हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की गंगा के भागीरथ पंडित विष्णु नारायण भातखंडे

 – डॉ० अशोक शर्मा

जिस समय संगीत राजदरबारों की दीवारों के पीछे कैद था तथा जनसाधारण के लिए सुगमता से उपलब्ध न होकर घरानो की सीमाओं में जकड़कर उस्तादों की इच्छा पर निर्भर था कि कौन संगीत शिक्षा का पात्र है कौन नहीं। ऐसे समय में शिक्षण संस्थानों में संगीत को विषय रूप में सम्मिलित करने के पुनीत कार्य का श्रेय पंडित विष्णु नारायण भातखंडे को जाता है। इसका लाभ उन पात्र विद्यार्थियों को मिला जो संगीत सिखने के इच्छुक होते भी संगीत शिक्षा से वंचित थे। इससे संगीत शिक्षण की गंगा धारा को नई गति मिली। एक तरफ घरानेदार पद्धति में साधारण जनता के बीच से संगीत उत्सुक विद्यार्थियों के लिए मार्ग खुलने लगे दूसरी ओर संगीत प्राथमिक शिक्षण संस्थानों से लेकर उच्च शिक्षण संस्थानों में विषय के रूप में उपलब्ध होने से शिक्षण की आधुनिक मुख्य धारा में सम्मिलित हो गया। इस महान कार्य के सूत्रधार, हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की गंगा को जन सामान्य के मध्य प्रवाहित करने वाले भागीरथ पंडित विष्णु नारायण भातखंडे का जन्म 10 अगस्त 1860 को श्री कृष्ण जन्माष्टमी के दिन बम्बई में हुआ। जिस प्रकार भगवान श्री कृष्ण ने गीता संदेश के माध्यम से उत्तम जीवन जीने का ढंग सिखाया उसी प्रकार पंडित भातखंडे ने जीवन में संगीत शिक्षण के नए मार्ग प्रशस्त किए।

पंडित भातखंडे की प्रारंभिक शिक्षा मुंबई में एटिफस्तन हाई स्कूल में हुई तत्पश्चात डक्केन कॉलेज पुणे में हुई। स्नातक उत्तीर्ण करने के साथ एल.एल.बी. की और वकालत को व्यवसाय के रुप में चुना। औपचारिक शिक्षा के साथ-साथ सितार की शिक्षा श्री वल्लभदास आचार्य से प्राप्त की। इसके पश्चात् श्रीबेलवागकर, मियां अली हुसैन खां तथा विलायत हुसैन से कंठ संगीत की शिक्षा ग्रहण की। संगीत के प्रति गहरी आस्था होने से कारण सफल अधिवक्ता का व्यवसाय त्यागकर शेष पूर्ण जीवन संगीत की दशा और दिशा में सुधार लाने की प्रक्रिया में लगा दिया।

पंडित भातखंडे जी को सर्वप्रथम संगीत में रूचि दिलाने वाली माता जी ही थी। माता जी के कंठ निकली हुई सुमधुर लोरियाँ भजन आदि सुनकर इस बालक को अपने जीवन कार्य की प्रेरणा मिलती रही। पंडित भातखंडे जी भजनों को बड़े ध्यान से सिर्फ सुनते ही नहीं थे उनको अपनी तोतली बोली में गाते भी थे। माता जी के कंठ से निकले हुए मधुर गीतों को सुनते-सुनते बालक गजानन के कान स्वरों से खूब परिचित हो गए। माता जी के गाये हुए सभी गीत इस बालक को कंठस्थ हुए और वो इसे मराठी प्राथमिक  पाठशाला में इन्हें गाने लगे। अपने सस्वर गायन पर उन्होंने अनेक बार पारितोषित भी पाए। 10-12 वर्ष की अवस्था में पंडित भातखंडे जी को बांसुरी सीखने का शौक लगा तथा बांसुरी बजाने में उन्होंने पर्याप्त प्रगति भी की।

सन् 1885 में बी.ए तथा 1887 में वे एल.एल.बी उत्तीर्ण करके एक वर्ष तक उन्होंने कराची हाईकोर्ट में वकालत भी की। तत्पश्चात भातखंडे जी बम्बई लौट आए और यहीं पर वकालत करने लगे विशेषतया फ़ौजदारी के मामलों में प.भातखंडे जी की वकालत बहुत सफल रही, क्योंकि वे तर्क-वितर्क में बहुत कुशल थे। वकालत का व्यवसाय केवल जीवन-यापन के लिए करते हुए संगीत की सेवा में लगे रहे।

उस समय बम्बई में ‘गायन उत्तेजक मंडल’ के नाम से एक संगीत संस्था चल रही थी। उस समय में बम्बई के पारसी लोग हिंदुस्तानी रागदारी संगीत के बड़े प्रेमी एवं आश्रयदाता थे। ‘गायन उत्तेजक मण्डली’ संगीत में रुचि रखने वाले कुछ ऐसे ही धनी पारसी सेठों की चलाई हुई संस्था थी। बम्बई आए हुए बड़े-बड़े गुणी गायक-वादकों के कार्यक्रम उनको यथायोग्य पुरस्कार देकर इस संस्था में आयोजित किए जाते थे। संस्था का मुख्य उद्देश्य ही यह था कि उच्च श्रेणी का गायन वादन लोगों के सुनने को मिले। इसी क्रम में पंडित भातखंडे जी ने अनेक स्थानों पर सहभागिता की और पुरस्कार प्राप्त किए। अपना सम्पूर्ण जीवन सांगीतिक कार्यों के लिए अर्पण करने का निश्चय इसी समय किया।

संगीत का क्रियात्मक एवं शास्त्रीय अभ्यास करने के पश्चात भी जब पंडित जी को कोई संतोष प्राप्त न हुआ, जब उन्होंने संगीत शास्त्र के अनुसंधान की दृष्टि से समस्त भारत की यात्राएं करना आरंभ किया। सर्वप्रथम पंडित भातखंडे जी ने पश्चिम में गुजरात, काठियावाड़ की यात्रा की। सूरत, भरूच, बड़ोदा, नवसारी, अहमदाबाद, राजकोट, बीकानेर, जामनगर, जूनागढ़ एवं भावनगर आदि नगरों में भी हो आये। तत्पश्चात उनकी दूसरी यात्रा सन 1904 में दक्षिण की हुई। जिसमे उन्होंने मैसूर, मद्रास, तंजौर, मदुरई, त्रिवेंद्रम, इटैयापुरम, रामेश्वरम, बैंगलोर आदि शहरों में जाकर वहां के संगीत विद्वानों के साथ संगीत पर चर्चा की और दक्षिणात्य सगीत प्रणाली का पर्याप्त ज्ञान प्राप्त किया। विशेषतया इटैयापुरम में भी सुब्रह्मण्यम दिक्षित से उनको पंडित व्यंकटमुखी की मेल पद्धति का ज्ञान प्राप्त किया। पंडित व्यंकटमुखी की ‘चतुर्दण्डिप्रकाशिका’ का हस्तलेख भी पंडित जी को यही से प्राप्त हुआ इसके अतिरिक्त आपने रामामात्य का ‘स्वरमेल कलानिधि’, तंजौर के तुलाजीराव भौसले का ‘संगीत सारामृतोद्वार’, ‘राग लक्ष्णम्’ इत्यादि हस्तलिखित ग्रन्थ तंजौर, मैसूर एवं मद्रास के पुस्तकालयों से प्राप्त किये और उन्हें बाद में प्रकाशित भी किया।

इलाहाबाद, मथुरा तथा दिल्ली में पंडित भातखंडे के विद्वानों के साथ बड़े विचित्र अनुभव हुए। इस यात्रा में भी उन्होंने गुणी गायक वादकों के कार्यक्रम सुनें तथा उनके साथ राग-रूपों पर भी पर्याप्त चर्चा की। उदयपुर में उन्होंने जकिरूद्दीन खां एवं उनके भाई अल्हाबंदे खां का ध्रुवपद गान जी भर कर सुना तथा उनके गायन की विशेषताओं को अपनी स्मृति में रख लिया ताकि वे स्वयं इस  शैली का अपने गायन में प्रयोग कर सकें।

संगीत ग्रंथ का अध्ययन, क्रियात्मक संगीत की शिक्षा एवं अभ्यास तथा संगीत अनुसंधानार्थ भारत भर की यात्राएं समाप्त करके पंडित भातखंडे जी ने सन् 1909 में चिरस्मरणीय संगीत ग्रन्थ ‘श्रीमल्लक्षय संगीतम्’ का लेखन आरंभ किया। ग्रंथ के आरंभ में उन्होंने उपनाम ‘भातखंडे’ का संकेत दिया। कुछ समय पश्चात् पंडित भातखंडे जी ने ‘गीत मलिका’ नाम से अपनी संग्रह की हुई रागदारी चीजों को स्वरलिपि सहित छपवाकर प्रकाशित करना आरम्भ किया। हर महीने में एक भाग प्रकाशित होता था तथा एक भाग में 25 चीजें रहती थी। इस गीत मालिका के सन् 1916 से 1923 तक 23 भाग प्रकाशित हुए थे तथा सबकों मिलाकर लगभग साढ़े पांच सौ चीजें स्वरलिपि सहित प्रकाशित हुई थी।

पंडित भातखंडे जी से पूर्व संगीत शास्त्र की स्थिति बिल्कुल अस्त-व्यस्त थी। परंतु भातखंडे जी के प्रयत्नों से इसका निवारण होना आरम्भ हो गया। रागों का जैसा विवरण पंडित भातखंडे जी ने उपलब्ध कराया है वैसा किसी कलाकार ग्रंथकार द्वारा नहीं किया गया। पंडित भात खंडे जी के अथक प्रयास से उत्तर भारत में एक व्यवस्थित पद्धति स्थापित हुई। इससे पहले उत्तर भारत में संगीत शास्त्र सम्बन्धी कई महत्वपूर्ण बिंदुओं पर अधिक कुछ उपलब्ध नहीं था परंतु पंडित भातखंडे जी के प्रयत्नों से यह संभव हो पाया है जैसे- शुद्ध सप्तक, राग रूप, बंदिशों के स्वर एवं शब्द, सगीत का पाठ्यक्रम एवं उसकी शिक्षण प्रणाली, राग-वर्गीकरण, वादी-संवादी, रागों का गायन समय आदि।

गीत रचना के रूप में पंडित भातखंडे जी ने जो कुछ किया है वह भी उनकी संगीत सेवा का एक अदभुत उदहारण है। नए-नए गीत रचकर अपने पूर्व आचार्यों से स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध करने का उनका उद्देश्य कदापि नहीं था। जिन गीतों की स्वर रचना पर वे आकर्षित हुए परंतु शब्द रचना ठीक नहीं लगी, वहां पर उन्होंने नवीन शब्द रचना का प्रयास किया। इसके अतिरिक्त पंडित भातखंडे जी द्वारा सैकड़ों लक्षणगीतों की रचना भी संगीत की एक अन्य विस्मृत परम्परा को पुनर्जीवित करने का तथा अपने संगीत सिद्धांतों को पेशेवर गायक-वादकों एवं सभी संगीत विद्यार्थियों तक पहुँचाने का उनका सहज सुलभ पर प्रभावशाली प्रयास था।

सन् 1916 से लेकर 1925 की कालावधि में पंडित भातखंडे जी के नेतृत्व में अखिल भारतीय संगीत परिषद के पांच अधिवेशन क्रमश: बड़ौदा, दिल्ली, बनारस एवं अंतिम दो लखनऊ में संपन्न हुए। इस परिषद के वे स्थाई सचिव थे। इन संगीत परिषदों में उच्च परंपरा के प्राय: सभी गायक-वादक एकत्रित हुए और संगीत विषयक चर्चा, वाद विवाद के पश्चात एकमत होकर कुछ निर्णय भी लिए गए। सारंग, मलहार, तोड़ी, कान्हड़ा, बिलावल के विभिन्न प्रकारों पर एकमत होकर निर्णय लिए गए। स्वरलिपि, थाट-राग, वर्गीकरण, रागांग राग-वर्गीकरण आदि पर खूब चर्चा हुई और पंडित भातखंडे जी के कार्यों का सभी गायक-वादकों ने मुक्तकंठ से समर्थन किया। शिक्षा के क्षेत्र में पंडित भातखंडे जी का संबंध मुख्यत: तीन संगीत विद्यालय से है। बड़ौदा शासकीय विद्यालय, ग्वालियर का माधव संगीत महाविद्यालय तथा लखनऊ का मैरिज कॉलेज ऑफ हिन्दुस्तानी म्यूजिक स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।  ग्वालियर तथा लखनऊ के विद्यालय को तो पंडित भातखंडे जी ने ही स्थापित किया था।

सन् 1917 में भारत धर्म मंडल ने उन्हें ‘संगीत कलानिधि’ की महानतम् उपाधि से विभूषित किया। सन् 1924 में ग्वालियर में माधव राव सिंधिया ने पंडित भातखंडे जी का वस्त्रादि से सम्मान किया। सन् 1930 में ग्वालियर के माधव संगीत महाविद्यालय के वार्षिक दीक्षांत समारोह पर राज्य सरकार की ओर से अभूतपूर्व सम्मान किया गया।

सन 1936 की सितंबर मास की 19 तारीख को गणेश चतुर्थी के दिन प्रात:काल संगीत संसार के युगप्रवर्तक सदा के लिए विदा हो गए।

विष्णु नारायण भातखंडे है तो एक व्यक्ति का नाम परंतु अपने योजनापूर्ण कार्यों द्वारा वे स्वयं एक विशाल संस्था के रूप में संगीत के इतिहास में चिर स्मरणीय हो गए। जीवन के अंतिम क्षण तक संगीत सेवा में लगे रहे । पंडित विष्उणु नारायण भातखंडे का नाम आते ही भारतीय संगीत का सौ-डेढ सौ वर्षों का साक्षात चित्र ही  सामने खडा हो जाता है। व्यवसाय से वकील होते हुए भी भारतीय संगीत के प्रति उनकी अनन्य सेवाओं को समाज चिरकाल तक याद रखेगा।

(लेखक कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के संगीत एवं नृत्य विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर है।)

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