भारतीय शिक्षा – ज्ञान की बात 49 (शिक्षा का सांस्कृतिक स्वरूप)

 – वासुदेव प्रजापति

भारतीय शिक्षा को जानने व समझने के लिए ज्ञान की बात नामक पाक्षिक स्तम्भ प्रारम्भ किया गया है। आज से ज्ञान की बात ने तीसरे वर्ष में प्रवेश किया है। प्रथम वर्ष का विषय ज्ञान एवं ज्ञानार्जन के करणों का विकास था। दूसरे वर्ष का विषय शिक्षा का भारतीय प्रतिमान : समग्र विकास था। अब तीसरे वर्ष का विषय शिक्षा का सांस्कृतिक स्वरूप है। इस वर्ष में हम शिक्षा का अधिष्ठान अध्यात्म, विषयों का अंगांगी सम्बन्ध, पठनीय विषयों का सांस्कृतिक स्वरूप, धर्मशिक्षा, कर्मशिक्षा तथा शास्त्रशिक्षा, औपचारिक व अनौपचारिक शिक्षा, बालक शिक्षा एवं बालिका शिक्षा और शिक्षा में स्वायत्तता नामक शीर्षकों के माध्यम से भारतीय शिक्षा के सांस्कृतिक स्वरूप को जानने व समझने का प्रयत्न करेंगे।

सांस्कृतिक स्वरूप से हमारा तात्पर्य

भारत की पहचान आध्यात्मिक राष्ट्र की है। अध्यात्म का व्यावहारिक स्वरूप संस्कृति है। इसलिए भारत में सब कुछ सांस्कृतिक है। अतः शिक्षा भी सांस्कृतिक है। परन्तु वर्तमान में भारत में दी जाने वाली शिक्षा का स्वरूप भौतिक है।

भारत में जीवन का भौतिक पक्ष सांस्कृतिक अधिष्ठान पर टिका हुआ है, जबकि पश्चिम में संस्कृति का आधार भी भौतिक ही है। इसलिए जीवन की प्रत्येक बात भारत और यूरोप में भिन्न-भिन्न प्रकार से व्याख्यायित होती है।

यही कारण है कि भारत की वर्तमान शिक्षा का आधार भौतिक है। जबकि सनातन शिक्षा का आधार सांस्कृतिक है। वर्तमान भारत को पुनः सनातन भारत बनाना ही भारत का भारतीयकरण है। यह तभी सम्भव होगा जब शिक्षा के भौतिक स्वरूप को सांस्कृतिक स्वरूप में बदला जाएगा।

व्यावहारिक जीवन में जब हम अध्यात्म का अधिष्ठान स्वीकार करके अपना जीवन यापन करते हैं, तब जीवन जीने की जो शैली बनती है उसे हम संस्कृति कहते हैं। चूँकि संस्कृति का सीधा सम्बन्ध व्यवहार से है, इसलिए सभी विषयों को आध्यात्मिक कहने के स्थान पर हम उसे सांस्कृतिक कहते हैं। आध्यात्मिक कहना और सांस्कृतिक कहना एक ही बात है। इसीलिए हमने शीर्षक में शिक्षा का सांस्कृतिक स्वरूप कहा है।

भारत की आध्यात्मिक संकल्पना

हमारे देश में अध्यात्म संकल्पना को लेकर बहुत भ्रम फैला हुआ है। जब हम कहते हैं कि सभी विषयों का अधिष्ठान अध्यात्म है तो सामान्य जनों की बात ही क्या विद्वान भी अध्यात्म के विषय में एकमत नहीं है। कोई अध्यात्म को संन्यास से जोड़ता है तो कोई मठ-मंदिरों के साथ जोड़ता है। कोई धर्म को ही अध्यात्म मानता है तो कोई सम्प्रदाय को अध्यात्म कहता है। कोई पूजा-अर्चना, कीर्तन-भजन, व्रत-उपवास को अध्यात्म समझते हैं तो कोई यज्ञ, त्योहार, तीर्थ यात्रा व कथा श्रवण एवं उपनिषदों के पठन-पाठन को ही अध्यात्म बतलाते हैं। परन्तु कोई भी उसे दैनन्दिन जीवन का अंग नहीं मानते, वे तो इसे इस दुनिया से परे की कोई वस्तु मानते हैं। इसी कारण से अध्यात्म के प्रति आस्था का भाव नहीं है। अतः अध्यात्म के विषय में स्पष्टता होना नितान्त आवश्यक है।

अध्यात्म में मूल शब्द आत्म है। आत्म में अधि उपसर्ग लगने से अध्यात्म शब्द बना है। इसलिए अध्यात्म का अर्थ है आत्मतत्व को विचारों, भावनाओं, व्यवहारों और व्यवस्थाओं के आधार रूप में स्वीकार करना। यहाँ आत्मतत्त्व शब्द आत्मा, परमात्मा, ब्रह्म अर्थात् ईश्वर या भगवान के लिए प्रयुक्त हुआ है। भगवान सर्वज्ञ हैं, सर्वव्यापी हैं और सर्वशक्तिमान हैं। परमात्मा ने ही यह सृष्टि बनाई है और वे स्वयं सृष्टि के प्रत्येक कण-कण में विद्यमान हैं। वे सबको देखते हैं और जानते हैं। वे पापियों को व दुर्जनों को दण्ड देते हैं और सज्जनों की रक्षा करते हैं। उसके घर में देर है अंधेर नहीं है। सामान्य लोगों में प्रतिष्ठित ये मान्यताऍं वास्तव में अध्यात्म का ही लोकभाषा में प्रकटीकरण है। लोकमानस में अध्यात्म की स्वीकृति और बौद्धिक जगत में अध्यात्म विषयक अज्ञान आज के अनेक संकटों का कारण है। अतः अध्यात्म का सही-सही ज्ञान होना अत्यावश्यक है। इस बात को हम छोटी सी कथा से समझेंगे।

सबमें प्रभु का वास

एक सब्जी वाला था। वह सब्जी की पूरी दुकान ही साइकिल पर लगाकर घूमता रहता था। प्रभु उसका तकिया कलाम था। कोई उससे पूछता, आलू कैसे लिए? वह कहता, दस रुपए प्रभु। हरि धनिया है क्या? बिल्कुल ताजा है प्रभु। वह हर एक को प्रभु कहता था। परिणाम स्वरूप लोग भी उसको प्रभु कहकर पुकारने लगे। एक दिन उससे किसी ने पूछा, तुम सबको प्रभु-प्रभु क्यों कहते हो? और लोग भी तुम्हें प्रभु कहकर क्यों बुलाते हैं? तुम्हारा कोई असली नाम है भी या नहीं?

सब्जी वाले ने कहा, है न प्रभु। मेरा असली नाम भैयालाल है प्रभु। वह अपनी कथा बताने लगा। प्रभु मैं शुरु से अनपढ़ गँवार हूँ। पहले मैं मजदूरी करता था। एक बार गाँव में एक नामी सन्त की कथा हुई। मैं भी उस कथा में गया। कथा मेरे पल्ले नहीं पड़ी, परन्तु एक लाइन मेरे दिमाग में पक्की बैठ गई। उन संत ने कहा कि हर इंसान में प्रभु का वास है। आप उसे तलाशने की कोशिश तो करो, पता नहीं किस इंसान में तुम्हें प्रभु मिल जाय और तुम्हारा उद्धार कर जाय। बस! उसी दिन से मैंने हर एक को प्रभु की नजर से देखना व पुकारना शुरु कर दिया। वाकई चमत्कार हो गया। दुनिया के लिए शैतान आदमी भी मेरे लिए प्रभु समान हो गया। मेरे दिन ऐसे फिरे कि मैं मजदूर से व्यापारी हो गया। सुख-समृद्धि के सारे साधन जुड़ते गए और मेरे लिए तो सारी दुनिया ही प्रभु रूप हो गई। इसीलिए हमारे यहाँ कहा जाता है, न जाने किस भेष में मिल जाय भगवान रे!

आत्मतत्त्व को अधिष्ठान स्वीकारना

आत्मतत्त्व अनुभूति का क्षेत्र है, अनुभूति के आधार पर ही उसका बौद्धिक स्वरूप बना है। आत्मतत्त्व को अधिष्ठान मानने की भारतीय संकल्पना एक अति विशिष्ट संकल्पना है। यह सम्पूर्ण जगत के बारे व्यवहारों, घटनाओं, भावनाओं और व्यवस्थाओं का खुलासा करती है।

यह जगत गतिशील और परिवर्तनशील है, इस बात को स्वीकार तो सब करते हैं परन्तु सर्व प्रकार के परिवर्तनों का आलम्बन और उन सभी परिवर्तनों व गतियों को नियमन में रखने वाले तत्त्वों का आलम्बन भी आत्मतत्त्व ही है, यह नहीं मानते। यथार्थ यही है कि सभी परिवर्तनशील पदार्थों के पीछे एक सर्वथा अपरिवर्तनशील, सभी इन्द्रियों व अन्त:करण से गम्य पदार्थों के पीछे एक सर्वथा अगम्य, सभी कल्पनीय व चिन्तनीय पदार्थों के पीछे एक सर्वथा अकल्प्य व अचिन्त्य, सभी क्षरणशील व जर्जरित होने वाले पदार्थों के पीछे एक अक्षर व अजय, सभी मरणशील व नाशवान पदार्थों के पीछे एक अमर व अविनाशी, सभी आरम्भ व अन्त को प्राप्त होने वाले पदार्थों के पीछे एक अनादि व अनन्त, सभी द्वन्द्वात्मक, द्विविध, त्रिविध और अनेकविध पदार्थों के पीछे एकमेवाद्वितीय तत्त्व की अनुभूति करना और उस अनुभूति को बुद्धिगम्य बनाना तथा उसके आधार पर व्यावहारिक जीवन की रचना करना भारत के आर्षद्रष्टा ऋषियों के सामर्थ्य का परिचायक है।

मनुष्य को परमात्मा ने अपने प्रतिरूप में बनाया है, यह इसका प्रमाण है। यह सामर्थ्य आत्मानुभूति का है, यह आत्मानुभूति ही आत्मबल है। इसीलिए यह आत्मबल ही बुद्धिबल, मनोबल, प्राणबल और देहबल के रूप में आवश्यकता के अनुसार प्रकट होता है और संसार के सारे व्यवहार संचालित करता है। अतः आत्मतत्त्व के अधिष्ठान के बिना सारा सामर्थ्य, सारी क्षमताएँ, सबका अस्तित्व ही अनाश्रित हो जायेगा। इस आत्मतत्त्व को स्वीकार करना ही जीवन को आध्यात्मिक बनाना है। शिक्षा में आत्मतत्त्व के अधिष्ठान को लाकर ही हम उसे सर्वभूत हितेरता: बना सकते हैं।

भौतिक अधिष्ठान को बदलना

आज जिस अधिष्ठान पर सारा शिक्षा विचार टिका हुआ है, वह भौतिक है।

भारत की जीवन रचना में भौतिक आयाम सांस्कृतिक आयाम का एक अंग है, स्वयं अधिष्ठान नहीं है। फिर भी भारत में भौतिकता को स्वीकार करते हैं, उसे हेय नहीं मानते किन्तु उसे संस्कृति के प्रकाश में ही स्वीकारा जाता है। भौतिकता को मुख्य न मानकर संस्कृति का एक अंग मानने से भौतिकता भी अधिक समृद्ध, अधिक सार्थक, अधिक कल्याणकारी होती है। इस तथ्य को भारत की सहस्रों वर्षों की जीवन व्यवस्था ने सिद्ध कर दिखाया है।

अतः हमें सभी विषयों का भौतिक स्वरूप बदलकर उसका  सांस्कृतिक स्वरूप अपनाना चाहिए। उदाहरण के लिए भारत का मानचित्र माँगने पर राजकीय मानचित्र लाया जाता है। यह गौण को मुख्य मान लेने का परिणाम है, राजकीय क्षेत्र सम्पूर्ण सांस्कृतिक जीवन का एक अंग है। जब यह कहा जाय कि राजकीय मानचित्र लाओ तभी राजकीय मानचित्र लाना चाहिए, अन्यथा केवल मानचित्र लाने के लिए कहा जाय तब सांस्कृतिक मानचित्र ही लाना चाहिए। तब संस्कृति का स्थान मुख्य और राजकीय क्षेत्र का स्थान गौण बन जाता है।

भारतीय शास्त्रों को प्रमाण मानना

शिक्षा की विषय वस्तु को आध्यात्मिक विचार पर अधिष्ठित करना सबसे प्रथम और सबसे महत्वपूर्ण चरण है। इस प्रथम चरण के अभाव में शेष सारे प्रयत्न बिना एक का शून्य जैसे निरर्थक हो जायेंगे। अतः हमें विशेष ध्यान रखकर सारे विषयों का स्वरूप सांस्कृतिक बनाना होगा। और सांस्कृतिक स्वरूप निर्धारित करते समय हमें भारतीय शास्त्रों को ही प्रमाण मानना होगा।

श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान कहते हैं –

य: शास्त्र विधिमुत्सृज्य वर्त्तते कामकारत:।

न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्।।

अर्थात् जो शास्त्रों में बताए हुए व्यवहार को छोड़कर मनमाना व्यवहार करता है, उसे न सिद्धि प्राप्त होती है न सुख प्राप्त होता है और न उसे सद्गति ही मिलती है।

अतः हमें भारतीय शास्त्रों को ही प्रमाण मानना चाहिए। हाँ आवश्यक हो तो कहीं-कहीं पाश्चात्य शास्त्रों का सन्दर्भ लिया जा सकता है, परन्तु वे भारतीय शास्त्रों के अविरोधी होने चाहिए अन्यथा वे त्याज्य होंगे। हमारे लिए तो हमारे वेद, उपनिषद्, पुराण तथा गीता-रामायण ही प्रमाण शास्त्र हैं और वसिष्ठ, विश्वामित्र, याज्ञवल्क्य, वेदव्यास और कौटिल्य ही प्रमाण हैं। सभी आर्षद्रष्टा ऋषि हमारे लिए स्वत: प्रमाण हैं।

(लेखक शिक्षाविद् है, भारतीय शिक्षा ग्रन्थमाला के सह संपादक है और विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान के सह सचिव है।)

और पढ़ें : ज्ञान की बात 48 (व्यक्ति को समर्थ बनाना)

Facebook Comments

Leave a Reply

Your email address will not be published.