पुस्तक परिचय : भारतीय शिक्षा ग्रंथमाला


पुस्तक परिचय : भारतीय शिक्षा ग्रंथमाला

 – वासुदेव प्रजापति

पुस्तक का नाम : भारतीय शिक्षा ग्रंथमाला

लेखन एवं संपादन : इंदुमति काटदरे, अहमदाबाद

सह संपादक : वंदना फड़के नासिक, सुधा करंजगावकर अहमदाबाद, वासुदेव प्रजापति जोधपुर

प्रकाशक : पुनरुत्थान प्रकाशन सेवा ट्रस्ट, अहमदाबाद वेबसाइट – www.punarutthan.org

संस्करण : व्यास पूर्णिमा, युगाब्द, 9 जुलाई 2017

 

क्या आप जानते हैं?

  • स्वतंत्र भारत में दी जाने वाली शिक्षा भारतीय नहीं है?
  • शिक्षा का माध्यम स्वदेशी भाषा या विदेशी भाषा?
  • शिक्षा का उद्देश्य अच्छी नौकरी प्राप्त करवाना है या व्यक्तित्व का समग्र विकास करना?
  • भारत में समग्र विकास की अवधारणा क्या है?
  • शिक्षा के व्यावहारिक आयाम कौन-कौन से हैं?
  • अंग्रेजी शिक्षा का परिणाम बुद्धि विभ्रम एवं हीनता बोध है?
  • भारतीय शिक्षा वैश्विक संकटों का निवारण करने वाली है?

यदि आप इन सभी प्रश्नों का उत्तर जानना चाहते हैं तो पढ़े ‘भारतीय शिक्षा ग्रन्थमाला’। आओ! हम इस ग्रन्थमाला का परिचय प्राप्त करें।

भारतीय शिक्षा ग्रंन्थमाला – एक परिचय

हमारा मानना है किे भारत में दी जाने वाली शिक्षा भारतीय नहीं है। भले ही यह शिक्षा देने वाले भारतीय हैं और शिक्षा लेने वाले भी भारतीय हैं। भले ही यह शिक्षा भारत सरकार से मान्यता प्राप्त है, फिर भी शिक्षा भारतीय नहीं है, पाश्चात्य है यह जानना आवश्यक है।

भारत में शिक्षा भारतीय क्यों नहीं है? कब भारतीय होगी? जैसे सभी प्रश्नों का उत्तर हमें यह भारतीय शिक्षा ग्रन्थमाला देती है। यह ग्रन्थमाला मात्र उत्तर ही नहीं देती, वरन भारतीय शिक्षा की पुन: प्रतिष्ठा  का मार्ग भी सुझाती है।

भारत में शिक्षा भारतीय क्यों नहीं है? : प्रत्येक राष्ट्र का उसके जन्म से ही एक मूल स्वभाव होता है। उस मूल स्वभाव के अनुसार ही वह राष्ट्र इस जीवन को देखता है, जो उसकी जीवन दृष्टि कहलाती है। प्रत्येक राष्ट्र की यह जीवन दृष्टि और विश्व दृष्टि ही उस राष्ट्र का स्वधर्म कहलाता है। इस स्वधर्म के आधार पर ही उस राष्ट्र की इस जगत में एक भूमिका निश्चित होती है।

हमारे देश का स्वभाव आध्यात्मिक है। इसलिए भारत में अपने स्वधर्म के अनुसार ही राष्ट्र जीवन की सभी व्यवस्थाएँ बनी है। अर्थात् स्वभाव व स्वधर्म के अनुसार व्यवहार और व्यवस्थाएँ सब एक दूसरे के अनुकूल और अनुरूप होने से एक समग्र जीवन शैली बनती है, वही राष्ट्र की संस्कृति कहलाती है। शिक्षा संस्कृति की वाहक है। पीढ़ी दर पीढ़ी इस संस्कृति को शिक्षा ही हस्तान्तरित करती है। भारतीय शिक्षा, भारतीय संस्कृति को परिष्कृत करने, उसका संवर्धन करने और उसका हस्तारण करने वाली होनी चाहिए, जो नहीं है, इसलिए हम कहते हैं कि आज की शिक्षा भारतीय शिक्षा नहीं है।

भारत की शिक्षा कब से भारतीय नहीं है? : हम सब यह जानते है कि अंग्रेजों के भारत में आने तक भारत की शिक्षा भारतीय थी। अंग्रेजों द्वारा इस शिक्षा को बदलने से शिक्षा अभारतीय हो गई। सन् 1600 में ईस्ट इंडिया कम्पनी व्यापार करने के बहाने भारत में आई। उसका वास्तविक उद्देश्य तो भारत को लूटना ही था। व्यापार के नाम पर उन्होंने लूट ही की थी। व्यापार बिना किसी बन्धन के चलता रहे, इसलिए उन्होंने राज्य हथियाना प्रारम्भ किया। राज्य हथियाने के बाद उन्होंने दूसरा काम मिशनरियों के माध्यम से सेवा के बहाने से भोली-भाली वनवासी और गिरिवासी जनता को ईसाई बनाना शुरू किया। तीसरा और सर्वाधिक घातक काम उन्होंने शिक्षा के माध्यम से इस देश की जनता का मानस बदलकर कर उन्हें अंग्रेजीयत में ढालने का काम किया। इस काम में वे इसने यशस्वी हुए कि आज का भारतीय यह जानता तक नहीं कि हम अभारतीय शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं और अभारतीय सोच से जी रहे हैं। आश्चर्य तो यह है कि भारत को अभारत बनाने की प्रक्रिया जो दो सौ वर्ष पूर्व प्रारम्भ हुई थी, वह स्वतन्त्र भारत में आजतक चल रही है। तब से हम उल्टी दिशा में जा रहे हैं और उसे विकास मान रहे हैं। अतः प्रथम आवश्यकता अर्द्धवृत करने की है अर्थात् दिशा बदलने की है। यह ग्रन्थमाला हमें दिशा कैसे बदलना, दिशा बदलकर किस दिशा में जाना, क्यों जाना , कैसे जाना, मार्ग में आने वाले अवराधों से कैसे पार पाना? जैसे सभी प्रश्नों का हल सुझाती है।

भारतीय शिक्षा ग्रन्थमाला का स्वरूप : इस ग्रन्थमाला में कुल पाँच ग्रन्थ हैं। प्रत्येक ग्रन्थ ए-4 साइज के औसतन चार सौ पृष्ठों का सजिल्द ग्रन्थकार में है। इन पाँचों ग्रन्थों के शीर्षक अधोलिखित हैं-

  1. भारतीय शिक्षाः संकल्पना एवं स्वरूप
  2. भारतीय शिक्षा का समग्र विकास प्रतिमान
  3. भारतीय शिक्षा के व्यावहारिक आयाम
  4. पश्चिमीकरण से भारतीय शिक्षा की मुक्ति
  5. वैश्विक संकटों का निवारण भारतीय शिक्षा

यह ग्रन्थमाला पुनरुत्थान विद्यापीठ अहमदाबाद द्वारा प्रकाशित है। इसका लेखन कार्य वर्ष प्रतिपदा 2015 में प्रारम्भ हुआ और व्यास पूर्णिमा 2017 में पूर्ण हुआ। लेखन पूर्ण कर विद्यापीठ के कार्यकताओं ने इस ग्रन्थमाला को “त्वदीयाय वस्तु गोविंदं तुभ्यमेव समर्पये” की भावना से सर्वप्रथम ज्ञान सरस्वती बासर (आन्ध्र प्रदेश) में जाकर माँ शारदा के चरणों में समर्पित किया। उसके बाद सितम्बर 2017 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प.पू० सरसंघचालक मा. मोहन जी भागवत के कर कमलों से दिल्ली में आयोजित एक सार्वजनिेक कार्यक्रम में इसका लोकार्पण हुआ।

भारतीय शिक्षा ग्रन्थमाला की व्याप्ति : भारत में पुनः भारतीय शिक्षा स्थापित करने हेतु जितने अंगों से विचार करना चाहिए, उन सभी अंगों का विचार इन ग्रन्थों में किया गया है। इस ग्रन्थमाला में शिक्षा का विचार समग्रता में हुआ है। इसमें जहाँ गहनता के साथ तत्त्व चिन्तन किया गया है, वही तत्त्व के अनुरूप व्यवहार का निरूपण भी है।

इस ग्रन्थमाला में पठन-पाठन विधि, पाठ्यक्रम व विषयवस्तु का पुनर्विचार है तो साथ ही साथ अच्छा पढ़ने के लिए दिनचर्या, ऋतुचर्या, जीवनचर्या के साथ-साथ आहार, निद्रा, खेल, व्यायाम, सेवा, सत्संग, संयम, अनुशासन आदि को भी महत्व दिया गया है। विद्यालय में अध्ययन–अध्यापन जितना महत्त्वपूर्ण है उतना ही महत्त्वपूर्ण भवन-रचना, पानी, कचरे की निकासी, गणवेश एवं पर्यावरण की रक्षा भी है। इन सब व्यवस्थाओं का विचार न करना अधूरे चिन्तन को दर्शाता है।

विद्यालय का समय, वाहन व्यवस्था, बगीचा, रंगमंचीय कार्यक्रम के बारे में शास्त्रीय दृष्टि, आर्थिक दृष्टि, स्वास्थ एवं सुविधा की दृष्टि से विचार करना ही शैक्षिक दृष्टि है। इस ग्रन्थमाला में तत्त्व, व्यवहार और व्यवस्था की प्रत्येक बात का शैक्षिक दृष्टि से विचार किया गया है। केवल विचार ही नहीं तो कक्षाकक्ष में पठनीय विषयों की शिक्षा और कक्षाकक्ष के अन्दर व बाहर की व्यवस्थाओं का सम्बन्ध जोड़ने का भी प्रयास किया गया है।

यह ग्रन्थमाला भारतीय शिक्षा के विभिन्न क्षेत्रों में कार्य करने वाले सभी लोगों के लिए है जैसे – जो भारतीय शिक्षा के प्रश्न को सुलझाना चाहते हैं, जो इस विषय में अनुसंधान करना चाहते हैं जो भारतीय प्रतिमान को लेकर प्रयोग करना चाहते हैं, विश्वविद्यालय के जो अध्ययन मंडल पाठ्यक्रम निर्माण करना चाहते हैं, जो शैक्षिक, धार्मिक व सामाजिक संगठन आमूल परिवर्तन करना चाहते हैं, जो पश्चिमीकरण से भारतीय मानस की मुक्ति चाहते है, जो भारतीय शिक्षा के माध्यम से विश्वकल्याण चाहते है उन सब अध्येताओं के लिए यह ग्रन्थमाला मार्ग प्रशस्त करती है।

(लेखक शिक्षाविद् है, इस ग्रन्थमाला के सह संपादक है और विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान के सह सचिव है।)

और पढ़ें : भारतीय शिक्षा ग्रंथमाला के लोकार्पण अवसर पर माननीय डॉ मोहन भागवत जी के उद्बोधन के संपादित अंश

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