ज्ञान की बात 37 (विश्वगत विकास)

वासुदेव प्रजापति

अब तक हमने व्यक्ति के परिवार के साथ सम्बन्ध, समाज के साथ सम्बन्ध, राष्ट्र के साथ सम्बन्ध कैसे होने चाहिए? इन सब सम्बन्धों के बारे में जाना। आज हम व्यक्ति के विश्व के साथ सम्बन्ध कैसे होने चाहिए? इस बिन्दु को जानने का प्रयत्न करेंगे। इन सम्बन्धों को जानने से पूर्व विश्व के एक राष्ट्र की कथा को जानेंगे।

हमारी मातृभूमि वापस कर दो!

इस विश्व में द्वितीय महायुद्ध तक यहूदियों के देश का नामोनिशान नहीं था। अर्थात् ई.सन् 1944 तक विश्व में एक भी यहूदी राष्ट्र नहीं था। सर्वप्रथम सन् 1948 में एक यहूदी राष्ट्र अस्तित्व में आया। कुल 27 लाख वाले उस छोटे से राष्ट्र का नाम है, इजरायल। इजरायल की सफलता और उसकी सम्पन्नता का कारण इसके निवासी यहूदियों की गहन धर्मनिष्ठा है, जो सम्पूर्ण विश्व में एक आदर्श उदाहरण है।

यहूदी अपने धर्म ग्रन्थों पर बहुत विश्वास रखते हैं। इसी प्रकार वे अपनी मातृभूमि और अपने आदर्शों की रक्षा हेतु निजी स्वार्थों का हँसते -हँसते बलिदान कर देते हैं। अर्थात् उनके लिए निजी स्वार्थों की तुलना में राष्ट्रहित सर्वोपरि है। उनका यह वैशिष्ट्य अपने आपमें अनूठा उदाहरण है। इसी वैशिष्ट्य के बल पर आज इजरायल ने इतनी प्रगति व आत्मनिर्भरता प्राप्त की है और विश्व राजनीति में अपना विशेष स्थान बनाया है। यहूदियों में धर्मप्रेमी और जातीय सेवा का भाव कितना प्रबल है? इसकी कथा आप भी जानिए।

एक यहूदी वैज्ञानिक ब्रिटेन में रहते थे। द्वितीय विश्वयुद्ध में उस यहूदी वैज्ञानिक ने अपने अथक परिश्रम से ब्रिटेन की बहुत मदद की। द्वितीय विश्वयुद्ध में ब्रिटेन को विजय दिलाने में उस यहूदी वैज्ञानिक की प्रमुख भूमिका रही थी। अतः विजय के पश्चात् ब्रिटेन के अधिकारियों ने उस वैज्ञानिक को उसकी विशिष्ट सेवाओं  के लिए पुरस्कार देने की इच्छा प्रकट की।

एक उच्च ब्रिटिश सेनाध्यक्ष ने उससे कहा – आपने ब्रिटेन की महान सेवा की है, उस उपलक्ष्य में ब्रिटेन आपका सम्मान करना चाहता है। बताइये, आपकी महान सेवाओं के बदले हम आपको क्या भेंट दे सकते हैं?

वे चाहते तो करोड़ों-अरबों रुपए मांग सकते थे या कोई जागीर अथवा पद-प्रतिष्ठा प्राप्त कर सकते थे। उनके मन में एक बार भावी जीवन का वैभवपूर्ण आकर्षण आया भी किन्तु दूसरे ही क्षण उनकी बुद्धि ने कहा- अति क्षुद्र लौकिक वासना के पीछे अपने धर्म व संस्कृति को मत भूल जाना, कुछ माँगना ही है तो अपने धर्म के लिए मांग। तेरा जीवन तो अन्ततः नष्ट होगा ही, चिरन्तन धर्म की रक्षा में यदि तेरा कुछ योगदान बन सके तो यह न केवल तेरा अपितु सम्पूर्ण यहूदी जाति के गौरव का भव्य इतिहास बनेगा।

तब उस यहूदी वैज्ञानिक ने कहा- मान्यवर! यदि आप मुझे कुछ देना ही चाहते हैं तो हम यहूदियों की मातृभूमि वापस कर दें, जिससे हम अपने धार्मिक आदर्शों की रक्षा कर सकें। अंग्रेज उसके प्रति बड़े कृतज्ञ थे, उन्होंने फिलिस्तीन का कुछ भाग दे दिया, जहाँ विश्वभर से आ-आ कर सारे यहूदी पुनः संगठित हुए। इस प्रकार एक यहूदी वैज्ञानिक ने अपने निजी स्वार्थों को त्याग कर अपनी जाति के लिए सर्वस्व त्याग का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया।

सब यहूदियों ने मिलकर उस रेगिस्तानी भू- भाग को अपने अथक परिश्रम से हरा-भरा बना दिया। यह सब उनके सामूहिक श्रम का ही सुफल है कि आज इजरायल न केवल आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न है, वरन् छोटे से भू-भाग को लेकर चहूँ ओर से घिरे शत्रुओं से अपनी मातृभूमि की सुरक्षा करने में सदैव सन्नद्ध रहता है। तथा सम्पूर्ण विश्व के राजनीतिक पटल पर एक शक्तिशाली, स्वाभिमानी व आत्मनिर्भर राष्ट्र की विशिष्ट पहचान बनाए हुए है।

विश्व को जानना

इस विश्व में अनेक राष्ट्र हैं। सब राष्ट्रों का मूल स्वभाव भिन्न-भिन्न है, स्वभाव की भिन्नता के कारण उनके धर्म, संस्कृति, इतिहास, जीवनदर्शन भी भिन्न-भिन्न हैं। इस दृष्टि से सभी राष्ट्रों को जानना ही विश्व को जानना है। जब व्यक्ति का विकास राष्ट्रीय स्तर से ऊपर उठता है, तब वह वैश्विक स्तर पर पहुंचता है। वह सभी राष्ट्रों के धर्म व संस्कृति को समझता है, उनकी तुलना करता है तथा सभी संस्कृतियों को जानकर उनका अनुभव लेता है। वह सबसे समरस होने का प्रयास करता है, सबके प्रति प्रेम व आदर का भाव विकसित करता है। इसे हम विश्वगत विकास कहते हैं।

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विश्वगत विकास के आयाम

विश्व में भारत की भूमिका समझना : यह विश्वगत विकास का एक आयाम है। हम पहले विश्वगुरु थे आज क्यों नहीं हैं? और पुनः किस प्रकार बन सकते हैं और उसमें हमारा योगदान क्या हो सकता है? इसका विचार करना और उसके लिए आवश्यक योग्यताओं को प्राप्त करना, विश्वगत विकास का महत्त्वपूर्ण चरण है।

विश्व में भारतीय की पहचान बनना

विश्व में एक भारतीय के नाते भारत की प्रतिष्ठा बढ़ाना। अन्य राष्ट्रों के समक्ष हमारे राष्ट्र का गौरव हो, ऐसा व्यवहार करना। विश्व में आजकल क्या चल रहा है, अन्य देशों का भारत के साथ कैसा व्यवहार है? इस पर पैनी नजर रखना। अपने शत्रु-मित्र कौन है? यह समझना एक सच्चे भारतीय का कर्तव्य है। वैश्विक संकटों को दूर करने की दृष्टि  से विश्व को सहायता और मार्गदर्शन करने योग्य बनाना, विश्वगत विकास का अगला चरण है।

विश्व को अपना परिवार मानना

सम्पूर्ण विश्व को देखने की भारतीय दृष्टि अन्य राष्ट्रों की दृष्टि से बिल्कुल भिन्न है। जहाँ अन्य राष्ट्र विश्व पर अपना आधिपत्य स्थापित करना चाहते हैं या विश्व को एक बाजार मानते हैं, वहीं भारत वसुधैव कुटुम्बकम् अर्थात् सम्पूर्ण विश्व को अपना परिवार मानता है और विश्व-परिवार के एक सदस्य के नाते इस परिवार का हित चाहता है। भारत का वसुधैव कुटुंबकम् का भाव अर्थात् सम्पूर्ण वसुधा(पृथ्वी) को अपना कुटुम्ब मानना, विश्वगत विकास का परिचायक है।

हमने पूर्व में जाना है कि समष्टि के चार चरण हैं- परिवार, समाज, राष्ट्र और विश्व। व्यक्ति जब स्वयं से ऊपर उठकर परिवार के साथ सामंजस्य स्थापित करता है तब उसका परिवारगत विकास होता है। जब व्यक्ति परिवार से ऊपर उठकर समाज के साथ समरसता स्थापित करता है तब उसका समाजगत विकास होता है। जब वह समाज से ऊपर उठकर राष्ट्र के साथ एकाकार होता है तब उसका राष्ट्रगत विकास होता है। और जब वह अपने राष्ट्र से भी ऊपर उठकर सम्पूर्ण विश्व को अपना परिवार मानता है तब उसका विश्वगत विकास होता है और वह एक विश्व मानव बन जाता है। इस प्रकार परिवार, समाज, राष्ट्र और विश्व ये चारों विकास मिलकर व्यष्टि का समष्टिगत विकास कहलाता है।

(लेखक शिक्षाविद् है, भारतीय शिक्षा ग्रन्थमाला के सह संपादक है और विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान के सह सचिव है।)

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