ज्ञान की बात 39 (परमेष्ठीगत विकास)

 – वासुदेव प्रजापति

अब तक हमने व्यष्टिगत विकास, समष्टिगत विकास और सृष्टिगत विकास को समझा, आज हम परमेष्ठीगत विकास को समझेंगे। विकास का यह अन्तिम आयाम है। इसमें ही विकास की पूर्णता भी है। इस पूर्णता को जानने से पूर्व हम ब्रज की एक लोक कथा में जानेंगे कि वह पूर्ण हमारे अन्दर है।

भगवान हमारे अन्दर हैं

वृन्दावन में एक बुढ़िया रहती थीं। उनका नाम था सरला। वे एक छोटी-सी कुटिया में अकेली रहती थीं और भगवान श्री कृष्ण की भक्ति किया करती थीं। वे पूरी तरह कृष्ण भक्ति में समर्पित थीं। उनकी वह कुटिया एक छोटी-सी बगिया में थी। उस बगिया में तुलसी के पवित्र पौधे लगे हुए थे। वे नित्य तुलसी के दो दल तोड़कर लाती और एक छोटी-सी चौकी पर भगवान के नाम से चढ़ातीं और भगवान की पूजा करती थीं। जब वह भगवान की पूजा कर रही होती थीं, उसी समय भगवान कृष्ण आकर उसकी चौकी पर बैठ जाते और चढ़ाए गए वे तुलसी दल उनके श्री चरणों में रखे दिखाई देते। श्रीकृष्ण बैठे-बैठे मुस्कराते हुए पूछते, सरला! तुम्हें क्या चाहिए? वह बुढ़िया रोने लगती और खुशी में पगलाते हुए कहतीं- हे मेरे स्वामी! आपको छोड़कर मुझे और कुछ भी नहीं चाहिए। आप मुझे कभी मत छोड़ना, बस! मुझे तो जीवन में इतना ही चाहिए।

भगवान के ध्यान में वे अपनी सुध-बुध खो देती थीं। अपनी आँखें बन्द कर भगवान का नाम-कीर्तन करती रहतीं। ऐसे समय भी भगवान आकर बैठ जाते और कीर्तन सुनते रहते। जब बुढ़िया आँखें खोलती तब भगवान गायब हो जाते। परन्तु जाने से पहले वे उसके मिट्टी के बर्तनों को लाल, बात व दूध-दही से भर देते। बुढ़िया सरला यह भोजन भगवान को चढ़ाती और दोपहर में उस दिव्य भोजन को प्रसाद रूप में स्वयं ग्रहण करतीं। इस प्रकार भगवान की अनन्य भक्ति में उसका जीवन बीत रहा था।

बुढ़िया के पड़ौसी उसे मायावी समझते। वे आपस में बातें करते यह बुढ़िया न तो कोई काम-धाम करती है, न भीख माँगती है और न किसी से उधार ही मांगती है, फिर भी वह जीवित है। आखिर यह राज क्या है? पता लगाने के लिए कुछ पड़ौसियों ने एक दिन उसकी कुटिया में झांककर देखा। उन्होंने जो चमत्कार देखा तो उनकी आँखें फटी की फटी रह गईं। बुढ़िया आँखें बन्द किए ध्यान में मग्न है, उधर श्रीकृष्ण आसन पर बैठे हैं। उन्होंने इसे बुढ़िया की माया समझी और उसके साथ एक कुटिल चाल चली। जब बुढ़िया अपनी बगिया में तुलसी के पौधों को पानी पिला रही थीं, उसी समय उन्होंने उसके बर्तन चुरा कर छोड़ डाले और भगवान की चौकी को यमुनाजी में फेंक दिया।

बुढ़िया जब नित्य पूजा करने अपनी कुटिया में आई तो क्या देखती है? न बर्तन है, न भोजन है और न चौकी ही है। वह जोर से भगवान को पुकार लगाने लगीं- हे प्रभो, हे कृष्ण, हे मेरे स्वामी! आप मुझे भोजन से वंचित कर सकते हैं, किन्तु मेरी कुटिया में आपका जो स्थान है, उससे वंचित मत करिए। जब कोई असहाय व्यक्ति भगवान को आर्त्तस्वर में पुकारता है, तब भगवान चुप नहीं रहते। इसी समय बुढ़िया ने बाहर कुछ कोलाहल सुनाई दिया, वह धीरे से बाहर आई। उसने देखा बाहर पड़ौसियों की भीड़ जमा है, वे एक चमत्कार देख रहे हैं। कुटिया के बाहर हजारों बर्तन रखें हुए हैं और उनमें खाने-पीने की वस्तुएँ भरी पड़ी हैं। बुढ़िया ने पलकें बन्द कर अपने आंसूं रोके परन्तु किसी भी बर्तन को छूआ तक नहीं। उसने श्रीकृष्ण को पुकारते हुए कहा-  हे कृष्ण! मैंने आपसे भोजन नहीं माँगना था। यह निर्बल शरीर भोजन पर जीवित नहीं है, यह तो आपकी कृपा पर जीवित है। आप मेरे जीवन में पुनः आ जाइए। बुढ़िया जोर-जोर से भगवान को पुकारती रहीं, अब तो वे निष्ठुर पड़ौसी भी पश्चाताप से भरे हुए बुढ़िया के साथ-साथ भगवान को पुकारने लगे। थोड़ी देर में क्या देखते हैं कि बुढ़िया के हृदय में भगवान मुस्कराते हुए विराजमान हैं। पड़ौसी भगवान के सामने नतमस्तक हो गए। अब वे बुढ़िया से क्षमा माँगने लगे। वे बोले- माँ! हम लोगों ने आपके साथ जो दुर्व्यवहार किया है, उसके लिए हमें क्षमा करें। आप ही भगवान की वेदी हैं, आपमें ही स्वयं भगवान विराजमान हैं।

बुढ़िया ने झुककर देखा तो सच में मुस्कराते हुए भगवान श्रीकृष्ण छाती के मध्य भाग में विराजित हैं। भगवान के दर्शन कर वह भीड़ की ओर मुड़ी और उनसे बोली- आप लोग तो मेरे गुरु हैं। मुझे तो आप सबका आभार व्यक्त करना चाहिए, आपके कारण ही आज मैं अज्ञान से मुक्त हुई हूँ। अब तक मैं भगवान को अपने से बाहर ही देखती रही, आज मुझे बोध हुआ कि भगवान तो मेरे अन्दर हैं। उधर भीड़ को भी बोध हुआ कि ईश्वर में दृढ़ विश्वास और उनकी अनन्य भक्ति करने से ईश्वर प्राप्त होते हैं। और जहाँ ईश्वर होते हैं वहाँ अन्य सब वस्तुएँ अपने आप सुलभ हो जाती हैं। अतः हमें भी ईश्वर को अपने अन्दर ढूंढना चाहिए। जैसे श्रीकृष्ण की आराधिका सरला को ईश्वर मिले हैं वैसे ही हमें भी ईश्वर मिले सकते हैं।

‘मैं ब्रह्म हूँ’ की अनुभूति होना

यह सृष्टि उस परमात्मा का व्यक्तरूप है। जड़-चेतन भी मूल में एक ही हैं।और वह एक तत्त्व ब्रह्म है। इस आधार पर मैं स्वयं वह ब्रह्म हूँ, ऐसा साक्षात्कार होना ही पूर्णता को प्राप्त करना है। हमारा एक महावाक्य है- ‘सर्वं खलु इदं ब्रह्म’। अर्थात् इस सृष्टि में जो सब कुछ दिखाई दे रहा है, वह ब्रह्म है। जब एक योगी समाधि में स्थित होता है तो उसे अनुभूति होती है- ‘अहं ब्रह्मास्मि’। जिस ब्रह्म ने व्यक्त होते-होते मनुष्य का रूप धारण किया, वह मनुष्य अब जान गया है कि मैं मूल रूप में वही ब्रह्म हूँ। अर्थात् मैं भी वही परमात्मा हूँ।

ऐसे उदाहरण हमारे भक्ति ग्रंथों में, उपनिषदों में भरे पड़े हैं। ऐसे योगियों के चरित्र भी पढ़ने को मिलते हैं। इस स्तर तक विकसित व्यक्तियों का व्यवहार कैसा होता है? यह हमें योगीराज श्रीकृष्ण में मिलता है और श्रीमद्भगवद्गीता इसी तत्त्व का व्यवहार शास्त्र है।

भारत का यह मूल स्वभाव है

भारत में विकास की यही संकल्पना है। हमारे शान्तिपाठ में द्यु लोक, पृथ्वी, आप, औषधि, वनस्पति आदि से लेकर भूतमात्र तक सबकी शान्ति की कामना की गई है। मनुष्य जीवन का लक्ष्य भी यही बताया गया है। सर्वसामान्य लोगों के अन्तर्मन में यह बोध अवस्थित है, तभी तो उनकी यह मान्यता है कि कण-कण में भगवान है। भारत का यह मूल स्वभाव है। सहस्त्रों वर्षों में यह स्वभाव बना है। ऋषि-मुनियों ने इसका दर्शन किया है और अपनी तपश्चर्या से इसे बनाए रखा है।

शिक्षा का उद्देश्य मुक्ति दिलाना है

बालक के व्यक्तित्व का विकास मुक्ति की दिशा में करना ही शिक्षा का उद्देश्य है। मुक्ति तक पहुँचने की सप्तपदी यह है- व्यक्ति, परिवार, समाज, राष्ट्र, विश्व, सृष्टि व परमेष्ठी। व्यक्तित्व का व्यष्टि से लेकर समष्टि, सृष्टि व परमेष्ठी के साक्षात्कार तक भक्ति और कर्म के आधार पर विकास ही समग्र विकास है और यही शिक्षा का उद्देश्य है- ‘सा विद्या या विमुक्तये’

एक बात और ध्यान रखने योग्य है। इस सप्तपदी में किसी भी एक स्तर का विकास दूसरे स्तर के विकास का विरोधी नहीं है। जैसे- पारिवारिक विकास से व्यक्तिगत विकास की हानि नहीं होती अथवा सामाजिक विकास से पारिवारिक विकास की हानि नहीं होती। क्योंकि ये सभी स्तर परस्पर सम्बद्ध हैं और पूरक हैं। इनमें निरन्तरता है, ये अलग-अलग और स्वतंत्र नहीं हैं। एक विकसित होते-होते अगला चरण विकसित हो जाता है। अर्थात् व्यक्ति से परिवार, परिवार से समाज, समाज से राष्ट्र, राष्ट्र से विश्व में रूपांतरण होता जाता है। इसे ही हमारे यहाँ व्यक्ति की अपने परिवार से ऊपर उठकर वसुधैव कुटुंबकम् तक की और ऊपर उठकर नर से नारायण बनने की विकास यात्रा कहा गया है। शिक्षा का मूल उद्देश्य भी यही है।

(लेखक शिक्षाविद् है, भारतीय शिक्षा ग्रन्थमाला के सह संपादक है और विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान के सह सचिव है।)

और पढ़ें : ज्ञान की बात 38 (सृष्टिगत विकास)

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