भक्त कवि नरसिंह महेता

 – अनिल रावल

ईसा की 15वीं सदी में हुए गुजरात के कवि नरसिंह महेता ‘आदि कवि’ के नाम से जाने जाते है। लोकहृदय में उनका स्थान आदि कवि का है। नरसिंह लोकपूज्य भक्त थे। उनके पदों में कृष्णभक्ति के दर्शन होते हैं। नरसिंह महेता एक ऐसा नाम है, जिन्होंने पूरे भारतवर्ष में ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में गुजरात का नाम रोशन किया है। पूज्य गांधी बापू ने उनका भजन ‘वैष्णव जन तो तेने कहिए…’ को अपने जीवन में महत्त्व का स्थान दिया था। हमारी संस्कृति में जो ज्ञान की उज्ज्वल परंपरा है, उसको उन्होंने आगे बढ़ाई है। हमारे देश में रामानंद, कबीर, नानक, नामदेव, सूरदास, तुकाराम, तुलसी, मीरां जैसे कवियों के साथ गुजरात का नरसिंह महेता का नाम भी आता है। उन्होंने करीब 900-1000 भक्ति पदों की रचनाएँ की है जो आज भी लोकहृदय में बसी हुए है। गुजरात में आज भी उनके बहुत सारे पद बड़े आदर के साथ गाए जाते हैं।

जीवन और कवन

इतिहास में नरसिंह के जन्म की कोई ठोस दिनांक मिलती नहीं है। उनके समकालीन या अनुगामीयों द्वारा भी उनके जन्म और मृत्यु की तिथि के कोई संकेत प्राप्त नहीं होते है। किन्तु उनकी रचनाओं में किए गए उल्लेख से 15वीं सदी की जानकारी है। नरसिंह महेता का जन्म गुजरात के सौराष्ट्र में तलाजा नामक गांव में हुआ था। उनका वतन जूनागढ़ था। वे वडनगरा नागर ब्राह्मण थे। उनकी कुल परंपरा में शैव धर्म पाला जाता था। बचपन में ही माता और पिता का देहांत हो गया था। नरसिंह अपने बड़े भाई और भाभी के साथ रहते थे। एक बार भाभी ने ताना मारा इससे व्यथित होकर नरसिंह घर छोड़कर वन में चले गये। वन में भगवान महादेव की उपासना की। भगवान शंकर उन पर प्रसन्न हुए। भगवान शंकर ने उनको श्रीकृष्ण की रासलीला का दर्शन करवाया, तब से नरसिंह महेता कृष्णमय हो गए और कृष्ण के अनन्य भक्त बन गए।

पुत्र विवाह की पदमाला के पदों से उनके भक्त जीवन और उनकी भक्ति कविता के आरंभ के संकेत मिलते है। हरि और हर के दर्शन करके वापस आया हुआ युवा नरसिंह संसार-विरक्त और प्रभुमस्त बनकर जूनागढ में अपनी गृहस्थी का आरंभ करते है। हृदय से गोपी बनकर श्रीकृष्ण का शरण स्वीकार कर नचिंत भाव से प्रभुकीर्तन में व्यस्त रहते थे। उनकी पत्नी का नाम माणेकबाई था। उनको एक बेटा और एक बेटी थी। बेटे का नाम शामळदास और बेटी का नाम कुंवरबाई था। शामळदास का विवाह वडनगर के मदन महेता की पुत्री के साथ हुआ था। अपनी पुत्री कुंवरबाई का विवाह ऊना/मांगरोळ के श्रीरंग महेता के पुत्र के साथ हुआ था। कुंवरबाई के सीमंत के पूर्व नरसिंह महेता की पत्नी और पुत्र का अवसान हुआ था इससे नरसिंह का मन संसार में से उठ गया।

नरसिंह महेता के जीवन में कुछ ऐसी घटनाएं घटी हैं जिसमें उनको जो जो सहाय मिली वह ईश्वर का चमत्कार था ऐसा माना जाता है। नरसिंह महेता के जीवन में कुंवरबाई का मामेरा, पिता का श्राद्ध, अपने पुत्र शामळदास का विवाह, द्वारिका के सेठ पर लिखी हुई हूंडी का स्वीकार और जूनागढ़ के राजा रा’ मांडलिक द्वारा की हुई कसौटी में नरसिंह के गले में हारमाला का रोपण जैसे प्रसंग पर भगवान श्रीकृष्ण ने ही मदद की ऐसा माना जाता है।

युवान पुत्र और पत्नी की मृत्यु एवं समाज के द्वारा होती हुई परेशानी से नरसिंह महेता विचलित नहीं हुए। ईश्वर से मिली हुई मदद ने नरसिंह की मूर्ति को लोकहृदयमें अंकित कर दी है। इस बातों ने लोकहृदय की आस्तिकता को पुष्टि की है और ईश्वर श्रद्धा को दृढ़ बनाकर भक्तिभाव का संवर्धन किया है।

समरसता का जीवंत दृष्टांत

आज से पांच सदी पूर्व समाज में छूताछूत का दूषण व्याप्त था। लोग हरिजनों से अंतर रखते थे। नरसिंह महेता नागर ब्राह्मण थे। ब्राह्मण के लिए हरिजन की बस्ती में जाना तो क्या उनको छूने का भी सोच नहीं सकते थे। कृष्ण-दर्शन के बाद नरसिंह महेता के हृदय में सभी के प्रति करुणा छलकती थी। हरिजनों की बस्ती में भजन-कीर्तन का न्यौता मिलने पर नरसिंह हरिजन की बस्ती में गये। रातभर प्रभुभजन करते रहे। अपने समाज के लोगों को जब मालूम पड़ा तो नरसिंह की बहुत टीका की। नरसिंह को परेशान किया गया फिर भी नरसिंह जलकमलवत् रहे। वे हरिजनों के बीच भजन के लिए जाते रहे। पांच सौ वर्ष पहले यह करना बड़ा साहस था। करुणामय नरसिंह जात-पात के भेदभाव से परे थे। उन्होंने सामाजिक समरसता का उत्कृष्ट दृष्टांत समाज के समक्ष रखा था।

कृति और कर्तृत्व

गुजरात के जानेमाने साहित्यकार श्री कृष्णलाल झवेरी जैसे विद्वान ने नरसिंह महेता को गुजराती भाषा का ‘आदिकवि’ माना है। लेकिन नरसिंह के पहले भी सर्जक हुए है, इसलिए नरसिंह महेता पहले वैष्णव भक्त कवि और ज्ञानकवि थे ऐसा कहने में कोई संदेह नहीं है।

नरसिंह महेता के सर्जन में ‘शामळदास का विवाह’, ‘सुदामा चरित्र’, ‘चातुरीओं’, वसंत के पदों, हिंडोले के पदों, शृंगालमाला, श्रीकृष्ण जन्म और उनकी बाल लीलाओं के पदों का समावेश होता है। नरसिंह के पदों प्रभातियां के नाम से प्रचलित है। प्रभातियां याने प्रभात के समय गाये जानेवाले पद। श्रीकृष्ण की लीला का गान उनकी रचना में केन्द्रस्थ रहा है। बाल कृष्ण की चांदा के लिए की गई जीद, माखनचोरी, उनके तूफान, स्वभावोक्ति और वात्सल्यपूर्ण माधुर्य के कारण उनके काव्य आस्वाद्य और आह्लादक बने हुए है।

युवावस्था में ‘भागवत’ और ‘गीत गोविंद’ का असर नरसिंह महेता के पदों में दिखाई देता है। मध्यावस्था के बाद उपनिषद और अद्वैत सिद्धांत का ज्ञान उनके पदों में दिखाई पड़ता है। ज्ञान और बोधदायक पदों की रचना नरसिंह को अनन्य भक्त होने के साथ साथ कुशल कवि स्थापित करते है। नरसिंह ने अपने पदों में तत्त्वज्ञान की गहन बातें सहजता से प्रस्तुत की है।

नरसिंह महेता अच्छे गायक या अच्छे संगीतज्ञ थे या नहीं उसकी जानकारी नहीं है। लेकिन उनके पदों में शास्त्रीय रागों और छंदो का विपुल वैविध्य भावक को प्रभावित करने में पूर्णतः सफल है। उनके पदों में ज्यादातर झूलणा छंद का उपयोग किया गया है। शब्द और लय की लचक के कारण उनकी रचनाएं गेय है। शब्दालंकार के साथ-साथ अर्थालंकार का विनियोग नरसिंह महेता के कवि-कर्तृत्व का परिचायक है। चंद शब्दो में पूरी घटना या चित्र को प्रस्तुत करने की लाघव कला उनको सिद्धहस्त है। प्रभाती, केदारो, मल्हार, आशावरी, भैरव, वसंत-पंचम,मालव जैसे शास्त्रीय रागों में की गई पद-रचना वास्तव में श्रीकृष्ण की अनन्य भक्ति ही है।

नरसिंह महेता ने सुदामा की कथा को ‘सुदामा चरित्र’ में आलेखित की है। गुजराती साहित्य में सुदामा विषयक यह पहली काव्य रचना है। एक कथा की अनेक पदों में प्रस्तुति के कारण गुजराती साहित्य में नरसिंह आख्यान का बीज रोपनेवाले कवि है।

नरसिंह महेता की कुछ लोकप्रिय पंक्तियाँ –

जागीने जोउं तो जगत दीसे नहीं ऊँघमां अटपटा भोग भासे

अखिल ब्रह्मांडमां एक तुं श्री हरि, जूजवे रूपे अनंत भासे

आद्य तुं, मध्य तुं, अंत्य तुं, श्री हरि

सुखदःख मनमां न आणीए, जे गमे जगत गुरुदेव जगदीशने

जळकमळ छांडी जाने बाळा, स्वामी अमारो जागशे

नीरखने गगनमां कोण घूमी रह्यो? तेज हुं तेज हुं शब्द बोले

ज्यां लगी आतमा तत्त्व चीन्यो नहीं त्यां लगी साधना सर्व जूठी

आजनी घडी रळियामणी रे, जागने जादवा! कृष्ण गोवाळिया! तुज विना धेनमां कोण जाशे?

भोळी रे भरवाडण हरिने वेचवा चाली सोळ सहस्र गोपीनो वहालो मटुकीमां घाली

आज भी जूनागढ में मजेवडी दरवाजा के पास ‘नरसिंह महेता का चोरा’ है। मांगरोळ में एक स्थान को ‘नरसिंह का श्मशान’ कहा जाता है। तलाजा की टेकरी में ‘नरसिंह महेता की शाला’ के नाम से गुफा है।

नरसिंह महेता की याद में 1999 से आद्य कवि नरसिंह महेता साहित्य निधि ट्रस्ट द्वारा गुजराती भाषा के श्रेष्ठ कवि को नरसिंह महेता अवार्ड दिया जाता है। नरसिंह महेता के जीवन पर 1932 में गुजराती भाषा का प्रथम चलचित्र ‘नरसिंह महेता’ बना था। ‘नरसैंयो’ नामक गुजराती धारावाहिक दूरदर्शन पर प्रसारित हुआ था।

भक्त कवि के रूप में नरसिंह महेता आज भी जीवित है।

(लेखक अहमदाबाद-गुजरात से प्रकाशित ‘संस्कार दीपिका’ गुजरती पत्रिका के संपादक है।)

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