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	<title>पुस्तक समीक्षा Archives - राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन rashtriyashiksha.com</title>
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	<description>सा विद्या या विमुक्तये</description>
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	<title>पुस्तक समीक्षा Archives - राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन rashtriyashiksha.com</title>
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		<title>पुस्तक समीक्षा: भारतीय जीवन शैली</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 25 Oct 2025 06:40:38 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>&#8211; डॉ. महेश कुमार दाधीच &#8220;भारतीय जीवन शैली&#8221; एक समग्र ग्रंथ है जो भारतीय परंपराओं, स्वास्थ्य विज्ञान, आहार-विहार, और आधुनिक जीवन के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास करता है।&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"><strong><em>&#8211;</em></strong> डॉ. महेश कुमार दाधीच</p>
<p><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone wp-image-9049" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/10/71Fv6pr6KyL._AC_UF10001000_QL80_-300x266.jpg" alt="" width="1722" height="1527" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/10/71Fv6pr6KyL._AC_UF10001000_QL80_-300x266.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/10/71Fv6pr6KyL._AC_UF10001000_QL80_-768x681.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/10/71Fv6pr6KyL._AC_UF10001000_QL80_.jpg 1000w" sizes="(max-width: 1722px) 100vw, 1722px" /></p>
<p style="text-align: justify;"><em>&#8220;</em>भारतीय जीवन शैली&#8221; एक समग्र ग्रंथ है जो भारतीय परंपराओं, स्वास्थ्य विज्ञान, आहार-विहार, और आधुनिक जीवन के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास करता है। सुरुचि प्रकाशन द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक के लेखक श्री रवि कुमार ने इस पुस्तक में भारतीय संस्कृति की गहराई से पड़ताल करते हुए उसे आज के संदर्भ में प्रस्तुत किया है। पुस्तक को आठ प्रमुख भागों में विभाजित किया गया है। प्रत्येक भाग जीवन के किसी महत्वपूर्ण पहलू को संबोधित करता है और इसके अंतर्गत छोटे-छोटे अध्याय हैं जो विषय की गहराई को प्रभावी रूप से प्रस्तुत करते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>सैद्धांतिक चिंतन – </strong>इस  भाग  में भारतीय जीवन शैली की मूल अवधारणाओं को स्पष्ट किया गया है। इसमें यह समझाया गया है कि भारतीय जीवन शैली केवल जीवन जीने का तरीका नहीं, बल्कि यह आहार, विहार  और धन प्रबंधन के बीच सामंजस्य स्थापित करने का माध्यम है। ऋतुचर्या के अनुसार भोजन, त्रिदोष सिद्धांत (वात-पित्त-कफ), और आहार चिकित्सा जैसे विषय आयुर्वेदिक दृष्टिकोण से समझाए गए हैं। &#8220;आहार ही औषध&#8221; की अवधारणा इस भाग  की विशेषता है, जो भोजन को औषधि के रूप में देखने की भारतीय परंपरा को दर्शाती है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>भोजन संस्कार </strong>– इस भाग में बताया गया है कि भोजन केवल शरीर की आवश्यकता नहीं, बल्कि एक संस्कार है — यह विचार इस भाग में प्रमुखता से उभरता है। लेखक बताते हैं कि किस प्रकार भोजन के समय, मनःस्थिति और प्रक्रिया से स्वास्थ्य पर सकारात्मक या नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। यह अध्याय आज की भागदौड़ भरी दुनिया में विशेष रूप से प्रासंगिक है, जहाँ लोग अक्सर भोजन को मात्र आवश्यकता मानकर उपेक्षा करते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>पाकशाला</strong> &#8211; पारंपरिक भारतीय रसोई और उसमें प्रयुक्त औषधीय दृष्टिकोण का यह भाग एक अद्भुत पहलू को उजागर करता है। ‘भारतीय रसोई घर का वैद्य’ अध्याय विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, जो दर्शाता है कि हमारी रसोई के मसाले औषधीय गुणों से समृद्ध हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">भोजन संयम, भोजन के समय और विधि का स्वास्थ्य पर प्रभाव, और भारतीय परंपरागत रसोई की संरचना जैसे विषयों को वैज्ञानिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया गया है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>पंचमहाभूत –</strong> इस भाग<strong> में </strong>जल, वायु, अग्नि, पृथ्वी और आकाश — इन पंचमहाभूतों का मानव स्वास्थ्य पर प्रभाव को विस्तार से बताया गया है। विशेष रूप से जल सेवन, प्रकाश और वायु के महत्व को आधुनिक विज्ञान और आयुर्वेद दोनों के दृष्टिकोण से समझाया गया है।  लेखक ने इसे सिर्फ धार्मिक या दार्शनिक संदर्भ में नहीं लिया, बल्कि व्यावहारिक और वैज्ञानिक तर्कों के साथ प्रस्तुत किया है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>विहार अर्थात् सम्यक दिनचर्या </strong>— इस भाग में दर्शाया गया है कि जीवन का संतुलन केवल आहार से नहीं, बल्कि विहार (दिनचर्या), निद्रा, व्यायाम,  योग और वस्त्र चयन आदि से भी बनता है। लेखक ने जीवन की छोटी-छोटी आदतों को बड़े प्रभाव से जोड़ा है और बताया है कि एक सुव्यवस्थित दिनचर्या कैसे मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य का आधार बन सकती है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>स्वस्थ बालक, स्वस्थ राष्ट्र</strong> — यह भाग विशेष रूप से बच्चों के आहार-विहार, मानसिक विकास और शिक्षा प्रणाली पर केंद्रित है। यह एक सामाजिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है कि यदि बच्चों की जीवनशैली सही हो तो भविष्य का राष्ट्र भी स्वस्थ होगा। बालक के मन, बुद्धि और शिक्षण पर आहार-विहार के प्रभाव को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझाया गया है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>21वीं शताब्दी की चुनौतियाँ </strong>— यह भाग आज के युग की सबसे बड़ी चुनौतियों – जंक फूड, तनाव, सोशल मीडिया – को भारतीय जीवनशैली के परिप्रेक्ष्य में विश्लेषित करता है। यह आधुनिकता और परंपरा के बीच सामंजस्य की आवश्यकता पर बल देता है। लेखक ने इनका विश्लेषण करते हुए भारतीय जीवन शैली को इनसे बचाव का उपाय बताया है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>परिशिष्ट </strong>— यह भाग व्यावहारिक मार्गदर्शन प्रदान करता है। इस में ऋतु अनुसार आहार-विहार, आदर्श दिनचर्या जैसे मूलभूत बिंदुओं को शामिल किया गया है, जिससे पाठक को पुस्तक की अवधारणाओं को दैनिक जीवन में लागू करने में सहायता मिलती है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>निष्कर्ष</strong></p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;भारतीय जीवन शैली&#8221; केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि भारतीय जीवन दर्शन का सार है। यह ग्रंथ भारतीय परंपराओं को आधुनिक संदर्भ में पुनर्परिभाषित करता है और स्वास्थ्य, आहार, दिनचर्या, और सामाजिक व्यवहार के बीच संतुलन स्थापित करने का मार्ग दिखाता है।</p>
<p style="text-align: justify;">श्री रवि कुमार ने परंपरा और आधुनिकता के बीच एक पुल बनाने का सफल प्रयास किया है। यह पुस्तक उन सभी पाठकों के लिए उपयोगी है जो भारतीय संस्कृति में निहित स्वास्थ्य विज्ञान को समझना और अपनाना चाहते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक भारत सरकार के आयुष मंत्रालय के अंतर्गत राष्ट्रीय औषधीय पादप बोर्ड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी है।)</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>और पढ़ें : <span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/book-review-bharatiya-shiksha-darshan-theory-tradition-and-practice/" target="_blank" rel="noopener">पुस्तक समीक्षा – भारतीय शिक्षा दर्शन : सिद्धांत, परंपरा एवं व्यवहार (डॉ. कुलदीप मेहंदीरत्ता एवं रवि कुमार)</a></span></strong></p>
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		<title>पुस्तक समीक्षा &#8211; भारतीय शिक्षा दर्शन : सिद्धांत, परंपरा एवं व्यवहार (डॉ. कुलदीप मेहंदीरत्ता एवं रवि कुमार)</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 16 Sep 2025 03:11:03 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>&#8211; डॉ. कुमुद बंसल यह पुस्तक भारतीय शिक्षा दर्शन : सिद्धांत, परंपरा एवं व्यवहार भारतीय शिक्षा की संपूर्ण दृष्टि को सिद्धांत, परंपरा और व्यवहार तीनों आयामों से प्रस्तुत करती है।&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;">&#8211; डॉ. कुमुद बंसल</p>
<h4 style="text-align: justify;">यह पुस्तक भारतीय शिक्षा दर्शन : सिद्धांत, परंपरा एवं व्यवहार भारतीय शिक्षा की संपूर्ण दृष्टि को सिद्धांत, परंपरा और व्यवहार तीनों आयामों से प्रस्तुत करती है। इसमें वेद-उपनिषद से लेकर नालंदा-तक्षशिला तक की परंपराओं और आधुनिक संदर्भों में शिक्षा की प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला गया है। सरल भाषा और शोधपरक दृष्टि इसकी विशेषता है। यह कृति शिक्षा को केवल रोज़गार नहीं बल्कि जीवनोत्थान का साधन मानने की प्रेरणा देती है।</h4>
<p style="text-align: justify;">भारतीय संस्कृति और दर्शन विश्व की प्राचीनतम और सर्वाधिक समृद्ध परंपराओं में से एक है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह रही है कि यहां शिक्षा को केवल ज्ञानार्जन या रोज़गार प्राप्ति का साधन नहीं माना गया, बल्कि उसे जीवन का उद्देश्य और आत्मोन्नति का मार्ग समझा गया। प्रस्तुत पुस्तक “भारतीय शिक्षा दर्शन : सिद्धांत, परंपरा एवं व्यवहार” इसी दृष्टिकोण को केंद्र में रखकर इसमें लेखों को संकलित किया गया है। यह पुस्तक शिक्षा के भारतीय स्वरूप को उसकी ऐतिहासिक, दार्शनिक, सांस्कृतिक और व्यावहारिक पृष्ठभूमि सहित प्रस्तुत करती है, साथ ही आधुनिक समय में उसकी प्रासंगिकता को भी उजागर करती है।</p>
<p style="text-align: justify;">इस पुस्तक की संरचना तीन प्रमुख आयामों पर आधारित है &#8211;</p>
<p style="text-align: justify;">सिद्धांत : इसमें भारतीय शिक्षा के मूल दार्शनिक आधारों की चर्चा की गई है। वेद, उपनिषद, गीता, बौद्ध-जैन दर्शन, गुरुकुल परंपरा और नालंदा-तक्षशिला जैसे शिक्षा केंद्रों का उल्लेख मिलता है।</p>
<p style="text-align: justify;">परंपरा : इसमें भारतीय समाज की शैक्षिक परंपराओं &#8211; गुरु-शिष्य संबंध, आचार्यकुल की परिपाटी, आश्रम व्यवस्था, वर्णाश्रम धर्म तथा लोक परंपराओं का वर्णन किया गया है।</p>
<p style="text-align: justify;">व्यवहार : इस खंड में यह बताया गया है कि किस प्रकार शिक्षा का अनुप्रयोग जीवन, समाज और राष्ट्र निर्माण में हुआ और आज भी हो सकता है।</p>
<p style="text-align: justify;">पुस्तक को गहराई देने के कई आयाम और आधार हैं ।</p>
<p style="text-align: justify;">(क) दार्शनिक आधार</p>
<p style="text-align: justify;">लेखकों ने भारतीय शिक्षा को ‘संपूर्ण जीवन का दर्शन’ बताया है। पश्चिमी शिक्षा जहाँ अधिकतर भौतिक उपलब्धियों और वैज्ञानिक खोजों पर बल देती है, वहीं भारतीय शिक्षा आत्मबोध, सदाचार, नैतिकता और मोक्ष की ओर उन्मुख रहती है। पुस्तक में बार-बार इस बात पर बल दिया गया है कि भारतीय शिक्षा केवल ‘कौशल’ नहीं, बल्कि ‘संस्कार’ पर आधारित है।</p>
<p style="text-align: justify;">(ख) ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य</p>
<p style="text-align: justify;">पुस्तक में वेदकालीन, बौद्धकालीन और मध्यकालीन शिक्षा की व्यवस्थित व्याख्या की गई है। नालंदा और तक्षशिला के वैभव का चित्रण यह दर्शाता है कि भारत प्राचीन काल से ही वैश्विक शिक्षा का केंद्र रहा है।</p>
<p style="text-align: justify;">(ग) आधुनिक संदर्भ</p>
<p style="text-align: justify;">लेखक बताते हैं कि आज के समय में जब शिक्षा अधिकतर बाज़ार की माँगों और उपभोक्तावादी दृष्टिकोण से बंध गई है, तब भारतीय शिक्षा दर्शन की ओर लौटना अत्यंत आवश्यक है। यह हमें याद दिलाता है कि शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी नहीं, बल्कि एक सजग नागरिक और श्रेष्ठ मानव का निर्माण करना है।</p>
<p style="text-align: justify;">(घ) भाषा और शैली</p>
<p style="text-align: justify;">पुस्तक की भाषा सरल, प्रवाहपूर्ण और शोधपरक है। दार्शनिक और ऐतिहासिक तथ्यों को उदाहरणों और प्रसंगों के साथ प्रस्तुत किया गया है, जिससे पाठक को बौद्धिक संतोष के साथ-साथ भावनात्मक जुड़ाव भी होता है।</p>
<p style="text-align: justify;">यह पुस्तक कई स्तरों पर उपयोगी है &#8211;</p>
<ul style="text-align: justify;">
<li>शिक्षा शास्त्र के विद्यार्थी : जो भारतीय शिक्षा पद्धति को समझना चाहते हैं, उनके लिए यह एक आधारभूत ग्रंथ है।</li>
<li>शोधार्थी और शिक्षक : भारतीय परंपरा पर शोध करने वालों के लिए इसमें प्रामाणिक सामग्री उपलब्ध है।</li>
<li>नीति-निर्माता और शिक्षा प्रशासक : जो आधुनिक शिक्षा नीतियों को भारतीय दृष्टिकोण से सजाना चाहते हैं, उनके लिए यह मार्गदर्शक सिद्ध हो सकती है।</li>
<li>सामान्य पाठक : जो भारतीय संस्कृति और परंपरा को गहराई से जानना चाहते हैं, वे भी इस पुस्तक कर सकते हैं।</li>
</ul>
<p><img decoding="async" class="wp-image-8968 aligncenter" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/09/भारतीय-शिक्षा-दर्शन-300x252.webp" alt="भारतीय शिक्षा दर्शन" width="605" height="508" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/09/भारतीय-शिक्षा-दर्शन-300x252.webp 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/09/भारतीय-शिक्षा-दर्शन-1024x860.webp 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/09/भारतीय-शिक्षा-दर्शन-768x645.webp 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/09/भारतीय-शिक्षा-दर्शन.webp 1500w" sizes="(max-width: 605px) 100vw, 605px" /></p>
<p style="text-align: justify;">पुस्तक की सबसे बड़ी ताक़त यह है कि इसमें भारतीय शिक्षा की संपूर्णता को सिद्धांत, परंपरा और व्यवहार &#8211; तीनों दृष्टियों से प्रस्तुत किया गया है। इससे पाठक को यह समझने में सहायता मिलती है कि भारतीय शिक्षा दर्शन केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के लिए भी अत्यंत प्रासंगिक है।</p>
<p style="text-align: justify;">हालाँकि, पुस्तक में एक कमी यह भी लगती है कि इसमें आधुनिक शिक्षा की चुनौतियों &#8211; जैसे डिजिटल युग की शिक्षा, वैश्वीकरण, रोजगारपरकता और नई शिक्षा नीति 2020 &#8211; से अधिक गहराई से जुड़ाव हो सकता था। यदि आलेखों के संकलनकर्ता इन विषयों को भी विस्तार से जोड़ते तो पुस्तक और अधिक समकालीन हो जाती।</p>
<p style="text-align: justify;">कुल मिलाकर यह पुस्तक भारतीय शिक्षा दर्शन के व्यापक दृष्टिकोण को सरल और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती है। यह अतीत की गौरवशाली परंपराओं को वर्तमान की चुनौतियों से जोड़कर एक सकारात्मक दिशा दिखाती है। शिक्षा को केवल सूचना और तकनीक तक सीमित करने की बजाय उसे आत्मबोध और सामाजिक सद्भाव का साधन मानने का संदेश इस पुस्तक की सबसे बड़ी देन है।</p>
<p style="text-align: justify;">डॉ. कुलदीप मेहंदीरत्ता और श्री रवि कुमार का यह संपादन भारतीय शिक्षा दर्शन के मर्म को समझने के इच्छुक प्रत्येक पाठक के लिए एक मूल्यवान ग्रंथ है। यह हमें यह स्मरण करवाती है कि शिक्षा का उद्देश्य ‘रोज़गार’ नहीं, बल्कि ‘जीवन का उत्थान’ है। भारतीय शिक्षा का दर्शन आज भी हमें एक संतुलित, नैतिक और समरस समाज की ओर ले जाने की क्षमता रखता है।</p>
<p style="text-align: justify;">दोनों संकलनकर्ताओं को बधाई व मंगलकामनाएं।</p>
<p style="text-align: justify;">(लेखिका शिक्षाविद है और हरियाणा साहित्य अकादमी की निदेशक रही है।)</p>
<p style="text-align: justify;"><span style="color: #ff0000;"><strong>और पढ़े :</strong></span> <span style="color: #0000ff;"><strong><a style="color: #0000ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/bhartiya-education-philosophy-will-become-a-guide-shiksha-drishti/" target="_blank" rel="noopener">भारतीय शिक्षा दर्शन की मार्गदर्शिका बनेगी- भारतीय शिक्षा दृष्टि</a></strong></span></p>
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		<title>भारतीय शिक्षा दर्शन की मार्गदर्शिका बनेगी- भारतीय शिक्षा दृष्टि</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 16 Mar 2025 11:30:55 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[पुस्तक समीक्षा]]></category>
		<category><![CDATA[भारतीय शिक्षा दृष्टि]]></category>
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					<description><![CDATA[<p> &#8211; डॉ. विकास दवे इन दिनों मेरे हाथों में स्वाध्याय की दृष्टि से सुरुचि प्रकाशन, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित &#8216;भारतीय शिक्षा दृष्टि&#8217; पुस्तक है। यह पुस्तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के&#8230; </p>
<p>The post <a href="https://rashtriyashiksha.com/bhartiya-education-philosophy-will-become-a-guide-shiksha-drishti/">भारतीय शिक्षा दर्शन की मार्गदर्शिका बनेगी- भारतीय शिक्षा दृष्टि</a> appeared first on <a href="https://rashtriyashiksha.com">राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"> &#8211; डॉ. विकास दवे</p>
<p><img decoding="async" class="alignnone wp-image-8448" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/03/27255fcc-a533-4c8b-9dd3-60a232bf8190-1-300x178.jpeg" alt="" width="983" height="583" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/03/27255fcc-a533-4c8b-9dd3-60a232bf8190-1-300x178.jpeg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/03/27255fcc-a533-4c8b-9dd3-60a232bf8190-1.jpeg 648w" sizes="(max-width: 983px) 100vw, 983px" /></p>
<p style="text-align: justify;">इन दिनों मेरे हाथों में स्वाध्याय की दृष्टि से सुरुचि प्रकाशन, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित &#8216;भारतीय शिक्षा दृष्टि&#8217; पुस्तक है। यह पुस्तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के परम पूजनीय सरसंघचालक जी माननीय डॉ मोहन भागवत जी द्वारा संपूर्ण देश भर में शिक्षा क्षेत्र में काम करने वाले मनिषियों को दिए गए मार्गदर्शनों का संचय है। इस पुस्तक का संपादन श्री रवि कुमार जी द्वारा किया गया है। ज्ञातव्य है कि श्री रवि कुमार जी स्वयं भी राष्ट्र अर्पित ऐसे अनूठे व्यक्तित्व हैं जो अपने जीवन का एक लंबा कालखंड शिक्षा क्षेत्र में व्यतीत कर चुके हैं। भारतीय शिक्षा जगत में अनेक वर्षों से जब भी विमर्श प्रारंभ होता है तो विमर्श के अथ से लेकर इति तक केवल मैकाले के नामजप के अतिरिक्त कुछ नहीं रह पाता। यह स्वभाविक हो सकता है क्योंकि अंग्रेजों ने अनेक वर्षों तक परिश्रमपूर्वक हमारी चिती को समाप्त करने की जिस योजना पर काम किया था उसका सर्वाधिक महत्वपूर्ण अस्त्र शिक्षा ही था किंतु स्वतंत्रता के इतने वर्षों बाद भी क्या हम सांप निकलने के बाद लकीर पीटते रहेंगे? शिक्षा क्षेत्र की शुचिता और मर्यादा को पुनः लौटाकर भारतीय वैचारिक अधिष्ठान पर लाकर स्थापित करना इसके लिए किसी को दोष देते रहना या समस्या का उल्लेख करते रहना पर्याप्त नहीं होगा। समाधान की दिशा में प्रयोगात्मक कार्यविधि की आवश्यकता अनुभूत होती है।</p>
<p style="text-align: justify;">मान्यवर डॉ. मोहन भागवत जी भारत की ऋषि परंपरा के चेता हैं। स्वाभाविक रूप से आधुनिक युग के इन महर्षि ने भारत माता की परिक्रमा करते हुए जब-जब शिक्षा क्षेत्र के वरेण्य विद्वानों के साथ विमर्श किया होगा तो उस मंथन से जो नवनीत निकले हैं उन सबको एक स्थान पर एकत्र कर श्री रवि कुमार जी ने एक अद्भुत उपक्रम किया है। मैं इस पुस्तक को प्रायोगिक रूप से भारतीय शिक्षा को अपने मूल वैचारिक अधिष्ठान पर लौटाने के यज्ञ की एक महत्वपूर्ण आहुति मानता हूँ।</p>
<p style="text-align: justify;">इस ग्रंथ के प्रारंभ में संघ के मान्यवर सरसंघचालक जी द्वारा दिए गए वर्ष 2014 से लेकर वर्ष 2020 तक के विजयादशमी उत्सव के उद्बोधनों का संकलन किया गया है। यह सभी विषय भी मूलतः कहीं ना कहीं भारतीय समाज जीवन और शिक्षा से स्वयं को जोड़ते हैं। इस अध्याय के पश्चात भारतीय शिक्षा को भारतीय मनीषा से जोड़ने के लिए आवश्यक तत्वों के आधार पर इन मार्गदर्शनों का विषयपरक विभाजन किया गया है। सर्वप्रथम धर्म और शिक्षा विषय को लेकर उनके एक महत्वपूर्ण साक्षात्कार और राजकोट के गुरुकुल में दिए गए उद्बोधन को उद्धृत किया गया है। चूंकि विषय की पूर्व-पाठिका इन दो अध्याय में बनी ही इसलिए तुरंत दो आलेख गुरुकुल शिक्षा पद्धति को आधार बनाकर लिए गए हैं। दूसरा आलेख जो श्रृंगेरी के समीप हरिहरपुर में प्रबोधित किया गया है वह गुरुकुल शिक्षा पद्धति की हमारी प्राचीन परंपरा के समग्र अवदान को रेखांकित करने में सक्षम आलेख है। स्वाभाविक रूप से समय-समय पर हमारे इन मनीषियों के द्वारा दिए गए मार्गदर्शन के आधार पर एक उर्वरा-भूमि तैयार करने का काम लंबे समय से विद्या भारती अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान करता रहा है। इस संगठन के कार्यकर्ताओं को भी समय-समय पर श्रद्धेय भागवत जी का मार्गदर्शन प्राप्त होता रहा है। इन आयोजनों में उनके द्वारा दिए गए मार्गदर्शन सत्रों को लिपिबद्ध करते हुए श्री रवि कुमार जी ने 6 आलेख संपादित किए हैं। इन सबकी विषय वस्तु में कहीं ना कहीं शिक्षा, शिक्षण, शिक्षण पद्धति और भारतीय शिक्षा पद्धति के वे कारक जो मानसिक गुलामी काल में विस्मृत कर दिए गए, को बार-बार रेखांकित किया गया है।</p>
<p style="text-align: justify;">निश्चित तौर पर विद्या भारती के कार्य की चर्चा करते ही विद्या भारती की सबसे बड़ी पूंजी अर्थात उसके पूर्व छात्र स्मरण में आते हैं। संपूर्ण भारतवर्ष में करोड़ों की संख्या में समाज-जीवन में घुल-मिल गए विद्या भारती के इन पूर्व छात्रों को भी श्री भागवत जी ने जयपुर और हैदराबाद में मार्गदर्शित किया था। उन दोनों उद्बोधनों को पढ़ना मुझे लगता है केवल विद्या भारती के पूर्व छात्रों के लिए ही नहीं अपितु समाज में अपनी भूमिका का कुशलता से निर्वाह कर रहे समस्त भारतीय समाज के लिए अनिवार्य है। शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात हमारा अपने शिक्षण संस्थानों के प्रति दायित्व समाप्त नहीं होता यह दिशा इन आलेखों में बड़ी कुशलता से उकेरी गयी है।</p>
<p style="text-align: justify;">संघ के मूल वैचारिक दर्शन से अनुप्राणित शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास एक महत्वपूर्ण उपक्रम रहा है। विशेषकर पाठ्यक्रमों को उनकी खोई हुई गरिमा लौटाने के लिए प्रारंभ हुए शिक्षा बचाओ आंदोलन से लेकर शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास तक की उसकी यात्रा में आदरणीय भागवत जी ने पांच महत्वपूर्ण सत्रों में अपने मनोभाव व्यक्त किए थे। इन मनोभावों का यह सुंदर संच पृष्ठ 117 से पृष्ठ 150 तक संग्रहित है। इसके अतिरिक्त देश भर में निजी क्षेत्र में काम करने वाले शिक्षा संस्थानों और शिक्षाविदों के वैचारिक कुंभ के आयोजनों में भी आदरणीय भागवत जी का मार्गदर्शन समय-समय पर प्राप्त होता रहा है। ऐसे आयोजनों में दिए गए उनके उद्बोधनों को पांच आलेखों के माध्यम से रवि जी ने संग्रहित किया है इनमें कुछ आलेख पुस्तक विमोचन के समय अभिव्यक्त किए गए हैं तो कुछ आलेख भिन्न-भिन्न शासकीय संस्थाओं द्वारा स्वाध्याय और लेखन प्रशासन से जोड़कर आयोजित किए गए हैं। निश्चित तौर पर उपरोक्त उल्लेखित सभी आलेखों को पढ़ने के पश्चात हमारे मन में यह जिज्ञासा प्रकट होती है कि आखिर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मूल भारतीय विचार शिक्षा को किस पथ पर अग्रसरित करना चाहता है? हमारी इन जिज्ञासाओं का समाधान अंतिम खंड में होना प्रारंभ होता है। अंतिम तीन आलेख राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा अपनी साधारण सभा में पारित उन प्रस्तावों के उल्लेख से होता है जिन में शिक्षा नीति और भारतीय शिक्षा दर्शन को लेकर संघ ने अपना भविष्यदृष्टा चिंतन भारतीय समाज के समक्ष रखा है।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="size-medium wp-image-8497 aligncenter" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/03/GIF_20241127_222402-205x300.gif" alt="" width="205" height="300" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/03/GIF_20241127_222402-205x300.gif 205w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/03/GIF_20241127_222402-701x1024.gif 701w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/03/GIF_20241127_222402-768x1122.gif 768w" sizes="auto, (max-width: 205px) 100vw, 205px" /></p>
<p style="text-align: justify;">अंत में इस पूर्ण ग्रंथ को प्रमाणिकता प्रदान करने के लिए संदर्भ सूची का देना निश्चित तौर पर आने वाले समय में शैक्षिक क्षेत्र में हरदृष्टि से शोध कार्य संपन्न करने वाले शोधार्थियों के लिए भी यह पुस्तक मार्गदर्शिका की तरह काम करेगी। भारतीय शिक्षा दृष्टि को ध्यान में रखकर अपनी भूमिका तय करने वाले समाज जीवन के ऐसे कार्यकर्ता जो भारतीय शिक्षा दर्शन के आधार पर आने वाली पीढियां को गढ़ना चाहते हैं उनके लिए भी यह एक प्रकार की &#8216;गाइड बुक&#8217; बनकर उभरेगी। पूज्य सरसंघचालक जी के विचारों का यह नवनीत एक स्थान पर एकत्र करके हम सबके हाथों में सौंपना स्वयं में एक सारस्वत अनुष्ठान से कम नहीं था। होता के रूप में रवि कुमार जी ने इस कार्य को यज्ञ भाव से ही संपन्न किया है। मैं इस ग्रंथ के प्रकाशन हेतु सुरुचि प्रकाशन को भी बधाई देता हूँ कि उन्होंने इस पुस्तक की डिजाइनिंग से लेकर शब्दांकन और शब्द शुद्धि (प्रूफरीडिंग) तक बहुत ही गंभीरता से कार्य किया है। शिक्षा आधारित ग्रंथों की श्रेणी में यह पुष्प निश्चित तौर पर 108 मनकों की माला में सुमेरु की तरह स्थापित होगा इसमें कोई संशय नहीं। बधाई।</p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक साहित्यकार है और मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी के निदेशक है।)</p>
<p style="text-align: justify;">पुस्तक का नाम : भारतीय शिक्षा दृष्टि &#8211; डॉ. मोहन भागवत</p>
<p style="text-align: justify;">संपादक : श्री रवि कुमार</p>
<p style="text-align: justify;">प्रकाशक : सुरुचि प्रकाशन, केशव कुंज झंडेवाला, नई दिल्ली-110055</p>
<p style="text-align: justify;">प्रथम संस्करण : अक्टूबर 2024</p>
<p style="text-align: justify;">मूल्य : 235 रुपए</p>
<p style="text-align: justify;">पृष्ठ संख्या : 204</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>और पढ़ें : <span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/book-review-bharatiya-shiksha-drishti-dr-mohan-bhagwat/" target="_blank" rel="noopener">पुस्तक समीक्षा : भारतीय शिक्षा दृष्टि – डॉ मोहन भागवत</a></span></strong></p>
<p>The post <a href="https://rashtriyashiksha.com/bhartiya-education-philosophy-will-become-a-guide-shiksha-drishti/">भारतीय शिक्षा दर्शन की मार्गदर्शिका बनेगी- भारतीय शिक्षा दृष्टि</a> appeared first on <a href="https://rashtriyashiksha.com">राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
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			</item>
		<item>
		<title>पुस्तक समीक्षा : भारतीय शिक्षा दृष्टि &#8211; डॉ मोहन भागवत</title>
		<link>https://rashtriyashiksha.com/book-review-bharatiya-shiksha-drishti-dr-mohan-bhagwat/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 27 Feb 2025 10:33:30 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[पुस्तक समीक्षा]]></category>
		<category><![CDATA[श्री रवि कुमार जी]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://rashtriyashiksha.com/?p=8374</guid>

					<description><![CDATA[<p>संपादक &#8211; रवि कुमार समीक्षक &#8211; डॉ उदय भान सिंह &#8220;भारतीय शिक्षा दृष्टि&#8221; पुस्तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत द्वारा शिक्षा के विभिन्न आयामों पर व्यक्त विचारों&#8230; </p>
<p>The post <a href="https://rashtriyashiksha.com/book-review-bharatiya-shiksha-drishti-dr-mohan-bhagwat/">पुस्तक समीक्षा : भारतीय शिक्षा दृष्टि &#8211; डॉ मोहन भागवत</a> appeared first on <a href="https://rashtriyashiksha.com">राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"><strong>संपादक &#8211; रवि कुमार </strong></p>
<p style="text-align: right;">समीक्षक &#8211; डॉ उदय भान सिंह</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone  wp-image-8384" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/02/789-300x210.jpg" alt="" width="1417" height="992" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/02/789-300x210.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/02/789-1024x717.jpg 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/02/789-768x538.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/02/789-1536x1075.jpg 1536w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2025/02/789.jpg 2000w" sizes="auto, (max-width: 1417px) 100vw, 1417px" /></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>&#8220;भारतीय शिक्षा दृष्टि&#8221;</strong> पुस्तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत द्वारा शिक्षा के विभिन्न आयामों पर व्यक्त विचारों और उद्बोधनों का संकलन है, जिसे विद्या भारती के जोधपुर प्रांत के संगठन मंत्री श्री रवि कुमार ने संपादित किया है। यह शिक्षा के ज्ञान, कौशल, मूल्यों और दृष्टिकोण को अर्जित करने की सतत प्रक्रिया पर प्रकाश डालती है। पुस्तक को प्रसिद्ध राष्ट्रवादी <strong>सुरुचि प्रकाशन</strong> ने प्रकाशित किया है। प्रस्तुत पुस्तक में डॉ. मोहन भागवत जी द्वारा सन् 2010 से 2020 तक विभिन्न अवसरों पर शिक्षा विषय पर व्यक्त विचारों को समाहित किया गया है। मूलतः आठ भागों में विभाजित यह पुस्तक भारतीय ‘स्व’ के आधार  पर शिक्षा के विभिन्न आयामों पर केंद्रित है। पुस्तक की सम्पूर्ण विषयवस्तु में डॉ. भागवत जी के कुल 29 उद्बोधन व तीन प्रस्ताव शामिल हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">वसुधैव कुटुंबकम, अहिंसा, विश्व शांति और साहचर्य जैसे सिद्धांतों पर आधारित भारत की प्राचीन और सनातन शिक्षा परंपरा आक्रमणों और षड्यंत्रों के बावजूद संरक्षित रही। स्वतंत्रता के बाद भी इसे कमजोर करने के प्रयास हुए, किंतु राष्ट्रनिष्ठ संत-मनीषियों ने इसे सहेजने और अगली पीढ़ियों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसी कड़ी का स्तुत्य प्रयास इस पुस्तक की विषयवस्तु का संकलन, सम्पादन, प्रकाशन व पाठकों तक सहज ही सुलभ करवाना भी सम्मिलित है, यदि यह कहा जाए तो इसमें कोई भी अतिश्योक्ति नही होगी।</p>
<p style="text-align: justify;">‘भारतीय शिक्षा दृष्टि’ पुस्तक के पहले भाग में सम्पादक ने डॉ. मोहन भागवत जी के विजयादशमी उद्बोधनों (2014-2020) में भारतीय शिक्षा के उद्देश्यों और आयामों पर चर्चा की गई है। वे शिक्षा को सर्वसुलभ, संस्कारयुक्त और स्वाभिमान से जीवन संघर्ष करने योग्य बनाने पर बल देते हैं। शिक्षा के वैश्विक प्रयोगों का संज्ञान लेते हुए, वे भारतीय शिक्षा को सकारात्मक रूप देने का आह्वान करते हैं। शिक्षकों व अभिभावकों की भूमिका को महत्वपूर्ण मानते हुए, वे दायित्व बोध की आवश्यकता बताते हैं। शिक्षा के व्यापारीकरण से बचने और ‘स्व’ आधारित शिक्षा प्रणाली अपनाने की वकालत करते हैं। वे शैक्षिक ढांचे से इतर पाठ्यक्रम और शिक्षकों के प्रशिक्षण में आमूल-चूल परिवर्तन की आवश्यकता पर बल देते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">पुस्तक के दूसरे भाग “धर्म और शिक्षा” में पुस्तक के सम्पादक रवि कुमार ने डॉ. मोहन भागवत जी के द्वारा 9 अक्टूबर 2020 को लोकप्रिय हिन्दी पत्रिका ‘विवेक’ को दिए गए गए साक्षात्कार का सन्दर्भ लेते हुए बताया है कि धर्म के बिना शिक्षा अधूरी है। धर्म हमें सन्मार्ग दिखाता है और शिक्षा हमें उसके लिए सक्षम बनाती है। पुस्तक के इसी भाग में सम्पादक ने राजकोट (गुजरात ) गुरुकुल में डॉ. भागवत द्वारा 28 जनवरी को ‘धर्म, राष्ट्र और राष्ट्रधर्म’ पर व्यक्त विचारों को शामिल किया है।</p>
<p style="text-align: justify;">पुस्तक के तीसरे भाग में “गुरुकुल शिक्षा पद्धति” के अंतर्गत 29अप्रैल 2018 को अन्तर्राष्ट्रीय विराट गुरुकुल सम्मेलन में तथा 10 फ़रवरी 2021 को हरिपुर स्थित प्रबोधिनी गुरुकुल में आयोजित अर्ध-मण्डलोत्सव कार्यक्रम में डॉ. मोहन भागवत के द्वारा दिए गए उद्बोधनों की चर्चा की गई है। आज हम अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों की चकाचौंध में बच्चों को अपनी जड़ों से काट रहे हैं, जिससे उनका भविष्य संकट में पड़ रहा है। ऐसे में भारत की प्राचीन गुरुकुल शिक्षा पद्धति ही सर्वांगीण विकास का समाधान है। डॉ. भागवत के अनुसार, 21वीं शताब्दी में भी यह पद्धति प्रासंगिक है और भारत को विश्व का मार्गदर्शक बना सकती है, क्योंकि “सा विद्या या विमुक्तये” – विद्या ही सच्ची मुक्ति और दिशा प्रदान करती है।</p>
<p style="text-align: justify;">पुस्तक के चौथे और पाँचवे भाग में सम्पादक रवि जी ने विद्या भारती के अनेक आयोजनों /कार्यक्रमों तथा विद्या भारती के ही पूर्व विद्यार्थियों के बीच दिए गए डॉ. भागवत जी के व्याख्यानों में शिक्षा दृष्टि के बिंदुओं को रेखांकित किया है। इन व्याख्यानों में भी स्थान-स्थान पर भागवत जी ने विद्यालय-महाविद्यालयों के विद्यार्थियों के भटकाव, शिक्षक-अभिभावकों की भूमिका, शिक्षा में युगानुकूल परिवर्तन, संस्कारवान शिक्षा की आवश्यकता, विद्या भारती के विद्यालयों की भूमिका तथा पूर्व विद्यार्थियों की सामाजिक सक्रियता व भागीदारी की अपेक्षा जैसे अनेक महत्वपूर्ण विषयों पर प्रकाश डाला है।</p>
<p style="text-align: justify;">शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास शिक्षा के क्षेत्र में भारतीयकरण के अभियान में प्रमुखता से कार्य करने वाले संगठन है। न्यास के द्वारा आयोजित ज्ञानोत्सव 2018, भारतीय भाषा अभियान 2018, शिक्षाविद् गोष्ठी 2019, ज्ञानोत्सव 2019 तथा इसी वर्ष अगस्त में शिक्षा में भारतीयता विषय पर अनेक आयोजन हुए हैं, जिनमें  डॉ. मोहन भागवत जी के उद्बोधनों को पुस्तक के इस छठे भाग में संकलित करते हुए संपादक ने उनके शिक्षा के विविध आयामों पर डाले गए प्रकाश की चर्चा की है। शिक्षा के क्षेत्र में प्रयोगधर्मिता की आवश्यकता, समाज आधारित शिक्षा की पुर्नस्थापना, भाषा में स्व व अपनी भाषा, भारत की भाषा तथा मातृभाषा का महत्व जैसे बिंदुओं पर बल दिया गया है। वास्तव में यही समय की आवश्यकता भी है। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 में भी इसकी स्पष्ट झलक दिखाई भी देती है।</p>
<p style="text-align: justify;">पुस्तक के अगले भाग में डॉ. मोहन भागवत जी के द्वारा विभिन्न कार्यक्रम अवसरों पर दिए गए शिक्षा सम्बन्धी उद्बोधनों को संग्रहित किया गया है। इन उद्बोधनों में मुख्यतः शिक्षकों को कर्तृत्व उदाहरण बनने, ग्रन्थ लेखन का उद्देश्य व महत्व, शिक्षा में अपेक्षित परिवर्तन के लिए शोध की महती आवश्यकता, पाठ्यक्रम परिवर्तन, शिक्षा क्षेत्र में नव चिंतन का महत्व, शिक्षा क्षेत्र में मातृ शक्ति की भूमिका तथा विद्या-अविद्या की समझ, जैसे महत्वपूर्ण बिन्दुओं की चर्चा है। इन बिंदुओं पर व्यापक चर्चा कर व्यवहार के धरातल पर उतारने की तुरंत आवश्यकता है।</p>
<p style="text-align: justify;">“भारतीय शिक्षा दृष्टि” पुस्तक के अंतिम खंड में सम्पादक ने उन विषयों को समाहित किया है जिन्हें संघ ने अपने वार्षिक प्रतिवेदन में प्रस्ताव के रूप में सम्मुख रखा है। इस दृष्टि से पुस्तक के इस भाग में संपादक ने संघ की तीन अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा यथा, मार्च-2016 नागौर, मार्च-2018 नागपुर एवं मार्च-2019 ग्वालियर में पारित प्रस्तावों का उल्लेख किया है। इन प्रस्तावों में गुणवत्ता पूर्ण एवं सस्ती शिक्षा सबको सुलभ हो, भारतीय भाषाओं के संरक्षण एवं संवर्धन की आवश्यकता तथा भारतीय परिवार व्यवस्था-मानवता के लिए अनुपम देन जैसे अत्यंत महत्वपूर्ण विषय प्रस्तावों में शामिल हैं। यदि गहनता से देखा जाए तो यह सब विषय न केवल भारतीय सन्दर्भ में ही आवश्यक हैं अपितु वैश्विक दृष्टि से भी नितांत महत्वपूर्ण हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">यह पुस्तक शिक्षा के सभी प्रमुख आयामों को समेटते हुए इसके उपविषयों व महत्व को रेखांकित करती है। इसमें प्रस्तुत सुझाव यदि क्रियान्वित हो सकें, तो भारतीय शिक्षा प्रणाली में व्यापक परिवर्तन संभव है, जिससे शिक्षा में भारतीयता का समावेश होगा। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 ने कई महत्वपूर्ण बिंदुओं को अपनाया है, लेकिन क्रियान्वयन में अभी चुनौतियाँ बनी हुई हैं। यह पुस्तक शिक्षाविदों, शोधार्थियों व शिक्षा सुधार से जुड़े कार्यकर्ताओं के लिए उपयोगी सिद्ध होगी।</p>
<p style="text-align: justify;">पुस्तक का मूल्य भी अपेक्षाकृत काफ़ी कम है। इसलिए सर्व सुलभता की राह में कोई अड़चन नही होगी, ऐसा लगता है। आशा है आगामी संस्करण में संपादक पुस्तक में राष्ट्रीय शिक्षा नीति के प्रासंगिक प्रावधानों तथा चित्रों या रेखाचित्रों का यथोचित समावेशन करेंगे जिससे इस पुस्तक की विषयवस्तु और अधिक प्रभावी बन पड़ेगी। पुस्तक की विषयवस्तु पठनीय है, कलेवर व आवरण आकर्षक है तथा भाषा सरल है। इसलिए पाठकों के मध्य पुस्तक लोकप्रिय होगी, ऎसी अपेक्षा की जानी चाहिए।</p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक, दीनदयाल उपाध्याय अध्ययन केंद्र, हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय में सह आचार्य है।)</p>
<p style="text-align: justify;">पुस्तक का नाम : भारतीय शिक्षा दृष्टि &#8211; डॉ. मोहन भागवत</p>
<p style="text-align: justify;">संपादक : श्री रवि कुमार</p>
<p style="text-align: justify;">प्रकाशक : सुरुचि प्रकाशन, केशव कुंज झंडेवाला, नई दिल्ली-110055</p>
<p style="text-align: justify;">प्रथम संस्करण : अक्टूबर 2024</p>
<p style="text-align: justify;">मूल्य : 235 रुपए</p>
<p style="text-align: justify;">पृष्ठ संख्या : 204</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>और पढ़ें : <a href="https://rashtriyashiksha.com/bhartiya-jeevan-shaily/" target="_blank" rel="noopener">पुस्तक समीक्षा: भारतीय जीवन शैली</a></strong></p>
<p>The post <a href="https://rashtriyashiksha.com/book-review-bharatiya-shiksha-drishti-dr-mohan-bhagwat/">पुस्तक समीक्षा : भारतीय शिक्षा दृष्टि &#8211; डॉ मोहन भागवत</a> appeared first on <a href="https://rashtriyashiksha.com">राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</a>.</p>
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		<title>पुस्तक समीक्षा: भारतीय जीवन शैली</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 01 Dec 2024 07:25:17 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[कुलदीप मेहंदीरत्ता]]></category>
		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[पुस्तक समीक्षा]]></category>
		<category><![CDATA[Bhartiya Jeevan Shailu]]></category>
		<category><![CDATA[Bhartiya Jeevan Shaily]]></category>
		<category><![CDATA[book]]></category>
		<category><![CDATA[hindi literature]]></category>
		<category><![CDATA[indian education]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://rashtriyashiksha.com/?p=8115</guid>

					<description><![CDATA[<p>✍ डॉ. कुलदीप मेहंदीरत्ता लेखक &#8211; रवि कुमार प्रकाशक – सुरुचि प्रकाशन, झंडेवाला, नई दिल्ली पृष्ठ संख्या – 156, मूल्य 150₹ लेखक द्वारा रचित और सुरूचि प्रकाशन, दिल्ली द्वारा प्रकाशित&#8230; </p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"><img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/270d.png" alt="✍" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /> डॉ. कुलदीप मेहंदीरत्ता</p>
<p style="text-align: right;">लेखक &#8211; रवि कुमार</p>
<p style="text-align: right;">प्रकाशक – सुरुचि प्रकाशन, झंडेवाला, नई दिल्ली</p>
<p style="text-align: right;">पृष्ठ संख्या – 156, मूल्य 150₹</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-8117" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/12/71Fv6pr6KyL._AC_UF10001000_QL80_-300x266.jpg" alt="" width="1370" height="1215" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/12/71Fv6pr6KyL._AC_UF10001000_QL80_-300x266.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/12/71Fv6pr6KyL._AC_UF10001000_QL80_-768x681.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/12/71Fv6pr6KyL._AC_UF10001000_QL80_.jpg 1000w" sizes="auto, (max-width: 1370px) 100vw, 1370px" /></p>
<p style="text-align: justify;">लेखक द्वारा रचित और सुरूचि प्रकाशन, दिल्ली द्वारा प्रकाशित यह पुस्तक ‘भारतीय जीवन शैली’ पोषण की भारतीय अवधारणा और जीवनशैली  गहन अंतर्दृष्टि प्रदान करती है। 156 पृष्ठों में विस्तारित यह  पुस्तक भारतीय आहार-विहार और स्वास्थ्य परम्पराओं के सिद्धांतों पर एक व्यापक मार्गदर्शिका प्रस्तुत करती है। आठ भागों में संरचित यह पुस्तक पाठकों को भोजन, जीवनशैली, और स्वास्थ्य के बीच के संबंधों को पारंपरिक भारतीय दृष्टिकोण से समझने का अवसर प्रदान करती है।</p>
<p style="text-align: justify;">भारतीय जीवन शैली की आहार व्यवस्थाओं और व्यवहारों का सैद्धांतिक विश्लेषण पुस्तक के पहले भाग ‘सैद्धांतिक चिन्तन’ की विषयवस्तु है, जो हमारी सांस्कृतिक परंपराओं और ऋतुओं पर आधारित हैं। लेखक भारत की प्राचीन चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद में लिखित प्राकृतिक ऋतुओं के अनुरूप आहार को संयोजित करने के महत्व को रेखांकित करता है। पुस्तक शरीर के दोषों – ‘वात, पित्त और कफ’ के वैज्ञानिक वर्गीकरण पर चर्चा करती है और समझाती है कि इन तत्वों का संतुलन मानव स्वास्थ्य को कैसे निर्धारित करता है। लेखक द्वारा ‘भोजन ही औषधि है’ सिद्धांत की व्याख्या विशेष स्वास्थ्य स्थितियों को प्रबंधित करने और समग्र स्वास्थ्य को बढ़ावा देने की व्यावहारिक अंतर्दृष्टि के साथ की गई है। इसके अतिरिक्त, इस भाग में असंगत आहार विषय को भी शामिल किया गया है, जो पाठक को यह समझाने का प्रयास करता है कि कैसे कुछ खाद्य संयोजन पाचन और स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकते हैं। यह भाग विशेष रूप से उन लोगों के लिए मूल्यवान है जो पारंपरिक भारतीय आहार दर्शन से अपरिचित हैं, क्योंकि यह भाग सैद्धांतिक और वैज्ञानिक अवधारणाओं को सरलता से प्रस्तुत करता है ताकि पाठक बिना किसी पूर्व जानकारी के भी इसका अनुसरण कर सकें।</p>
<p style="text-align: justify;">सैद्धांतिक विचारों से व्यावहारिक अनुप्रयोगों की ओर बढ़ते हुए, दूसरा भाग ‘भोजन संस्कार’ अच्छे स्वास्थ्य के लिए आवश्यक आहार अनुशासन पर बल देता है। पुस्तक का यह भाग संतुलित भोजन दिनचर्या को विकसित करने के लिए आवश्यक दिशानिर्देश प्रदान करता है, जिसमें,  क्या, कैसे और कब खाना चाहिए, इसका सटीक और सूक्ष्म विश्लेषण किया गया है। लेखक आधुनिक जीवन शैली की आहार आदतों के दुष्प्रभावों को हमारे सम्मुख प्रस्तुत करता है और आधुनिक जीवनशैली को संतुलित रखने के लिए आयुर्वेद के साथ उचित समन्वय की आवश्यकता को रेखांकित करता है।</p>
<p style="text-align: justify;">पुस्तक का तीसरा भाग ‘पाकशाला’ घर के केंद्र के रूप में पारंपरिक भारतीय ‘रसोई’ के प्रति एक समग्र और व्यापक दृष्टिकोण प्रदान करता है।  यह भाग रसोई को औषधीय जड़ी-बूटियों, मसालों और पौष्टिक तत्वों को संरक्षित करने वाले एक उपचार स्थल के रूप में चित्रित करता है। लेखक  ‘पारंपरिक भारतीय रसोई में स्थित चिकित्सक’ की अवधारणा का पुनः स्मरण करता है और सामान्य घरेलू उपचारों और कुछ सामग्रियों, जैसे हल्दी और अदरक, के स्वास्थ्य लाभों का वर्णन करता है। यह भाग पाठक को रसोई के चिकित्सीय महत्त्व को दर्शाता है कि यदि भोजन को सही ढंग से तैयार किया जाए, तो हमारा भारतीय भोजन, बीमारियों के विरुद्ध प्रथम रक्षा पंक्ति के रूप में कार्य कर सकता है।</p>
<p style="text-align: justify;">आयुर्वेद से प्रेरित चौथा भाग ‘पंच महाभूत’ हमारा ज्ञानवर्धन करता है कि पंच तत्व (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, और आकाश) हमारे भोजन से कैसे सम्बन्धित हैं और उनका स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव होता है। इसमें विभिन्न प्रकार के खाद्य पदार्थों और उनके हमारे शरीर की शारीरिक और मानसिक स्थिति पर प्रभाव के बारे में चर्चा की गई है। लेखक जल को ‘आदर्श भोजन’ के रूप में इसके शरीर को शुद्ध करने की क्षमता, गुण और उचित तरीके से जल पीने के लाभों की व्याख्या करता है। इसी प्रकार इस भाग में लेखक ने प्रकाश, वायु और अग्नि के पाचन प्रक्रिया एवं स्वास्थ्य सम्बन्धी प्रभावों पर भी प्रकाश डाला है, जो संतुलित जीवन शैली को बढ़ावा देने में पंच तत्त्व की भूमिका को समझने के लिए एक समग्र दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">पांचवें भाग ‘विहार अर्थात् सम्यक दिनचर्या’ में हमारी दैनिक गतिविधियों का विशद विवेचन और विश्लेषण किया गया है। यह भाग सम्यक निद्रा को उत्तम स्वास्थ्य के लिए आवश्यक तत्त्व के रूप में दर्शाता है, आधुनिक चिकित्सा के विभिन्न अनुसन्धान भी इस प्राचीन भारतीय विचार की पुष्टि करते हैं। इसी प्रकार खेल तथा व्यायाम की चर्चा के साथ ‘संवाद’ और वस्त्र चयन आदि के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों को सरल भाषा में प्रस्तुत किया गया है। लेखक योग और ध्यान आधारित एक सुव्यवस्थित दैनिक दिनचर्या पर बल देता है।</p>
<p style="text-align: justify;">छठे भाग ‘स्वस्थ बालक, स्वस्थ राष्ट्र’ में लेखक ने बालकों, विशेषकर विद्यार्थियों के व्यक्तिगत स्वास्थ्य और राष्ट्रीय कल्याण के बीच के संबंध को स्पष्ट किया है। लेखक का स्पष्ट मत है कि एक स्वस्थ बालक ही एक स्वस्थ राष्ट्र के निर्माण में योगदान कर सकता है। यह भाग उचित शिशु आहार, बाल्यावस्था सुपोषण, और मानसिक व शारीरिक स्वास्थ्य विकसित करने वाली आहार आदतों पर केन्द्रित है। यह भाग इस पारम्परिक भारतीय विचार की पुष्टि करता है कि प्रारंभिक जीवन में सुपोषण और अच्छी आदतों का निर्माण, व्यक्ति के सम्पूर्ण जीवन और अंतत: एक राष्ट्र के स्वास्थ्य के लिए आधारशिला का कार्य करता है।</p>
<p style="text-align: justify;">आधुनिक आहार और स्वास्थ्य आदतों, जैसे फास्ट फूड, जंक फ़ूड, और आलस आदि ने मनुष्य के जीवन के समक्ष कई चुनौतियों को उत्पन्न किया है। यह एक ऐसी समस्या है जिससे विश्व के विकसित कहे जाने वाले सभी समुदाय जूझ रहे हैं। पुस्तक का भाग सात ‘इक्कीसवीं सदी’ इसी चुनौती और समाधान को समर्पित है। लेखक वर्तमान भारतीय जीवन शैली में फ़ास्ट फ़ूड और जंक फूड की भूमिका का विश्लेषण  करते हुए उसके हमारे जीवन पर पड़े दुष्प्रभावों को स्पष्ट करता है। आधुनिक विज्ञान भी लेखक द्वारा प्रस्तुत इस प्राचीन भारतीय विचार की पुष्टि करता है कि ‘आहार- विहार और तनाव’ में सीधा सम्बन्ध है।   सोशल मीडिया के बढ़ते उपयोग के हमारे आहार- विहार पर हुए दुष्प्रभावों का विश्लेषण लेखक द्वारा सरल भाषा में किया गया है।</p>
<p style="text-align: justify;">पुस्तक का अंतिम और आठवां भाग ‘परिशिष्ट’ है जो अपने आप में इस पुस्तक का लघु रूप है जिसमें अत्यंत महत्त्वपूर्ण बिन्दुओं को लेखक ने सूत्रात्मक शैली में प्रस्तुत किया है। इसमें ऋतुचर्या अनुसार पथ्य तथा अपथ्य आहार और ऋतुचर्या अनुसार विहार का अद्भुत संकलन है। इस भाग और पुस्तक की एक महत्त्वपूर्ण कड़ी के रूप में लेखक ने आदर्श दिनचर्या के मूलभूत न्यूनतम अथवा सामान्य बिंदु प्रस्तुत किए हैं जिसे पाठक एक चार्ट के रूप में अपने सामने रख सकता है और दैनिक और सामयिक आत्म-विश्लेषण कर सकता है।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-8118" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2024/12/714miHcP9DL._AC_UF10001000_QL80_-230x300.jpg" alt="" width="1418" height="1850" /></p>
<p style="text-align: justify;">लेखक रवि कुमार की यह पुस्तक ‘ भारतीय जीवन शैली’ एक सहज, सरल और सूचनात्मक पुस्तक है जो पारंपरिक भारतीय आहार और जीवन शैली प्रथाओं को हमारे समक्ष प्रस्तुत करती है। सरल भाषा में लिखित यह पुस्तक, पारम्परिक भारतीय सैद्धांतिक चिन्तन को आधुनिक जीवन में अपेक्षित व्यावहारिक मार्गदर्शन के साथ जोड़ती है, और यह बिंदु इस पुस्तक की पठनीयता, महत्ता और आवश्यकता को स्थापित करता है। सरल रूप में ज्ञान का यह प्रकटीकरण, आयुर्वेद और पारंपरिक भारतीय स्वास्थ्य दर्शन से परिचित और अपरिचित दोनों प्रकार के पाठकों के लिए पुस्तक को आकर्षक बनाता है। पुस्तक का सुव्यवस्थित संगठन, सरल भाषा और परिशिष्टों का विचारशील समावेश यह सुनिश्चित करता है कि पाठक इस पुस्तक में चर्चा किए गए सिद्धांतों को अपने दैनिक जीवन में आसानी से क्रियान्वित कर सकें, और सही अर्थों में यही इस पुस्तक की विशेषता और सफलता है। इसलिए यह पुस्तक स्वास्थ्य, पोषण, और सांस्कृतिक ज्ञान में रुचि रखने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए एक पठनीय और संग्रहणीय संसाधन है।</p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र हरियाणा में राजनीति शास्त्र के सहायक प्रोफेसर है।)</p>
<p><strong>और पढ़ें : <span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/book-review-fundamentals-of-indian-education-bhartiya-shiksha-ke-mul-tatva-author-lajjaram-tomar/#google_vignette" target="_blank" rel="noopener">पुस्तक समीक्षा : भारतीय शिक्षा के मूल तत्व</a></span></strong></p>
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		<title>आदिकवि महर्षि वाल्मीकि कृत रामायण का परिचय</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 09 Oct 2022 12:12:06 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>&#8211; धीरेंद्र झा आदि कवि महर्षि वाल्मीकि ने तमसा नदी के तट पर 24000 श्लोकों से निबद्ध रामायण नामक संस्कृत महाकाव्य की रचना की। इस महा काव्य में मर्यादा पुरुषोत्तम&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p dir="ltr" style="text-align: right;">&#8211; धीरेंद्र झा</p>
<p dir="ltr" style="text-align: justify;"><img loading="lazy" decoding="async" class=" wp-image-5881 aligncenter" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/10/images-2022-10-09T173918.636-300x225.jpeg" alt="रामायण" width="1450" height="1088" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/10/images-2022-10-09T173918.636-300x225.jpeg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/10/images-2022-10-09T173918.636.jpeg 640w" sizes="auto, (max-width: 1450px) 100vw, 1450px" /></p>
<p dir="ltr" style="text-align: justify;">आदि कवि महर्षि वाल्मीकि ने तमसा नदी के तट पर 24000 श्लोकों से निबद्ध रामायण नामक संस्कृत महाकाव्य की रचना की। इस महा काव्य में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के जीवन के माध्यम से हमें जीवन के सत्य व कर्तव्यों से परिचित करवाया गया है। इस महाकाव्य के स्रोतपुरुष मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का जीवन दशरथ पुत्र राम से आरंभ होकर अपने दिव्य गुणों एवं आदेशों के कारण मानव से भगवान श्रीराम बन​​ने की कथा है। इस लोकजयी प्रथम महाकाव्य रामायण की रचना करने के कारण ही उन्हें आदिकवि की संज्ञा दी जाती है। इस &#8216;रामायण&#8217; महाकाव्य की रचना के पीछे भी एक कथा प्रचलित है कि एक बार महर्षि तमसा नदी के तट पर अवस्थित अपने आश्रम में साधनारत थे, तभी उन्होंने देखा कि एक बहेलिये ने प्रेम मग्न क्रौञ्च (सारस) पक्षी के जोड़े में से नर पक्षी का वध पक्षी कर दिया। जिसके कारण मादा विलाप करने लगी। उसके करुण को सुनकर वाल्मीकि की करुणा जाग गई और द्रवित अवस्था में उनके मुख से स्वत: ही यह श्लोक प्रकट हुआ-</p>
<p dir="ltr" style="text-align: center;"><strong>&#8220;मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वती समा। यत्क्रौञ्चमिथुनादेक मवधी: काममोहितम्॥&#8221;</strong></p>
<p dir="ltr" style="text-align: justify;">(अर्थात् हे दुष्ट निषाद। तुमने प्रेमालाप में मग्न क्रौञ्च पक्षी का वध किया है। जाओं तुम्हें भी कभी प्रतिष्ठा की प्राप्ति नहीं होगी। और तुम्हें भी वियोग झेलना होगा।</p>
<p dir="ltr" style="text-align: justify;">कवि आनन्दवर्द्धनाचार्य ने लिखा है-<br />
<strong>“क्रौंचइन्द्र वियोगेन शोकः श्लोक त्वमागतः&#8221;</strong> अर्थात क्रौञ्च जोड़ों के दुःख के कारण ही &#8216;श्लोक&#8217; की उत्पत्ति हुई।कवि सुमित्रा नन्दन पंत ने भी इस कथन की पुष्टि करते हुए कहा है कि</p>
<p dir="ltr" style="text-align: center;"><strong>&#8220;वियोगी होगा पहला कवि</strong><br />
<strong>आह से उपजा होगा गान </strong><br />
<strong>निकल कर आँखों से चुपचाप</strong><br />
<strong>वही होगी कविता अनजान।।&#8221;</strong></p>
<p dir="ltr" style="text-align: justify;">इसके बाद उन्होंने प्रसिद्ध महाकाव्य रामायण की रचना की थी। वाल्मीकि ने रामायण में राम के चरित्र के अतिरिक्त अनेक घटनाओं के उस समय के सूर्यचन्द्र तथा अन्य नक्षत्रों की स्थितियों का भी वर्णन किया है। इससे यह ज्ञात होता है कि वे ज्योतिष व खगोल विद्या के भी ज्ञाता थे। भगवान वाल्मीकि त्रिकालदर्शी थे, उन्हें श्रीराम के जीवन में घटित प्रत्येक घटना का पूर्ण ज्ञान था। सतयुग त्रेता और द्वापर तीनों कालों में इनका उल्लेख मिलता है, इसलिए इन्हें सृष्टिकर्त्ता भी कहा जाता है। रामचरितमानस में श्रीराम के वाल्मीकि आश्रम आने और उनके चरणों दण्डवत प्रणाम करने का उल्लेख मिलता है।</p>
<p dir="ltr" style="text-align: justify;"><strong>&#8220;तुम त्रिकालदर्शी मुनिनाथा विस्व बदर जिमि तुमरे हाथा।&#8221; </strong></p>
<p dir="ltr" style="text-align: justify;">अर्थात आप तीनों लोकों को जानने वाले स्वयं प्रभु है। ये संसार आपके हाथ में एक बेर के समान प्रतीत होता है<br />
महाभारत में भी वाल्मीकि का वर्णन मिलता है। जब पाण्डवों ने कौरवों पर विजय प्राप्त कर ली तो द्रौपदी ने एक यज्ञ का आयोजन किया जिसको सफल करने के लिए शंखनाद करना जरूरी था, किन्तु श्रीकृष्ण सहित कोई भी इस कार्य को नहीं कर पाते हैं। तब सभी की प्रार्थना से द्रवित होकर महर्षि वाल्मीकि प्रकट होते हैं तो शंख स्वतः बज उठता है और द्रौपदी का यज्ञ भी सफल हो जाता है। इस घटना का वर्णन कबीरदास जी ने भी किया है।</p>
<p dir="ltr" style="text-align: center;"><strong>&#8220;सुपच रूप धार सतगुरु आए</strong><br />
<strong>पाण्डवों के यज्ञ में शंख बजाए।।&#8221;</strong></p>
<blockquote>
<p dir="ltr" style="text-align: left;">रामायण और महाभारत को संस्कृत साहित्य की परंपरा में इतिहास कहा जाता है। रामायण में बाल काण्ड, अयोध्याकाण्ड, अरण्यकाण्ड, किष्किन्धाकांड सुन्दरकाण्ड, लंकाकाण्ड और उत्तर काण्ड सहित सात अध्याय है। इसमें कुल 24000 श्लोक है। समग्र भारतीय वाङ्गमय एवं विश्व वाङ्गमय के सहस्राधिकों, ग्रन्थों, नाटकों, काव्यों व महाकाव्यों का यह उपजीव्य ग्रंथ है।</p>
</blockquote>
<p dir="ltr" style="text-align: justify;">इस ग्रन्थ की रचना महर्षि वाल्मीकि ने बिहार प्रान्त के चंपारण जिले में तमसा नदी के तट पर अवस्थित वाल्मीकि नगर में की थी। जनकनंदिनी सीता ने अपना परित्याग काल और लव-कुश का जन्म व पालन पोषण भी इसी स्थान पर किया था। नान्य पौराणिक मान्यताओं अनुसार रामायण का काल त्रेतायुग माना जाता है। गोवर्धनपीठ के शंकराचार्य पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र तथा श्री राघवेन्द्रचरितम् के रचनाकार श्री भागवतानंद गुरु के विचार में भगवान श्रीराम का अवतरण श्वेतवाराहकल्प के सातवें वैवस्वत मन्वन्तर के चौबीसवें त्रेता युग में हुआ था। जिसके अनुसार श्रीरामचन्द्र का काल लगभग पौने दो करोड़ वर्ष पूर्व का है। इसकी संपुष्टि में विचार पीयूष, मुशुण्डि रामायण पद्म पुराण हरिवंशपुराण, वायु पुराण संजीवनी रामायण एवं पुराणों से प्रमाण दिया जाता है।</p>
<p dir="ltr" style="text-align: justify;">आधुनिक विद्वान इसका रचनाकाल 7 वीं से 4 थीं शताब्दी ई.पू. मानते है। कुछ विद्वान इसे तीसरी शताब्दी ई. पू.  की रचना मानते है। कुछ भारतीय विद्वान इसे 600 ई.पू. के पहले लिखा गया मानते हैं।</p>
<p dir="ltr" style="text-align: justify;">वाल्मीकि रामायण के नायक मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के सोलह विशिष्ट गुणों का संचय बताया गया है, जो लोगों में नेतृत्वकर्त्ता के महत्वपूर्ण सूत्र है। वाल्मीकि जी ने नारद जी से प्रश्न किया कि सम्प्रति इस लोक में ऐसा कौन मनुष्य है जो गुणवान, वीर्यवान, धर्मज्ञ कृतज्ञ, सत्यवादी और दृढ़व्रत होने के साथ-साथ सदाचारी भी हो। जो सभी प्राणियों का हितचिंतक विद्वान सामर्थ्यशाली और प्रियदर्शन हो। महर्षि वाल्मीकि के शब्दों में-</p>
<p dir="ltr" style="text-align: center;"><strong>&#8220;को उन्चस्मिन् साम्प्रत लोके गुणवान कश्च वीर्यवान। </strong><br />
<strong>धर्मज्ञश्च कृतज्ञश्च सत्यवाक्यो हंदूनतः।।</strong><br />
<strong>चारित्रेण च को युक्तः सर्वभूतेषु को हितः।</strong><br />
<strong>विद्वान कः समर्थश्च कश्चैकप्रियदर्शनः।।</strong><br />
<strong>आत्मवान को जितक्रोधो युतिमान कोऽनुसूयका:। </strong><br />
<strong>कस्य विस्यति देवाश्च जातरोपस्य संयुगे॥&#8221;</strong></p>
<p dir="ltr" style="text-align: justify;">अर्थात गुणवान वीर्यवान धर्मज्ञ, कृतज्ञता, सत्यवादिता, दृढ़व्रत, चरित्रवान, सर्वभूत कल्याण, विद्वता, सामर्थ्यवान, सर्वभूत कल्याण, धैर्यवान, जितक्रोध, कान्तियुक्त, ईर्ष्या द्वेष से दूर रहने वाले और पराक्रमी- ये समस्त षोड्श गुणों से युक्त इक्ष्वाकू वंश में उत्पन्न श्रीराम है।</p>
<p dir="ltr" style="text-align: justify;">राम की इन्हीं विशेषताओं के आधार पर महाकवि मैथिलीशरण गुप्त कहते है कि<strong> &#8220;राम तुम्हारा चरित स्वयं ही काव्य है कोई कवि बन जाय, सहज संभाव्य है।&#8221;</strong><br />
मानव जीवन में आने वाले समस्त सम्बन्धों को पूर्ण तथा उत्तम रूप से निभाने की शिक्षा देने वाले प्रभु श्री रामचन्द्र जी के समान दूसरा कोई चरित्र नहीं है। कवि वाल्मीकि ने उनको गाम्भीर्य में समुद्र तथा धैर्य में हिमालय की तरह माना है। <strong>&#8220;समुद्र इव गाम्भीर्येधैर्येण हिमवानिव।।&#8221;</strong> वाल्मीकि रामायण के तीन पाठ प्राप्त होते हैं- (1) दाक्षिणात्य पाठ (11) गौड़ीय पाठ (111) पश्चिमोत्तरीय पाठ या काश्मीर संस्करण।</p>
<p dir="ltr" style="text-align: justify;">उपर्युक्त तीन पाठों में केवल पाठभेद ही नहीं आपत कहीं-कहीं इसके सर्ग भी भिन्न-भिन्न हैं। रामायण की प्रमुख टीकाओं में रामानुजीयम, सर्वार्थसार, रामायणदीपिका बृहद विवरण लघुविवरण, रामायण तत्वदीपिका भूषण वाल्मीकिहृदय, अमृतकर्तृक रामायणतिलक रामायण शिरोर्माण, विषमपदविवृति और रामायण भूषण प्रसिद्ध टीकायें है।</p>
<p dir="ltr" style="text-align: justify;">इसी प्रकार रामायण के आधार पर संत तुलसीदास ने रामचरितमानस, मैथिलीशरण गुप्त ने पंचवटी और साकेत नामक खंडकाव्यों की रचना की। नेपाल के कविवर श्री राधेश्याम जी ने राधेश्याम रामायण, प्रेमभूषण ने प्रेम रामायण महर्षि कम्बन ने कम्बरामायण आध्यात्म रामायण, सुब्रह्मण्यम भारती कृत तामिलू रामायण कत्तिवास रामायण इत्यादि। अनेकानेक रामायणों की रचना की गयी। किसी ने ठीक ही कहा है-</p>
<p dir="ltr" style="text-align: center;"><strong>&#8220;नाना भांति राम अवतारा</strong><br />
<strong> रामायण सत कोटि अपारा। </strong><br />
<strong>एक राम दशरथ का बेटा।</strong><br />
<strong>एक राम घट-घट में लेटा । </strong><br />
<strong>एक राम का सकल पसारा।</strong><br />
<strong>एक राम है सबसे न्यारा॥&#8221; </strong></p>
<p dir="ltr" style="text-align: justify;"><img loading="lazy" decoding="async" class=" wp-image-5879 aligncenter" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/10/download-3.jpeg" alt="रामायण" width="1482" height="1979" /></p>
<p dir="ltr" style="text-align: justify;">रामचरित के उद्‌गाता आदि कवि महर्षि वाल्मीकि का जन्म महर्षि कश्यप और अदिति के नवम पुत्र वरुण (आदित्य) से  हुआ। इनकी माता चर्षणी और भाई मृग थे। वरुण का एक नाम प्रचेत भी है इसलिए इन्हें प्राचेतस नाम से माँ अभिहित किया जाता है। उपनिषद के अनुसार यह भी अपने भाई मृगु की तरह परम ज्ञानी थे। एक बार ध्यान में बैठे हुए वरुण पुत्र के शरीर को दीमकों ने अपना घर बनाकर ढक लिया था। साधना पूरी करके जब यह दीमकों के घर, जिसे वल्मीक कहते हैं से बाहर निकले तो लोग इन्हें वाल्मीकि कहने लगे। हर वर्ष आश्विन माह की पूर्णिमा तिथि को महर्षि वाल्मीकि जी का जन्मोत्सव मनाया जाता है। महर्षि वाल्मीकि ने नारद मुनि के मार्गदर्शन में रामभक्ति का पथ अपनाया और 24000 श्लोकों युक्त &#8216;रामायण&#8217; महाकाव्य की रचना की। महर्षि वाल्मीकि का संदेश हमें उनके रामायण के श्लोकों में दृष्टिगत होता है, यथा–</p>
<p dir="ltr" style="text-align: center;"><strong>धर्मादर्थः प्रभवति धर्मात प्रभवते सुखम्।</strong><br />
<strong>धर्मेण लभते सर्वं धर्मसारमिदं जगत्॥ </strong></p>
<p dir="ltr" style="text-align: justify;">अर्थात धर्म से ही धन, सुख तथा सब कुछ प्राप्त होता है। इस संसार में धर्म ही सार वस्तु है।</p>
<p dir="ltr" style="text-align: center;"><strong>&#8220;सत्यमेवेश्वरो लोके सत्ये धर्मः सदाश्रितः। </strong><br />
<strong>सत्यमूलानि सर्वाणि सत्यान्नास्ति परं पदम्॥&#8221;</strong></p>
<p dir="ltr" style="text-align: justify;">अर्थात सत्य ही संसार में ईश्वर है। धर्म भी सत्य पर ही आश्रित है। सत्य ही सभी सफलताओं व समृद्धि का आधार है। सत्य से बढ़कर और कुछ नहीं है।</p>
<p dir="ltr" style="text-align: center;"><strong>&#8220;उत्साही बनवावार्य नास्त्यु सोत्साहस्य हि पत्साहात्परं बलम्।</strong><br />
<strong>सोत्सह्स्य ही लेकिशु न  किच्चिदपि दुर्लभम।।&#8221;</strong></p>
<p dir="ltr" style="text-align: justify;">अर्थात उत्साह में बड़ी शक्ति होती है उत्साह से बढ़कर कोई बल नहीं है। उत्साही पुरुष के लिए इस संसार में कुछ भी दुर्लभ नही है।</p>
<p dir="ltr" style="text-align: center;"><strong>&#8220;वाच्यावाच्य प्रकुपितो न विजानाति कर्हिचित।</strong><br />
<strong>नाकार्यमस्ति क्रुद्धस्य न वाच्यं विद्यते क्वचित।।&#8221;</strong></p>
<p dir="ltr" style="text-align: justify;">अर्थात क्रोध की स्थिति में मनुष्य को कहने और न कहने योग्य बातों का विवेक नहीं होता है। क्रुद्ध मनुष्य कुछ भी कह और बोल सकता है। उसके लिए कुछ भी अकार्य और अवाच्य नहीं है।</p>
<p dir="ltr" style="text-align: center;"><strong>&#8220;यदाचरिता कल्याणि। शुभं वा यदि वार्ड शुभम्।</strong><br />
<strong>तदेव लभते भद्रे कती कर्मजमात्मनः॥&#8221;</strong></p>
<p dir="ltr" style="text-align: justify;">अर्थात मनुष्य जैसा भी अच्छा या बुरा कर्म करता है, उसे वैसा ही फल मिलता है। कर्ता को अपने कर्मों का फल अवश्य भोगना पड़ता है।</p>
<p dir="ltr" style="text-align: center;"><strong>&#8220;सुदुःखं शयितः पूर्वं प्राप्येदं सुखमुत्तमम्।</strong><br />
<strong>प्राप्तकालं न जानीते विश्वामित्रो यथा मुनिः।।&#8221;</strong></p>
<p dir="ltr" style="text-align: justify;">अर्थात किसी को जब दुःख भोगने के बाद पर्याप्त सुख मिलता है तो उसे विश्वामित्र मुनि की भाँति समय का ज्ञान नहीं रहता। उसे सुख का अधिक समय भी थोडा ही लगता है।</p>
<p dir="ltr" style="text-align: center;"><strong>&#8220;निरुत्साहस्य दीनस्य शोपात्मनः।</strong><br />
<strong>सर्वाध व्यवसीदन्ति व्यसन चाधिगच्छति।।&#8221;</strong></p>
<p dir="ltr" style="text-align: justify;">अर्थात उत्साह हीन, दीन और शोकाकुल मनुष्य के सभी काम बिगड़ जाते हैं, वह घोर विपत्ति में फंस जाता है।</p>
<p dir="ltr" style="text-align: center;"><strong>&#8220;गुणवान व परजन: स्वजनो निर्गुणोऽपि वा।</strong><br />
<strong>निर्गुणः स्वजनः श्रेयान यः परः पर एव सः॥&#8221;</strong></p>
<p dir="ltr" style="text-align: justify;">अर्थात पराया मनुष्य भले ही गुणवान हो तथा स्वजन सर्वथा गुणहीन ही क्यों न हो, लेकिन गुणी परजन (पराया) से स्वजन (अपना) ही भला होता है। क्योंकि अपना तो अपना है और पराया पराया ही रहता है।</p>
<p dir="ltr" style="text-align: center;"><strong>&#8220;उपकार फलं मित्रमपकारोऽरिलक्षणम्।&#8221;</strong></p>
<p dir="ltr" style="text-align: justify;">अर्थात उपकार करना मित्रता का लक्षण है और अपकार करना शत्रुता का।</p>
<p dir="ltr" style="text-align: justify;">इस प्रकार आदिकवि महर्षि वाल्मीकि एक लोकजयी व कालजयी कवि थे। उन्होंने अपनी रचनाओं रामायण, योगवसिष्ठ और अक्षर लक्ष्यादि के माध्यम से एक लोक कल्याणकारी, परिवार, समाज, राष्ट्र और व्यक्ति वसुधैव कुटुम्बकम के जीवन्त स्वरूपण का निदर्शन किया है। वाल्मीकि रामायण काव्यसौन्दर्य, सौष्ठव भांपा अलंकार और काव्योपदेश सभी दृष्टियों से एक &#8220;न भूतो न भविष्यति” रचना है।</p>
<p dir="ltr" style="text-align: justify;">आज भी हजारों-हजार काव्य न केवल भारतवर्ष अपितु समग्र विश्व में राम कथा का आधार लेकर लिखे जा रहे हैं। किसी ने ठीक ही कहा है-</p>
<p dir="ltr" style="text-align: center;"><strong>&#8220;यावत स्थास्यन्ति गिरयः सरितश्च महीतलो।</strong><br />
<strong>तावद रामायणी कथा लोकेषु प्रचरिष्यते इति।।&#8221;</strong></p>
<p dir="ltr" style="text-align: justify;">ये भी पढ़े : <strong><span style="color: #3366ff;"><a style="color: #3366ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/our-cultural-festival-guru-purnima/" target="_blank" rel="noopener">हमारा सांस्कृतिक पर्व – गुरु पूर्णिमा</a></span></strong></p>
<p dir="ltr" style="text-align: justify;">संदर्भ-<br />
1. हजारीप्रसाद द्विवेदी ग्रन्थावली (2007) पृ.91</p>
<p dir="ltr" style="text-align: justify;">2. पट्टनायक देवदत्त &#8211; Was Ram born in Ayodhya Mumbai Mircos</p>
<p dir="ltr" style="text-align: justify;">3. सहरिया (2009) वन्या पत्रिका आदिम जाति कल्याण विभाग</p>
<p dir="ltr" style="text-align: justify;">4. जोशी अनिरुद्ध &#8211; महाभारत में रामायण की रामकथा</p>
<p dir="ltr" style="text-align: justify;">5. वेबदुनिया. कॉम. सिंह वी.पी. (2001)। गोविन्दचन्द्र पाण्डे &#8211; Life</p>
<p dir="ltr" style="text-align: justify;">6. Thought and culture of India 16 वाल्मीकीय रामायण &#8211; देहाती पुस्तक भंडार दिल्ली</p>
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		<title>विभाजनकालीन भारत के साक्षी</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 16 Aug 2022 06:00:08 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[पुस्तक समीक्षा]]></category>
		<category><![CDATA[वासुदेव प्रजापति]]></category>
		<category><![CDATA[14 August]]></category>
		<category><![CDATA[Amrit Mahotsav]]></category>
		<category><![CDATA[indian education]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[Vibhajan]]></category>
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					<description><![CDATA[<p> &#8211; वासुदेव प्रजापति यह  परिचय है “विभाजनकालीन भारत के साक्षी” पुस्तक का। भारत विभाजन के विषय पर वैसे तो अनेक पुस्तकें लिखी गईं हैं, किन्तु यह पुस्तक उनसे भिन्न है&#8230; </p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"> &#8211; वासुदेव प्रजापति</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-5722" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/08/WhatsApp-Image-2022-08-16-at-11.36.50-AM-205x300.jpeg" alt="" width="1671" height="2445" /></p>
<p>यह  परिचय है “विभाजनकालीन भारत के साक्षी” पुस्तक का। भारत विभाजन के विषय पर वैसे तो अनेक पुस्तकें लिखी गईं हैं, किन्तु यह पुस्तक उनसे भिन्न है और विशेष है। सामान्यतया इस विषय पर लिखी गई पुस्तकों का लेखन सरकारी दस्तावेज या कांग्रेस अथवा मुस्लिम लीग जैसी संस्थाओं की कार्यवाही व कार्यक्रमों के आधार पर हुआ हैं जो उनको ही उभारती है अथवा बचाती है। जबकि यह पुस्तक जिन्होंने प्रत्यक्ष विभाजन की विभीषिका को झेला है, उनके मुख से निकली उनकी वेदना का वास्तविक लेखन है।</p>
<p>यह वास्तविक लेखन करनेवाले लेखक हैं- श्री कृष्णानंद सागर। आप स्वयं विभाजन की त्रासदी के प्रत्यक्ष द्रष्टा हैं, स्वयं ने उस वेदना को सहा है। आपकी उसी वेदना ने इस पुस्तक को जन्म दिया है, इसलिए भी यह पुस्तक विशेष है। उन्होंने अपने जैसे लगभग पांच सौ लोगों के साक्षात्कार लिए जिन्होंने खुद विभाजन की त्रासदी को झेला है। लगभग बीस वर्षों के कठिन परिश्रम से लिए गए साक्षात्कारों में से तीन सौ पचास की आपबीती को पुस्तक के चार खण्डों में समाहित किया है। यह परिचय पुस्तक के चार खंडों में से प्रथम खण्ड का है, प्रथम खण्ड में दो अनुभाग हैं। अनुभाग एक में लेखक ने विभाजन से सम्बन्धित कुछ तथ्यों का समावेश किया है, जो विभाजन की वास्तविकता उजागर करते हैं। अनुभाग दो में 76 साक्षियों के संस्मरणों को साक्षियों के नाम के अनुक्रम से समाहित किया है, जो अनिल गुप्ता से प्रारम्भ होकर गौरीनंदन सिंहल तक चलते हैं। इस प्रथम खण्ड की प्रस्तावना श्रीयुत् श्रीराम आरावकर जी ने लिखी है, आप वर्तमान में अ. भा. विद्याभारती शिक्षा संस्थान के सह संगठन मंत्री हैं। जागृति प्रकाशन, एफ 109, सेक्टर 27, नोएडा- 201301 में इसका प्रकाशन हुआ है। लेखक ने यह पुस्तक जिन्हें समर्पित की है उसे पढ़ने से पुस्तक का मंतव्य स्पष्ट हो जाता है-</p>
<p style="text-align: center;"><strong>समर्पण</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>उन लाखों देशवासियों को</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>जो हिन्दू होने के कारण</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>बर्बर आततायियों की खड्गों व गोलियों के शिकार हुए।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>उन सहस्रों माताओं वह बहनों को</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>जिन्होंने अपनी अस्मिता की रक्षा के लिए</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>जीवित ही अग्नि चिंताओं में जलकर</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>अथवा नदियों व कुओं में समाकर अपनी जीवन लीला</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>समाप्त कर ली।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>उन सैंकड़ों युवा वीरव्रतियों को</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>जो अपने प्राणों की चिन्ता न करके</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>विधर्मी आक्रमणकारियों से भिड़ गए</strong><strong>,</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>और अनेकों को यमलोक भेजकर स्वयं भी सदा के लिए</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>मातृभूमि की गोद में सो गए।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>विभाजन की पृष्ठभूमि</strong></p>
<p>लेखक ने विभाजन की वास्तविकता को समझने के लिए कुछ महत्वपूर्ण बिन्दुओं का समावेश किया है, जिन्हें पढ़ने से विभाजनकारियों की मानसिकता स्पष्ट होती है।</p>
<p>१. यह केवल विभाजन नहीं था अपितु सीधा-सीधा हिन्दू समाज तथा मुस्लिम समाज के बीच एक महायुद्ध था। इस महायुद्ध के कई रणक्षेत्र थे, अनेक ‘कुरुक्षेत्र’ व अनेक ‘पानीपत’ थे। अगस्त १९४६ में बंगाल से प्रारम्भ हुआ               यह युद्ध अगस्त-सितंबर १९४७ तक बिहार, पश्चिमी उत्तरप्रदेश, मेवात, राजस्थान का कुछ भाग, हरियाणा, हिमाचल, पूर्वी पंजाब, सिंध, बलूचिस्तान, सीमाप्रांत तथा जम्मू-कश्मीर तक फ़ैल गया था अर्थात् लगभग आधे भारत में इस युद्ध का व्याप था।</p>
<p>२. इस युद्ध में मुस्लिम आक्रान्ता था। मुस्लिम लीग उसका नेतृत्व कर रही थी। मुस्लिम प्रशासन, मुस्लिम पुलिस व मुस्लिम सेना पूरी तरह से उसकी पीठ पर थी। जबकि हिन्दू समाज आक्रमित था। उसका कोई नेता नहीं था। उसकी            पीठ पर न तो हिन्दू प्रशासन, न हिन्दू पुलिस और न हिन्दू सेना ही थी। जिन हिन्दू नेताओं पर हिन्दू समाज ने विश्वास किया था, उन्होंने वाग्शूरता तो दिखाई किन्तु प्रत्यक्ष युद्ध शुरू होने से पहले ही पीठ दिखाकर भाग गए। अतः हिन्दू समाज को यह युद्ध अपने बलबूते पर ही लड़ना पड़ा था।</p>
<p>उपर्युक्त बिन्दु के पक्ष में वे अधोलिखित तथ्य देते हैं &#8211;</p>
<p>(अ) महात्मा गांधी विभाजन होने के पहले तक यह कहते रहे कि विभाजन मेरी लाश पर होगा। उनके इस वक्तव्य पर विश्वास कर अनेक हिन्दू वहीं रहे और मुसलमानों की बर्बरता के शिकार हुए। ऐसे आक्रन्ता मुस्लिमों के प्रति गांधीजी की सद्भावना उनके इस भाषण से ज्ञात होती है।</p>
<p><strong>८ अगस्त १९४२ को मुम्बई में कांग्रेस महासमिति में गांधीजी के भाषण का अंश</strong></p>
<p>“पाकिस्तान के सवाल पर मेरे मन में कोई भ्रम नहीं है। चाहे कुछ भी हो, पाकिस्तान हिन्दुस्तान के बाहर नहीं बन सकता। आजादी सबके लिए है, किसी एक जाति या कौम के लिए नहीं। किसी भी कौम को हिन्दुस्तान की हुकूमत सौंप देने की जो मांग मौलाना साहब (मौलाना आजाद) ने ब्रिटेन के सामने पेश की है, मैं उसका समर्थन करता हूँ। अगर मुसलमानों को हुकूमत सौंप दी जाए तो उससे मुझे कोई रंज नहीं होगा, आखिर वे भी हिन्दुस्तानी हैं। हिन्दू भी यह समझ लें कि उन्हें अल्पसंख्यकों सहित सबके लिए लड़ना है। मुसलमानों की जान बचाने के लिए उन्हें अपनी जान की कुर्बानी करनी चाहिए। यह अहिंसा का पहला पाठ है।”</p>
<p>&#8211; कांग्रेस का इतिहास, खण्ड २, पृष्ठ ४०७</p>
<p>(आ) दूसरा दृष्टांत नेहरु जी का है। यह उस समय का है जब एक हिन्दू प्रतिनिधि मंडल विभाजन के नाम पर हो रहे आक्रमण से बचाने की मांग लेकर उनसे मिलने गया, तब नेहरूजी ने उन्हें दो टूक मना कर दिया कि सरकार तुम्हारी कोई मदद नहीं कर सकती।</p>
<p>मार्च के महीने में जवाहरलाल नेहरू अमृतसर आए थे। जगह-जगह जले हुए मकानों व दुकानों के मलबे के ढेरों को देखकर उन्होंने कहा था कि ऐसा लगता है मानो यहाँ भीषण बम वर्षा की गई हो। नेहरूजी उस समय अंतरिम सरकार के प्रमुख थे। अमृतसर की विभिन्न हिन्दू संस्थाओं का एक प्रतिनिधि मंडल उनसे भेंट करने पहुँचा और उनसे रक्षा करने की प्रार्थना की। नेहरूजी बोले- “सरकार जो भी कर सकती है, कर रही है, इससे अधिक वह नहीं कर सकती। आपको अपनी सुरक्षा खुद ही करनी पड़ेगी।” तब एक ने कहा, फिर तो आप हमें हथियार दे दीजिए, हम अपनी सुरक्षा खुद कर लेंगे। नेहरूजी- यह कैसे हो सकता है? अगर सरकार हिन्दुओं को हथियार देगी तो कल को मुसलमान भी मांगेंगे। तब दूसरा बोला, तो फिर आप हमें जहर ही दे दीजिए। अब नेहरू जी सकपका गए, वे उस समय चुर्रट पी रहे थे। चुर्रट का धुआं छोड़ते हुए बोले- देखो भाई, यह जो मार-काट चल रही है, इसका एक ही हल हमारी समझ में आ रहा है कि हिन्दुस्तान का विभाजन मान लिया जाए।</p>
<p>उस प्रतिनिधि मंडल के एक सदस्य थे ज्ञानी पिण्डीदास जी, उन्होंने नेहरू जी को बहुत ही खरी-खरी सुनाते हुए कहा- “अभी तक तो आप ऊँची-ऊँची घोषणाएँ करते फिर रहे थे कि हिन्दुस्तान का विभाजन किसी भी कीमत पर नहीं होगा। अब मुस्लिम दंगों को दृढ़तापूर्वक दबाने की बजाय आप उनके आगे घुटने टेकने की सोच रहे हैं। यह तो स्पष्ट ही आपकी कायरता है, आपका दोगलापन है। आपकी कथनी व करनी में अन्तर है। उन्होंने प्रश्न किया- “क्या विभाजन स्वीकार लेने पर स्थायी शान्ति हो जायेगी?&#8221; नेहरू जी ने इसका कोई उत्तर नहीं दिया।</p>
<p>सब लोग नेहरू जी के पास गए तो थे बहुत आशा लेकर, लेकिन लौटे निराश होकर। इस भेंट से एक बात बिल्कुल साफ हो गई थी कि सरकार तथा प्रशासन हिन्दुओं की कोई मदद नहीं करेगा, हिन्दूओं को अपनी रक्षा अपने बलबूते पर ही करनी होगी।</p>
<p><strong>तथ्य जो पहली बार उजागर हुए</strong></p>
<p>लेखक ने प्रस्तुत पुस्तक में उन तथ्यों को उजागर किया है, जिन्हें आम जन तक पहुँचने ही नहीं दिया गया। आपकी जानकारी के लिए प्रस्तुत है, ऐसे कुछ तथ्य –</p>
<p>१. विभाजन पूर्व से ही मुस्लिम लीग डंके की चोट पर कहती थी कि वह मुसलमानों की प्रतिनिधि संस्था है और उसे मुसलमानों के लिए अलग से मुस्लिम ‘होमलैंड’ चाहिए। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए वह मुसलमानों को सशस्त्र व आक्रामक होने का आह्वान करती थी। इतना ही नहीं उसने तो द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त होने के बाद अमरीकी सेना द्वारा छोड़े गए शस्त्रों को औने-पौने दामों में खरीदकर मुसलमानों को बांटे थे।</p>
<p>२. दूसरी ओर कांग्रेस की भ्रमपूर्ण स्थिति ऐसी थी कि वह स्वयं को हिन्दुओं व मुसलमानों दोनों की प्रतिनिधि संस्था मानती थी। जबकि मुसलमान उसे अपनी संस्था नहीं मानते थे। इस भ्रमजाल में फंसी कांग्रेस स्वयं को हिन्दुओं की संस्था मानती ही नहीं थी। इसलिए वह कभी हिन्दू हित की कोई बात नहीं करती थी। इसके विपरीत वह तो मुस्लिम आक्रामकता के विरुद्ध हिन्दुओं को शान्ति व अहिंसा का ही उपदेश देती थी। परिणाम स्वरूप मुसलमान मारते थे और हिन्दू कायर की भांति मार खाते थे और कांग्रेस मूक दर्शक बनी रहती थीं।</p>
<p>३. इस विषय परिस्थिति में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई थी, क्योंकि संघ एक हिन्दू संगठन था। संघ की मान्यता थी कि हिन्दू समाज भारत का आदिकाल से पुत्रवत समाज है। यह संगठित व शक्ति सम्पन्न      होगा तो विदेशी शासक यहाँ टिक ही नहीं पायेगा। अतः संघ ने स्वयं को प्रचलित राजनीति से दूर रखते हुए हिन्दू समाज को संगठित करने का काम स्वीकारा था। देश का दुर्भाग्य ही माना जाएगा कि तब तक संघ का कार्य देशभर में इतना विस्तार नहीं पा सका था कि वह अकेला अपने बलबूते पर विभाजन को टाल सकता। फिर भी संघ के स्वयंसेवकों ने विभाजन की इस त्रासदी में अपनी सामर्थ्य से बढ़कर हिन्दू समाज की रक्षा व सेवा की थी।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-5715" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/08/Hotpot-1-300x200.png" alt="" width="1676" height="1117" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/08/Hotpot-1-300x200.png 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/08/Hotpot-1.png 512w" sizes="auto, (max-width: 1676px) 100vw, 1676px" /></p>
<p><strong>अनेक स्वयंसेवकों ने बलिदान दिया</strong></p>
<p>जिन दिनों कांग्रेस के नेता इस जुगत में लगे हुए थे कि उन्हें भी सत्ता का कोई न कोई टुकड़ा मिल जाए, उन्हीं दिनों में संघ के स्वयंसेवक नगरों, ग्रामों व गली मोहल्लों में हिन्दुओं में आत्मविश्वास जगाते हुए आक्रमणकारियों से लोहा ले रहे थे। इस ग्रंथ में दिए गए साक्षात्कारों में से लगभग ९०% साक्षात्कार इस तथ्य की पुष्टि करते हैं। ऐसी मात्र दो घटनाएँ यहाँ दी जा रही है।</p>
<p>(१) बलिदान का यह मार्मिक दृष्टांत है बीकानेर के श्री किशोर दास अरोड़ा ‘गांधी’ का। वे बताते हैं कि उनके पिताजी की खैरपुर खातीवाला, बहावलपुर रियासत में मिर्च का व्यापार था। खैरपुर मिर्च की प्रसिद्ध मंड़ी थी। यह बात है सन् १९४५ की। उस समय किशोरदास जी शिशु स्वयंसेवक थे। श्री प्रेमकुमार गोगिया व युधिष्ठिरजी खैरपुर शाखा के प्रमुख कार्यकर्ता थे। दोनों ही हिम्मत वाले जवान थे। जब उस इलाके का वातावरण बिगड़ने लगा तो इन्होंने पहले से ही तैयारी शुरू कर दी। बोतल बम, बल्ब बम भी बनाना सीख लिया और आवश्यक सामग्री इकठ्ठी करके रख दी।</p>
<p>अगस्त १९४७ में मुसलमानों ने सारे हिन्दू क्षेत्र को घेर लिया। हिन्दू मोहल्लों से बाहर रहने वाले हिन्दुओं के मकानों को लूटकर उनमें आग लगा दी। उनमें रहने वाले हिन्दू मारे गए, कुछ अपनी जान बचाकर हिन्दू मोहल्लों में आ गए। आक्रमणकारी कुछ मुसलमानों के पास बन्दुकें थीं। वे गोलियां चलाने लगे। गोलियों की बौछार के सामने भी प्रेमकुमार जी व युधिष्ठिर जी ने हिम्मत नहीं हारी, उनका मुकाबला करते रहे। यह मुकाबला तीन दिन तक चला। तीसरे दिन मुकाबला करते समय पहले युधिष्ठिर जी को और बाद में प्रेमकुमार जी को गोली लगी, दोनों शहीद हो गए। दोनों ने मरते दम तक हिन्दुओं को बचाए रखा। बाद में भी संघर्ष तो चलता रहा, परन्तु रियासत के एक अंग्रेज सैनिक अधिकारी ने शेष हिन्दूओं को बचा लिया।</p>
<p>जो हिन्दू खैरपुर में बच गए, वे सब बीकानेर आ गए। उन सबका विश्वास है कि हम उन दोनों बलिदानी स्वयंसेवकों के कारण बचे। अतः बीकानेर में आज भी खैरपुर भवन बना हुआ है, उसमें प्रेमकुमार जी व युधिष्ठिर जी के चित्र लगे हैं। हर वर्ष अगस्त के अंतिम रविवार को वे सब दोनों बलिदानी स्वयंसेवकों की याद में शहीद दिवस मनाते हैं।</p>
<p>(२) दूसरा दृष्टांत बताने वाले स्वयंसेवक हैं श्री कृष्ण कुमार महाजन। उनका यह दृष्टांत है, गुरदासपुर जिले की शकरगढ़ तहसील के सुखोचक गांव का। शकरगढ़ तहसील बॅंटवारे में पाकिस्तान चली गई थी। वहाँ के मुसलमानों ने हिन्दुओं पर हमले शुरू कर दिए तो हिन्दू पलायन कर लाहोर रिलीफ कैम्प में आ गए। दालमंडी में अधिकांश मुसलमान होने के कारण वहाँ के हिन्दू भी दयाल सिंह कॉलेज में इकट्ठे हो गए। उधर मुसलमानों ने दयाल सिंह कॉलेज को चारों ओर से घेर लिया। यह सूचना रिलीफ कैम्प में हम स्वयंसेवकों को मिली।</p>
<p>सूचना मिलते ही हम १३ स्वयंसेवक दयाल सिंह कॉलेज से हिन्दुओं को रिलीफ कालेज में लाने के लिए ट्रक से चले। हम शहर के अन्दर से न जाकर बाहर-बाहर रावी रोड़ से जा रहे थे। रावी रोड़ पर हमारे सामने बलूच मिलिट्री आ गई, उसमें सब मुसलमान सिपाही थे। मिलिटर ने ट्रक रोक लिया और हमसे पूछा- “कौन हो, कहाँ जा रहे हो?” हमने बताया कि हम पंजाब रिलीफ कमेटी के कार्यकर्ता हैं और रिलीफ के लिए जा रहे हैं। बलूच मिलिट्री ने हम सबको ट्रक से उतार कर एक लाइन में खड़ा कर दिया और एक-एक को गोली मारनी शुरू कर दी। हम लोग निहत्थे थे। लाइन में पांचवे या छठे नंबर पर सरदार प्रद्युम्नसिंह थे। उनके बाद मैं था और मेरे बाद सरदार जगत सिंह थे। प्रद्युम्न सिंह काफी तगड़े और हट्टे-कट्टे थे। उन्हें गोली लगते ही उनका हाथ जोर से मेरी छाती पर लगा और उनके साथ ही मैं भी जमीन पर धड़ाम से गिर पड़ा। जगत सिंह छोटे कद के थे मेरे साथ वे भी गिर पड़े। मैं और जगत सिंह प्रद्युम्न सिंह के नीचे दब गए और बेहोश हो गए।</p>
<p>अपनी तरफ से बलूच मिलिट्री हम १३ स्वयंसेवकों को मरा समझकर चली गई थी। लेकिन मैं और जगतसिंह बच गए थे। कुछ देर बाद हम दोनों को होश आया, तब हम छुपते-छुपाते कैम्प में पहुंचे। मुझे आज भी यही लगता है कि इस बर्बर घटना को बताने के लिए ही भगवान ने हम दोनों को बचाया था। ऐसी अनेक घटनाएँ हैं, जिनमें संघ के स्वयंसेवकों ने हिन्दू समाज की रक्षार्थ अपना बलिदान दिया।</p>
<p><strong>क्या आप भी इन घटनाओं को जानना चाहेंगे</strong><strong>?</strong></p>
<p>पुस्तक परिचय में मैंने तो नमूना रूप दो घटनाओं की ही जानकारी दी है। जबकि सम्पूर्ण पुस्तक ऐसी ही हृदय विदारक घटनाओं से भरी पड़ी है। ऐसी ही कुछ घटनाओं का उल्लेख मात्र कर रहा हूँ, जिनको आप भी जानना चाहेंगे, यथा-</p>
<ol>
<li>किस पिता ने अपने पुत्र से कहा- मुझे तू ही गोली मार दे?</li>
<li>एक बाल स्वयंसेवक ने क्यों कहा- “मैं बम बनाऊॅंगा?”</li>
<li>किस रेलवे स्टेशन पर मौत का तांडव मचा?</li>
<li>राष्ट्र सेविका समिति की बहनों का क्या योगदान था?</li>
<li>किस स्वयंसेवक के मामा जी ने नेहरू जी को बचाया?</li>
<li>हिन्दू लीग की स्थापना किसने की?</li>
<li>कुर्बानी की गाय कौन छीन लाए?</li>
<li>किस बताई महिला ने झाड़ू से मुसलमान को मार डाला?</li>
<li>आर्य समाज के गुरुकुल झज्जर की क्या भूमिका रही?</li>
<li>झूठी गवाही देने वाला वह कौन था जो राष्ट्रपति बना?</li>
<li>मेवों में बच्चूसिंह का खोंफ क्यों था?</li>
<li>अमृतसर दरबार साहब पर हमला किनके सहयोग से नाकाम रहा?</li>
<li>काहूटा का वह दर्दनाक दृश्य क्या था? आदि आदि</li>
</ol>
<p>उपर्युक्त सभी प्रश्नों के उत्तर आपको यह पुस्तक, “विभाजनकालीन भारत के साक्षी” देती है। आज की नई पीढ़ी विभाजन की वेदना से बिल्कुल अनजान है। इस वेदना को जाने बिना राष्ट्र की एकता व अखण्डता हेतु वह क्यों अपना जीवन खपाएगी? राष्ट्र के लिए जीवन खपाने वाली पीढ़ी का निर्माण होने से ही भारत पुनः विश्व कल्याण की भूमिका का निर्वहन कर पाएगा। इसीलिए आवश्यक है कि नई पीढ़ी विभाजन की वेदना को जाने, जिसे लेखक ने पुस्तक के समापन में इन शब्दों व्यक्त की है-</p>
<p style="text-align: center;"><strong>सोचता हूँ</strong><strong>,</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>हम एक रात के लिए घर से निकले थे।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>आज तीन पीढियां बीत गईं</strong><strong>,</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>लेकिन वह एक रात समाप्त नहीं हुई।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>वह रात</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>कब समाप्त होगी</strong><strong>?</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>और हम कब घर वापिस पहुंचेंगे</strong><strong>?</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>इसका उत्तर क्या</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>कोई देगा</strong><strong>?</strong></p>
<ul>
<li>कृष्णानन्द सागर</li>
</ul>
<p><strong>(लेखक शिक्षाविद् है, भारतीय शिक्षा ग्रन्थमाला के सह संपादक है और विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान कुरुक्षेत्र के सचिव है।)</strong></p>
<p><strong>और पढ़ें</strong> : <span style="color: #000080;"><strong><a style="color: #000080;" href="https://rashtriyashiksha.com/amrit-utsav-of-national-pride/" target="_blank" rel="noopener">राष्ट्र गौरव का अमृत पर्व</a></strong></span></p>
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		<item>
		<title>लोकमान्य तिलक जी द्वारा लिखित ‘गीता रहस्य’ एक अद्भुत साहित्य कृति</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 13 Dec 2021 11:17:27 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[पुस्तक समीक्षा]]></category>
		<category><![CDATA[लेख]]></category>
		<category><![CDATA[Bhartiya Education]]></category>
		<category><![CDATA[Children]]></category>
		<category><![CDATA[indian education]]></category>
		<category><![CDATA[lokmanya tilak]]></category>
		<category><![CDATA[prrents]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[school]]></category>
		<category><![CDATA[shri mad bhagwat gita]]></category>
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					<description><![CDATA[<p> &#8211; डा. आशिष मुकंद पुराणिक लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने अपने जीवन काल में शिक्षा, राजनीति, अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, अध्यात्म आदि ऐसे अनेक विषयों पर प्रस्तुतीकरण किया है। अन्तरिक्ष विज्ञान पर&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"> &#8211; डा. आशिष मुकंद पुराणिक</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-4452" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/12/51py49GC0QL-e1639393820758-300x187.jpg" alt="" width="1073" height="669" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/12/51py49GC0QL-e1639393820758-300x187.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/12/51py49GC0QL-e1639393820758.jpg 372w" sizes="auto, (max-width: 1073px) 100vw, 1073px" /></p>
<p>लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने अपने जीवन काल में शिक्षा, राजनीति, अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, अध्यात्म आदि ऐसे अनेक विषयों पर प्रस्तुतीकरण किया है। अन्तरिक्ष विज्ञान पर भी ‘ओरायन’, ‘द आर्किटेक्ट होम इन वेदास’ आदि ग्रंथों के आधार पर अपने अध्ययन और विचार द्वारा एक नई दिशा निर्माण की है। २०वीं शताब्दी के शुरुआती दौर में जब भारतीय तत्वज्ञान और जीवन पद्धति को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गलत तरीके से समझा और देखा जा रहा था तब “भारतीय दर्शन और पौराणिक ग्रंथों के मूल्य का विश्लेषण सबके सामने आए और भारतीय ग्रंथों का आधार वैज्ञानिक है”, ये पूरे जगत की समझ में आए इस हेतु से अनेक ग्रंथों के लेखक के रूप में ये उनकी पहचान बहुत कम लोग जानते हैं। लोकमान्य तिलक आध्यात्मिक पुरुष थे। उन्होंने ‘गीता रहस्य’ नाम का एक वृहद ग्रन्थ मांडले  कारावास के दौरान लिखा और भगवद्गीता का कर्मयोगी अर्थ सबके सामने लाए।</p>
<p>श्रीमद्भगवद गीता पर अनेक संस्कृत अथवा देशी भाषाओं में अनुवाद सर्वमान्य निरूपित है। फिर भी ‘गीता रहस्य’ ग्रन्थ क्यों प्रकाशित हुआ? आरम्भ के कुछ पृष्ठों में तिलक महाराज ने कुछ ऐसी बातों का प्रतिपादन किया जिसके आधार पर गीता रहस्य का महत्व अपने आप में पूरा विषय हो जाता है। लोकमान्य तिलक जी का लेखन इतना स्तरीय और बिना पूर्वाग्रह के है कि वे स्वयं तिलक महाराज इस बात का उल्लेख करते हैं कि भगवद्गीता की अनेक टीकाएँ लिखी गई है उनमें भगवद्गीता को कर्मयोग न बताते हुए उसके कर्म योग के दृष्टिकोण को झूठा साबित करने का भी प्रयास अनेक ग्रंथों में या लेखों में किया गया है। केवल भारतीय नहीं बल्कि विदेशी लेखको के लेखन का भी उल्लेख तिलक महाराज ने अपनी प्रस्तावना तथा पहले प्रकरण में किया है। भगवद्गीता को मोक्ष प्रधान या निवृत्ति प्रधान मानकर अनेक विस्तृत लेखन किए गए, पर तिलक महाराज का कहना है कि भगवद्गीता कर्म प्रधान है। गीता में ‘योग’ शब्द ही कर्मयोग के अर्थ में प्रयुक्त हुआ। महाभारत, वेद, उपनिषद तथा अन्य हिन्दू ग्रंथों का आधार लेकर श्रीमदभगवद गीता का सम्पूर्ण कर्मयोग दर्शन तिलक महाराज ने इस ग्रंथ में किया है। टीकाकारों के विविध मतों का संग्रह कर उसकी अपूर्णता सकारण दिखलाना जिससे उनके भ्रम पाठकों के मन से दूर हो जाएं, इस विचार से लोकमान्य तिलक महाराज ने श्रीमदभगवद गीता के ऊपर ‘गीता रहस्य’ ग्रंथ लिखा।</p>
<p>गीता रहस्य की प्रस्तावना में लोकमान्य तिलक जी कहा है कि मैंने गीता के अनेक संस्कृत भाष्य, टीकाएँ और अनेक विद्वानों के मराठी तथा अंग्रेजी में लिखे विवेचन पढ़े, किन्तु मन की शंकाओं का समाधान नहीं हुआ। अपने स्वजनों के साथ युद्ध को महान कुकर्म मानकर दुखी हुए अर्जुन को युद्ध के लिए प्रेरित करने वाली गीता में ब्रह्मज्ञान व मोक्ष मार्ग का विवेचन कैसे हो सकता है यह समझ नहीं आ रहा था। किन्तु जब समस्त टीकाओं और भाष्यों को लपेट कर रख दिया, और विचारपूर्वक स्वयं गीता का कई बार पारायण अध्ययन किया, तब बोध हुआ।</p>
<p>गीता रहस्य के प्रारंभ में तिलक महाराज ने उद्धृत किया है कि उनको श्रीमदभगवद गीता कर्मयोग शास्त्र क्यों लगा? इसका विवरण देते हुए तिलक महाराज ने आदि शंकराचार्य जी से लेकर अनेक अलग-अलग सिद्धांतों का आधार लिया है और मूलतः धर्म विचार को समाज के सामने लाने का प्रयास किया है।</p>
<p>श्रीमद् शंकराचार्य का जन्म संवत ८४५ (शक ७१०) में हुआ था। <strong>बत्तीसवें वर्ष में उन्होंने गुहा प्रवेश किया</strong>। श्री शंकराचार्य अलौकिक विद्वान् थे। उन्होंने श्रुति स्मृति विहित वैदिक धर्म की रक्षा के लिए भरत खंड की चारों दिशाओं में चार मठ बनाकर, वैदिक धर्म को कलियुग में पुनर्जन्म दिया।</p>
<p>शंकराचार्य के कथन के बारे में तिलक महाराज ने कहा है कि मनुष्य की आँख से दिखने वाले सम्पूर्ण जगत की अनेकता असत्य है, इन सबमें एक ही शुद्ध नित्य परब्रह्म विद्यमान है, और उसी की माया से, मनुष्य की इन्द्रियों को इन वस्तुओं में भिन्नता का आभास होता है। मनुष्य की आत्मा भी मूलतः परब्रह्म स्वरुप ही है, जिसे आत्मन कहा गया है। आत्मा और परब्रह्म की एकात्मता का अनुभवसिद्ध पूर्ण ज्ञान हुए बिना कोई भी मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकता। यह अद्वैतवाद है। एक शुद्ध, बुद्ध, नित्य और मुक्त परब्रह्म के अतिरिक्त अन्य कोई भी वस्तु स्वतंत्र और सत्य नहीं है। जो भिन्नता द्रष्टिगोचर होती है, वह मानवीय दृष्टि का भ्रम या माया निर्मित आभास मात्र है। माया भी कोई स्वतंत्र या सत्य वस्तु नहीं है, वह भी मिथ्या है। यही उक्त सिद्धांत का तात्पर्य है।</p>
<p>तत्व ज्ञान निरूपण में शंकराचार्य ने इसके आगे भी मंतव्य व्यक्त किया, जिसके अनुसार चित्त शुद्धि के द्वारा ब्रह्म और आत्मा में एक्य का ज्ञान प्राप्त करने के लिए गृहस्थाश्रम के कर्म आवश्यक हैं, किन्तु अंत में उन सब कर्मों का त्याग कर संन्यास लिए बिना मोक्ष नहीं मिल सकता। सब वासनाओं और कर्मों से छूटे बिना ब्रह्मज्ञान की पूर्णता संभव नहीं। इस दूसरे सिद्धांत को निवृत्ति मार्ग कहते हैं। सब कर्मों का संन्यास करके ज्ञान ही में निमग्न रहने के कारण इसे ‘संन्यास निष्ठा’ अथवा ‘ज्ञाननिष्ठा’ कहते हैं।</p>
<p>तिलक महाराज बताते है की शंकराचार्य के २५० वर्ष बाद श्रीरामानुजाचार्य ने विशिष्टाद्वैत मत प्रस्थापित किया। वे भागवत धर्मी थे। उनका मत था कि शंकराचार्य जी के माया मिथ्यात्व और अद्वैत सिद्धांत, दोनों गलत हैं। जीव, जगत और ईश्वर &#8211; ये तीन तत्व यद्यपि भिन्न हैं, तथापि जीव याने चित और जगत याने अचित, ये दोनों एक ही ईश्वर के शरीर हैं। ईश्वर शरीर के सूक्ष्म चित्त-अचित्त से ही स्थूल चित्त अर्थात अनेक जीव और स्थूल अचित्त अर्थात जगत की उत्पत्ति हुई है। उन्होंने तत्व ज्ञान की द्रष्टि से विशिष्टाद्वैत तथा आचरण की द्रष्टि से मुख्यतः वासुदेव भक्ति पर जोर दिया। उन्होंने शंकराचार्य के अद्वैत मत के बदले विशिष्टाद्वैत तथा संन्यास के स्थान पर भक्ति को प्रतिस्थापित करने का प्रयत्न किया। तिलक महाराज की दृष्टि से इन दोनों मतों में कोई अधिक अंतर नहीं है। रामानुजीय मत में भी कर्माचरण से चित्त शुद्धि से ज्ञान प्राप्ति उपरांत प्रेमपूर्वक निस्सीम वासुदेव भक्ति का उपदेश एक प्रकार से निवृत्ति मार्ग ही है।</p>
<p>अद्वैत मत द्वारा माया को मिथ्या कहने के स्थान पर वासुदेव भक्ति को ही सच्चा मोक्ष साधन बताने वाले विशिष्टाद्वैत के बाद सामने आया। उसका मत था कि परब्रह्म और जीव को कुछ अंशों में एक, और कुछ अर्थों में भिन्न मानना असंगत है, अतः दोनों को सदैव ही भिन्न मानना चाहिए। इस मत के प्रवर्तक श्री मध्वाचार्य जी थे। उनके गीता भाष्य में उल्लेख है कि निष्काम कर्म भी केवल साधन है, भक्ति ही अंतिम निष्ठा है। भक्ति की सिद्धि हो जाने के बाद कर्म करना या न करना एक ही बात है।</p>
<p>रामानुज और मध्वाचार्य के उपरांत वैष्णवपंथी श्री वल्लभाचार्य जी जिन्हें महाप्रभुजी भी कहा जाता है, जिन्होंने अपनी ८४ बैठकों द्वारा समाज का मार्गदर्शन किया, उन्होंने माना कि माया रहित शुद्ध जीव और परब्रह्म और ईश्वर एक ही वस्तु हैं, दो नहीं । इसलिए उन्हें शुद्धाद्वैती कहा गया। उनको सिद्धांत कुछ ऐसे है, जैसे जीव अग्नि की चिंगारी के समान ईश्वरीय अंश है और मायात्मक जगत मिथ्या नहीं है। माया परमेश्वर की इच्छा से उससे विभक्त हुई एक शक्ति है, अतः मायाधीन जीव को ईश्वर की कृपा से ही मोक्षज्ञान संभव है। इसलिए मोक्ष का मुख्य साधन भगवत् भक्ति ही है। इस मार्ग वाले परमेश्वर के अनुग्रह को ‘पुष्टि’ कहते हैं, इसलिए यह पंथ ‘पुष्टिमार्ग’ भी कहलाता है।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-4453" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/12/41khKrUroL-232x300.jpg" alt="" width="987" height="1276" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/12/41khKrUroL-232x300.jpg 232w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2021/12/41khKrUroL.jpg 387w" sizes="auto, (max-width: 987px) 100vw, 987px" /></p>
<p>कर्म करने की आवश्यकता और महत्व बताते समय तिलक महाराज ने कुछ आधार और उदाहरण दिए हैं। सबसे पहले गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कर्मयोग की कुछ भिन्न परिभाषा दी है। उनका उपदेश है कि इन्द्रियों और मन की वृत्तियों का नाश करने के स्थान पर उन्हें अपने अधीन रखना चाहिए –</p>
<p style="text-align: center;"><strong>न जातु कामः कामानां उपभोगेन शाम्यति ।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>हविषा कृष्णवत्मेव भूय एवाभिवर्धते ।।</strong></p>
<p>अर्थात सुखों के उपभोग से विषय वासना की तृप्ति तो नहीं होती, किन्तु विषय वासना निरंतर उस प्रकार बढ़ती हैं, जैसे अग्नि की ज्वाला घृत से बढ़ती है।</p>
<p>महाभारत में कहा गया  – <strong>असंतोषस्य नास्त्यन्तः तुष्टिस्तु परमं सुखं।</strong> अर्थात् असंतोष का अंत नहीं है, संतोष ही परम सुख है। किन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि उत्कर्ष का प्रयत्न ही न किया जाए। यदि हम असंतोष का पूर्णतः नाश कर डालेंगे तो न केवल इस लोक में वरन परलोक में भी हमारी दुर्गति होगी। <strong>भर्तृहरि ने कहा है- यशसि चाभिरुचिर्व्यसनं श्रुतौ। </strong>अर्थात् यश के लिए रूचि या इच्छा अवश्य होना चाहिए।</p>
<p><strong>भर्तृहरि ने आगे कहा –</strong> <strong>मानसि च परितुष्ट को</strong><strong>Sर्थवान को दरिद्रः। </strong>अर्थात् मन के प्रसन्न होने पर क्या अमीरी और क्या दरिद्रता।</p>
<p><strong>भगवद्गीता में कहा गया – आत्मनिष्ठ बुद्धि की प्रसन्नता से जो सुख मिलता है वही श्रेष्ठ और सात्विक सुख है।</strong> मनु संहिता के चौथे अध्याय में कहा गया –</p>
<p style="text-align: center;"><strong>यत्कर्म कुर्वतो</strong><strong>Sस्य स्यात परिशोअंतरात्मनः।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>यत्प्रयत्नेन कुर्वीत विपरीतं तु वर्जयेत।।</strong></p>
<p>अर्थात् वह कर्म प्रयत्न पूर्वक करना चाहिए, जिसके करने से हमारी अंतरात्मा संतुष्ट हो और इसके विपरीत कर्म छोड़ देना चाहिए।</p>
<p>याज्ञवल्क्य जी ने भी कहा –</p>
<p style="text-align: center;"><strong>वेदः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>एतच्चतुर्विधम प्राहूः साक्षात धर्मस्य लक्षणं।।</strong></p>
<p>अर्थात् वेद, स्मृति, शिष्टाचार और अपने आत्मा को प्रिय होना धर्म के चार मूल तत्व हैं।</p>
<p>मन के सद्रश बुद्धि भी शरीर का धर्मं है। पूर्व कर्म के अनुसार, पूर्व परम्परानुसार या आनुवंशिक संस्कारों के कारण अथवा शिक्षा आदि अन्य कारणों से बुद्धि कम या अधिक सात्विक, राजसी या तामसी हो सकती है। यही कारण है कि कोई बात एक को ग्राह्य तो दूसरे को अग्राह्य लगती है।</p>
<p>गीता के अठारहवें अध्याय में एक ही बुद्धि के तीन भेद कहे गए हैं –</p>
<p style="text-align: center;"><strong>प्रवृत्तिं च निवृत्तिम च कार्याकार्ये भयाभये।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>बन्धं मोक्षं च या वेत्ति वुद्धिः सा पार्थ सात्विकी।।</strong></p>
<p>अर्थात् सात्विक बुद्धि वह है, जिसे इसका ज्ञान है &#8211; कौन सा काम करना, और कौन सा नहीं, किस बात से डरना चाहिए और किससे नहीं, किसमें बंधन है और किसमें मोक्ष।</p>
<p style="text-align: center;"><strong>यथा धर्ममधर्मं च कार्य च अकार्यमेव च।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी।।</strong></p>
<p>अर्थात् धर्म और अधर्म, करणीय और अकरणीय का निर्णय किये बिना जो बुद्धि केवल भला किया करती है, वह राजसी है।</p>
<p style="text-align: center;"><strong>अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>सर्वाथान विपरीतांश्च बुद्धिः या पार्थ तामसी।।</strong></p>
<p>अर्थात् अधर्म को ही धर्म मानने वाली अथवा सब बातों का विपरीत निर्णय करने वाली बुद्धि तामसी कहलाती है।</p>
<p>जिस प्रकार एक मनुष्य कोई काम करने के पहले यह विचार कर लेता है कि उसे वह काम करना है या नहीं, और करना है तो किस प्रकार करना है, उसी प्रकार परमात्मा को इच्छा हुई और उन्होंने विचार किया – <strong>‘बहु स्याम प्रजायेय’</strong> अर्थात् हमें अनेक होना चाहिए – उसके बाद सृष्टि उत्पन्न हुई । सांख्यमत के अनुसार जिस प्रकार मनुष्य को कुछ काम करने की बुद्धि पहले होती है, उसी प्रकार प्रकृति को भी अपना विस्तार करने की बुद्धि होती है, किन्तु प्रकृति अचेतन या जड़ होने से उसे अपनी बुद्धि का ज्ञान नहीं रहता। आधुनिक सृष्टि शास्त्रज्ञ भी अब स्वीकारने लगे हैं कि गुरुत्वाकर्षण, लौह चुम्बक का आकर्षण तथा अपसारण आदि जड़ प्रकृति में दिखाई देने बाले गुणों का मूल कारण ठीक बतलाया नहीं जा सकता। आधुनिक वैज्ञानिकों के उक्त मत पर ध्यान देने से सांख्य मत का यह विचार आश्चर्यजनक प्रतीत नहीं होता कि प्रकृति में पहले बुद्धिगुण का प्रादुर्भाव होता है। अव्यक्त प्रकृति में निर्मित होने वाली यह बुद्धि भी प्रकृति के ही समान सूक्ष्म होती है किन्तु उसके समान अव्यक्त नहीं होती – मनुष्य को इसका ज्ञान हो सकता है।</p>
<p>बुद्धि के बाद उत्पन्न होने वाले प्रथकता के गुण को ही ‘अहंकार’ कहते हैं। ‘मैं-तू’ के पृथकता सूचक शब्द ही अहंकार का प्रतीक होते हैं। प्रकृति में भी उत्पन्न होने वाले इस अहंकार के गुण का प्रगटीकरण पारे के जमीन पर गिरने के बाद बनने वाली छोटी छोटी गोलियां हैं। पेड़ पत्थर पानी एकरूप प्रकृति से ही उत्पन्न होते हैं, भेद केवल इतना है कि चैतन्य न होने के कारण उन्हें ‘अहम्’ का ज्ञान नहीं होता, या यूं कहें कि मुंह न होने से वे कह नहीं सकते। सारांश यह कि अभिमान या अहंकार का तत्व सब जगह समान ही है। अहंकार बुद्धि का ही एक भाग है। अतएव संख्याओं ने निश्चित किया कि अहंकार बुद्धि के बाद का गुण है।</p>
<p><em>लोकमान्य ने </em><em>कुल ४ भाग और १५ </em><em>प्रकरणों </em><em>मे विस्तृत रूप</em> <em>से हर एक संवाद या तत्व को </em><em>सांख्यशास्त्र</em><em>, </em><em>न्यायशास्त्र</em><em>, </em><em>वैशेषिकशास्त्र</em><em>, </em><em>योगशास्त्र</em><em>, </em><em>मीमांसाशास्त्र</em><em>, </em><em>वेदांतशास्त्र</em> <em>इन ६ शस्त्रों</em> <em>के आधार </em><em>पर समग्र रूप से सब के सामने रखा है। कई जानकार ये कहते है कि तिलक महाराज द्वारा लिखे गए इस ग्रंथ की भाषा समझने में कठिन है पर इतनी आसान भाषा में इतने कम शब्दों में इतना सारा ज्ञान लिखना ये बात आसान नहीं होती। तिलक महाराज द्वारा लिखे हुए गीता रहस्य की महत्ता कम शब्दों में लिखना भी इतनी सरल बात नहीं है। </em></p>
<p>(लेखक बृहन्महाराष्ट्र कॉलेज ऑफ कॉमर्स, पुणे में सहायक प्राध्यापक एवं उपप्राचार्य, डेक्कन एज्युकेशन सोसायटी में व्यवस्थापन परिषद सदस्य तथा विद्या भारती पश्चिम महाराष्ट्र के प्रांत कोषाध्यक्ष है।)</p>
<p>और पढ़ें : <span style="color: #000080;"><strong><a style="color: #000080;" href="https://rashtriyashiksha.com/book-review-indian-education-psychology-base-author-lajjaram-tomar/" target="_blank" rel="noopener">पुस्तक समीक्षा : भारतीय शिक्षा मनोविज्ञान के आधार – लेखक लज्जाराम तोमर</a></strong></span></p>
<p>The post <a href="https://rashtriyashiksha.com/a-wonderful-literary-work-gita-rahasya-written-by-lokmanya-tilak/">लोकमान्य तिलक जी द्वारा लिखित ‘गीता रहस्य’ एक अद्भुत साहित्य कृति</a> appeared first on <a href="https://rashtriyashiksha.com">राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</a>.</p>
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		<item>
		<title>पुस्तक परिचय : भारतीय शिक्षा ग्रंथमाला, पांचवां ग्रन्थ – वैश्विक संकटों का निवारण भारतीय शिक्षा</title>
		<link>https://rashtriyashiksha.com/book-introduction-indian-education-series-bharatiya-shiksha-granthmala-fifth-book-indian-education-to-overcome-global-crises-vaishvik-sankaton-ka-niwaran-bharatiya-shiksha/</link>
					<comments>https://rashtriyashiksha.com/book-introduction-indian-education-series-bharatiya-shiksha-granthmala-fifth-book-indian-education-to-overcome-global-crises-vaishvik-sankaton-ka-niwaran-bharatiya-shiksha/#respond</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 23 Jan 2020 10:10:46 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[पुस्तक समीक्षा]]></category>
		<category><![CDATA[वासुदेव प्रजापति]]></category>
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					<description><![CDATA[<p> &#8211; वासुदेव प्रजापति पुस्तक का नाम : भारतीय शिक्षा ग्रंथमाला, पांचवां ग्रन्थ – वैश्विक संकटों का निवारण भारतीय शिक्षा लेखन एवं संपादन : इंदुमति काटदरे, अहमदाबाद सह संपादक : वंदना&#8230; </p>
<p>The post <a href="https://rashtriyashiksha.com/book-introduction-indian-education-series-bharatiya-shiksha-granthmala-fifth-book-indian-education-to-overcome-global-crises-vaishvik-sankaton-ka-niwaran-bharatiya-shiksha/">पुस्तक परिचय : भारतीय शिक्षा ग्रंथमाला, पांचवां ग्रन्थ – वैश्विक संकटों का निवारण भारतीय शिक्षा</a> appeared first on <a href="https://rashtriyashiksha.com">राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"> &#8211; वासुदेव प्रजापति</p>
<p style="text-align: center;">पुस्तक का नाम : <strong>भारतीय शिक्षा ग्रंथमाला</strong><strong>, पांचवां</strong> <strong>ग्रन्थ</strong> <strong>– </strong><strong>वैश्विक संकटों का निवारण भारतीय शिक्षा</strong></p>
<p style="text-align: center;">लेखन एवं संपादन : इंदुमति काटदरे, अहमदाबाद</p>
<p style="text-align: center;">सह संपादक : वंदना फड़के नासिक, सुधा करंजगावकर अहमदाबाद, वासुदेव प्रजापति जोधपुर</p>
<p style="text-align: center;">प्रकाशक : पुनरुत्थान प्रकाशन सेवा ट्रस्ट, अहमदाबाद वेबसाइट – <a href="http://www.punarutthan.org">www.punarutthan.org</a></p>
<p style="text-align: center;">संस्करण : व्यास पूर्णिमा, युगाब्द, 9 जुलाई 2017</p>
<p style="text-align: center;"><strong>यह तो आप भी चाहेगें कि</strong><strong>…..</strong></p>
<p>भारत पुनः विश्वगुरु बनें।</p>
<p>भारतीय ज्ञान चराचर जगत का कल्याण करने वाला हो।</p>
<p>विश्व के सभी देश अज्ञान, गरीबी, असमानता, हिंसा, आतंकवाद जैसे संकटों से मुक्त हों।</p>
<p>भारतीय शिक्षा इन सभी संकटों का निवारण बतलाये।</p>
<p>भारत ने पूर्व में विश्व का मार्गदर्शन किया है, अब पुनः करे।</p>
<p>आज फिर से भारत शिक्षा के माध्यम से विश्व को संकट मुक्त करने की भूमिका निभाए।</p>
<p>भारत आज विश्व का नेतृत्व करने की स्थिति में है, अतः भारत के नेतृत्व में विश्व सुख, शान्ति व समृद्धि की दिशा में अग्रसर हों।</p>
<p>एक भारतीय होने के नाते हम सबका कर्तव्य बनता है कि विश्व स्तर पर भारत अपनी भूमिका निभाने में समर्थ हों। हम भारत की भूमिका को भली-भाँति समझें। भारत की भूमिका समझने में भारतीय शिक्षा ग्रन्थमाला का यह <strong>पाँचवा ग्रन्थ</strong> पढ़ना बहुत उपयोगी सिद्ध होगा। आओ! हम इस ग्रन्थ का संक्षिप्त परिचय प्राप्त करें।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="wp-image-1029 aligncenter" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2020/01/Part-5-min-216x300.jpg" alt="" width="881" height="1224" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2020/01/Part-5-min-216x300.jpg 216w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2020/01/Part-5-min-768x1067.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2020/01/Part-5-min-737x1024.jpg 737w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2020/01/Part-5-min.jpg 1609w" sizes="auto, (max-width: 881px) 100vw, 881px" /></p>
<p style="text-align: center;"><strong>पाँचवा ग्रन्थ – वैश्विक संकटों का निवारण भारतीय शिक्षा</strong></p>
<p>इस अन्तिम ग्रन्थ में यह समझाया गया है कि <strong><em>भारत का मूल चिन्तन वैश्विक है</em></strong><strong><em>, फलतः भारतीय शिक्षा भी विश्व कल्याणक है।</em></strong> इस विश्वकल्याणक पांचवें ग्रन्थ का परिचय यह है।</p>
<p>इस ग्रन्थ में कुल छः पर्व हैं। <strong>पहला पर्व</strong> अन्तजलि (Internet) पर दी हुई विश्व की वर्तमान स्थिति को दर्शाता है, जैसेः- विश्व का मानचित्र, महाद्वीपशः देशों की सूची, संयुक्त राष्ट्र संघ एवं उसकी संस्थाये, सूचकांक जैसे- मानव विकास सूचकांक, शांति सूचकांक, प्रगति सूचकांक, गरीबी सूचकांक, सुखी सूचकांक तथा पर्यावरण सूचकांक आदि। धार्मिक आबादी की सूची, प्रशासनिक व्यवस्थानुसार देशों की सूची, वैश्विक आर्थिक असमानता, अंतर्राष्ट्रीय रेकिंग की सूची, वैश्विक लिंगगेप रिपोर्ट एवं विश्व खुशी रिपोर्ट दी गई है।</p>
<p><strong>पर्व दो</strong> में विश्वस्थिति का आकलन किया गया है। वर्तमान में वैश्विक परिस्थिति क्या व कैसी है? राजनीतिक प्रवाह कौन-कौन से हैं? ‘द प्रिजन’ पुस्तक का सांराश देते हुए बताया गया है कि अमेरिका स्वयं एक समस्या है। आर्थिक हत्यारे की स्वीकारोक्ति एवं अमेरिका का एक्सरे इसके प्रमाण हैं। अन्त में नव साम्यवाद के लक्षण एवं स्वरूप बतलाते हुए राष्ट्रवाद की पश्विमी संकल्पना बतलाई गई है।</p>
<p><strong>पर्व तीन</strong> में वैश्विक संकटों का विश्लेषण किया गया है। संकटों का मूल कहाँ है, संकेन्द्री दृष्टि अनर्थक अर्थ में है। आधुनिक विज्ञान एवं गुलामी का समान आधार व कट्टरता की विवेचना करते हुए वैश्विक समस्याओं के स्रोत, युरोपीय आधिपत्य के पाँच सौ वर्षों का इतिहास तथा जिहादी आतंकवाद को उजागर किया गया है।</p>
<p><strong>पर्व चार</strong> में भारत की भूमिका स्थापित की गई है, जिसके मुख्य बिन्दु ये हैं- भारत की दृष्टि से देखे, मनोस्वास्थ्य प्राप्त करें, संस्कृति के आधार पर विचार करें, समाज को सुदृढ़ बनाये, आर्थिक स्वतन्त्रता की रक्षा करें तथा युगानुकूल पुनर्रचना करें।</p>
<p><strong>पर्व पाँच</strong> में भारतीय शिक्षा की भूमिका बतलाई गई है। भारतीय शिक्षा का स्वरूप बतलाते हुए <strong>विश्व को भारतीय शिक्षा अपनाने की बात सुझाई है।</strong> अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय का वास्तविक स्वरूप बतलाते हुए प्रशासक और शिक्षक संवाद दिया गया है, साथ में शिक्षक, प्रशासक व मंत्री के वार्तालाप के माध्यम से सबकी भूमिकाओं को स्पष्ट किया गया है। अन्त में हिन्दू धर्म में समाज सेवा को क्या स्थान है? यह बतलाया गया है।</p>
<p><strong>पर्व छः</strong> में विविध सामग्री के माध्यम से ग्रन्थ का समापन किया गया है। विविध सामग्री में एक सर्वसामान्य प्रश्नोत्तरी है, विविध आलेख है और पुनरुत्थान विद्यापीठ की समग्र शिक्षा योजना देकर ग्रन्थ को पूर्णता प्रदान की गई है।</p>
<p><strong>फलश्रुति &#8211; </strong>इस ग्रन्थ को पढ़ने वालों की दृष्टि <strong>‘सर्वभूत हितेरत:’</strong> की बन जायेगी, वह <strong>‘वसुधैव कुटुम्बकम’</strong> की भावना से अपना जीवन <strong>‘सर्वेभवन्तु सुखिनः’</strong> सम्पूर्ण मानवता के कल्याण में लगायेगा।</p>
<p><strong>फलश्रुति- </strong>यह तो ‘भारतीय शिक्षा ग्रन्थमाला’ के पाँचों ग्रन्थों का परिचय मात्र है। जब आप इन ग्रन्थों को पढ़ना प्रारम्भ करेंगे तो निश्चय ही है आपको यह अनुभूति होगी कि <strong>ज्ञान का आनन्द अन्य सब आनन्दों से परे है</strong><strong>, वह तो आत्मानन्द है।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>इति</strong></p>
<p>(लेखक शिक्षाविद् है, इस ग्रन्थमाला के सह संपादक है और विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान के सह सचिव है।)</p>
<p>और पढ़ें : <a href="https://rashtriyashiksha.com/book-introduction-indian-education-series-bharatiya-shiksha-granthmala-fourth-book-liberation-of-indian-education-from-westernization-pashchimikaran-se-bharatiya-shiksha-ki-mukti/" target="_blank" rel="noopener noreferrer">पुस्तक परिचय : भारतीय शिक्षा ग्रंथमाला, चौथा ग्रन्थ – पश्चिमीकरण से भारतीय शिक्षा की मुक्ति</a></p>
<p>The post <a href="https://rashtriyashiksha.com/book-introduction-indian-education-series-bharatiya-shiksha-granthmala-fifth-book-indian-education-to-overcome-global-crises-vaishvik-sankaton-ka-niwaran-bharatiya-shiksha/">पुस्तक परिचय : भारतीय शिक्षा ग्रंथमाला, पांचवां ग्रन्थ – वैश्विक संकटों का निवारण भारतीय शिक्षा</a> appeared first on <a href="https://rashtriyashiksha.com">राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</a>.</p>
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		<title>पुस्तक परिचय : भारतीय शिक्षा ग्रंथमाला, चौथा ग्रन्थ – पश्चिमीकरण से भारतीय शिक्षा की मुक्ति</title>
		<link>https://rashtriyashiksha.com/book-introduction-indian-education-series-bharatiya-shiksha-granthmala-fourth-book-liberation-of-indian-education-from-westernization-pashchimikaran-se-bharatiya-shiksha-ki-mukti/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 14 Jan 2020 10:35:28 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[पुस्तक समीक्षा]]></category>
		<category><![CDATA[वासुदेव प्रजापति]]></category>
		<category><![CDATA[abhinav bharat ki sankplna]]></category>
		<category><![CDATA[bharatiya shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[education]]></category>
		<category><![CDATA[Making the Education Nation]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[Vivekananda who restores Bharatiya Shiksha/indian education in India]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://rashtriyashiksha.com/?p=1012</guid>

					<description><![CDATA[<p>&#8211; वासुदेव प्रजापति पुस्तक का नाम : भारतीय शिक्षा ग्रंथमाला, चौथा ग्रन्थ – पश्चिमीकरण से भारतीय शिक्षा की मुक्ति लेखन एवं संपादन : इंदुमति काटदरे, अहमदाबाद सह संपादक : वंदना&#8230; </p>
<p>The post <a href="https://rashtriyashiksha.com/book-introduction-indian-education-series-bharatiya-shiksha-granthmala-fourth-book-liberation-of-indian-education-from-westernization-pashchimikaran-se-bharatiya-shiksha-ki-mukti/">पुस्तक परिचय : भारतीय शिक्षा ग्रंथमाला, चौथा ग्रन्थ – पश्चिमीकरण से भारतीय शिक्षा की मुक्ति</a> appeared first on <a href="https://rashtriyashiksha.com">राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;">&#8211; वासुदेव प्रजापति</p>
<p style="text-align: center;">पुस्तक का नाम : <strong>भारतीय शिक्षा ग्रंथमाला, चौथा ग्रन्थ </strong><strong>– </strong><strong>पश्चिमीकरण</strong> <strong>से भारतीय शिक्षा की मुक्ति</strong></p>
<p style="text-align: center;">लेखन एवं संपादन : इंदुमति काटदरे, अहमदाबाद</p>
<p style="text-align: center;">सह संपादक : वंदना फड़के नासिक, सुधा करंजगावकर अहमदाबाद, वासुदेव प्रजापति जोधपुर</p>
<p style="text-align: center;">प्रकाशक : पुनरुत्थान प्रकाशन सेवा ट्रस्ट, अहमदाबाद वेबसाइट – <a href="http://www.punarutthan.org">www.punarutthan.org</a></p>
<p style="text-align: center;">संस्करण : व्यास पूर्णिमा, युगाब्द, 9 जुलाई 2017</p>
<p>&nbsp;</p>
<p style="text-align: center;"><strong>आप भी तनिक विचार करें</strong><strong>?</strong></p>
<p>अंग्रेजों ने श्रेष्ठ भारतीय शिक्षा का सर्वनाश क्यों किया?</p>
<p>अंग्रेजी शिक्षा से हमें क्या मिला?</p>
<p>अंग्रेजी शिक्षा ने हमसे क्या-क्या छीना?</p>
<p>स्वतंत्रता पूर्व किन-किन महापुरुषों ने राष्ट्रीय शिक्षा के प्रयत्न किये?</p>
<p>अंग्रेजी शिक्षा ने किस प्रकार भारतीय मानस को बदला?</p>
<p>अंग्रेजी शिक्षा के परिणाम स्वरूप हीनता बोध, जीवन मूल्यों का ह्रास, व्यक्ति केन्द्री विचार के साथ-साथ व्यवस्थाओं में बदलाव तथा यंत्र संस्कृति का विकास एवं कर्म संस्कृति का नाश हुआ है।</p>
<p>भारत में पुनः भारतीय शिक्षा प्रतिष्ठित करने के लिए अब क्या-क्या करना होगा?</p>
<p><strong>आज भी भारतीय ज्ञान एवं कौशल के उदाहरण हम देश भर से दे सकते हैं।</strong></p>
<p>उपर्यक्त सभी प्रश्नों का समाधान भारतीय शिक्षा ग्रन्थमाला का <strong>चौथा ग्रन्थ</strong> देता है, इसलिए इस ग्रन्थ को पढ़ना बहुत उपयोगी रहेगा। आओ! हम इस <strong>चौथे ग्रन्थ</strong> की संक्षिप्त जानकारी प्राप्त करें।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class=" wp-image-1016 aligncenter" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2020/01/WhatsApp-Image-2020-01-14-at-3.59.44-PM-211x300.jpeg" alt="" width="335" height="476" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2020/01/WhatsApp-Image-2020-01-14-at-3.59.44-PM-211x300.jpeg 211w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2020/01/WhatsApp-Image-2020-01-14-at-3.59.44-PM.jpeg 632w" sizes="auto, (max-width: 335px) 100vw, 335px" /></p>
<p style="text-align: center;"><strong>चौथा ग्रन्थ </strong><strong>–</strong> <strong>पश्चिमीकरण</strong> <strong>से भारतीय शिक्षा की मुक्ति</strong></p>
<p>इस ग्रन्थ में यह वर्णित है कि अंग्रेजों ने किस प्रकार इस देश की सनातन शिक्षा पद्धति को समाप्त किया, कैसे शिक्षा का माध्यम भारतीय भाषाओं के स्थान पर अंग्रेजी कर दिया और कैसे कक्षाकक्ष में भारतीय ज्ञान के स्थान पर यूरोपीय ज्ञान देकर इस देश के लोगों का मानस बदला गया। अब हम भारतीय शिक्षा को पुनः कैसे प्रतिष्ठित कर सकते हैं, इसका मार्ग दिखाया है। इस ग्रन्थ में कुल छः पर्व हैं।</p>
<p><strong>प्रथम पर्व</strong> में यह बतलाया गया है कि भारत में दी जाने वाली शिक्षा भारतीय नहीं है। किस प्रकार अंगेजी सत्ता ने ब्रिटिश शिक्षा का भारत में विकास किया और कैसे भारतीय शिक्षा का सर्वनाश किया। कैसे संस्कृत के लिए लड़ाई लड़ी गई और कैसे ब्रिटिश शिक्षा इस देश में प्रतिष्ठित हुई।</p>
<p><strong>पर्व दो</strong> में स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद भी भारत में जो पश्चिमी शिक्षा ही दी जा रही है, उसका स्वरूप क्या है? शिक्षा विभाग, यूजीसी, अल्प संख्यक शिक्षण संस्थानों के राष्ट्रीय आयोग, विभिन्न माध्यमिक शिक्षा बोर्ड, भारत में प्रारम्भिक व माध्यमिक विद्यालयों की शिक्षा, राज्यों के अनुसार विश्वविद्यालयों की सूची और उनका वर्गीकरण देते हुए विभिन्न शिक्षा आयोगों की यूनिसेफ की जानकारी दी गई है।</p>
<p><strong>पर्व तीन</strong> में शिक्षा के भारतीयकरण के प्रयास कब-कब किस रूप में हुए। स्वतन्त्रता पूर्व राष्ट्रीय शिक्षा का आन्दोलन किन-किन महापुरुषों ने चलाया, आज भी देश में भारतीयकरण के प्रयास कौन-कौन कर रहा है, और अन्त में भारतीयकरण के प्रयासों की समीक्षा करते हुए गहन चिंतन किया गया कि भारतीयकरण के ये प्रयास क्यों सफल नहीं हो पाये?</p>
<p><strong>पर्व चार</strong> पश्चिमी शिक्षा के सांस्कृतिक दुष्परिणामों की ओर ध्यान दिलाता है। अंग्रेजी शिक्षा के परिणाम स्वरूप भारतवासियों की बुद्धि भ्रमित हुई, बुद्धि विभ्रम के परिणाम स्वरूप हम हीनताबोध से ग्रसित हुए, शिक्षा में जीवन मूल्यों का हृास हुआ, व्यक्ति केन्द्री व्यवस्था बनी तथा व्यवहार और व्यवस्था में भौतिकता आधार बन गई। इन सबके परिणाम स्वरूप यंत्र संस्कृति का विकास हुआ और कर्म संस्कृति का नाश हुआ, दायित्व बोध के अभाव का संकट खड़ा हो गया फलतः मनुष्य में निहित सम्पदाओं का नाश हुआ और अपने देश के विषय में घोर अज्ञान घर कर गया। यदि ऐसा ही चलता रहा तो देश की क्या स्थिति होगी? इस ओर ध्यान खींच कर उसमें आशा की किरण बताई गई है।</p>
<p><strong>पर्व पाँच</strong> में भारतीय शिक्षा की पुन:प्रतिष्ठा हेतु करणीय प्रयास क्या-क्या करने होंगे? इसका मार्ग सुझाया है। करणीय कार्य ये हैः <strong><em>सर्वप्रथम हीनताबोध से मुक्त होने के उपाय करने होंगे। हमारी शोध दृष्टि बदलनी होगी</em></strong><strong><em>, तदनुसार अध्ययन व अनुसंधान करने होंगे। व्यक्तिगत जीवन व परिवारिक जीवन में भारतीय शैली अपनानी होगी।</em></strong> <strong><em>भारतीय शिक्षा की पुनप्रतिष्ठा हेतु विद्यालयों को व समाज को अपेक्षित परिवर्तन की मानसिकता बनानी होगी।</em></strong> <strong><em>धर्माचार्य और सामाजिक कार्यकर्ताओं को व शैक्षिक संगठनों को भारतीय ज्ञान को पुन:प्रतिष्ठित करना होगा, तभी भारतीय शिक्षा की प्रतिष्ठा सम्भव हो पायेगी।</em></strong></p>
<p><strong>पर्व छः</strong> में भारतीय ज्ञान की श्रेष्ठता सिद्ध करने वाले कुछ मुखर उदाहरण दिये गये है। जैसे &#8211; शंख विज्ञान, प्रथम स्वदेशी वायुयान ‘मरुत सखा’ काटे कादु जोड़े त्रिभुवन, टीकाकरण, कागज निर्माण, बर्फ बनाने की प्रक्रिया, लोहे के कारखाने, अद्भुत क्षमता के दो नमूने, वैद्यशाला, जीता जागता पुल एवं अनोखी पाठशाला जैसे उदाहरणों के द्वारा यह सिद्ध किया गया है कि <strong>भारत ज्ञान-विज्ञान में भी अग्रणी था।</strong></p>
<p><strong>फलश्रुति</strong>&#8211; <strong>इस चौथे ग्रन्थ को पढ़ने वालों में निश्चय ही विवेक शक्ति के साथ रचाभिमान जाग्रत होगा और वे स्वदेशी व विदेशी में भेद करते हुए स्वदेशी अपनाने में समर्थ होंगे।</strong></p>
<p>(लेखक शिक्षाविद् है, इस ग्रन्थमाला के सह संपादक है और विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान के सह सचिव है।)</p>
<p>और पढ़े <a href="https://rashtriyashiksha.com/book-introduction-indian-education-series-bharatiya-shiksha-granthmala-third-book-behavioral-dimensions-of-indian-education-bharatiya-shiksha-ke-vyavharik-aayam/" target="_blank" rel="noopener noreferrer">पुस्तक परिचय : भारतीय शिक्षा ग्रंथमाला, तीसरा ग्रन्थ – भारतीय शिक्षा के व्यवहारिक आयाम</a></p>
<p>The post <a href="https://rashtriyashiksha.com/book-introduction-indian-education-series-bharatiya-shiksha-granthmala-fourth-book-liberation-of-indian-education-from-westernization-pashchimikaran-se-bharatiya-shiksha-ki-mukti/">पुस्तक परिचय : भारतीय शिक्षा ग्रंथमाला, चौथा ग्रन्थ – पश्चिमीकरण से भारतीय शिक्षा की मुक्ति</a> appeared first on <a href="https://rashtriyashiksha.com">राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</a>.</p>
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