया।</p>
<p style="text-align: justify;">सामान्यतः अन्य घरों में पुरोहित जी इस सब के साथ विदा ले लेते थे लेकिन इस घर में दादाजी का विशेष अनुरोध रहता था कि आप पधारें हैं तो कोई पुराण कथा भी सुनाते जाइए जिससे टी वी मोबाइल की दुनिया में रमे रहने वाले इन बच्चों को कुछ धर्म-संस्कृति के संस्कार भी बने रहे।</p>
<p style="text-align: justify;">पुरोहित तो स्वयं चिंचित होते थे आने वाली पीढ़ियां परम्पराओं को भुलाकर आधुनिकता के नाम पर प्रायः दिशाहीन हो रही है। ऐसा लगता है आने वाले कुछ वर्षों में न पुरोहितों की न ही यजमानों की पीढ़ियां दिखाई देंगी। इसलिए यह प्रस्ताव उनमें आशा की किरण जगाता था और वे बालसुलभ शैली में वाणी के पर्याप्त उतार-चढ़ाव के साथ कोई न कोई पुराण कथा सोचकर ही आते थे। उनकी कहानी कहने की कला वास्तव में अद्भुत थी कि बच्चे मोहित होकर सुनते रहते।</p>
<p style="text-align: justify;">आरंभ सीताराम राधेश्याम के कीर्तन की प्रतियोगिता से होता। बच्चों के दो दल बनाए जाते। एक कहती सीताराम दूसरी जैसे उसके उत्तर में कहती राधेश्याम। ऐसा लगता झगड़ा हो रहा है बच्चों में जीतने का यह उत्साह देखने लायक होता। थोड़ी देर बाद पुरोहित जी के संकेत पर जय-जय श्री सीताराम जय-जय श्री राधेश्याम के जयकारों के साथ बच्चा मंडली शांत बैठ जाती। यह पुरोहित जी की अपनी सूझ थी अन्यथा सामान्य कथा भागवत में होने वाले कीर्तन बच्चों को भला कितना आकर्षित कर पाते।</p>
<p style="text-align: justify;">आज पुरोहित जी ने यह कीर्तन झगड़ा शांत कर कहा &#8220;आज कथा कहने के पहले रक्षाबंधन करेंगे। आज श्रावणी पूर्णिमा है न?&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;रक्षाबंधन? वह तो शाम को होगा भुआ आएंगी, यह शीला भी हमको राखी बांधेंगी।&#8221; मुकुल ने कहा।</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;आप किसको रक्षाबंधन करवाओगे?&#8221; शीला ने आश्चर्य व्यक्त किया।&#8221; हम बांधेंगे आप सबको राखी।&#8221; पुरोहित जी ने मुस्कुराते हुए कहा।</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;आप तो लड़के हो? राखी तो हम लड़कियां बांधती हैं अपने भाइयों को।&#8221; साधना की हँसी छूट गई यह कहते हुए।</p>
<p style="text-align: justify;">पुरोहित जी ने पालकी मारी और बताने लगे&#8221; रक्षाबंधन केवल भाई-बहनों का त्यौहार नहीं है। बल्कि हर उस व्यक्ति का संबंध इससे है जो किसी से रक्षा की अपेक्षा रखता है। इसीलिए रक्षाबंधन केवल श्रावणी पूर्णिमा को ही हो ऐसा भी आवश्यक नहीं है, बस भाई बहन का संबंध पवित्र, स्नेहभरा और कर्तव्यपूर्ण बना रहे इसलिए इस दिन वार्षिक रक्षाबंधन तो हो ही सही ऐसी परंपरा है।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;तो रक्षाबंधन भाई-बहनों के अतिरिक्त भी किन्हीं के बीच होता है?&#8221; मुकुंद ने जिज्ञासा से पूछा।</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;हाँ बेटा! पहला रक्षा बंधन तो पति-पत्नी के बीच ही हुआ था?&#8221; पुरोहित जी ने हँसते हुए कहा।</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;वह कैसे?&#8221; शीला और साधना के मुंह से एक साथ निकला।</p>
<p style="text-align: justify;">पुरोहित जी ने बताया &#8220;बहुत पुरानी बात है भयानक राक्षसों ने अपने आतंक से तीनों लोकों में हाहाकार मचा दिया था और देवराज इन्द्र अपनी देवसेना के साथ भी उन्हें हराने में बार-बार असफल हो रहे थे। तब अपने पति की रक्षा के लिए उनकी पत्नी शचि ने एक अभिमंत्रित रेशम का धागा इन्द्र की कलाई पर बांध दिया। इससे न केवल इन्द्र की रक्षा हुई बल्कि वे विजयी भी हुए। उस दिन श्रावणी पूर्णिमा थी तब से यह दिन रक्षाबंधन का दिन कहलाता है।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;तो भाई-बहनों की राखी कब आरंभ हुई आपको यह भी पता है क्या?&#8221; अभी तक चुपचाप बैठी मानसी ने पूछा।</p>
<p style="text-align: justify;">पुरोहित जी हँसे &#8220;बिल्कुल पता है। बताएं, सुनोगे सब?&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">ऐसी रोचक कथा कौन न सुनना चाहेगा? सबने हाँ भर दी तो पुरोहित जी ने घुटने पर बायां हाथ रखा और दाहिने को उठाते हुए कहने लगे।&#8221; पिछली बार हमने वामन अवतार की कथा सुनाई थी, वह याद है या भूल गए?&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;याद है जिसमें राजा बलि ने भगवान वामन को तीन पग धरती दान दी थी और भगवान छोटे से बच्चे से बहुत बहुत बहुत बड़े हो गए थे। तब दो पग में धरती आकाश सब नाप लिए और तीसरा पग के लिए नापने के लिए बलि ने अपना मस्तक झुकाकर आगे कर दिया था।&#8221; मुकुंद ने सुना दिया।</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;फिर क्या हुआ था?&#8221; पुरोहित जी ने पूछा।</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;मैं बताऊं&#8221; कहते हुए साधना बताने लगी &#8220;बलि को भगवान ने पाताल का राजा बना दिया और वरदान मांगने को कहा तो बलि ने उन्हें अपना द्वारपाल यानी पहरेदार बनने का वचन ले लिया।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;एकदम ठीक&#8221; कहते हुए पुरोहित जी ने कथा का सूत्र पकड़ा &#8220;अब वैकुंठ खाली। भगवान पाताल में। लक्ष्मी जी घबराईं, पाताल जा पहुंची। बलि को कहा ‘मैं आपको राखी बांधने आई हूँ।&#8217; अब कोई भी नारी किसी को राखी बांधना चाहे तो भारतीय संस्कृति में न इससे बड़ा धर्म है न इससे बड़ा सम्मान। जन्म के बाद माँ बेटे के बाद यदि स्त्री पुरुष का सबसे पवित्र रिश्ता है तो भाई-बहन का। बलि ने स्वीकृति दे दी। रक्षा बंधन संपन्न हुआ। अच्छा मुकुल और मुकुन्द! बताओ तुम राखी बंधवाकर क्या करते हो?&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;बहनों को उपहार देते हैं?&#8221; दोनों बोले।</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;बलि ने लक्ष्मी जी को उपहार मांगने को कहा। अब वे तो स्वयं धन संपत्ति की देवी उन्हें क्या चाहिए था पर वे बोलीं भैया! मेरे पति मुझे लौटा दो।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="wp-image-8928 aligncenter" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/08/download-2.webp" alt="raksha sutra" width="580" height="469" /></p>
<p style="text-align: justify;">बलि मुस्कुरा उठे पूरे साल के लिए नहीं चार माह तो ये मेरे यहाँ ही रहेंगे। लक्ष्मी जी मान गईं।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">बच्चों ने तालियां बजाईं। अब पुरोहित जी ने अपने पास से पचरंगी मौली के रक्षासूत्र निकाले और सबकी कलाई पर बांधने लगे। वे मंत्र पढ़ते जा रहे थे जिसमें राजा बलि का रक्षाबंधन वाला ही उल्लेख था। मंत्र था-</p>
<p style="text-align: center;"><strong>येन बद्धो बलीराजा दानवेन्द्रो महाबल:।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>तेन त्वां प्रतिबध्नामि रक्षे माचल माचल।।</strong></p>
<p style="text-align: justify;">अर्थात् जिस सूत्र से महाबलवान राजा बलि को बांध लिया यानी वचनबद्ध कर लिया गया था उसी सूत्र से मैं तुम्हें अचल रक्षा के लिए आबद्ध करता हूँ या करती हूँ।</p>
<p style="text-align: justify;">दादाजी ने बताया &#8220;पुरोहित जी घर घर जाकर रक्षाबंधन करते हैं हर पूजा-पाठ यज्ञ अनुष्ठान के पहले रक्षासूत्र के रूप में कलावा बंधवाकर हम उस काम की संकल्पपूर्ति के लिए वचनबद्ध होते हैं, व्रत बद्ध होते हैं।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">तभी राघव काका भी शाखा से वहाँ आ गए। बोले &#8220;तुम पूछ रहे थे न संघ की शाखा पर सब एक दूसरे को रक्षाबंधन क्यों बांधते हैं। इसलिए कि हम सब एक दूसरे की रक्षा का संकल्प लें। भगवा ध्वज को रक्षासूत्र बांधकर हम राष्ट्र, धर्म, संस्कृति और समाज की रक्षा का संकल्प लेते हैं।&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">सभी बच्चे आज रक्षाबंधन के व्यापक स्वरूप को जानकर प्रसन्न थे।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>और पढ़े :</strong></span> <span style="color: #0000ff;"><strong><a style="color: #0000ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/rakshabandhan-the-festival-of-national-defense/" target="_blank" rel="noopener">राष्ट्र रक्षा का पर्व रक्षाबंधन</a></strong></span></p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक इंदौर से प्रकाशित ‘देवपुत्र’ बाल मासिक पत्रिका के कार्यकारी संपादक है।)</p>
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