भारतीय शिक्षा – ज्ञान की बात-19 (अध्ययन)


 – वासुदेव प्रजापति

अध्ययन (पढ़ना)

अध्ययन का अर्थ है, “पढ़ना”। पढ़ना और पढ़ाना या अध्ययन और अध्यापन एक ही क्रिया के दो स्वरूप हैं। हम अंग्रेजी भाषा के प्रभाव के कारण इन्हें दो क्रियापद मानते हैं। अंग्रेजी में इन दोनों पदों के लिए दो स्वतन्त्र क्रियायें हैं – “टू टीच और टू लर्न”। हमारे देश की सभी भाषाओं में पढ़ना व पढ़ाना शब्द एक ही क्रिया के दो पद हैं। अध्ययन का क्रियापद पढ़ना है और अध्यापन का क्रियापद पढ़ाना है। इन दोनों स्वरूपों में “पढ़ना” यह क्रियापद का मूल रूप है और “पढ़ाना” उसका प्रेरक रूप है। आज हम पढ़ना या अध्ययन करना, इस मूल क्रियापद को समझेंगे।

अध्ययन एक प्रक्रिया है

अध्ययन एक निरन्तर चलने वाली क्रिया है। इसे क्रिया न कहकर प्रक्रिया कहना अधिक सार्थक है। जिस प्रकार एक कदम के बाद दूसरा कदम और दूसरे के बाद फिर पहला कदम निरन्तर रखते जाते हैं, तभी उसे चलना कहते हैं। केवल एक ही पैर आगे रखने को चलना नहीं कहते। उसी प्रकार अनेक क्रियाएँ निरन्तर उचित क्रम में होने से अध्ययन की क्रिया होती है। जैसे भोजन का एक निवाला मुँह में रखने से लेकर, चबाने, पचाने एवं रस बनकर रक्त में मिल जाने तक की पूरी क्रिया को पाचन होना कहते हैं। उसी प्रकार ज्ञान का पूर्णरूप से आत्मसात होकर व्यक्तित्व का भाग बन जाने तक की क्रिया को अध्ययन कहते हैं। पाचन की भाँति अध्ययन भी एक सतत चलने वाली प्रक्रिया है।

अध्ययन अर्थात् ज्ञान सम्पादन

अध्ययन करने का अर्थ है, ज्ञान सम्पादन करना। ज्ञान सम्पादन के अन्तर्गत अनेक क्रिया-कलाप होते हैं, जैसे पढ़ना, लिखना, रटना, प्रयोग करना, व्याख्यान सुनना या ऐसा ही कोई अन्य क्रिया-कलाप करना, ये सब ज्ञान सम्पादन के लिए ही किये जाते हैं। यदि ज्ञान सम्पादन नहीं होता है तो इन सारे क्रिया-कलापों का स्वतंत्र रूप में कोई महत्त्व या प्रयोजन नहीं है।

ज्ञान सम्पादन करने का अर्थ है, ज्ञानवान बनना। ज्ञान कोई भौतिक पदार्थ नहीं है, जिसे बाह्य मापदंड़ों से नापा जाय। परीक्षा में मिलने वाले अंक या पढ़ाई का शुल्क या पढ़ाई के बाद मिलने वाली नौकरी ज्ञान को मापने के साधन नहीं हैं। ज्ञान अमूर्त तत्त्व है। ज्ञान व्यक्ति के सम्पूर्ण व्यक्तित्व में अनुस्यूत हो जाता है और उसकी वाणी, व्यवहार,भावना और दृष्टिकोण आदि के माध्यम से प्रकट होता है।

शिक्षक आजीवन विद्यार्थी है

पढ़ना और पढ़ाना में मूल क्रिया पढ़ना है। विद्वान अपने आपको “मैं गणित का विद्यार्थी हूँ” अथवा “मैं विज्ञान का विद्यार्थी हूँ” कहते हुए अपना परिचय देने में गौरव का अनुभव करते हैं। शिक्षक होना विद्यार्थी होने का एक अंश है। व्यक्ति शिक्षक नहीं होगा तब भी वह विद्यार्थी तो होगा ही। व्यक्ति लेखक होगा, चिंतक होगा, वक्ता होगा या अनुसंधानकर्ता होगा तब भी वह विद्यार्थी तो होगा ही। इसका यह अर्थ है कि शिक्षक न होने पर भी विद्यार्थी तो होगा ही, परन्तु विद्यार्थी के न होने पर शिक्षक नहीं होगा। अत: शिक्षक सदैव विद्यार्थी होता ही है।

अध्ययन केन्द्रवर्ती है

समग्र शिक्षातंत्र की रचना अध्ययन क्रिया को केन्द्र में रखकर की जाती है, अध्यापन क्रिया को नहीं। यदि शिक्षातंत्र की रचना अध्यापन क्रिया को केन्द्र में रखकर की जायेगी तो तंत्र का केन्द्र ही बदल जायेगा, परिणाम स्वरूप अनवस्था निर्माण हो जायेगी। अध्ययन का स्थान केन्द्रवर्ती है, यह कहने का सीधा-सीधा अर्थ है कि अध्ययन के केन्द्र में विद्यार्थी है, अत: विद्यार्थी का स्थान केन्द्रवर्ती है। जब विद्यार्थी केन्द्र में होता है, तब उसकी आवश्यकता, उसकी क्षमता, उसकी पद्धति, उसकी गति, उसकी स्थिति को आधार बनाकर अध्ययन की योजना की जानी चाहिए।

अध्ययन समग्रता में होता है

अध्ययन सदैव समग्रता में होना चाहिए। आज अध्ययन खण्ड-खण्ड में करने का प्रचलन हो गया है। उदाहरण के लिए शिक्षक रोटी के बारे में बता रहा है तो आहारशास्त्र, कृषिशास्त्र, वनस्पतिशास्त्र, पाकशास्त्र और अर्थशास्त्र को जोड़कर ही पढ़ाना चाहिए। केवल आहारशास्त्र या अर्थशास्त्र को अलग-अलग टुकड़ों में पढ़ाना ठीक नहीं। इसी तरह आहारशास्त्र की बात हो तो सात्त्विकता, पौष्टिकता, स्वादिष्टता, उपलब्धता व सुलभता आदि सभी आयामों को एक साथ बताना चाहिए तथा भोजन बनाने की कुशलता भी सिखानी चाहिए। समग्रता में सिखाना अत्यन्त सहज है, इसे विशेषरूप से बताने की आवश्यकता नहीं रहती, किन्तु आज का पढ़ाना इतना खण्ड-खण्ड में हो गया है कि समग्रता की बात को आग्रह पूर्वक बताना पड़ता है। समग्र अध्ययन से ही सम्पूर्ण व्यक्तित्व का निर्माण होता है।

आज हम ऐसे व्यक्तित्व से परिचित होंगे जो शिक्षक के साथ-साथ आजीवन विद्यार्थी बने रहे, और जिन्होंने समग्र अध्ययन किया –

ईश्वरचन्द्र विद्यासागर

इनका नाम था ईश्वरचन्द्र, जन्म बंगाल के मेदिनीपुर जिले के वीरसिंह ग्राम में 26 सितम्बर, 1820 को हुआ था। श्री ठाकुरदास वंद्योपाध्याय इनके पिता एवं भगवती देवी इनकी माँ थीं। इन्हें पढ़ने हेतु संस्कृत कॉलेज में भर्ती कराया गया। स्वयं निर्धन परिवार के होते हुए भी विद्यालय से मिलने वाली छात्रवृत्ति की राशि गरीब विद्यार्थियों में बाँट देते थे। रात में सड़क पर लगी गैस बत्ती के प्रकाश में पढ़ाई करते थे। इन्होंने कुछ ही वर्षों में – व्याकरण, काव्य, वेदान्त, स्मृति, न्याय एवं ज्योतिष में विशारद तथा सर्वशास्त्रों में दक्षता प्राप्त कर ली। अत: लोगों ने इन्हें विद्यासागर की उपाधि प्रदान की, उसी दिन से इनका नाम ईश्वरचन्द्र विद्यासागर हो गया। आजीवन विद्यार्थी बने रहकर सचमुच में ये “विद्या के सागर” बन गये।

उनके समय पहले से चली आई परम्परा के अनुसार संस्कृत केवल ब्राह्मण विद्यार्थी ही पढ़ सकते थे, किन्तु इन्होंने सबको संस्कृत पढ़ाना शुरु किया। संस्कृत केवल ब्राह्मणों के लिए नहीं सबके लिए है,ऐसी समता मूलक व्यवस्था स्थापित की। इन्होंने संस्कृत को सरल बनाने के लिए व्याकरण में “उपक्रमणिका” एवं “व्याकरण कौमुदी” नामक दो ग्रन्थ लिखे। बाँग्ला भाषा को सरल बनाने के लिए “वर्ण परिचय” पुस्तक लिखी। इनके साथ-साथ ‘वेताल पंचविंशती’, ‘शकुन्तला’, ‘सीता वनवास’, ‘भ्रान्ति विलास’ नाम की पुस्तकें भी लिखी।

वे देशभर के गाँव-गाँव में विद्यालय खोलना चाहते थे। सन् 1855 के अगस्त से लेकर जनवरी 1856 तक मात्र 6 माह में 20 आदर्श विद्यालयों की स्थापना की। आपने बालिका शिक्षा की ओर विशेष ध्यान दिया। सन् 1857 में 7 माह में आपने विभिन्न स्थानों पर 35 बालिका विद्यालय शुरु कर दिये। इन विद्यालयों के लिए एक हजार रुपये का मासिक व्यय भी स्वयं ही वहन करते थे।

जीवन भर स्वयं अध्येता बने रहे, पढ़ने व पढ़ाने का काम करते-करते “यथा नाम तथा गुण” की उक्ति चरितार्थ की। उनका सम्पूर्ण जीवन विद्या की सेवा करते-करते विद्या का सागर बन गया। अन्त में 26 जुलाई 1891 में इस आजीवन विद्यार्थी ने अपनी इहलीला सम्पूर्ण की।

(लेखक शिक्षाविद् है, भारतीय शिक्षा ग्रन्थमाला के सह संपादक है और विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान के सह सचिव है।)

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