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	<title>आहार-विहार - राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन rashtriyashiksha.com</title>
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	<description>सा विद्या या विमुक्तये</description>
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	<title>आहार-विहार - राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन rashtriyashiksha.com</title>
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		<title>स्वास्थ्य पर वस्त्रों का प्रभाव</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 26 Oct 2023 11:34:43 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>✍ रवि कुमार आजकल मनुष्य अपने जूतों व वस्त्रों पर सबसे अधिक खर्च करता है। अच्छा दिखना चाहिए, पर्सनेलिटी बननी चाहिए, इसलिए मनुष्य ऐसा करता है। क्या वास्तव में इनसे&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"><img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/270d.png" alt="✍" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /> रवि कुमार</p>
<p><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone  wp-image-7091" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/10/Presentation1-300x214.jpg" alt="" width="1672" height="1193" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/10/Presentation1-300x214.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/10/Presentation1-768x549.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/10/Presentation1.jpg 1007w" sizes="(max-width: 1672px) 100vw, 1672px" /></p>
<p style="text-align: justify;">आजकल मनुष्य अपने जूतों व वस्त्रों पर सबसे अधिक खर्च करता है। अच्छा दिखना चाहिए, पर्सनेलिटी बननी चाहिए, इसलिए मनुष्य ऐसा करता है। क्या वास्तव में इनसे पर्सनेलिटी बनती है? क्या वस्त्रों का यही कार्य है? क्या स्वास्थ्य का सम्बंध वस्त्रों से जुड़ा हुआ है? क्या वस्त्रों का भी मन पर प्रभाव पड़ता है? क्या वस्त्रों का चयन मात्र अच्छा दिखने के दृष्टिकोण से करना ठीक है? आइए इन सभी प्रश्नों का उत्तर समझते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>वस्त्रों का कार्य</strong></p>
<p style="text-align: justify;">वास्तव में वस्त्र हमारे शरीर की बाह्य वातावरण (धूप, गर्मी, सर्दी आदि) से रक्षा करने के लिए बने हैं। जैसे जैसे सभ्यताओं का विकास हुआ, वैसे ही वस्त्र मानव जीवन का महत्वपूर्ण अंग बने। सभ्यताओं में संस्कृति के आधार पर कलाओं का विकास हुआ तो विभिन्न प्रकार की परंपराओं के अनुसार वेशभूषाएँ भी मानव जीवन में जुड़ी। परंतु मूल भाव वही रहा जो प्रारम्भ में था – मानव स्वास्थ्य रक्षा का। भारतीय परंपरा में क्षेत्र अनुसार वेशभूषा का निर्माण मानव स्वास्थ्य की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर किया गया। अच्छा दिखे ये भी ध्यान का विषय रहा होगा। परन्तु अच्छा दिखे और मानव स्वास्थ्य के प्रतिकूल हो, ऐसा भाव कभी नहीं रहा।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>आधुनिक जीवन शैली का वस्त्रों पर प्रभाव</strong></p>
<p style="text-align: justify;">आजकल की आधुनिक जीवन शैली में वस्त्र मनुष्य के जीवन का महत्वपूर्ण भाग हो गए हैं। महंगा व ब्रांडेड वस्त्र पहनना, अच्छा दिखना और सबसे अलग दिखना ये प्राथमिकता का विषय हो गया है। मानव स्वास्थ्य दूसरे स्थान पर आ गया है। अच्छा दिखना तो ठीक है, पर स्वास्थ्य को ताक पर रखकर नहीं, ये समझने की आवश्यकता है। अच्छा पहनना परंतु घर का बजट बिगाड़कर बहुत महंगा व ब्रांडेड पहनना क्या उचित है। अथवा जैसे तैसे महंगे वस्त्रों की व्यवस्था करना स्वस्थ जीवन के लिए अच्छा नहीं है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>वस्त्र और स्वास्थ्य</strong></p>
<p style="text-align: justify;">वस्त्रों का स्वास्थ्य पर सही व विपरीत प्रभाव पड़ता है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि आपका चयन कैसा है। चयन करते समय स्टफ (फैब्रिक) कैसा है, रंग कैसा है, ऋतु के अनुकूल है या नहीं, सिलाई कैसी की है, ये सब बातें स्वास्थ्य को प्रभावित करती है। उदाहरण के लिए गर्मी के मौसम में गहरे रंग के कपड़े ठंडक नहीं दे सकते। यदि कपड़े सांस नहीं लेते है तो त्वचा तक वायु नहीं पहुंचेगी तो जब तक आप ऐसे वस्त्र पहनेंगे तब तक असहजता रहेगी और बाद में भी उसका प्रभाव अनुभव होगा। शरीर के साथ सटे हुए वस्त्र भी स्वास्थ्य को हानि पहुंचाते हैं। आजकल ऐसे वस्त्रों का प्रचलन आम हो गया है। ये शरीर के तापमान को नियंत्रित नहीं होने देते, वायु को त्वचा तक पहुंचने नहीं देते और शरीर की गर्मी को बाहर नहीं आने देते। युवाओं में ऐसे वस्त्रों का अधिक उपयोग उनकी प्रजनन क्षमता को भी प्रभावित करता है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>छोटे बालक और वस्त्र</strong></p>
<p style="text-align: justify;">छोटी आयु के बालकों के लिए फैशन के नाम पर वस्त्र पहना दिए जाते हैं। उनके हाथ में निर्णय करना होता नहीं है और अभिभावकों की दृष्टि में तो अच्छे दिखते रहने चाहिए पर उतना समय मन से वे कष्ट में रहते हैं। एक घर में जाना हुआ। अतिथि आते हैं तो घर में सब अच्छा दिखना चाहिए, ये भाव रखकर सभी तैयारी करते हैं। घर में एक वर्ष से कम आयु का शिशु भी था। उसे भी अच्छे वस्त्र पहनाए हुए थे। वह बिस्तर पर लेटा हुआ था। शिशु अपने पैरों को हिलाने का प्रयास तो कर रहा था परंतु जो निक्कर उसे पहनाई गई थी, उसके कारण पैर हिला नहीं पा रहा था। मेरे कहने पर उसकी माँ ने निक्कर निकाल कर लंगोट बांध दिया। इस कारण हिलने-डुलने में उसे सुविधा हुई। ऐसा होने पर उसके मुख पर अलग ही प्रसन्नता दिख रही थी। विवाह कार्यक्रमों में सम्मिलित होने के लिए शिशुओं को चमकदार व सिंथेटिक फैब्रिक से बने वस्त्र पहना दिए जाते हैं। शिशु बेचारा विवाह में आनन्द की बजाय ऐसे वस्त्रों से ही परेशान रहता है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>वस्त्र और रंग</strong></p>
<p style="text-align: justify;">स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए उचित रंग के वस्त्रों का चयन व्यक्ति के आत्मविश्वास को बढ़ाता है। त्वचा का रंग कैसा है, मौसम कैसा है, कहां जाना है, उन सब बातों को ध्यान में रखते हुए कौन से रंग का वस्त्र पहनना है ये चुनाव करना आवश्यक है। अब त्वचा का रंग भी गहरा है और गहरे रंग के वस्त्र पहने हुए है तो कैसा लगेगा!</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>भारतीय अवधारणा</strong></p>
<p style="text-align: justify;">भारतीय अवधारणा में खुले-हवादार वस्त्रों का प्रचलन रहा है। विशेषकर सूती व खादी के वस्त्रों का जो पर्याप्त सांस लेते हैं। शीतकाल के लिए ऊनी वस्त्रों का उपयोग होता रहा है। सूती, खादी व ऊनी वस्त्र ये प्रकृति के अनुकूल है। शरीर से सटे हुए वस्त्रों का प्रचलन भारतीय परंपरा का भाग नहीं रहा क्योंकि भारतीय परम्परा में मानव स्वास्थ्य प्रथम स्थान पर रहा है।</p>
<p style="text-align: justify;">भारतीय अवधारणा व आधुनिक जीवन शैली का समन्वय वस्त्रों के सम्बन्ध में भी करना आवश्यक है। वस्त्रों के विषय में प्रचलित धारणा से बाहर निकल कर स्वास्थ्य और सौन्दर्य दोनों को उचित स्थान देना हितकर है।</p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक विद्या भारती दिल्ली प्रान्त के संगठन मंत्री है और विद्या भारती प्रचार विभाग की केन्द्रीय टोली के सदस्य है।)</p>
<p><strong>और पढ़ें : <span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/diet-is-the-medicine/" target="_blank" rel="noopener">आहार ही औषध – आहार चिकित्सा</a></span></strong></p>
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		<title>आहार ही औषध &#8211; आहार चिकित्सा</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 04 Sep 2023 06:22:35 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[आहार-विहार]]></category>
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		<category><![CDATA[श्री रवि कुमार जी]]></category>
		<category><![CDATA[Diet is the medicine - diet therapy]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>✍ रवि कुमार करनाल (हरियाणा) के एक कार्यकर्त्ता से उनकी आयु के विषय में चर्चा हुई। उन्होंने कहा आप ही बताएं कि मेरी आयु कितनी है। किसी की भी आयु&#8230; </p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"><img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/270d.png" alt="✍" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /> रवि कुमार</p>
<p><img decoding="async" class="alignnone wp-image-6940" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/09/Hindu-300x169.jpg" alt="" width="1701" height="958" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/09/Hindu-300x169.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/09/Hindu-1024x576.jpg 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/09/Hindu-768x432.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/09/Hindu.jpg 1280w" sizes="(max-width: 1701px) 100vw, 1701px" /></p>
<p style="text-align: justify;">करनाल (हरियाणा) के एक कार्यकर्त्ता से उनकी आयु के विषय में चर्चा हुई। उन्होंने कहा आप ही बताएं कि मेरी आयु कितनी है। किसी की भी आयु पूछने पर सामान्यतः ऐसा ही प्रति उत्तर प्राप्त होता है। मैंने कहा कि आपकी आयु 40 वर्ष के आसपास होगी। वे मुस्कुराने लगे। उनसे पूछने पर कि मुस्कुराने का कारण क्या है? तो उन्होंने बताया कि मेरी आयु 52 वर्ष है। कई बार ‘त्वचा से आयु की जानकारी नहीं मिलती’ ऐसी कहावत चलती है। मन में जिज्ञासा उत्पन्न हुई कि 52 वर्ष की आयु के व्यक्ति की 40 वर्ष आयु क्यों प्रतीत होती है।</p>
<p style="text-align: justify;">आज का मनुष्य बहुत जल्दी ही कई प्रकार के रोगों का शिकार होता है। इसके कारण वह चिकित्सक की शरण में जाता है। और किसी भी चिकित्सक से परामर्श करने पर वह बहुत सारी औषधि लेने के लिए बाध्य जैसा कर देता है। कुछ दुर्लभ व्यक्ति ऐसे भी मिलते हैं, जिनकी आयु 60-70 अथवा उससे अधिक है और वे पूर्णतः स्वस्थ है, किसी प्रकार के रोग से घिरे नहीं है। सामने वाले को यह देखकर आश्चर्य सा लगता है कि आज के युग में इतनी आयु होते हुए भी किसी प्रकार का रोग नहीं है और न ही वे कोई नियमित औषधि लेते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>आहार चिकित्सा</strong></p>
<p style="text-align: justify;">आयुर्वेद में एक सूत्र है – ‘आहार ही औषध’ अर्थात आहार औषधि है। आहार औषधि तब बनता है जब उसे नियमानुसार, संतुलित रूप से, ऋतुचर्या का पालन करते हुए एवं विरुद्ध आहार का ध्यान करते हुए लिया जाता है। उपरोक्त दोनों प्रसंगों में पूर्ण स्वास्थ्य का बड़ा कारण संतुलित आहार ही है। कोई भी रोग जब उत्पन्न होता है तो एकदम नहीं होता है। उस रोग से पूर्व उसकी प्रारंभिक अवस्था भी रहती है। उस रोग का जो मूल कारण है, उस मूल कारण के लक्षण भी उत्पन्न होते हैं। ऐसे लक्षणों को समझ कर प्रारम्भ में ही आहार के विभिन्न रूपों से मूल कारण को समाप्त किया जा सकता है। मूल कारण समाप्त हो गया तो रोग उत्पन्न होने की स्थिति नहीं आएगी। इस प्रक्रिया को आहार चिकित्सा भी कहा जाता है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>प्रचलित धारणा</strong></p>
<p style="text-align: justify;">चिकित्सा के बारे में प्रचलित धारणा है कि कुछ भी हो तो गोली खा लो, चिकित्सक के पास चले जाओ। चिकित्सक से पूछने पर कि आहार में क्या ले सकते है तो उत्तर मिलता है कि कुछ भी खा सकते हैं बस ये औषधि नियम से लीजिए, कोर्स पूरा अवश्य कीजिए। आहार कुछ भी लेंगे और उसके कारण फिर कोई न कोई व्याधि होगी, उस व्याधि के निवारण के लिए फिर से चिकित्सक से औषधि लेनी पड़ेगी। ये एक चक्र चलता रहता है।</p>
<p style="text-align: justify;">सोशल मीडिया पर एक वीडियो में बताया जा रहा था कि व्यक्ति फ़ास्ट व जंकफ़ूड खाता है। ऐसा करने से वह रोगी हो जाता है। उसे चिकित्सालय में भर्ती होना पड़ता है। उसके परिजन उसका कुशलक्षेम पूछने के लिए आते हैं, साथ में फल आदि स्वास्थ्यवर्धक खाद्य पदार्थ लेकर आते हैं। कुशलक्षेम पूछने के पश्चात परिजन चिकित्सालय के बाहर स्वयं फ़ास्ट व जंकफ़ूड खा रहे होते हैं। ये वीडियो आज की वस्तुस्थिति बता रहा है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>आहार चिकित्सा के प्रकार</strong></p>
<p style="text-align: justify;">आहार चिकित्सा के दो प्रकार है &#8211; एक है अपना नियमित आहार ठीक रखेंगे तो रोगों और चिकित्सक से दूर ही रहेंगे। दूसरा है &#8211; रोग के मूल कारण के लक्षण को समझकर उससे संबंधित आहार पथ्य-अपथ्य का पालन करेंगे तो मूल कारण को प्रारम्भ में ही समाप्त कर देंगे। जिससे रोग उत्पन्न होने से पूर्व ही समाप्त हो जाएगा। यथा- अधिकांश रोग उत्पन्न होने का कारण पेट ही है अर्थात जो आहार ग्रहण किया उसका पाचन ठीक से नहीं हुआ और प्रातः शौच निवृति भी ठीक से नहीं हुई। चिकित्सक इस विषय को अवश्य पूछता है। आहार चिकित्सा में प्रातः उषा पान करने के लिए कहा गया है। प्रातः उठकर पर्याप्त पानी पीना चाहिए। और दिन भर के आहार में भी तरल की मात्रा का समावेश होना चाहिए। किसी न किसी रूप में 5-6 लीटर जल ग्रहण करना आवश्यक है। ऐसे करने से पाचन व प्रातः शौच निवृति में कठिनाई नहीं आएगी। मात्र जल ग्रहण की नियमितता ही आपको कई प्रकार के रोगों से दूर रखेगी। पर्याप्त मात्रा में जल ग्रहण शरीर में शोधन का कार्य भी करता है। शरीर में धीरे-धीरे विष पदार्थ (टॉक्सीड) बढ़ते जाते हैं, जल उन्हें भी पसीने व मूत्र के द्वारा शरीर से बाहर निकालता रहता है जिससे शरीर में संतुलन बना रहता है।</p>
<p><img decoding="async" class="alignnone wp-image-6941" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/09/Nutrition-Week-300x171.jpg" alt="" width="1725" height="983" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/09/Nutrition-Week-300x171.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/09/Nutrition-Week.jpg 700w" sizes="(max-width: 1725px) 100vw, 1725px" /></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>रोग लक्षण और पथ्य</strong></p>
<table style="height: 336px; width: 100%; border-collapse: collapse; border-style: solid;">
<tbody>
<tr style="height: 24px;">
<td style="width: 3.89934%; height: 24px; border-color: #0a0a0a; border-style: solid; vertical-align: top;" scope="row" width="47">क्र०</td>
<td style="width: 12.327%; height: 24px; border-color: #0a0a0a; border-style: solid; vertical-align: top;" scope="row" width="151">रोग लक्षण</td>
<td style="width: 83.7736%; height: 24px; border-color: #0a0a0a; border-style: solid; vertical-align: top;" scope="row" width="425">पथ्य</td>
</tr>
<tr style="height: 48px;">
<td style="width: 3.89934%; height: 48px; border-color: #0a0a0a; border-style: solid; vertical-align: top;" scope="row" width="47">१</td>
<td style="width: 12.327%; height: 48px; border-color: #0a0a0a; border-style: solid; vertical-align: top;" scope="row" width="151">एसिडिटी</td>
<td style="width: 83.7736%; height: 48px; border-color: #0a0a0a; border-style: solid; vertical-align: top;" scope="row" width="425">सलाद, गाजर, गोभी, शिमला मिर्च, खीरा, अंगूर, खरबूजा और पपीता जैसे फल;  दूध, दही, पनीर, सोया आदि जैसे प्रोटीन युक्त आहार; ब्राउन चावल, मक्का, रोटी और बेसन जैसे अनाज का सेवन; दाल, चना, लोबिया और मूंगफली जैसे फलौलीय भोजन का सेवन; अधिक पानी पीना चाहिए।</td>
</tr>
<tr style="height: 24px;">
<td style="width: 3.89934%; height: 24px; border-color: #0a0a0a; border-style: solid; vertical-align: top;" scope="row" width="47">२</td>
<td style="width: 12.327%; height: 24px; border-color: #0a0a0a; border-style: solid; vertical-align: top;" scope="row" width="151">कब्ज</td>
<td style="width: 83.7736%; height: 24px; border-color: #0a0a0a; border-style: solid; vertical-align: top;" scope="row" width="425">उषापान, रेशेदार फल व सब्जियों का अधक सेवन, पानी अधिक पीना, चना भिगोकर खाना</td>
</tr>
<tr style="height: 24px;">
<td style="width: 3.89934%; height: 24px; border-color: #0a0a0a; border-style: solid; vertical-align: top;" scope="row" width="47">३</td>
<td style="width: 12.327%; height: 24px; border-color: #0a0a0a; border-style: solid; vertical-align: top;" scope="row" width="151">मोटापा</td>
<td style="width: 83.7736%; height: 24px; border-color: #0a0a0a; border-style: solid; vertical-align: top;" scope="row" width="425">नींबू, शहद और गर्म पानी; लौकी जूस, धनिया जूस, ग्रीन टी बिना चीनी मिलाए</td>
</tr>
<tr style="height: 24px;">
<td style="width: 3.89934%; height: 24px; border-color: #0a0a0a; border-style: solid; vertical-align: top;" scope="row" width="47">४</td>
<td style="width: 12.327%; height: 24px; border-color: #0a0a0a; border-style: solid; vertical-align: top;" scope="row" width="151">अनिद्रा</td>
<td style="width: 83.7736%; height: 24px; border-color: #0a0a0a; border-style: solid; vertical-align: top;" scope="row" width="425"><a href="https://www.1mg.com/hi/patanjali/badam-ke-fayde/">बादाम</a>, अखरोट, दूध एवं दलिया का सेवन; सोने से पूर्व दूध, हर्बल चाय, केला</td>
</tr>
<tr style="height: 24px;">
<td style="width: 3.89934%; height: 24px; border-color: #0a0a0a; border-style: solid; vertical-align: top;" scope="row" width="47">५</td>
<td style="width: 12.327%; height: 24px; border-color: #0a0a0a; border-style: solid; vertical-align: top;" scope="row" width="151">अपच</td>
<td style="width: 83.7736%; height: 24px; border-color: #0a0a0a; border-style: solid; vertical-align: top;" scope="row" width="425">उबले हुए चावल, सब्जियों का सूप, केला, पपीता, उबली हुई सब्जियाँ, सेब की चटनी, अनानास, दही इत्यादि</td>
</tr>
<tr style="height: 24px;">
<td style="width: 3.89934%; height: 24px; border-color: #0a0a0a; border-style: solid; vertical-align: top;" scope="row" width="47">६</td>
<td style="width: 12.327%; height: 24px; border-color: #0a0a0a; border-style: solid; vertical-align: top;" scope="row" width="151">गैस ट्रबल</td>
<td style="width: 83.7736%; height: 24px; border-color: #0a0a0a; border-style: solid; vertical-align: top;" scope="row" width="425">तरबूज, कीवी, केला, अंजीर, खीरा, स्ट्राबेरी</td>
</tr>
<tr style="height: 24px;">
<td style="width: 3.89934%; height: 24px; border-color: #0a0a0a; border-style: solid; vertical-align: top;" scope="row" width="47">७</td>
<td style="width: 12.327%; height: 24px; border-color: #0a0a0a; border-style: solid; vertical-align: top;" scope="row" width="151">चरम रोग</td>
<td style="width: 83.7736%; height: 24px; border-color: #0a0a0a; border-style: solid; vertical-align: top;" scope="row" width="425">सहजन, टिंडा, परवल, लहसुन, टमाटर, मौसमी ताजी सब्जियाँ (लौकी, तोरई, करेला, कददू) सेब, पपीता, अनार, गोभी, गाजर, फालसा, आंवला</td>
</tr>
<tr style="height: 24px;">
<td style="width: 3.89934%; height: 24px; border-color: #0a0a0a; border-style: solid; vertical-align: top;" scope="row" width="47">८</td>
<td style="width: 12.327%; height: 24px; border-color: #0a0a0a; border-style: solid; vertical-align: top;" scope="row" width="151">मधुमेह</td>
<td style="width: 83.7736%; height: 24px; border-color: #0a0a0a; border-style: solid; vertical-align: top;" scope="row" width="425">सेब, अमरुद, नाशपति, आडू, जामुन, करेला, काला चना, सहजन</td>
</tr>
<tr style="height: 24px;">
<td style="width: 3.89934%; height: 24px; border-color: #0a0a0a; border-style: solid; vertical-align: top;" scope="row" width="47">९</td>
<td style="width: 12.327%; height: 24px; border-color: #0a0a0a; border-style: solid; vertical-align: top;" scope="row" width="151">रक्त की कमी</td>
<td style="width: 83.7736%; height: 24px; border-color: #0a0a0a; border-style: solid; vertical-align: top;" scope="row" width="425">चकुंदर, पालक, अनार, तुलसी, अमरुद, साबुत दाल, मोटा अनाज, हरी पत्तेदार सब्जियाँ.</td>
</tr>
<tr style="height: 24px;">
<td style="width: 3.89934%; height: 24px; border-color: #0a0a0a; border-style: solid; vertical-align: top;" scope="row" width="47">१०</td>
<td style="width: 12.327%; height: 24px; border-color: #0a0a0a; border-style: solid; vertical-align: top;" scope="row" width="151">कोलोस्ट्रोल बढ़ना</td>
<td style="width: 83.7736%; height: 24px; border-color: #0a0a0a; border-style: solid; vertical-align: top;" scope="row" width="425">आंवला, एलोविरा, लहसुन, अदरक, नींबू, अर्जुन जड़ी बूटी, त्रिफला</td>
</tr>
<tr style="height: 24px;">
<td style="width: 3.89934%; height: 24px; border-color: #0a0a0a; border-style: solid; vertical-align: top;" scope="row" width="47">११</td>
<td style="width: 12.327%; height: 24px; border-color: #0a0a0a; border-style: solid; vertical-align: top;" scope="row" width="151">ज्वर</td>
<td style="width: 83.7736%; height: 24px; border-color: #0a0a0a; border-style: solid; vertical-align: top;" scope="row" width="425">खिचड़ी, फल, नारियल पानी, विभिन्न सूप</td>
</tr>
<tr style="height: 24px;">
<td style="width: 3.89934%; height: 24px;" width="47"></td>
<td style="width: 12.327%; height: 24px;" width="151"></td>
<td style="width: 83.7736%; height: 24px;" width="425"></td>
</tr>
</tbody>
</table>
<p style="text-align: justify;">उपरोक्त तालिका में सामान्य रूप से होने वाले रोग लक्षणों एवं आहार चिकित्सा में पथ्य खाद्य पदार्थों का वर्णन किया गया है। ये 11 रोग लक्षण है, इन्हें रोग मान लिया जाता है। इन्हें आहार चिकित्सा से न्यून व समाप्त किया जा सकता है अन्यथा आगे बढ़कर ये कई भयंकर रोगों को जन्म देते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">आरोग्यं भोजनाधीनम्। (काश्यपसंहिता, खि. 5.9). महर्षि कश्यप कहते हैं कि आरोग्य भोजन के अधीन होता है। अपनी जीवन शैली में संतुलित आहार और आहार चिकित्सा को स्थान देकर जीवन में आरोग्य प्राप्त कर सकते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक विद्या भारती दिल्ली प्रान्त के संगठन मंत्री है और विद्या भारती प्रचार विभाग की केन्द्रीय टोली के सदस्य है।)</p>
<p><strong>और पढ़ें : <span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/food-and-vihar-of-baby/" target="_blank" rel="noopener">शिशु का आहार-विहार</a></span></strong></p>
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		<title>शिशु का आहार-विहार</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 31 May 2023 06:45:39 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[आहार-विहार]]></category>
		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[Aahar Vihar]]></category>
		<category><![CDATA[bhartiya shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[Bhojan]]></category>
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		<category><![CDATA[indian education]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#x270d; रवि कुमार घर में शिशु रहता है तो आनन्द रहता है। घर में आने-जाने वाले सभी रिश्तेदार, ईष्ट-मित्र गण के लिए वह शिशु आकर्षण का केंद्र होता है। शिशु&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"><img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/270d.png" alt="✍" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /> रवि कुमार</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-6705" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/05/Introducing-Solid-Foods-300x160.jpg" alt="" width="1616" height="862" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/05/Introducing-Solid-Foods-300x160.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/05/Introducing-Solid-Foods-768x409.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/05/Introducing-Solid-Foods.jpg 940w" sizes="auto, (max-width: 1616px) 100vw, 1616px" /></p>
<p style="text-align: justify;">घर में शिशु रहता है तो आनन्द रहता है। घर में आने-जाने वाले सभी रिश्तेदार, ईष्ट-मित्र गण के लिए वह शिशु आकर्षण का केंद्र होता है। शिशु अपने क्रियाकलापों से सभी का ध्यान अपनी ओर खींचता है। शिशु-काल अर्थात आयु-अवधि 5 वर्ष तक की मानी गई है। बालक के विषय में शास्त्रों में कहा गया है<strong>&#8211; “</strong><strong>लालयेत</strong> <strong>पंचवर्षाणि</strong> <strong>दशवर्षाणि</strong> <strong>ताडयेत्। प्राप्ते</strong> <strong>तु</strong> <strong>षोडशे</strong> <strong>वर्षे</strong> <strong>पुत्रं</strong> <strong>मित्रवदाचरेत्</strong><strong>।</strong><strong>।” </strong>अर्थात पांच वर्ष तक की आयु में शिशु का लालन-पालन बड़े लाड़-प्यार से करना चाहिए। दस वर्ष तक (15 वर्ष की आयु होने तक), आवश्यक होने पर, बालक को ताड़ना (नियम पालन, संस्कार आदि) भी कर सकते हैं। 16 वर्ष की आयु हो जाए तो बालक के साथ मित्र जैसा व्यवहार करें।</p>
<p style="text-align: justify;">पाँच वर्ष तक की अवस्था में शिशु माँ पर आलंबित है। शिशु के लालन-पालन में उसका आहार-विहार आता है। आहार में माँ का दूध और आयु स्तर अनुसार भोज्य पदार्थ; विहार में उसकी नींद व क्रियाकलाप आते हैं। अब प्रश्न यह उठता है कि आज की माताएं शिशु के आहार-विहार के प्रति जागरूक है क्या? जागरूकता के साथ-साथ आहार-विहार में क्या-क्या ध्यान रखना, इस विषय में उन्हें जानकारी रहती है?</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>आहार के विषय में सही जानकारी का अभाव</strong></p>
<p style="text-align: justify;">वर्तमान माताएं शिशु के आहार-विहार के लिए जागरूक तो है परंतु इस विषय में उन्हें दिशा स्पष्ट नहीं है। आज के भाग-दौड़ भरे जीवन में समय का अभाव भी दिखाई देता है। माँ को दिशा की अस्पष्टता व समय का अभाव शिशु को आने वाले जीवन में भुगतना पड़ता है। इन पांच वर्षों में हुई शारीरिक वृद्धि व मानसिक विकास का प्रभाव शिशु के जीवन पर पड़ता है। आज सर्वदूर बाल अवस्था में बालकों में हीनताजन्य रोग (deficiency disease) दिखाई देते हैं। उसका बड़ा कारण शिशु अवस्था में आहार-विहार पर सही ध्यान न देना है।</p>
<p style="text-align: justify;">समय का अभाव, विज्ञापनों का प्रभाव व सही जानकारी के न होने के कारण बाजार में होर्लिक्स तथा सेरेलॉक आदि खाद्य पदार्थों को शिशु आहार का मुख्य भाग मानकर शिशु को देते रहते हैं। इस सब खाद्य पदार्थों में प्रिजरवेटिव (Preservative) रहता है, मीठे की मात्रा भी अधिक होती है, स्वाद बढ़ाने की दृष्टि से चॉकलेट आदि फ्लेवर भी डाले जाते हैं। शिशु की आंतों व शरीर की पाचन प्रक्रिया के लिए ये सब ठीक नहीं है। आजकल बहुत कम आयु के बालकों को डायबिटीज जैसे रोग होने के कारणों में से एक ये भी है। दूध में चॉकलेट पाउडर घोलकर शिशु को पिलाना आम प्रचलन में है। चॉकलेट पाउडर दूध की गुणवत्ता को कम करता है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>शिशु का आहार</strong></p>
<p style="text-align: justify;">आयुर्वेद शास्त्र में बालक के जन्म के पश्चात् उसकी तीन अवस्थाएँ बताई गई हैं – 1. क्षीरप 2. क्षीरान्नाद 3. अन्नाद। क्षीरप बालक केवल स्तनपान पर ही निर्भर रहता है। अतः इस अवस्था में माता को पौष्टिक आहार की विशेष आवश्यकता रहती है। क्षीरान्नाद अर्थात दूध व अन्न दोनों पर निर्भर रहने वाला बालक। छह मास की आयु के बाद बालक को अन्नप्राशन संस्कार की व्यवस्था है। इस अवस्था में बालक की शारीरिक हलचल बढ़ने के साथ-साथ पाचन शक्ति भी बढ़ती है। छह मास के बाद माँ के दूध के अलावा अन्य प्राणियों (गाय, भैंस) का दूध भी बालक को पिलाते हैं। एक वर्ष के बालक को सभी प्रकार के लघु धान्य- गेहूँ, चावल, मक्का, बाजरा को दूध-घी आदि के साथ तरल मात्रा में दे सकते हैं। अन्नाद अर्थात सम्पूर्ण रूप से धान्य पर निर्भर रहने वाला बालक।</p>
<p style="text-align: justify;">जब तक शिशु माँ का दूध ग्रहण करता है तब तक माँ के द्वारा लिए गए आहार का प्रभाव भी शिशु पर पड़ता है। माँ का स्वास्थ्य बिगड़ता है तो शिशु का भी स्वास्थ्य बिगड़ता है। अतः माँ का आहार शुद्ध सात्विक होना चाहिए। एक परिवार में शिशु को ठंड लग गई। पूछने पर पता चला कि माँ ने कुछ अत्यंत ठंडे पदार्थों का सेवन किया था, इस कारण माँ अस्वस्थ हुई और उसका प्रभाव शिशु पर भी हुआ। शिशु अवस्था में ठंडे पदार्थों आइसक्रीम, ठंडे पेय पदार्थ व अत्यधिक मीठे पदार्थों आदि का सेवन वर्जित है।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-6706" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/05/Sleeping-Bby-4_wide-300x162.jpg" alt="" width="1715" height="926" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/05/Sleeping-Bby-4_wide-300x162.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/05/Sleeping-Bby-4_wide-1024x554.jpg 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/05/Sleeping-Bby-4_wide-768x415.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/05/Sleeping-Bby-4_wide.jpg 1026w" sizes="auto, (max-width: 1715px) 100vw, 1715px" /></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>शिशु का विहार (नींद और क्रियाकलाप)</strong></p>
<p style="text-align: justify;">शिशु अवस्था में शारीरिक व मानसिक विकास के लिए नींद का बहुत अधिक महत्व है। जन्म के पश्चात वह 24 में से 22 घंटे तक सोता है। धीरे धीरे यह समय कम होता जाता है और शिशु को दिन व रात का भान भी होता जाता है। तीन से पांच वर्ष की आयु में शिशु को न्यूनतम 12 घंटे सोना आवश्यक है। वह शांति से नींद ले सके, इसकी व्यवस्था करना भी आवश्यक है।</p>
<p style="text-align: justify;">शिशु के विहार के लिए खेलना, कूदना, चलना, दौड़ना, सामान इधर से उधर फेंकना-रखना, बाहर घूमने जाना, पैन/पेंसिल/रंग जो हाथ में आ गया उससे कपड़ों/दीवार पर कुछ न कुछ बना देना, ऊपर-नीचे चढ़ना-उतरना, नई नई ध्वनि सुनना व निकालना, मिट्टी में खेलना आदि आते हैं। शिशु का प्रत्येक क्रियाकलाप उसका व्यायाम ही है। इन सारे क्रियाकलापों में परिवार के सदस्यों विशेषकर माँ का संरक्षण आवश्यक है। संरक्षण के साथ स्वतंत्रता, सहजता व सुरक्षा भी महत्वपूर्ण है।</p>
<p style="text-align: justify;">प्रायः परिवारों में ये मनोभाव रहता है कि शिशु के हाथ में जो भी आ जाता है वह उसे फेंक देता है, तोड़ देता है। इसलिए सब सामान शिशु से बचा कर रखो। कक्ष का द्वार खुला मिला तो कहीं भी चला जाएगा, इसलिए द्वार बंद करके रखो, पूरा पहरा दो। ऐसा होना स्वाभाविक है, इसका कारण उस अवस्था में शिशु की ज्ञानेन्द्रियों व कर्मेन्द्रियों की सक्रियता का बढ़ना है। शिशु अपने क्रियाकलाप ठीक से कर सके, इसके लिए उसके वस्त्र भी ऐसे हो कि उसे क्रियाकलाप करने में कोई बाधा या असहजता न हो। इस अवस्था में टीवी व मोबाइल से दूरी बनाना ही ठीक रहता है। अन्यथा शिशु क्रियाकलाप करने की बजाय इन आधुनिक यंत्रों में ही फंसा रहेगा और उसकी शारीरिक-मानसिक वृद्धि रुक जाएगी।</p>
<p style="text-align: justify;">शिशु अवस्था शेष जीवन की नींव है। नींव जितनी मजबूत होगी भवन उतना ही अच्छा बनेगा। इस नींव को मजबूत बनाने के लिए आहार-विहार पर ध्यान देना माताओं के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है। माता की जागरूकता के साथ उसे सही जानकारी हो और उस अनुसार शिशु का लालन-पालन हो  तो ‘आज का स्वस्थ शिशु कल का स्वस्थ नागरिक’ बनता है।</p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक विद्या भारती दिल्ली प्रान्त के संगठन मंत्री है और विद्या भारती प्रचार विभाग की केन्द्रीय टोली के सदस्य है।)</p>
<p><strong>और पढ़ें</strong> : <span style="color: #000080;"><strong><a style="color: #000080;" href="https://rashtriyashiksha.com/effects-of-discussion-on-health/" target="_blank" rel="noopener">चर्चा-संवाद का स्वास्थ्य पर प्रभाव</a></strong></span></p>
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		<title>चर्चा-संवाद का स्वास्थ्य पर प्रभाव</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 24 Apr 2023 10:52:42 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[आहार-विहार]]></category>
		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[श्री रवि कुमार जी]]></category>
		<category><![CDATA[Aahar Vihar]]></category>
		<category><![CDATA[Diet]]></category>
		<category><![CDATA[education]]></category>
		<category><![CDATA[food and health]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[school]]></category>
		<category><![CDATA[आहार विहार]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#x270d; रवि कुमार एक व्यक्ति नौकरी से आकर अपने कक्ष में कम्प्यूटर के सामने बैठकर अपने ऑनलाइन चैटरूम में व्यस्त रहता था। एक दिन उसका इंटरनेट पैक समाप्त हो गया।&#8230; </p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"><img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/270d.png" alt="✍" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /> रवि कुमार</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-6575" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/04/WhatsApp-Image-2023-04-24-at-7.23.41-PM-300x225.jpeg" alt="" width="1644" height="1233" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/04/WhatsApp-Image-2023-04-24-at-7.23.41-PM-300x225.jpeg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/04/WhatsApp-Image-2023-04-24-at-7.23.41-PM.jpeg 435w" sizes="auto, (max-width: 1644px) 100vw, 1644px" /></p>
<p style="text-align: justify;">एक व्यक्ति नौकरी से आकर अपने कक्ष में कम्प्यूटर के सामने बैठकर अपने ऑनलाइन चैटरूम में व्यस्त रहता था। एक दिन उसका इंटरनेट पैक समाप्त हो गया। इस कारण उस दिन चैटरूम में बैठने की बजाय अपने परिवार के सदस्यों के साथ चर्चा करते हुए समय व्यतीत किया। अगले दिन उसने नौकरी से लौटते हुए नेटपैक रिचार्ज करवा लिया। घर आने पर चैटरूम में अपने साथियों के साथ पहला वाक्य लिखा &#8211; &#8220;कल नेटपैक समाप्त होने के कारण आप सबको जॉइन नहीं कर पाया। कल का समय मैंने अपने परिवार वालों के साथ व्यतीत किया। बहुत अच्छे लोग हैं वे।&#8221; यह संस्मरण आजकल के भागदौड़ भरे जीवन का एक उदाहरण है।</p>
<p style="text-align: justify;">परस्पर चर्चा गायब सी होती जा रही है। मोबाइल-इंटरनेट में तो घंटों समय लगता है परंतु आपसी बातचीत के लिए कुछ मिनटों का समय भी हमारे पास नहीं है। परिवार के सदस्यों की आपस में बातचीत नहीं होती। कार्य स्थल पर भी कुछ ऐसा ही दिखता है। कहीं कुछ मित्र मंडली में हो जाए तो ठीक, अन्यथा बड़ी मात्रा में लोगों का जीवन चर्चा-विहीन सा बीतता है।</p>
<p style="text-align: justify;">परस्पर चर्चा होने या न होने का भी हमारे स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़ता है। चर्चा अधिक होना, कम होना, सकारात्मक होना या नकारात्मक होना, सबका स्वास्थ्य से सम्बंध है। स्वास्थ्य से चर्चा का कैसा संबंध है, आइए विचार करते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>मनुष्य का मन</strong></p>
<p style="text-align: justify;">मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। वह समूह में रहना चाहता है। आजकल के जीवन में वह समूह में रहकर भी अकेला अनुभव करता है। उसका एक मुख्य कारण है कि अपने मन की बात वह किससे कहे? ऐसा कोई स्थान और व्यक्ति उसके जीवन में है क्या, जहां और जिसके सामने वह अपनी मन की बात निसंकोच भाव से खुलकर कह सकता है। जिस व्यक्ति के पास ऐसा स्थान रहता है, वह आजकल सौभाग्यशाली माना जाता है। ऐसे में एक पुराने गीत की पंक्ति स्मरण हो आती है &#8211; &#8220;कोई होता जिसको अपना हम अपना कह देते।&#8221; मन की बात खुलकर कहने से मन हल्का हो जाता है, अन्यथा मन में कुंठाएं-गांठें बनती रहती हैं जो धीरे धीरे दुःख, अवसाद और तनाव आदि का कारण बनती है और आगे चलकर मानसिक रोग का रूप ले लेती है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>सामाजिक दायरा</strong></p>
<p style="text-align: justify;">आजकल मनुष्य का सामाजिक दायरा सिमटता जा रहा है। पहले एक सामान्य मनुष्य का सहज स्वाभाविक दायरा बहुत बड़ा होता था, आज का मनुष्य उस दायरे को रखना नहीं चाहता। बड़ा सामाजिक दायरा उसे अपने व्यक्तिगत जीवन में हस्तक्षेप दिखाई देता है इसलिए वह छोटे से छोटा दायरा रखना चाहता है। बड़े सामाजिक दायरे का लाभ उसे दिखाई नहीं देता। बस मेरे व्यक्तिगत सुख में कोई दखल न हो, ऐसा वह विचार करता है। यह विचार मूल रूप में पश्चिम का विचार है, भारतीय विचार नहीं है। भारतीय विचार बड़े सामाजिक दायरे का है, &#8216;वसुधैव कुटुम्बकम&#8217; का है। जितना बड़ा सामाजिक दायरा होगा, उतना ही परस्पर चर्चा-संवाद का अवसर मिलेगा और जितना अधिक अवसर मिलेगा, उतना अधिक मन को खोल पाएंगे।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>पारिवारिक सम्बन्ध</strong></p>
<p style="text-align: justify;">परिवार के सदस्यों में रक्त संबंध होता है इस कारण उनका एक दूसरे के प्रति सहज जुड़ाव रहता है। सभी सदस्य एक दूसरे के पूरक होते हैं। अपने मन की बात एक दूसरे को कहना, ये सबकी इच्छा रहती है। परंतु भागदौड़ के जीवन में कहने का अवसर ही नहीं मिल पाता। इसके लिए दिन में कोई एक समय परिवार के सभी सदस्य मिलकर भोजन/जलपान आदि करें। सप्ताह में एक बार 30-40 या 60 मिनट के लिए एक साथ बैठकर खुलकर चर्चा-संवाद करें। परिवार के सदस्यों में जितना संवाद बढ़ेगा, उतनी ही आपसी दूरियां कम होंगी और जीवन आनन्दमय बनेगा।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-6576" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/04/WhatsApp-Image-2023-04-24-at-7.21.59-PM-300x243.jpeg" alt="" width="1594" height="1291" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/04/WhatsApp-Image-2023-04-24-at-7.21.59-PM-300x243.jpeg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/04/WhatsApp-Image-2023-04-24-at-7.21.59-PM.jpeg 615w" sizes="auto, (max-width: 1594px) 100vw, 1594px" /></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>आहार और मनःस्थिति</strong></p>
<p style="text-align: justify;">आहार अच्छा लेने मात्र से स्वास्थ्य अच्छा नहीं हो जाता। आहार लेते समय मनःस्थिति कैसी है, इसका आहार के पाचन पर सीधा प्रभाव रहता है। प्रसन्नतापूर्वक प्रसाद रूप में ग्रहण किया हुआ भोजन अधिक पाचक होता है और अधिक पौष्टिकता प्रदान करता है। आहार लेते समय मन का भाव अच्छा नहीं है या नकारात्मक भाव है अथवा मन क्रोधित है तो भोजन का पाचन ठीक से नहीं होगा और न ही रस ठीक से बन पाएगा।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>रोगी के साथ संवाद की परंपरा</strong></p>
<p style="text-align: justify;">भारत में कोई परिचित रोगग्रस्त हो जाता है तो उसके जानने वाले स्वास्थ्य का हालचाल पूछने के लिए आते हैं। रोगी व्यक्ति जितने अधिक परिचित लोगों से संवाद करता है, उतना उसको ठीक होने की शक्ति बढ़ाता रहता है। रोगी व्यक्ति के ठीक होने की गति तीव्र होती रहती है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>कुछ करणीय बातें</strong></p>
<ul style="text-align: justify;">
<li>
<h4>जीवन में अंतर्मुखी होने की बजाय बहिर्मुखी बने। हालांकि ये व्यक्ति के मूल स्वभाव पर निर्भर करता है। तो भी मानव का मूल स्वभाव समूह में विचरण करने का है।</h4>
</li>
<li>
<h4>मोबाइल-इंटरनेट से कुछ हद तक दूरी बनाएं। इनका अपने कार्य हेतु उपयोग करें। इन्हें अपने ऊपर हावी न होने दे।</h4>
</li>
<li>
<h4>सच्चे मित्र ढूंढें। ये परिवार के सदस्य भी हो सकते हैं अथवा अपनी मित्र मंडली में से भी। सच्चे मित्र के साथ आप अपने मन की बात खोल सकते हैं।</h4>
</li>
<li>
<h4>हर समय कार्यालय अपने साथ न लेकर चले। कभी कभी मन में 24 घंटे कार्य चलता रहता है। सायंकाल एक समय के बाद कार्यालय मन में से भी बंद कर देवे। मित्र मंडली व परिवार में बातचीत के लिए समय रखे और हल्के मूड के साथ चर्चा-संवाद करें।</h4>
</li>
<li>
<h4>कुछ अच्छा साहित्य अध्ययन करें और आत्म-संवाद करें। पुस्तकें भी सच्ची मित्र होती हैं। पुस्तकों में जो अच्छा पढ़ने को मिले, उसे अपने साथियों के साथ चर्चा में सांझा करें।</h4>
</li>
<li>
<h4>कभी कभी समूह में भ्रमण के लिए जाएं। वर्ष में एक बार परिवार सहित तीर्थाटन अथवा देशाटन के लिए जाना अच्छा रहेगा।</h4>
</li>
</ul>
<p style="text-align: justify;"><strong>परस्परानुकथनं पावनं भगवद्यश:।</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>मिथो रतिर्मिथस्तुष्टिर्निवृत्तिर्मिथ आत्मन:॥</strong></p>
<p style="text-align: justify;">&#8211; भागवत पुराण (११.३.३०)</p>
<p style="text-align: justify;">अर्थात मनुष्य को चाहिए कि भगवद्भक्तों के साथ एकत्र होकर भगवान् की महिमा-गायन के लिए उनकी संगति करना सीखे। यह विधि अत्यन्त शुद्ध बनाने वाली है। जैसे ही भक्तगण इस प्रकार प्रेमपूर्ण मैत्री स्थापित कर लेते हैं, वैसे ही उन्हें परस्पर सुख तथा तुष्टि का अनुभव होता है। इस प्रकार एक-दूसरे को प्रोत्साहित करके, वे उस भौतिक इन्द्रिय-तृप्ति को त्यागने में सक्षम होते हैं, जो समस्त कष्टों का कारण है।</p>
<p style="text-align: justify;"><em>सकारात्मक चर्चा-संवाद सदा ही सुख देने वाला है। उसे जीवनचर्या का भाग बनाएं और आनंदित रहें। ऐसा करने से हम अपने जीवन को काफी हद तक स्वास्थ्य से भरपूर बना सकते हैं।</em></p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक विद्या भारती दिल्ली प्रान्त के संगठन मंत्री है और विद्या भारती प्रचार विभाग की केन्द्रीय टोली के सदस्य है।)</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>और पढ़ें : <span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://rashtriyashiksha.com/diet-vihara-and-yoga/" target="_blank" rel="noopener">आहार-विहार और योग</a></span></strong></p>
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		<title>आहार-विहार और योग</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 24 Mar 2023 06:04:59 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[आहार-विहार]]></category>
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		<category><![CDATA[श्री रवि कुमार जी]]></category>
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		<category><![CDATA[food and yoga]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#x270d; रवि कुमार आज योग की चर्चा सर्वत्र है। अपने आसपास पार्क में, घर की बालकॉनी में योग करते अनेक व्यक्ति मिल जाएंगे। अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस 21 जून के प्रचलन&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"><img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/270d.png" alt="✍" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /> रवि कुमार</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-6473" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/03/upload_1550553406_0-e1679648839500-300x187.jpg" alt="" width="1729" height="1078" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/03/upload_1550553406_0-e1679648839500-300x187.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/03/upload_1550553406_0-e1679648839500-768x478.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/03/upload_1550553406_0-e1679648839500.jpg 882w" sizes="auto, (max-width: 1729px) 100vw, 1729px" /></p>
<p style="text-align: justify;">आज योग की चर्चा सर्वत्र है। अपने आसपास पार्क में, घर की बालकॉनी में योग करते अनेक व्यक्ति मिल जाएंगे। अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस 21 जून के प्रचलन से भी इस विषय को काफी बढ़ावा मिला है। परंतु विचार का विषय यह है कि योग मात्र व्यायाम करना, योगासन, प्राणायाम व ध्यान करना ही है? प्रातः अच्छे से योग करो और दिनभर में जो इच्छा हो उसे खा लो तो स्वास्थ्य अच्छा रहेगा? भाग-दौड़ के जीवन में जैसी गिरती-पड़ती-भागती दिनचर्या हो, उसमें रहो और प्रातः कुछ समय योग कर लो तो सब ठीक रहेगा? आइए, इस विषय पर और विचार करते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>प्रचलित धारणा</strong></p>
<p style="text-align: justify;">योग के विषय में प्रचलित धारणा व्यायाम, आसन, प्राणायाम व ध्यान करना ही है। इन चार बातों में योग सीमित हो गया है। क्या वास्तव में यह योग है? यह विचारणीय प्रश्न है। महर्षि पतंजलि ने योग को अष्टांग रूप में वर्णन किया है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधयो</strong><strong>s</strong><strong>ष्टावङ्गानि॥ </strong>(पतंजलि योग सूत्र २.२९)</p>
<p style="text-align: justify;">ये आठ अंग है – १) यम, २) नियम, ३) आसन, ४) प्राणायाम, ५) प्रत्याहार, ६) धारणा, ७) ध्यान व ८) समाधि। ये आठ अंग जीवनचर्या का भाग बनने चाहिए तभी योग जीवन का भाग बनेगा। अथवा ये कहे कि भारतीय जीवन शैली के अनुसार जीना है तो योग आधारित जीवन शैली को अपनाना होगा।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>जीवन शैली में योग</strong></p>
<p style="text-align: justify;">पतंजलि अष्टांग योग में पहला है यम। इसके अंतर्गत पांच बातें आती हैं – अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य व अपरिग्रह। सबको स्वयं के जैसा समझना और मन-कर्म-वचन से हिंसा न करना। मन, कर्म व वचन से एक समान रहते हुए सत्य का साथ देना। चोरी की भावना नहीं रखना, पुरुषार्थ से जो अर्जित नहीं किया या भेंट व पुरस्कार नहीं मिला उसे लेने का विचार न करना अस्तेय है। समस्त इन्द्रिय संयम ब्रह्मचर्य है। आवश्यकता से अधिक वस्तुओं का संग्रह न करना और संग्रह करने की प्रवृत्ति को मन-कर्म-वचन से त्यागना ही अपरिग्रह है।</p>
<p style="text-align: justify;">इसी प्रकार नियम के अंतर्गत भी पांच बातें है – शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय व ईश्वर-प्राणिधान। शौच अर्थात मन व शरीर की पवित्रता है। कर्तव्य का पालन करते हुए जो प्राप्त हो, उसमें संतुष्ट रहना संतोष है। हर परिस्थिति में मन व शरीर को अनुशासित रखना तप है। स्वयं का अध्ययन करते हुए विचार शुद्धि करना, ज्ञान प्राप्ति के लिए विद्याभ्यास, अच्छे साहित्य का अध्ययन, सत्संग का आदान-प्रदान आदि स्वाध्याय है। ईश्वर के प्रति श्रद्धा व आस्था रखना ईश्वर-प्राणिधान है।</p>
<p style="text-align: justify;">यम-नियम की 10 बातें जीवन का भाग बने, यह योग आधारित जीवन शैली का प्रथम चरण है। योग सर्वप्रथम यम व नियम के द्वारा व्यक्ति के मन और मस्तिष्क को ठीक करने का सुझाव देता है। आसन व प्राणायाम करने से पूर्व यदि व्यक्ति यम-नियम का पालन नहीं करता तो उसे योग से पूर्ण स्वास्थ्य लाभ नहीं मिल सकता।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>संतुलित आहार और योग</strong></p>
<p style="text-align: justify;">योगासन-प्राणायाम प्रतिदिन करते हैं और संतुलित आहार नहीं लेते तो योगासन-प्राणायाम का स्वास्थ्य पर प्रभाव बहुत कम होगा। संतुलित आहार का मन-मस्तिष्क पर भी प्रभाव पड़ता है। <strong>“जैसा खाए अन्न</strong><strong>, </strong><strong>वैसा बने मन”</strong> &#8211; ये कहावत सभी ने सुनी है। आजकल तामसिक भोजन यथा जंकफूड, अधपका हुआ, बासी व भोजन निर्माण की मूल प्रक्रिया को बदल कर बनाए गए व्यंजनों का प्रचलन अधिक हो गया है। साथ ही असमय खाना भी प्रचलन में है। तामसिक भोजन ग्रहण करेंगे, असमय करेंगे और योग करेंगे तो ये समन्वय कैसे संभव है? ऐसे में स्वास्थ्य लाभ की अपेक्षा करना ही व्यर्थ है।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>विहार और योग</strong></p>
<p style="text-align: justify;">जिस प्रकार मानव स्वास्थ्य के लिए संतुलित आहार आवश्यक है उसी प्रकार सम्यक विहार भी जरूरी है। विहार में दिनचर्या के सभी भाग आते हैं। यथा- कार्य की प्रकृति, अधिक समय बैठने या खड़े रहने की स्थिति, खेल, व्यायाम, नींद, परस्पर संवाद आदि। योग प्रतिदिन करते है और सम्यक विहार नहीं है तो स्वास्थ्य लाभ हो ही नहीं सकता। व्यवस्थित दिनचर्या व उपरोक्त बातों को दिनचर्या में यथास्थान देना ही सम्यक विहार कहा जाएगा।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-6471" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/03/Which-Healthy-Food-to-take-During-Yoga-Exercises-300x180.jpg" alt="" width="1647" height="989" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/03/Which-Healthy-Food-to-take-During-Yoga-Exercises-300x180.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/03/Which-Healthy-Food-to-take-During-Yoga-Exercises-768x461.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/03/Which-Healthy-Food-to-take-During-Yoga-Exercises.jpg 799w" sizes="auto, (max-width: 1647px) 100vw, 1647px" /></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>योगासन</strong><strong>, </strong><strong>प्राणायाम व ध्यान</strong></p>
<p style="text-align: justify;">योग के इन तीनों अंगों को नियमित अभ्यास में लाने से स्वास्थ्य को उचित लाभ मिलता है। कभी-कभी करने से स्वास्थ्य लाभ नहीं मिलता। सामान्यतः लोग प्रारम्भ करते हैं और कुछ दिन करके छोड़ देते हैं। दृढ़तापूर्वक नियमित योग अभ्यास करने की आदत लगनी चाहिए। योगासन करते समय श्वास क्रिया महत्वपूर्ण है। सामान्य नियम है &#8211; शरीर का विस्तार करते समय श्वास भरना और संकुचन करते समय श्वास छोड़ना। बिना श्वास क्रिया के योगासन करना मात्र व्यायाम ही होता है।</p>
<p style="text-align: justify;">हठयोग प्रदीपिका में कहा गया है &#8211;</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>चले वाते चलं चित्तं निश्चले निश्चलं भवेत्योगी स्थाणुत्वमाप्नोति ततो वायुं निरोधयेत्॥२.२॥</strong></p>
<p style="text-align: justify;">अर्थात प्राणों के चलायमान होने पर चित्त भी चलायमान हो जाता है और प्राणों के निश्चल होने पर मन भी स्वत: निश्चल हो जाता है और योगी स्थाणु हो जाता है। अतः योगी को श्वांसों का नियंत्रण करना चाहिए।</p>
<p style="text-align: justify;">श्वास नियमन व नियंत्रण के लिए प्राणायाम का अभ्यास अच्छा रहता है। कपालभाति के बाद इन तीन भस्त्रिका, अनुलोम-विलोम व भ्रामरी प्राणायाम को नियमित अभ्यास में जोड़ सकते हैं। न्यूनतम 15 मिनट प्राणायाम नियमित करना चाहिए। धीरे-धीरे समय बढ़ा सकते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">ध्यान किसी योग्य व्यक्ति के मार्गदर्शन में प्रारम्भ करना चाहिए और धीरे-धीरे आगे बढ़ना चाहिए। अन्यथा लाभ की बजाय हानि भी हो सकती है। प्रारंभ में आँख बंद कर शांत होकर बैठना कठिन लगेगा। एकाग्रता नहीं बनेगी। प्रतिदिन 5 मिनट बैठने से अभ्यास प्रारंभ कर सकते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">योग की प्रचलित धारणा से निकल कर योग आधारित जीवन शैली को जीवनचर्या का भाग बनाना आवश्यक है। इस भाग-दौड़ के जीवन में आहार-विहार के सामान्य नियमों को दिनचर्या में सम्मिलित करने से स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। ‘संतुलित आहार, सम्यक विहार और योग को जीवन का भाग’ ये तीनों बातें नवीन पीढ़ी को सिखाने से ‘भविष्य का भारत &#8211; स्वस्थ भारत’ की कल्पना की जा सकती है।</p>
<p style="text-align: justify;">(लेखक विद्या भारती दिल्ली प्रान्त के संगठन मंत्री है और विद्या भारती प्रचार विभाग की केन्द्रीय टोली के सदस्य है।)</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>और पढ़ें : <a href="https://rashtriyashiksha.com/sports-and-exercise-is-necessary-for-good-health/" target="_blank" rel="noopener">अच्छे स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है खेल-व्यायाम</a></strong></p>
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		<title>अच्छे स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है खेल-व्यायाम</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 25 Feb 2023 09:58:44 +0000</pubDate>
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		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[श्री रवि कुमार जी]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#x270d; रवि कुमार मानव स्वास्थ्य के लिए जिस प्रकार आहार आवश्यक है उसी प्रकार खेल-व्यायाम भी आवश्यक है। आजकल की भागदौड़ की जीवनचर्या में खेल-व्यायाम की बात आती है तो&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"><img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/270d.png" alt="✍" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /> रवि कुमार</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-6370" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/02/WhatsApp-Image-2023-02-25-at-16.03.03-300x179.jpeg" alt="" width="1472" height="878" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/02/WhatsApp-Image-2023-02-25-at-16.03.03-300x179.jpeg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/02/WhatsApp-Image-2023-02-25-at-16.03.03.jpeg 650w" sizes="auto, (max-width: 1472px) 100vw, 1472px" /></p>
<p>मानव स्वास्थ्य के लिए जिस प्रकार आहार आवश्यक है उसी प्रकार खेल-व्यायाम भी आवश्यक है। आजकल की भागदौड़ की जीवनचर्या में खेल-व्यायाम की बात आती है तो लोग कहते हैं कि नींद व आराम के लिए समय तो मिलता नहीं है, खेल-व्यायाम के लिए कहाँ मिलेगा। खेल या तो खिलाड़ी खेलता है या कहीं बाल अवस्था में बालकों को अवसर मिलने पर खेलता हुआ देख सकते हैं। और व्यायाम करने वालों की संख्या भी सीमित ही दिखाई देती हैं। इस सीमित संख्या में वे भी सम्मिलित है जिन्हें चिकित्सक ने परामर्श दिया है कि सैर-व्यायाम आदि अवश्य करना है तभी औषधि काम करेगी।</p>
<p>पूर्व काल में बाल अवस्था में खेलना सहज अनिवार्य हो जाता था। और स्त्री-पुरुष की जीवनचर्या के कार्यों में व्यायाम सहजता से हो जाता था। धीरे-धीरे युग परिवर्तन हुआ। जीवनचर्या में भागदौड़, सुविधाएं, अध्ययन का दबाव आदि बढ़ा और खेल-व्यायाम जो जीवनचर्या का महत्त्वपूर्ण भाग था, धीरे-धीरे कम होता चला गया। एक अध्ययन के अनुसार 64 प्रतिशत भारतीय कभी व्यायाम नहीं करते जिसमें महिलाओं की संख्या अधिक है।</p>
<p>खेल-व्यायाम का कम होने का एक बड़ा कारण मोबाइल, इंटरनेट व सोशल मीडिया का बढ़ता प्रयोग भी है। प्रत्यक्ष खेलने की बजाय आज की नवीन पीढ़ी मोबाइल व ऑनलाइन गेम में समय अधिक व्यतीत करती हैं। इस गेम से वह कुछ आनन्द तो प्राप्त करती होगी परंतु स्वास्थ्य लाभ की बजाय स्वास्थ्य को नुकसान ही पहुंचाती होगी। सोशल मीडिया पर एक कार्टून कभी-कभी दिखाई देता है जिसमें दो दृश्य है। पहले दृश्य में बालक बाहर खेल रहा है और माँ उसका कान पकड़ कर घर की ओर अध्ययन करने के लिए ले जा रही है। दूसरे दृश्य में बालक मोबाइल में लगा हुआ है और माँ उसे कान पकड़ कर मैदान की ओर खेलने के लिए ले जाती दिख रही है। दूसरा दृश्य आज की वस्तु स्थिति को अभिव्यक्त कर रहा है।</p>
<p><strong>खेलने व व्यायाम करने से क्या होता है लाभ</strong></p>
<p>नियमित खेलने व व्यायाम करने से माँसपेशियां स्वस्थ रहती हैं। दिनभर व नियमित कार्य करने की क्षमता बढ़ती है। ऊर्जा का स्तर सतत बना रहता है और नियमित रूप से बढ़ता है।</p>
<p>आजकल तनाव सामान्य विषय हो गया है। हर व्यक्ति तनाव में दिखाई देता है। नियमित खेल-व्यायाम से दिनभर के कार्य से उत्पन्न हुए तनाव से राहत मिलती है और तनाव को झेलने की क्षमता भी बढ़ती है।</p>
<p>नियमित खेलने व व्यायाम करने से शरीर का मेटाबॉलिज्म अच्छा होता है। मेटाबॉलिज्म अच्छा होने से कैलोरी भी तेजी से बर्न होती है और वजन नियंत्रित रहता है। खेल-व्यायाम से शरीर का रक्तचाप नियंत्रित रहता है और उच्च रक्तचाप का खतरा 75% तक कम हो जाता है। नियमित खेल-व्यायाम से कोलेस्ट्रॉल नियंत्रण में रहता है। नियमितता से हानिकारक कोलेस्ट्रॉल घटता है और अच्छे कोलेस्ट्रॉल की मात्रा बढ़ती है।</p>
<p>समूह में खेलने से सामाजिक दायरा बना रहता है और धीरे-धीरे बढ़ता रहता है। एक दूसरे के साथ खेलने से सहनशक्ति विकसित होती है। खेल में हार-जीत होती ही रहती है इससे जीवन की सफलता-विफलता में समभाव रहने का अभ्यास होता है। बाल अवस्था में मैदान में खेलने के कारण मिट्टी से सम्पर्क बना रहता है। इससे जीवन रफ एंड टफ बनता है।</p>
<p>खेलकूद और व्यायाम जीवन को अनुशासित बनाता है। खेलकूद करने वाले लोग हमेशा आत्म-विश्वासी रहते हैं और जीवन की चुनौतियों का सामना करने के लिए उनका मानसिक स्तर हमेशा ऊँचा ही रहता है।</p>
<p>खेल व व्यायाम नियमित करने का हमारी भूख व नींद पर भी अच्छा प्रभाव पड़ता है। अच्छी भूख लगती है और पर्याप्त गहरी नींद आती है। आजकल के जीवन में अच्छी भूख लगना व पर्याप्त नींद आना दुर्लभ सा हो गया है।</p>
<p style="text-align: center;"><strong>व्यायामं कुर्वतो नित्यं विरुद्धमपि भोजनम्।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>विदग्धमविदग्धं वा निर्दोषं परिपच्यते ॥</strong></p>
<p>अर्थात नियमित व्यायाम करने से मनुष्य यदि गरिष्ठ, जला, कच्चा भोजन भी खाए तो उसे भी आसानी से पचा लेता है और शरीर को कोई भी हानि नहीं होती है।</p>
<p>मोबाइल, इंटरनेट, सोशल मीडिया का अधिक उपयोग हमारी एकाग्रता को कम करता है। जबकि खेल व व्यायाम हमारी एकाग्रता के स्तर को बढ़ाता है। इसलिए सोशल मीडिया पर अनुपयोगी खर्च हो रहे समय को खेल-व्यायाम के लिए उपयोग करने की आदत नवीन पीढ़ी को लगना आवश्यक है।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-6371" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/02/WhatsApp-Image-2023-02-25-at-16.03.04-300x181.jpeg" alt="" width="1546" height="933" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/02/WhatsApp-Image-2023-02-25-at-16.03.04-300x181.jpeg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/02/WhatsApp-Image-2023-02-25-at-16.03.04.jpeg 630w" sizes="auto, (max-width: 1546px) 100vw, 1546px" /></p>
<p><strong>क्या करें</strong></p>
<p>बाल अवस्था में खेल व व्यायाम अति आवश्यक है। इस आयु में न्यूनतम एक घंटा खेल-व्यायाम होना ही चाहिए। इस अवस्था में लगी आदत जीवनभर चलती है। आजकल इंडोर खेल भी आ गए हैं। यहां इंडोर नहीं मैदानी (आउटडोर) खेलों की नियमित आदत की बात हो रही है। नियमित खेल-व्यायाम बाल अवस्था से तरुणावस्था में प्रवेश पर होने वाले शारीरिक व मानसिक परिवर्तनों के दौरान भटकाव से बालक को दूर रखता है।</p>
<p>खेलने व व्यायाम करने की कोई आयु निश्चित है, ऐसा नहीं है। हर आयु-अवस्था में खेल-व्यायाम आवश्यक है। कितना करना जब यह विचार करते हैं तो दो सूत्र अपना सकते हैं। 1. पूरा शरीर पसीने से नहा जाए, इतना करना। 2. दिनभर में जितना समय खाने में लगाते हैं, उतना समय खेल-व्यायाम में लगाना। सायंकाल की बजाय प्रातःकाल खेल-व्यायाम स्वास्थ्य के लिए अधिक हितकर होता है।</p>
<p>खेल-व्यायाम को दिनचर्या का आवश्यक भाग बनाएं। दिनभर के क्रियाकलापों की योजना करते समय खेल-व्यायाम को अवश्य स्थान देवें। नियमित क्रम बनाने में विशेष ध्यान देना पड़ता है। क्रम टूटने पर पुनः ध्यान देकर क्रम बनाएं। खेल-व्यायाम का नियमित क्रम बनने पर उस समय में अन्य कार्य की योजना न करें।</p>
<p style="text-align: center;"><strong>व्यायामात् लभते स्वास्थ्यं दीर्घायुष्यं बलं सुखं।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>आरोग्यं परमं भाग्यं स्वास्थ्यं सर्वार्थसाधनम्॥</strong></p>
<p><strong>अर्थात व्यायाम से स्वास्थ्य</strong><strong>, </strong><strong>लम्बी आयु</strong><strong>, </strong><strong>बल और सुख की प्राप्ति होती है। निरोगी होना परम भाग्य है और स्वास्थ्य से अन्य सभी कार्य सिद्ध होते हैं।</strong></p>
<p>(लेखक विद्या भारती दिल्ली प्रान्त के संगठन मंत्री है और विद्या भारती प्रचार विभाग की केन्द्रीय टोली के सदस्य है।)</p>
<p><strong>और पढ़ें : <span style="color: #000080;"><a style="color: #000080;" href="https://rashtriyashiksha.com/influence-of-social-media-on-diet/" target="_blank" rel="noopener">सोशल मीडिया का आहार-विहार पर प्रभाव</a></span></strong></p>
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		<title>सोशल मीडिया का आहार-विहार पर प्रभाव</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 23 Jan 2023 11:20:21 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[आहार-विहार]]></category>
		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[श्री रवि कुमार जी]]></category>
		<category><![CDATA[bhartiya shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[indian education]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[आहर विहार]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#x270d; रवि कुमार बालक के पालन-पोषण में माँ की भूमिका व जिम्मेदारी महत्वपूर्ण होती है। और माँ इस भूमिका व जिम्मेदारी को पूर्ण करने में पूरा प्रयास करती है। एक&#8230; </p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"><img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/270d.png" alt="✍" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /> रवि कुमार</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone  wp-image-6213" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/01/pic-300x225.jpg" alt="" width="1499" height="1124" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/01/pic-300x225.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/01/pic-1024x768.jpg 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/01/pic-768x576.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/01/pic.jpg 1200w" sizes="auto, (max-width: 1499px) 100vw, 1499px" /></p>
<p>बालक के पालन-पोषण में माँ की भूमिका व जिम्मेदारी महत्वपूर्ण होती है। और माँ इस भूमिका व जिम्मेदारी को पूर्ण करने में पूरा प्रयास करती है। एक वीडियो में एक माँ हाथ में पात्र व चम्मच लेकर बालक को भोजन करवाने के लिए तत्पर है और बालक मोबाइल में लगा हुआ है। वह भोजन ग्रहण ही नहीं कर रहा। माँ बार बार प्रयास करती है और विफल हो जाती है। बालक के लिए मोबाइल का आकर्षण अधिक है। ऐसे में माँ एक मार्ग निकालती है। वह एक गुड्डा व एक डंडा लेकर आती है और चम्मच में भोज्य पदार्थ भरकर गुड्डे के मुँह से लगाती है। गुड्डा वह ग्रहण नहीं करता और गुड्डे को वह डंडे से पिटती है। यह दृश्य बालक देखता है तुरंत मोबाइल छोड़कर भोजन ग्रहण करने लगता है। इस प्रसंग का अर्थ यह नहीं है कि बालक न माने तो उसे डंडे से पीटे। लेकिन मोबाइल को लेकर समाज में जो स्थिति बनी है उसका प्रतिबिम्ब इस वीडयो में दिखाई देता है।</p>
<p>आज मोबाइल व इंटरनेट की पहुंच सभी तक होने से उसका उपयोग भी बढ़ता जा रहा है। सोशल मीडिया की दुनिया में हर व्यक्ति खोता जा रहा है। पूरे विश्व में फेसबुक यूज़र्स की संख्या 2.91 बिलियन है और यह संख्या भारत में 329.65 मिलियन है। इसी प्रकार विश्व में यूट्यूब यूज़र्स 2.6 बिलियन और भारत में 467 मिलियन; इंस्टाग्राम के 2 बिलियन यूजर्स विश्व में और 230 मिलियन भारत में तथा व्हाट्सएप्प यूज़र्स की संख्या विश्व में 2 बिलियन व भारत में 487 मिलियन है। यह संख्या प्रतिवर्ष बढ़ती जा रही है। मोबाइल-इंटरनेट व सोशल मीडिया के अधिकाधिक उपयोग ने मनुष्य की जीवन शैली को प्रभावित किया है।</p>
<p><strong>आहार पर प्रभाव</strong></p>
<p>सोशल मीडिया पर कंटेंट की भरमार है। सोशल मीडिया के टूल पर कंटेंट यूजर जनरेटेड होने के कारण हर समय यह कंटेंट बढ़ता जाता है। एक बार व्यक्ति देखना प्रारम्भ कर दे तो उसे चाह कर भी छोड़ नहीं सकता। किसी कारण से कुछ समय के लिए मोबाइल बंद भी कर दे तो खाली होते ही तुरंत देखना प्रारम्भ कर देता है। मध्य अंतराल में भी मन में रहता है कि पुनः सोशल मीडिया पर जाने का कब अवसर मिलेगा। ऐसे में वह भोजन समय पर लेना भी भूल जाता है। वह जब भोजन लेता भी है तो एक हाथ में मोबाइल और आँखे उस पर, दूसरे हाथ से भोजन ग्रहण करता है। ऐसा करने से जो खा रहा है और कितनी मात्रा में खा रहा है, यह उसे भान ही नहीं होता। भोजन से जो स्वाद ग्रहण करना है, वह उसे नहीं पता लगता। मनुष्य को भोजन में क्या खाना, क्या नहीं खाना इसका निर्णय व चयन भी वह नहीं कर पाता।</p>
<p>सोशल मीडिया पर विज्ञापन व फ़ोटो-वीडियो के माध्यम से उसके सामने अनेक प्रकार के भोज्य पदार्थों की जानकारी आती रहती है। ऐसे में वे सभी भोज्य पदार्थ उसके स्वास्थ्य के लिए सही है या नहीं, ये जाने बिना उसे ग्रहण करने का मन बना लेता है। अंततः वह उन भोज्य पदार्थों को ग्रहण करके ही मानता है। यह सब भी उसकी आहार की आदतों को प्रभावित करता है। एक अध्ययन के अनुसार जो लोग खाने-पीने की सामग्री की फोटो सोशल मीडिया पर प्रेषित करते रहते हैं तो उनकी खाने-पीने की इच्छा अधिक बढ़ती रहती है और वे दूसरों की अपेक्षा अधिक खाते हैं।</p>
<p><strong>विहार पर प्रभाव</strong></p>
<p>मनुष्य का जो समय प्रतिदिन खेल-व्यायाम में लगना चाहिए वह समय सोशल मीडिया की लत के कारण उसमें लग जाता है। खेल-व्यायाम के लिए समय ही नहीं निकलता। आजकल नींद की समस्या से अधिक लोग परेशान है। नींद की समस्या के पीछे बड़ा कारण सोशल मीडिया का अधिक उपयोग है। देर तक मोबाइल चलाने से वास्तविकता में नींद का सही समय व्यक्ति को मिल नहीं पाता। जब व्यक्ति सोता है तो सोशल मीडिया पर देखे गए कंटेंट के प्रभाव के कारण उसे ठीक से नींद आ नहीं पाती। बाद में व्यक्ति अनिद्रा के रोग से ग्रसित हो जाता है।</p>
<p>एक बार कुछ मित्रगण भ्रमण के लिए सागर तट पर गए। उनमें से एक ने अपने मोबाइल को होटल के कक्ष में ही छोड़ दिया। सभी ने विचार किया कि कुछ जलपान कर लेते हैं। जलपान की मेज पर सभी बैठे हैं और स्वयं के मोबाइल में लगे हुए हैं। बिना मोबाइल वाला व्यक्ति दूसरों से बात करने का प्रयास कर रहा है। परंतु बार बार प्रयास करने पर भी सफल नहीं हो रहा है। सोशल मीडिया के युग में संवाद कहीं खो सा गया है!</p>
<p><strong>सोशल मीडिया संयम व पथ्य-परहेज</strong></p>
<p>उपरोक्त वस्तुस्थिति से हम घिरे हुए है। सोशल मीडिया के आहार-विहार पर विपरीत प्रभाव के कारण मानव स्वास्थ्य भी प्रभावित हो रहा है। आने वाले समय में कुछ रोगों का कारण ही मोबाइल-इंटरनेट होने वाला है। इस प्रकार की स्थिति कुछ कुछ दस्तक दे रही है। सब कुछ जानते हुए भी मनुष्य कहता है कि क्या करें?</p>
<ol>
<li style="text-align: justify;">जीवन में सोशल मीडिया संयम का पालन करना आवश्यक है। ये कहना तो ठीक नहीं होगा कि सोशल मीडिया का उपयोग बंद करें। सोशल मीडिया पर जीवन उपयोगी अनेक प्रकार की जानकारी भी आती है।</li>
<li style="text-align: justify;">जब हम संयम का पालन करेंगे तो कितना देखना व क्या देखना, यह प्राथमिकताएं भी निश्चित करें।</li>
<li style="text-align: justify;">संयम के लिए मन पक्का कर अभ्यास करें। छोटे छोटे निश्चय कर पालन करने से अभ्यास बनता है।</li>
</ol>
<p>श्रीमद भगवद गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है &#8211;</p>
<p style="text-align: center;"><strong>असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्‌।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते॥ (गीता &#8211; ६.३५)</strong></p>
<p>अर्थात &#8211; हे महाबाहु कुन्तीपुत्र! इसमे कोई संशय नही है कि चंचल मन को वश में करना अत्यन्त कठिन है, किन्तु इसे सभी सांसारिक कामनाओं को त्याग (वैराग्य) और निरन्तर अभ्यास द्वारा वश में किया जा सकता है।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone  wp-image-6211" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/01/main-qimg-7d857807d0cc5ed88661ecc367dd2e18-pjlq-300x169.jpg" alt="" width="1624" height="915" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/01/main-qimg-7d857807d0cc5ed88661ecc367dd2e18-pjlq-300x169.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2023/01/main-qimg-7d857807d0cc5ed88661ecc367dd2e18-pjlq.jpg 602w" sizes="auto, (max-width: 1624px) 100vw, 1624px" /></p>
<ol start="4">
<li style="text-align: justify;">मोबाइल उपवास भी कुछ कुछ प्रचलन में आने लगा है। यदि आप सोशल मीडिया की अधिक गिरफ्त में तो यह उपवास आपके लिए अधिक उपयोगी रहेगा। इसे जीवनचर्या का भाग बनाएं।</li>
<li style="text-align: justify;">घर में छोटे बालक है तो उनके सामने मोबाइल का उपयोग अधिक न करें। उनकी आयु अवस्था में नकल (कॉपी) करने की आदत होती है। घर में बड़ों को मोबाइल का अधिक प्रयोग करते देख बालकों को भी इसकी इच्छा होने लगती है।</li>
<li style="text-align: justify;">विद्यालयीन शिक्षा में जब तक बालक है तो उन्हें स्वतंत्र मोबाइल न देवे।</li>
<li style="text-align: justify;">आपका मोबाइल बालक को उपयोग करना है तो निश्चित अवधि के लिए आपकी देखरेख में ही वे उपयोग करें।</li>
<li style="text-align: justify;">भोजन करते समय मोबाइल दूर रखें और उसमें इंटरनेट बंद कर देवे।</li>
<li style="text-align: justify;">घर में हर समय मोबाइल अपने साथ रखना भी आवश्यक नहीं है।</li>
<li style="text-align: justify;">किसी से बातचीत करते समय मोबाइल मौन अवस्था (साइलेंट मोड) में कर देवे ताकि आप दूसरे से ठीक से बातचीत कर सके।</li>
<li style="text-align: justify;">जब इंटरनेट संबंधी कुछ कार्य है तो तभी मोबाइल में इंटरनेट ऑन करें।</li>
<li style="text-align: justify;">आजकल भी कुछ लोग ऐसे मिलते हैं जो सोशल मीडिया पर हैं ही नहीं। कुछ लोग ऐसे भी मिलते हैं जिनके पास स्मार्ट फोन की बजाय कीपैड वाला फोन है। वे अपना व्यावसायिक/अध्ययन कार्य लैपटॉप या डेस्कटॉप पर करते हैं। कितने सुखी होंगे वे लोग!</li>
</ol>
<p>मोबाइल-इंटरनेट व सोशल मीडिया का उपयोग बढ़ा है तो उससे मानव जीवन में कुछ लाभ भी हुआ है। चाणक्य नीति में कहा गया है &#8211; ‘अति सर्वेत वर्जयेत्’ अर्थात अति का सर्वत्र त्याग किया जाना चाहिए। किसी की भी अधिकता हानिकारक होती है। सोशल मीडिया के युग मे उसके अधिकाधिक उपयोग से समस्याएं दिखनी प्रारंभ हुई है। इस कठिनाई से हम स्वयं संयम का पालन कर उभर सकते हैं। निश्चय हमें स्वयं ही करना है!</p>
<p>(लेखक विद्या भारती दिल्ली प्रान्त के संगठन मंत्री है और विद्या भारती प्रचार विभाग की केन्द्रीय टोली के सदस्य है।)</p>
<p><strong>और पढ़ें : <span style="color: #000080;"><a style="color: #000080;" href="https://rashtriyashiksha.com/food-from-mothers-hand-matrihaste-bhojnam/" target="_blank" rel="noopener">मातृहस्तेन भोजनम्!</a></span></strong></p>
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		<title>आहार-विहार और तनाव</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 22 Dec 2022 04:32:34 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[आहार-विहार]]></category>
		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[श्री रवि कुमार जी]]></category>
		<category><![CDATA[Aahar Vihar]]></category>
		<category><![CDATA[diet and stress]]></category>
		<category><![CDATA[indian educaton]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[आहार विहार]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#x270d; रवि कुमार कक्षा तीसरी-चौथी के चार-पांच बालक उद्यान में खेल रहे थे। परस्पर चर्चा करते समय एक बालक ने अपनी बात सांझा की। उस बात में बालक ने कहा&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"><img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/270d.png" alt="✍" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /> रवि कुमार</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone  wp-image-6106" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/12/shutterstock_1896956995-1024x778-1-300x228.jpg" alt="" width="1653" height="1256" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/12/shutterstock_1896956995-1024x778-1-300x228.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/12/shutterstock_1896956995-1024x778-1-768x584.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/12/shutterstock_1896956995-1024x778-1.jpg 1024w" sizes="auto, (max-width: 1653px) 100vw, 1653px" /></p>
<p>कक्षा तीसरी-चौथी के चार-पांच बालक उद्यान में खेल रहे थे। परस्पर चर्चा करते समय एक बालक ने अपनी बात सांझा की। उस बात में बालक ने कहा कि कल मेरी परीक्षा है। यदि परीक्षा में कम अंक आए तो मेरी माँ का मेरे साथ क्या व्यवहार होगा, इसकी चिंता मुझे सताए जा रही है। घर का सदस्य कोई अनपेक्षित बात परिवार के मुखिया से छुपा रहा है। उसके मन में भाव है कि यदि बता दिया तो क्या होगा। कर्मचारी को उसकी कम्पनी ने अधिक कार्य बता दिया है। वह कार्य प्रारंभ किए बिना दवाब अनुभव कर रहा है। उपरोक्त तीनों प्रकार की स्थितियां तनाव की स्थिति उत्पन्न करती है। ऐसी और अनेक प्रकार की तनाव की स्थितियां हम अपने दैनंदिन जीवन में अनुभव करते होंगे। ये तनाव क्या है?</p>
<p><strong>क्या है तनाव</strong></p>
<p>भिन्न-भिन्न परिस्थिति में हमारा शरीर प्रतिक्रिया स्वरूप मन के भावों को शाब्दिक/अशाब्दिक अभिव्यक्त करता है। ये अभिव्यक्ति तनाव है। तनाव भावनात्मक या शारीरिक परेशानी से जुड़ी भावना है। यह अनुभूति किसी भी घटना या विचार से हो सकती है, जो व्यक्ति को निराश, क्रोधित और दुखी कर देती है। अगर तनाव लंबे समय तक रह जाए तो यह घातक भी हो सकता है।</p>
<p>तात्कालिक तनाव शीघ्र समाप्त हो जाता है। कई बार तनाव सप्ताह-मास तक चलता है। ऐसा भी होता है कि व्यक्ति तनाव में है लेकिन उसे पता ही नहीं है। लंबे समय का तनाव विभिन्न रोगों को जन्म लेता है। अवसाद, चिंता, द्विध्रुवी विकार, एंग्जायटी आदि जैसे गंभीर मानसिक विकारों को जन्म देता है लंबा तनाव।</p>
<p><strong>तनाव के लक्षण</strong></p>
<p>सामान्य स्थिति में सिरदर्द, सिर का भारी होना, किसी भी कार्य में एकाग्र न होना, भूख न लगना, स्मृति कम होना आदि तनाव के लक्षण है। तनाव का पेट पर भी प्रभाव होता रहता है जिसके कारण कब्ज होना, पेट ठीक से साफ न होना, जल्दी जल्दी पेट दर्द होना, गैस-एसिडिटी होना आदि सामान्य लक्षण है।</p>
<p><strong>आहार का तनाव से सम्बंध</strong></p>
<p>&#8216;जैसा खाए अन्न वैसा हो जाए मन&#8217; ये कहावत तो हम सबने सुनी होगी। अन्न का मन पर पर्याप्त प्रभाव रहता है। सात्विक भोजन दिनचर्या का भाग है तो मन निर्मल रहेगा। मन में गलत विचार व भाव उत्पन्न नहीं होंगे। तामसिक भोजन, आधा पका हुआ, भोजन निर्माण की मूल प्रक्रिया को बिगाड़कर बनाया हुआ, जंकफूड आदि का सेवन जीवन में मूढ़ता, आलस, क्रोध, एकाग्रता न होना आदि उत्पन्न करता है।</p>
<p><strong>आहारशुद्धौ सत्वशुद्धि सत्वशुद्धो ध्रुवा स्मृति:। स्मृतिर्लब्धे सर्वग्रन्थीनाँ प्रियमोक्ष:।।</strong></p>
<p><strong>&#8211; छान्दोग्य उपनिषद (7.2, 6.2)</strong></p>
<p>अर्थात &#8211; आहार के शुद्ध होने से अंतःकरण की शुद्धि होती है। अंतःकरण के शुद्ध होने से बुद्धि निश्छल होती है और बुद्धि के निश्छल होने से सब संशय व भ्रम जाते रहते हैं और तब मुक्ति का मिल सकना सुलभ हो जाता है।</p>
<p><strong>विहार का तनाव से सम्बंध</strong></p>
<p>सम्यक दिनचर्या, खेल, व्यायाम, ईश-प्रार्थना, परस्पर संवाद, संतुलित कार्य समय आदि, ये सभी अच्छे विहार के भाग है। ये सब दिनचर्या के भाग व्यक्ति को मानसिक रूप से पुष्ट व दृढ़ करने का कार्य करते हैं।</p>
<p>आईटी क्षेत्र में कार्य करने वाले एक व्यक्ति से बात हुई कि सारा दिन लैपटॉप पर कार्य करने से मन तो नहीं थक जाता। उनका कथन था कि मन क्या शरीर भी थकता है। फिर मैंने प्रश्न किया कि आईटी अथवा कॉरपोरेट क्षेत्र में कार्य करने वाले व्यक्ति कुछ वर्षों के पश्चात या तो ये व्यावसायिक क्षेत्र छोड़ देते हैं या कई प्रकार के रोगों से घिर जाते हैं। उन व्यक्ति का कहना था कि ये भी सत्य है। फिर मैंने प्रश्न किया कि उपरोक्त दोनों से बचना हो तो क्या करना चाहिए? बहुत सुंदर व व्यवहारिक उत्तर उन व्यक्ति का था &#8211; जो प्रोफेशनल दिनचर्या में शारीरिक कार्य, खेल/व्यायाम आदि को अनिवार्य से रूप से सम्मिलित रखते हैं वे मानसिक व शारीरिक रूप से स्वस्थ रहते हैं और अपने क्षेत्र में आनन्द लेते हुए आगे बढ़ते हैं। तनाव उनके आसपास भी नहीं आ पाता।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone  wp-image-6107" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/12/9e1a21e1e4be4f1f8450f8cae8271799-300x150.webp" alt="" width="1210" height="605" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/12/9e1a21e1e4be4f1f8450f8cae8271799-300x150.webp 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/12/9e1a21e1e4be4f1f8450f8cae8271799.webp 768w" sizes="auto, (max-width: 1210px) 100vw, 1210px" /></p>
<p><strong>सम्यक आहार-विहार से तनाव प्रबंधन</strong></p>
<p>आहार-विहार सम्यक रहा तो तनाव हमारे निकट नहीं आ पाएगा। और किसी कारण से आया भी तो तात्कालिक ही रहेगा। सामान्यतः लोग हल्का सिरदर्द या सिर भारी होने पर सिरदर्द की गोली ले लेते हैं। ऐसी स्थिति से बचना चाहिए। नहीं तो गोली की आदत या लत लग जाती है।</p>
<p>तनाव की स्थिति से बचने के लिए पर्याप्त नींद व पर्याप्त संवाद दिनचर्या का भाग बनना चाहिए। कई बार नींद पूरी न होने के कारण ही तनाव रहता है। सामान्यतः लोगों को लगता है कि तनाव के कारण नींद नहीं आ रही। ऐसी स्थिति में यदि आप एक पूरी नींद (6-8 घंटे) ले लेते हैं तो मन-मस्तिष्क से सहज व तनाव मुक्त अनुभव करेंगे। अपने जीवन में कोई ऐसा व्यक्तित्व हो जिससे आप अपने मन की बात निःसंकोच रख सके। योग व प्राणायाम का नियमित अभ्यास तनाव से लड़ने के लिए मानसिक शक्ति प्रदान करता है।</p>
<p style="text-align: center;"><strong>मिताहार बिना यस्तु योगारम्भं तु करायेत्।</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>नाना रोगो भवेतस्य किंचितद्योगो न सिध्यति।।</strong></p>
<p>घरेण्ड संहिता (16) के अनुसार मिताहार के अभाव में योग रोग नाशक नहीं अपितु भयंकर रोगों का नाशक बन जाता है।</p>
<p>वर्तमान समय में तनाव प्रबंधन सर्वदूर चर्चा का विषय बना है। तनाव प्रबंधन तनाव के स्रोत को ढूंढने, कम करने व हटाने में सहायता करता है। यह तनावपूर्ण घटना को देखने का तरीका बदलने में, अपने शरीर पर तनाव के प्रभाव को कम करने में एवं वैकल्पिक तरीकों से परेशानियों का सामना करना सीखने में सहायता करने का प्रयास करता है।</p>
<p>(लेखक विद्या भारती दिल्ली प्रान्त के संगठन मंत्री है और विद्या भारती प्रचार विभाग की केन्द्रीय टोली के सदस्य है।)</p>
<p><strong>और पढ़ें</strong> : <span style="color: #000080;"><strong><a style="color: #000080;" href="https://rashtriyashiksha.com/human-health-and-vata-pitta-kapha/" target="_blank" rel="noopener">मानव स्वास्थ्य और वात-पित्त-कफ</a></strong></span></p>
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		<title>मानव स्वास्थ्य और वात-पित्त-कफ</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 28 Nov 2022 06:41:27 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[आहार-विहार]]></category>
		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[श्री रवि कुमार जी]]></category>
		<category><![CDATA[Cough]]></category>
		<category><![CDATA[Food]]></category>
		<category><![CDATA[indian education]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[आहार विहार]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#x270d; रवि कुमार आजकल एक चर्चा चलती है कि आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति व एलोपैथी चिकित्सा पद्धति में क्या मूलभूत अंतर है। आम समाज में इस अंतर को स्पष्ट करते हुए&#8230; </p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;"><img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/270d.png" alt="✍" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /> रवि कुमार</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-6027" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/11/प्रकृती-अंतिम-300x272.jpg" alt="" width="1532" height="1389" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/11/प्रकृती-अंतिम-300x272.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/11/प्रकृती-अंतिम.jpg 515w" sizes="auto, (max-width: 1532px) 100vw, 1532px" /></p>
<p>आजकल एक चर्चा चलती है कि आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति व एलोपैथी चिकित्सा पद्धति में क्या मूलभूत अंतर है। आम समाज में इस अंतर को स्पष्ट करते हुए कहा जाता है कि एलोपैथी में लैब टेस्ट, गोली, कैप्सूल, इंजेक्शन के आधार पर तुरंत आराम मिलता है। आयुर्वेद में लंबी औषधि, पथ्य-परहेज आदि के आधार पर चिकित्सा होती है। आजकल के भाग-दौड़ भरे जीवन में ऐलोपैथी ही उपयुक्त है। समझने के लिए ऐलोपैथी व आयुर्वेद में दो मूलभूत अंतर है। एक, एलोपैथी रोग को जानकर उसे तुरंत ठीक करने के लिए औषधि सुझाती है। आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति में &#8216;Find the Cause and Treat the Cause&#8217; अर्थात रोग का कारण ढूंढकर उसका निवारण करो, जिसे शास्त्रीय रूप से कहा गया है &#8211; <strong>&#8216;निदान परिमार्जनम्&#8217; </strong>के आधार पर कार्य होता है। दूसरा, एलोपैथी में मानकीकरण (standardization) है और आयुर्वेद में अनुकूलन (customization) है। आइए जानते है कि आयुर्वेद मानवश: अनुकूलन को ध्यान रखते हुए <strong>&#8216;निदान परिमार्जनम्&#8217; </strong>कैसे करता है।</p>
<p>यह सर्वविदित है कि मानव शरीर पांच तत्वों (पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि व आकाश) से मिलकर बना है। आयुर्वेद के अनुसार पृथ्वी शरीर के मांस पदार्थों, जल शरीर की तरलता को, वायु शरीर के अवयवों रक्त, मल आदि की गति को, अग्नि शरीर की गर्मी और ऊर्जा को तथा आकाश शरीर के खाली स्थान को इंगित करता है।</p>
<p><strong>त्रिगुण वात-पित्त-कफ</strong></p>
<p>पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि व आकाश – इन पाँचों तत्वों की परस्पर क्रिया से शरीर के तीन गुण – &#8216;वात-पित्त-कफ&#8217; बनते हैं।</p>
<p><strong>वात पित्त श्लेष्मणाम् पुनः सर्वशरीरचराणाम्।। सर्वाणि स्रोतास्ययनभूतानि।</strong></p>
<p>&#8211; (च.वि. ५/५)</p>
<p>वात वायु व आकाश के परस्पर समन्वय से बनता है। पित्त अग्नि व जल के समन्वय से उत्पन्न होता है। और कफ भूमि व जल तत्व से मिलकर बनता है।</p>
<p>वात-पित्त-कफ शरीर की प्रत्येक कोशिका में समान मात्रा में पाए जाते हैं। इन तीन गुणों का समन्वय ही हमें स्वास्थ्य प्रदान करता है। इन गुणों के शरीर में अलग अलग कार्य है-</p>
<p>१. पित्त के द्वारा हमारे शरीर में गर्मी रहती है, तथा भोजन का पाचन होता है।</p>
<p>२. हमारे शरीर में सारी गतियाँ वात के कारण होती है। जैसे खून का दौड़ना, सांस लेना, शरीर के अंगों और आँतों आदि का कार्य करना।</p>
<p>३. कफ हमारे शरीर को द्रव्यमान या भार प्रदान करता है व हमारे शरीर के अंगों को जोड़े रखता है।</p>
<p>व्यक्ति की प्रकृति वात-पित्त-कफ में से कौन सी है, यह जानना आवश्यक है। उसी अनुसार चिकित्सा की ओर बढ़ सकते हैं। प्रकृति जानने के लिए शरीर में उत्पन्न हुए लक्षणों को समझना एवं आयुर्वेदिक चिकित्सक से परामर्श करना आवश्यक है।</p>
<p><strong>त्रिदोष</strong></p>
<p>यदि वात-पित्त-कफ इन तीन गुणों का समन्वय बिगड़ जाए अथवा इन तीनों में से कोई एक गुण कम या अधिक हो जाए तो शरीर में दोष उत्पन्न हो जाता है। ये दोष आगे चलकर रोग का रूप धारण करते हैं। ऐसी अवस्था में इन तीन गुणों को त्रिदोष भी कहा गया है। महर्षि वाग्भट्ट ने कहा है- <strong>&#8220;वायु: पित्तम् कफश्चेति त्रयो दोषा: समासतः।&#8221;</strong></p>
<p>आयुर्वेद पद्धति में इन तीन गुण/दोषों के आधार पर &#8216;निदान परिमार्जनम्&#8217; सूत्रानुसार रोग चिकित्सा की जाती है।</p>
<p>किसी व्यक्ति को त्वचा संबंधी रोग हैं तो उसका कारण पित्त दोष होगा। ऐसे में व्यक्ति कुछ गोली आदि ले लेता है व कुछ वैक्स आदि त्वचा पर लगा लेता है तो त्वचा रोग दब जाता है। बाद में पुनः उभरता है तो फिर वही औषधि लेता रहता है। जब तक पित्त दोष का निवारण नहीं होगा तब तक यह त्वचा रोग बार-बार उभरेगा। पित्त दोष के निवारण के लिए पित्त वर्धक पदार्थों (मिर्च-मसालेदार, तीखी आदि) का ग्रहण बंद करना होगा और पित्त नाशक पदार्थों का ग्रहण बढ़ाना पड़ेगा। स्थाई निवारण के लिए शरीर में व्याप्त वायु व आकाश तत्व को संतुलित करना होगा।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-6029" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/11/l54520210915181618-1-300x169.jpeg" alt="" width="1678" height="945" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/11/l54520210915181618-1-300x169.jpeg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/11/l54520210915181618-1-1024x576.jpeg 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/11/l54520210915181618-1-768x432.jpeg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/11/l54520210915181618-1.jpeg 1440w" sizes="auto, (max-width: 1678px) 100vw, 1678px" /></p>
<p><strong>वात-पित्त-कफ &#8211; त्रिदोष प्रकृति के कारण होने वाले लक्षण व रोग उत्पत्ति</strong></p>
<p><strong>वात</strong> &#8211; शरीर में रूखापन, दुबलापन, धीमी व भारी आवाज और नीद की कमी; इसके अलावा आंखों, भौहों, ठोड़ी के जोड़, होंठों, जीभ, सिर, हाथों व टांगों में अस्थिरता, मांसपेशियों में थकान, जोड़ों का दर्द, जकड़न, सिर दर्द, क़ब्ज़, वजन कम होना, मरोड़, ऐठन, कंपकपी, कमज़ोरी, पेट दर्द, शुष्की आदि।</p>
<p><strong>पित्त</strong> &#8211; गर्मी सहन न कर पाना, त्वचा पर भूरे धब्बे, बालों का जल्दी सफ़ेद होना, मांसपेशियों और हड्डियों के जोड़ों में ढीलापन, पसीना, मल और मूत्र का अधिक मात्रा में बाहर निकलना, अत्यधिक एसिडिटी, शरीर में जगह जगह सूजन, रक्त स्राव, उच्च रक्तचाप, जलन, अधिक मल त्याग, त्वचा में चकत्ते, फुंसी, मुहाँसे आदि।</p>
<p><strong>कफ</strong> &#8211; भूख, प्यास और गर्मी कम लगना, पसीना कम आना, जोड़ों में मजबूती और स्थिरता, शरीर में गठीलापन, मुटापा, सूजन, शरीर में पानी जमा हो जाना, अधिक बलगम, अति विकास, अवसाद आदि।</p>
<p><strong>वात-पित्त-कफ के संतुलन के लिए क्या करें</strong></p>
<p>१. वात का संचय ग्रीष्म में, प्रकोप वर्षा में और शमन शरद ऋतु में होता है। पित्त का संचय वर्षा, प्रकोप शरद एवं शमन हेमंत ऋतु में होता है। कफ का संचय हेमंत, प्रकोप बसंत तथा शमन ग्रीष्म ऋतु में होता है। अतः ऋतुचर्चा अनुसार आहार-विहार का प्रयासपूर्वक पालन करें।</p>
<p>२. भूमि, जल व वायु &#8211; इन तीन तत्वों की पूर्ति हेतु आवश्यक भोज्य पदार्थों, पर्याप्त जल एवं शुद्ध वायु का संतुलित मात्रा में सेवन करें।</p>
<p>३. दिनचर्या व्यवस्थित रखे। नियमित व्यायाम व पर्याप्त नींद को दिनचर्या में स्थान दें।</p>
<p>४. ऋतुचर्या अनुसार आवश्यक पथ्य-अपथ्य का पालन करें।</p>
<p>५. वात संतुलन के लिए तिल के तेल की मालिश, पित्त संतुलन के लिए देशी घी का सेवन एवं कफ संतुलन के लिए शहद का उपयोग लाभकारी रहता है।</p>
<p>(लेखक विद्या भारती दिल्ली प्रान्त के संगठन मंत्री है और विद्या भारती प्रचार विभाग की केन्द्रीय टोली के सदस्य है।)</p>
<p><strong>और पढ़ें : </strong><span style="color: #000080;"><strong><a style="color: #000080;" href="https://rashtriyashiksha.com/effect-of-fire-on-human-health/" target="_blank" rel="noopener">मानव स्वास्थ्य पर अग्नि का प्रभाव</a></strong></span></p>
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		<title>मानव स्वास्थ्य पर अग्नि का प्रभाव</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राष्ट्रीय शिक्षा]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 14 Oct 2022 04:44:18 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[आहार-विहार]]></category>
		<category><![CDATA[नवीनतम]]></category>
		<category><![CDATA[श्री रवि कुमार जी]]></category>
		<category><![CDATA[Bhartiya Shikha]]></category>
		<category><![CDATA[Dietary habits]]></category>
		<category><![CDATA[indian education]]></category>
		<category><![CDATA[Rashtriya shiksha]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#8211; रवि कुमार मित्रों अथवा परिचितों के यहाँ विवाह या शुभ कार्यक्रम का निमंत्रण मिलने पर सामान्यतः सम्मिलित होना होता है। आजकल यह कार्यक्रम अधिकतर रात्रि में ही सम्पन्न होते&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;">&#8211; रवि कुमार</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone  wp-image-5891" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/10/stomach-digetion-1280x720-1-300x169.jpg" alt="" width="1679" height="946" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/10/stomach-digetion-1280x720-1-300x169.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/10/stomach-digetion-1280x720-1-1024x576.jpg 1024w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/10/stomach-digetion-1280x720-1-768x432.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/10/stomach-digetion-1280x720-1.jpg 1280w" sizes="auto, (max-width: 1679px) 100vw, 1679px" /></p>
<p>मित्रों अथवा परिचितों के यहाँ विवाह या शुभ कार्यक्रम का निमंत्रण मिलने पर सामान्यतः सम्मिलित होना होता है। आजकल यह कार्यक्रम अधिकतर रात्रि में ही सम्पन्न होते हैं। वहाँ भोजन देर रात्रि में होता है। देर रात्रि भोजन होने के अगले दिन पेट की क्या स्थिति होती है, इसका कभी हमने विचार किया है? असमय किए गए पूर्ण भोजन के पश्चात पाचन की क्या स्थिति होती है, उसका अनुभव तो हमने किया ही होगा। उस समय ठीक पाचन नहीं होता। भूख तो ठीक लगी है और उस समय हमने खाया ही नहीं अथवा कम खाया, तब पेट की स्थिति का अनुभव हुआ है? ऐसा किस कारण होता है? आइए इसका विचार करते हैं।</p>
<p>हम सभी जानते हैं कि मानव शरीर पांच महाभूतों (भूमि, जल, वायु, अग्नि व आकाश) से मिलकर बना है- <strong>“छिति जल पावक गगन समीरा। पंच रचित अति अधम सरीरा।।”</strong> रामचरित मानस – 1.4.11 ।। और मरणोपरांत इन्हीं पंच महाभूतों में विलीन हो जाता है। इन पंच महाभूतों में एक तत्त्व है- अग्नि। अब अग्नि का शरीर संचालन में क्या कार्य है?</p>
<p><strong>अग्नि का कार्य</strong></p>
<p>अग्नि पित्त के अंतर्गत समाहित होती है- <strong>“न खलु पित्त व्यतिरेकादन्य अग्निरूपलक्ष्यते”</strong> (सुश्रुत संहिता – २९/९) और पाचन-पोषण आदि कार्यों को संपादित करती है। आहार का पाचन अग्नि द्वारा होता है जिससे आहार रस का निर्माण होता है जो शरीर को बल प्रदान करता है। अग्नि को आयु, वर्ण, बल आदि का मूल कहा गया है। शरीर के तापमान को नियंत्रण करने का कार्य भी अग्नि करती है। आयुर्वेद में 13 प्रकार की अग्नि बताई गई हैं।</p>
<p><strong>अग्नि के प्रकार</strong></p>
<p>१. जठराग्नि &#8211; इसका प्रमुख कार्य जठर में उपस्थित आहार का पाचन करना है।</p>
<p>२. भूताग्नि &#8211; यह अग्नि जठर द्वारा पचित आहार के अलग-अलग महाभूत को शरीर की कोशिकाओं तक ले जाती है। हर महाभूत की एक अग्नि अर्थात इस प्रकार की पाँच अग्नियां है।</p>
<p>३. धात्वग्नि &#8211; इसका प्रमुख कार्य महाभूतों के अलग अलग घटक से नए तत्वों का निर्माण कर धातु को पोषण देना है। शरीर में सप्त धातु (रस, रक्त, मेद, मज्जा, मांसपेशी, अस्थि व शुक्र) है, अतः इस प्रकार की सात अग्नियां है।</p>
<p>चिकित्सा की दृष्टि से अग्नि को चार भागों में विभाजित किया गया है- विषग्नि, मन्दाग्नि, तीक्ष्णाग्नि एवं समाग्नि। मानव स्वास्थ्य की रक्षा के लिए समाग्नि सबसे ठीक है। यह सम्यवस्था अत्यंत महत्वपूर्ण है।</p>
<p><strong>अग्नि पर ऋतु का प्रभाव</strong></p>
<p>ऋतु अनुसार अग्नि की स्थिति अलग-अलग होती है। यथा- हेमंत व शिशिर ऋतु &#8211; अग्नि प्रबल, वसंत ऋतु &#8211; अग्नि मंद, ग्रीष्म ऋतु &#8211; अग्नि विषग्नि (अर्थ स्पष्ट करें जी), वर्षा ऋतु &#8211; जठराग्नि दुर्बल एवं शरद ऋतु &#8211; जठराग्नि तीव्र।</p>
<p>उस समय ऋतु अनुसार आहार का नियम न पालन करने के फलस्वरूप मनुष्य अनेक रोगों को स्वयं आमंत्रण देता है। आज के युग में भोजन संबंधी पथ्य परहेज का पालन नहीं होता। वर्षभर भोजन का प्रकार एक जैसा ही रहता है। ‘आजकल तो ऐसा चलता है’ ऐसा कहकर ऋतुचर्या को अलग रख दिया जाता है और परिणाम स्वरूप चिकित्सक के पास जाना, औषधि को ग्रहण करना&#8230;.होता है। कुछ रोग तत्काल नहीं होते परंतु उसका कारण उसी समय प्रारम्भ हो जाता है और कुछ वर्षों बाद रोग प्रस्फुटित होता है। तब व्यक्ति सोचता है कि मैं तो सादा ही भोजन करता था&#8230;। जिन परिवारों में भारतीय परम्परागत रसोई का पालन होता है, वहां का भोजन ऋतुचर्या अनुसार होगा और उस परिवार के सदस्य अपेक्षाकृत अधिक स्वस्थ व निरोगी मिलेंगे।</p>
<p><strong>जठराग्नि</strong></p>
<p>जठराग्नि का सम्बंध सूर्य से भी है। सूर्य की किरणें जैसे जैसे प्रखर होती है, वैसे वैसे जठराग्नि भी उतनी प्रज्वलित होती रहती है। दिन में प्रातः 10 बजे से अपराह्न 2 बजे तक जठराग्नि सर्वाधिक प्रज्वलित होती है। सूर्यास्त तक और उसके पश्चात मंद पड़ती जाती है। आजकल जठराग्नि के विपरीत रात्रि में गरिष्ठ और अति आहार का सेवन होता है और प्रातः व दिन में कम। इस कारण जठराग्नि सामान्य स्थिति में भी मंद होती चली जाती है। <strong>“रोगा: सर्वे</strong><strong>s</strong><strong>पि मन्दे</strong><strong>s</strong><strong>ग्नौ जायते”</strong> अर्थात शरीर में होने वाली सभी प्रकार की व्याधियों का मूल कारण अग्नि का मंद होना है, अतः स्वस्थ जीवन के इच्छुक व्यक्ति को अग्नि की रक्षा करने का सदैव प्रयत्न करना चाहिए।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone  wp-image-5890" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/10/fire-300x226.jpg" alt="" width="1675" height="1262" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/10/fire-300x226.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2022/10/fire.jpg 532w" sizes="auto, (max-width: 1675px) 100vw, 1675px" /></p>
<p><strong>अग्नि की सम्यक अवस्था के लिए क्या करे&#8230;</strong></p>
<p>आहार देह और मन के अनुकूल हो और उचित समय, नियत मात्रा और विधि विधान से किया जाए तो अग्नि के विकृत होने का भय नहीं रहता। सम्यक आहार के सेवन से अग्नि को सम रखने का प्रयत्न करना चाहिए।</p>
<p>समय पर भोजन करें। मात्रा युक्त आहार का सेवन करें। भोजन पश्चात शरीर के क्रियाकलापों यथा- उठना, बैठना, बोलना, हँसना आदि में बाधा न हो। पहले सेवन किए हुए भोजन के पाचन के पश्चात ही भोजन करें।</p>
<p>व्यायाम और निद्रा का सम्यक ध्यान रखे। भोजन मन लगाकर करें और भोजन में कमियां न निकालें। कभी अत्यधिक और कभी कम भोजन, ऐसा न करें। विरुद्धाहार (यथा दूध के साथ अम्ल पदार्थ आदि का सेवन) न करें। भोजन करने के तुरंत पश्चात शयन न करें। चिंता, शोक, भय, क्रोध आदि मानसिक भावों से बचे। जल का अत्यधिक या कम सेवन, भोजन के तुरंत पश्चात जल ग्रहण, ऐसा न करें। भूख और प्यास के वेग को धारण न करें।</p>
<p>स्वस्थ शरीर के लिए आहार पुष्टता आवश्यक है और आहार पुष्टता के लिए उसका सही पाचन होना। पाचन पश्चात पौष्टिक तत्त्वों से धातु निर्माण व शरीर के सभी अंगों तक उसका पहुँचना, ये सब तभी हो सकेगा जब अग्नि सम्यक अवस्था में रहेगी। दिनचर्या व आहार नियमों में थोड़ा बदल करने से हम अग्नि सम्यक रख सकते हैं और ‘पहला सुख निरोगी काया’ की ओर बढ़ सकते हैं।</p>
<p>(लेखक विद्या भारती दिल्ली प्रान्त के संगठन मंत्री है और विद्या भारती प्रचार विभाग की केन्द्रीय टोली के सदस्य है।)</p>
<p><strong>और पढ़ें</strong> : <span style="color: #000080;"><strong><a style="color: #000080;" href="https://rashtriyashiksha.com/effect-of-air-on-health/" target="_blank" rel="noopener">स्वास्थ्य पर वायु का प्रभाव</a></strong></span></p>
<p>The post <a href="https://rashtriyashiksha.com/effect-of-fire-on-human-health/">मानव स्वास्थ्य पर अग्नि का प्रभाव</a> appeared first on <a href="https://rashtriyashiksha.com">राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन</a>.</p>
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