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	<title>दिलीप बेतकेकर, Author at राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन rashtriyashiksha.com</title>
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	<title>दिलीप बेतकेकर, Author at राष्ट्रीय शिक्षा : शिक्षा में समाज प्रबोधन rashtriyashiksha.com</title>
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		<title>जिद्दी – बालक भी और पालक भी</title>
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		<dc:creator><![CDATA[दिलीप बेतकेकर]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 11 Feb 2020 06:54:02 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अभिभावक शिक्षा]]></category>
		<category><![CDATA[दिलीप बेतकेकर]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>-दिलीप वसंत बेतकेकर दो अभिभावक आपस में मिलें! दोनों की समस्या एक सी ही थी। बच्चे जिद्दी हैं! उनका जिद्दी स्वभाव कैसे नियंत्रित करें, यही उनकी चिंता! “हम उन्हें जो&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: right;">-दिलीप वसंत बेतकेकर</p>
<p><img fetchpriority="high" decoding="async" class="wp-image-1079 aligncenter" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2020/02/parents१-300x183.jpg" alt="" width="546" height="333" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2020/02/parents१-300x183.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2020/02/parents१-768x469.jpg 768w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2020/02/parents१.jpg 900w" sizes="(max-width: 546px) 100vw, 546px" /></p>
<p>दो अभिभावक आपस में मिलें! दोनों की समस्या एक सी ही थी। बच्चे जिद्दी हैं! उनका जिद्दी स्वभाव कैसे नियंत्रित करें, यही उनकी चिंता!</p>
<p>“हम उन्हें जो चाहिए उपलब्ध कराते हैं। फिर भी पढाई के नाम से&#8230;..” दोनों में से एक पालक कह रहे थे।</p>
<p>“अब देखिये न, मेरी लड़की रिस्टवाच के लिए जिद करने लगी इसलिए एक हज़ार रूपये की नई रिस्टवाच उसे खरीदकर दी, किन्तु चार दिन में उसने घडी खो दी, अब क्या करें?”</p>
<p>मेरा अनुमान था कि लड़की दसवीं या ग्यारवीं में पढ़तीं होगी। मैंने पूछ ही लिया – “कौन सी कक्षा में पढ़तीं है लड़की?”</p>
<p>‘सातवी कक्षा में’, पालक बोले।</p>
<p>अब सातवीं कक्षा में पढने वाली लड़की को इतनी अधिक कीमत की घडी खरीदकर देना आवश्यक है क्या? ये विचार पालक को करना चाहिए न! और यदि वास्तव में वह आवश्यक है भी तो क्या उसे दु:खी देखकर हमें अच्छा न लगने से कम कीमत वाली इलेक्ट्रॉनिक घड़ी भी तो खरीदकर दी जा सकती है।</p>
<p>किन्तु अत्यधिक अंध प्रेम के कारण बच्चों द्वारा मांगी गई प्रत्येक वस्तु उन्हें उपलब्ध कराने वाले पालक अनजाने ही स्वयं का और साथ ही बच्चों का अहित करते हैं। वास्तव में आवश्यकता किस वस्तु की है इस बात का अनुमान पालक लगाने के लिए प्रयासरत रहें तो पैसों के अपव्यय से बचा जा सकता है। बच्चे भी बिगड़ने से बचेंगे और घर का माहौल भी स्वस्थ रहेगा।</p>
<p>इस हेतु बच्चों से बातचीत, चर्चा करना आवश्यक होगा। <strong>केवल संवाद ही नहीं, सुसंवाद!</strong></p>
<blockquote><p><strong>बच्चों के साथ क्या चर्चा करें, ये सवाल किसी के मन में उभर सकता है। बच्चों के साथ यदि संयम से, शांति से बात करें, कोई बात शांति से उन्हें समझा दी जाए तो अनेक बार वे मान जाते हैं। यदि हम ये पद्धति दस बार अपनाएं तो दसवीं बार तो वे अवश्य बात मान लेंगे। ये बात उनके गले उतरेगी अथवा नहीं ये कहना कठिन है, किन्तु वे मान जायेंगे तो कुछ हद तक तो अपना मानसिक तनाव कम होगा ही!</strong></p></blockquote>
<p>&#8230;&#8230;. अभी-अभी परसों की ही घटना! हमारे सुपुत्र किसी मित्र के घर गये थे। वहां उसने एक गुड्डा (खिलौना)  देखा। अब उसी प्रकार का गुड्डा लेने हेतु वह जिद करने लगा। वह खिलौना ‘कॉम्प्लान’ के डिब्बे के साथ ‘भेंट’ के रूप में था। अब हमारे पुत्र ‘कॉम्प्लान’ लेने की जिद करने लगे। एक तारीख को लेंगे कहकर उसे सांत्वना दी। किन्तु पहली तारीख आते ही, याद से उसने उस वस्तु की मांग दोहराई। अब विचार करना आवश्यक हो गया। बाज़ार जाकर पूछताछ करने पर पता चला कि एक किलो वाला डब्बा क्रय करने पर ही वह गुड्डा साथ में मिलेगा। खरीद भी सकते थे, किन्तु वह अनुपयोगी ही रहता। घर पर इसके पूर्व क्रय किये ‘कॉम्प्लान’, ‘बोर्नविहटा’  आदि के डिब्बे भी अनुपयुक्त होकर पड़े थे। कारण बच्चों को वे पेय पसंद नहीं थे। केवल गुड्डा मिलेगा इस दृष्टि से ही बच्चे को डिब्बा खरीदना था।</p>
<p>‘मैं नहीं खरीदूंगा’ ऐसा कहकर उसे मैं डांटता तो वह रोता, चिल्लाता, गुस्सा हो जाता, जिद करता! “पिता मेरी पसंद की वस्तु कभी देते नहीं’’ ऐसी भावना उसमें निर्मित होती। अनचाहे ही घर का माहौल, इन घटनओं से दूषित हो जाता।</p>
<p><strong>बच्चों से चर्चा करके निर्णय लेना ये है मेरी पद्धति!</strong> इससे ‘पिताजी सदैव एक तरफ़ा निर्णय लेते हैं’ ऐसी धारणा बच्चों में नहीं पनपती! निर्णय में दोनों ही सहभागी रहने से निर्णय का पालन करने की जिम्मेदारी भी बच्चे समझते हैं।</p>
<p>मैंने पूछा, “तुम्हे ‘कॉम्प्लान’ चाहिए अथवा ‘गुड्डा’? ‘कॉम्प्लान’ न लेते हुए केवल ‘गुड्डा’ लेना पसंद करोगे?’’</p>
<p>थोड़ी सी चर्चा पश्चात् वह केवल ‘गुड्डा’ लेने को राज़ी हुआ -‘कॉम्प्लान’ तो उसे नापसंद था ही। हम बत्तीस रूपये में गुड्डा खरीदकर घर लौटे! घटना छोटी सी, छुटपुट सी! किन्तु आपस में थोड़ी चर्चा की और अमेय ने भी अपनी जिद छोड़ दी।</p>
<p>बच्चे जिद्दी हैं कहने वाले पालकगण भी कभी-कभी जिद्दी बन जाते हैं, इस बात का विचार पालकगण शायद ही करते होंगे! केवल बात टालने के हेतु से बच्चों को झूठा वायदा कर समझना उचित नहीं है। जब किसी कार्य को हम करेंगे, ऐसा पालक कहें तब वह कार्य को हम करेंगे, ऐसा पालक कहें तब वह कार्य अवश्य करना चाहिए अन्यथा बच्चों पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। कोई बात यदि हमारे बस की नहीं है ऐसा हमें विश्वास है तो उस बात को करने का झूठा आश्वासन बच्चों को देना आवश्यक है।</p>
<p>उनकी मनचाही वस्तु वह उन्हें आवश्यक न हो पालक सदैव उपलब्ध कराते हैं ऐसी धरना बच्चों में बनने पर जिद्दी बनने की संभावना अधिक रहती है। अनेक पालकगण बच्चों को बेवजह लाड-प्यार देकर उन्हें बिगाडते हैं। भावी जीवन में उनकी अपेक्षानुसार कार्य बना तो वे हताशा का शिकार हो जाते हैं। इससे छोटे-मोटे अपराध उनके द्वारा घटित हो जाते हैं और कभी-कभी वे आत्महत्या करने को उद्यत हो जाते हैं।</p>
<p><strong>जीवन में ‘नकार’ सहने की मानसिकता भी होनी चाहिए।</strong> सदैव अपने मनचाहेनुसार कार्य होगा नहीं। वस्तुस्थिति को स्वीकारना होगा। पचास वर्ष पूर्व शिक्षाविद् ताराबाई मोडक द्वारा बच्चों की जिद के सम्बन्ध में उनके विचार एक पुस्तक में व्यक्त किये गए थे। उनके अनुसार बच्चों द्वारा जिद करना एक मानसिक विकार है। जिस प्रकार बच्चे को बुखार आने पर हम नाराज न होकर बुखार का कारण खोजते हैं। उसी प्रकार जिद करने का कारण खोजकर उचित निराकरण करें।</p>
<p>किन्तु यह भी जान लें कि वह केवल जिद का आभास है अथवा वास्तव में जिद हैं। अनेक बार बालक जिद करते हुए दिखाता है किन्तु वह जिद वास्तविक न होकर किसी कारणवश ऐसा करता हैं।</p>
<p><img decoding="async" class="wp-image-1080 aligncenter" src="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2020/02/1_149684050510-300x169.jpg" alt="" width="541" height="305" srcset="https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2020/02/1_149684050510-300x169.jpg 300w, https://rashtriyashiksha.com/wp-content/uploads/2020/02/1_149684050510.jpg 737w" sizes="(max-width: 541px) 100vw, 541px" /></p>
<p>कुछ कारण न होते हुए वरिष्ठजन जो कहें उसे अनावश्यक रूप से विरोध करना, अर्थात् जिद। अर्थात् आग्रह, इच्छाशक्ति का प्रबल व्यापार! वास्तविक जिद में इच्छाशक्ति का उपयोग होता है। किन्तु वह उपयोगी नहीं अपितु अनुपयोगी-दुरुपयोगी होती है। शक्ति का अपव्यय होता है। इस कारण व्यक्तितव का विकास न होकर उसके विपरीत क्षीणता उत्पन्न होती है।</p>
<p>तारा बाई द्वारा जिद पर सुझाव दिये हैं-</p>
<p><strong>बच्चे जब जिद पर उत्तारू हो जाते हैं तब पालकगण को शांति अपनानी चाहिए। शांति अपनाने का मतलब केवल मुंह बंद रखना नहीं अपितु मन को शांत रखना है । चेहरे पर भी गुस्से का भाव न रखते हुए चेहरा शांत दिखे। स्वयं को दृढ़ रखें। अनेक बार बच्चों की जिद के लिए पालकगण जिम्मेदार होते हैं।</strong></p>
<p>बच्चे जिद करने लगे तो पालक उन पर गुस्सा होते हैं, चिल्लाते हैं, डांटते है और कभी-कभी मारते भी हैं।</p>
<p style="text-align: left;">इसके विपरीत कुछ पालकगण बच्चों की जिद शुरू होने पर उन्हें समझाने का प्रयास करते हैं। अनावश्यक लालच, आश्वासन देते हैं, इस प्रयोग से भी बच्चे जिद पकड़ते हैं। ये दोनों ही विपरीत छोर होते हैं। इन्हें टालना आवश्यक हैं।</p>
<p>(लेखक शिक्षाविद् है और विद्या भारती अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष है।)</p>
<p>और पढ़े <a href="https://rashtriyashiksha.com/children-and-homework-education-of-life-behaviour/" target="_blank" rel="noopener noreferrer">बच्चे और गृहकार्य–जीवन व्यवहार की शिक्षा</a></p>
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		<title>पूतना को पहचानते हैं आप?</title>
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		<dc:creator><![CDATA[दिलीप बेतकेकर]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 22 Mar 2019 09:53:30 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अभिभावक शिक्षा]]></category>
		<category><![CDATA[Bahrtiya Education]]></category>
		<category><![CDATA[Barsana]]></category>
		<category><![CDATA[indian education]]></category>
		<category><![CDATA[Krishna]]></category>
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		<category><![CDATA[Pootna Ko Pahchanon]]></category>
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		<category><![CDATA[पूतना की कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[पौराणिक कथाओं से शिक्षा]]></category>
		<category><![CDATA[भारतीय पौराणिक कथाएँ]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>गोकुल में नन्हा कृष्ण पल रहा है, यह खबर कंस को मिली । उसके मन में भय उत्पन्न हुआ । वह घबरा गया और कृष्ण का वध करने के लिए&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p>गोकुल में नन्हा कृष्ण पल रहा है, यह खबर कंस को मिली । उसके मन में भय उत्पन्न हुआ । वह घबरा गया और कृष्ण का वध करने के लिए भिन्न-भिन्न प्रयास शुरू किए । अपने अनेक दुष्ट सरदारों को कृष्ण का वध करने के लिए भेजना शुरू किया । उसमें एक थी पूतना ।</p>
<p>पूतना छिपते-छिपाते गोकुल में पहुँची । उसने बाल कृष्ण को देखा । उसे अकेला देखकर उसको बहुत हर्ष हुआ । नन्हे कृष्ण को उठाकर उसने अपनी छाती से लगाया । अपना दूध पिलाना शुरू किया । वह दूध नहीं विष था । कुछ ही क्षणों में कृष्ण यह दुनिया छोड़कर चला जायेगा, ऐसा उसे पूरा विश्वास था । लेकिन हुई उल्टी बात । कृष्ण ने पूतना को ही इस संसार से विदा कर दिया ।</p>
<p>कृष्ण ने पूतना को अच्छी तरह से पहचान लिया था । उसका उद्देश्य ठीक तरह से समझा और उसे विफल किया । परन्तु क्या आज के नन्हे कृष्ण पूतना को जानते-पहचानते हैं? नन्हों की बात छोड दें, बड़े-बड़े लोग भी आज की पूतना को नहीं पहचान पा रहे हैं । घर-घर यशोदा, देवकी, नंद, वसुदेव आज की पूतना को ठीक से नहीं समझ पा रहे हैं । कैसा दुर्भाग्य और विडंबना ।</p>
<p>कृष्ण को मारने के लिए तो एक ही पूतना आयी थी । लेकिन आज सैंकडों पूतना हैं । घर-घर में उन्होंने प्रवेश कर लिया है । वह पूतना तो छिपकर आयी थी, आज की पूतना दिन दहाड़े, बड़ी तामझाम के साथ, खुलेआम घरों में प्रवेश करके आराम से निवास कर रही है । लोग उसको बुला-बुलाकर, निमंत्रण देकर अपने घर ले जा रहे हैं । केवल दूध ही नहीं वह अनेक प्रकार के विष, खाद्य पदार्थ खिला रही है, पिला रही है । आधुनिक माता-पिता भी बड़े प्यार से अपने कृष्ण कन्हैया को विष खाते गौरव से देख रहे हैं । बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के विज्ञापन और प्रचार देखकर मोहित हुए अभिभावक अपने हाथों से अपने कृष्ण-बलराम, लव-कुश, प्रहलाद, ध्रुव, सीता-राधा को जहरीले पदार्थ खिला रहे हैं ।</p>
<p>उनके ध्यान में यह बात नहीं आ रही है कि यह सब ‘जंक’ है । उसमें पोषण युक्त कुछ नहीं । केवल खोखलापन है । यह खाकर बच्चों में बल निर्माण होने के बजाय दुर्बलता ही बढ़ जायेगी । जो रोग पचास-साठ साल का होने के बाद होते हैं वह सब शैशव और यौवनावस्था में बच्चों को ग्रस्त करेंगे, यह बात बिल्कुल ध्यान में नहीं आ रही है ।</p>
<p>अभिभावकों की बैठकों में हँसी-मजाक में मैं एक प्रश्न पूछता हूँ, मान लो, आपके घर एक साथ दो मेहमान आये । एक मेहमान आपके बच्चों के लिए घर में बनाकर कुछ खाद्य पदार्थ लाया और दूसरा कैडबरी, तो आपकी दृष्टि से ‘वी.आई.पी.’ मेहमान कौन होगा? बड़ी ईमानदारी से अभिभावक जवाब देते हैं, ‘कैडबरी लानेवाला मेहमान’ आपका भी तो उत्तर यही है न?</p>
<p>महात्मा विदुर ने कहा है &#8211;</p>
<p>एकं विष रसो हन्ति, शस्त्रोणैकश्च वध्यते ।</p>
<p>सराष्ट्रं सप्रजं हन्ति, राजानं मंत्रा विप्लवः । ।</p>
<p>विष पिलाकर एक व्यक्ति को मारा जा सकता है ।शस्त्रों के प्रयोग द्वारा भी एक और प्रज्ञापालक मर सकता है । लेकिन बुद्धि भ्रम पैदा किया तो राष्ट्र, प्रजा और प्रजापालक सभी का नाश हो सकता है ।</p>
<p>महात्मा विदुर के इन शब्दों का आज पल-पल अनुभव आ रहा है । समाज के बड़े वर्ग की मति भ्रष्ट हो चुकी है । वैचारिक भ्रम के कारण विनाश अनिवार्य है । अपना हित-अहित किस बात में है, इसका पता नहीं । बहुत गर्व से लोग कहते हैं कि वे विज्ञान युग में रहते है । परंतु व्यवहार विपरीत दिखाई देता है । अतीत की हर बात के बारे में आशंका और प्रश्न खड़ा करना और पश्चिम की प्रत्येक बात पूछताछ किये बिना स्वीकार करना, मानों हर आधुनिक बात अच्छी ही होती है ।</p>
<p>आज की पूतना मौसी बहुत सामर्थ्यवान है । उसकी आर्थिक शक्ति तो इतनी अधिक है कि छोटे-छोटे देशों का वार्षिक बजट भी उनके सामने बौना है । उनके विज्ञापन बहुत अहम भूमिका निभाते हैं । विज्ञापन के बलबूते पर सामान्य वस्तु भी असामान्य दिखाई देती है ।विज्ञापन के आधार पर विष भी लोगों के गले में उतारना कठिन नहीं रहा है ।2010 में नेस्ले कम्पनी का अपने उत्पादनों के विज्ञापन पर व्यय था 302 करोड़ रुपये ।2014 में इसी कंपनी ने विज्ञापन पर 445 करोड़ रुपये की राशि व्यय की । पेप्सी, कोक, पिज्जा, बर्गर, मैगी आदि के प्रति लोगों के मन में आकर्षण बढ़ाने के लिए जो तरीके अपनाए जाते हैं और उन पर खर्च दिया जाता है उसकी कल्पना भी सामान्य व्यक्ति को नहीं होती ।</p>
<p>अमेरिका और यूरोपीय देशों को जो वस्तुएँ नहीं चाहिए वे फैंकने का कूड़ादान बन गया है अपना देश-भारत । कई दवाईयाँ अनेक देशों में बिक नहीं सकती । वे सब बहुत आराम से भारत में बेची जाती हैं । तकनीक पुरानी हुई, स्क्रैप हुआ तो बेच दो भारत को । वे सब देश अपने देश के लोगों के स्वास्थ्य के बारे में बहुत सतर्क और सावधान होते हैं । लेकिन भारत के लोगों की जान को हानि पहुँचाने में उनको कोई दुःख नहीं होता । सब प्रकार के नियम और कानूनों की अनदेखी करते हुए अपने उत्पादन भारत के बाजारों में उतारने हैं और करोड़ों रुपये भारत से लेकर चले जाते हैं और सबसे दुःख और दुर्भाग्य की बात यह है कि भारतवासियों को न इसका पता है और न कुछ वेदना ।विदेशीयों के अंधानुकरण से मानव ही उलटा-पुलटा हो गया है । मस्तिष्क बधिर और संवेदनाहीन हो गया है । विशेष रूप से उच्च वर्गीय समाज को भारत की हर चीज, हर बात गंदी, बुरी और प्रतिगामी लगती है और पश्चिम की हर बात श्रेष्ठ, वंदनीय, अनुकरणीय । विदेशीयों की जूठन भी उनको अच्छी, स्वादिष्ठ और मीठी लगती है ।</p>
<p>आकर्षित करने वाले पैकिंग, लेबल्स और रात-दिन चलने वाले विज्ञापन के कारण लोग भ्रमित हो रहे हैं । चक्रव्यूह में फंसे हैं । घरों में रसोईघर, फ्रिज और अलमारियां ऐसे पेय और खाद्य पदार्थों से भरे हैं जिनमें कोई पोषक तत्व नहीं है । अपने घर आने वाले अतिथि को यह सब खिलाने में उनको धन्यता और प्रतिष्ठा अनुभव होती है ।</p>
<p>ये सब पेय और खाद्यपदार्थ वास्तव में कितने सुरक्षित हैं इस पर बहुत बड़ा प्रश्नचिह्न है ।</p>
<p>कैडबरी, डेअरी मिल्क चॉकलेट में कीटनाशक पाये गये ऐसी खबर 2003 में अखबारों में छपी । कंपनी  ने अपनी जिम्मेदारी टालने और दुकानदारों पर दोषारोपण करने का प्रयास किया ।2003 में ही पेप्सी और कोका कोला में कीटनाशक की मात्रा अत्यधिक है, ऐसा ध्यान में आया । यह खबर बहुत लोगों तक पहुँची भी नहीं ।2006 में दिल्ली के ‘सेंटर फॉर साइन्स एण्ड एन्वायर्नमेंट’ नामक प्रतिष्ठित संस्था ने पेप्सी और कोका कोला के ग्यारह उत्पादनों के बारे में अपना अनुसंधान प्रस्तुत किया । कोका कोला, पेप्सी, थम्स अप, मिरींडा, लिम्का, स्प्राईट, पैंफटा, इन सभी में लिंडेन, डी.डी.टी., मैलथियॉन और क्लोरोपायरीपफॉस जैसे कीटनाशकों के अंश मिले ।</p>
<p>31 मार्च 2012 को इकॉनॉमिक टाइम्स ब्युरो ने एक आलेख प्रकाशित किया । सेंटर पफॉर साइन्स एण्ड एन्वायर्नमेंट(सी.एस.ई.) ने नेस्ले, हल्दीराम, पेप्सिको, के.एफ.सी. और मॅक्डोनाल्ड कंपनियों के सोलह उत्पादनों का परीक्षण किया । बहुतांश उत्पादनों में शक्कर, नमक और वसा का अनुपात स्वीकृति मानकों से अधिक पाया गया ।</p>
<p>मैगी नूडल्स में सीसे (लीड) का अनुपात 17.5 पी.पी.एम. है छोटे बच्चों के खाद्य पदार्थों में इसकी मात्रा 0.01 पी.पी.एम. से भी कम होनी चाहिए । लीड शोषण बच्चों में बहुत जल्दी होता है किन्तु उसके दुष्परिणाम तुरंत नहीं दिखाई पड़ते । धीरे-धीरे लीड यकृत, वृक्क, मूत्राशय और अस्थियों में जाता है । मैगी में नमक आवश्यकता से अधिक मात्रा में होता है । विशेषतः मोनोसोप्यिम ग्लुटामेट (एम.एस.जी.) शरीर के लिए बहुत हानिकारक है । इन पदार्थों में वसा की मात्रा अधिक और पफायबर कम होता है ।</p>
<p>अनेक शोधों के निष्कर्ष बताते हैं कि यह सब उत्पाद स्वास्थ्य पर अत्यन्त प्रतिकूल प्रभाव डालने वाले हैं । तो भी विज्ञापनों का मायाजाल और उससे भी अधिक आधुनिक बनने और स्टेटस सिंबल के रूप में इन उत्पादों की स्वीकृति इससे सामान्य व्यक्ति को दूर रहने नहीं देती । दूर-दराज के गाँवों तक इनकी पहुँच हो गई है । आकर्षक पैकिंग की चकाचौंध के अन्दर छिपी पूतना को हम पहचान नहीं पा रहे । पैकिंग का प्लास्टिक उपजाऊ भूमि को नष्ट कर रहा है और अन्दर रखा पदार्थ मनुष्यों को । कृष्ण के समय पूतना एक थी और कृष्ण में पहचानने की क्षमता थी । आज पूतना अनेक हैं, विविध रूप हैं और घर-घर में अपनी पैठ बना चुकी हैं । क्या करें आज के बालकृष्ण, जब स्वयं यशोदाएँ ही उन्हें पूतनाओं को सौंप रही हों? क्या आप पहचान रहे हैं अपने आसपास घूम रही पूतनाओं को?</p>
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		<title>विज्ञापन और बच्चे</title>
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		<dc:creator><![CDATA[दिलीप बेतकेकर]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 06 Mar 2019 09:25:26 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अभिभावक शिक्षा]]></category>
		<category><![CDATA[Advertisement and Child]]></category>
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		<category><![CDATA[बच्चों पर विज्ञापनों का प्रभाव]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#8220;पिताजी । मुझे नया मोबाइल हैंडसेट चाहिए। &#8216; “माँ मेरे सभी दोस्त अपनी बाइक पर कॉलेज आते हैं। यह मेरे लिए शर्मनाक है क्योंकि मेरे पास बाइक नहीं है। मैं&#8230; </p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p>&#8220;पिताजी । मुझे नया मोबाइल हैंडसेट चाहिए। &#8216;</p>
<p>“माँ मेरे सभी दोस्त अपनी बाइक पर कॉलेज आते हैं। यह मेरे लिए शर्मनाक है क्योंकि मेरे पास बाइक नहीं है। मैं कब नयी बाईक लाने वाला हूं? &#8221;</p>
<p>&#8220;मैं आपके साथ चाचा की जगह पर नहीं आऊंगा जब तक मुझे नए जूते नहीं मिलेंगे&#8221;</p>
<p>ये केवल कुछ उदाहरण हैं जो बताते हैं कि बच्चे अपनी मांग को मनवाने के लिए कैसे दवाब बनाते हैं और माता-पिता को परेशान करते हैं। असहाय माता-पिता अपनी सामान्य वित्तीय स्थिति के बावजूद बढ़ती मांग को पूरा करने की कोशिश करते हैं। कई माता-पिता सोचते हैं कि जब वे बच्चे थे तो उनकी सभी मांगें पूरी नहीं हुई थीं। इसलिए वे नहीं चाहते कि उनके बच्चों के साथ ऐसा हों। बच्चे भीकाफी होशियार है, वे माता-पिता से अपनी बात कैसे मनवाना है यह बहुत अच्छी तरह से जानते हैं।</p>
<p>बच्चों की मांगों को बढ़ाने में विज्ञापन बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है। चतुर कंपनियों ने महसूस किया है कि परिवार में फैसलों को लेकर बच्चों में निपुणता है। इसलिए कंपनियाँ व्यवस्थित रूप से बच्चों को हुक करने की योजना बनाते हैं। बच्चों को लुभाने के लिए पंच लाइन्स, आकर्षक जिंगल्स, कैरिकेचरऔर कई अन्य तकनीकों का बहुत प्रभावी ढंग से उपयोग किया जाता है। एक बार जब बच्चे विज्ञापनों के बहकावे में आते हैं, तो वे ब्रांडेड उत्पाद के लिए जोर देते हैं और कंपनियों को अंधे ग्राहक मिल जाते हैं।</p>
<p>विज्ञापन को अधिक रोचक और प्रभावी बनाने के लिए सभी कंपनियों द्वारा भारी राशि खर्च की जाती है। प्रौद्योगिकीके उपयोग के अलावा सिनेस्टार, खिलाड़ी, संगीतकार, राजदूत ambassdors के रूप में लगे हुए हैं। स्पोर्ट्स और एंटरटेनमेंट इवेंट्स मैन्युफैक्चरर्स को विज्ञापन का मौका देते हैं। कंपनियों, मनोरंजन कार्यक्रमों के निर्माता और कलाकार एक-दूसरे के साथ हाथ मिलाते हैं। अक्सर गुड लुकिंग वस्मार्ट बच्चों का प्रयोग बेबी फूड, खिलौने, गेम, टूथ पेस्ट, साबुन और डिटर्जेंट जैसे विभिन्न उत्पादों के विज्ञापन के लिए भी किया जाता है।</p>
<p>चूंकि बच्चे आकर्षक उत्पादों के वास्तविक मूल्य, उपयोगिता और परिणाम को समझने के बिना फ़ेस वैल्यू पर विज्ञापन देखते हैं, वे नौटंकी और चाल के शिकार होते हैं।</p>
<p>बच्चे उत्पादों को खरीदने के लिए जोर देते हैं, जो विज्ञापन में बहुत बार देखते हैं। साथियों का दवाब भी निर्णायक भूमिका निभाता है। कुछ देशों ने, बच्चों पर खतरनाक प्रभाव का एहसास करते हुए, बारह साल से कम उम्र के बच्चों पर निर्देशित विज्ञापनों पर प्रतिबंध लगा दिया है।</p>
<p><strong>बच्चों पर प्रभाव</strong></p>
<ul>
<li>बच्चे हर चीज के लिए तरसते हैं, वे विज्ञापन में देखते हैं।</li>
<li>वे वास्तविक जरूरतों और विलासिता के बीच भेदभाव नहीं कर सकते।</li>
<li>वे दावे के दावे, अर्ध-सत्य और अतिशयोक्ति में विश्वास करते हैं।</li>
<li>वे यह जानने की जहमत नहीं उठाते कि परिवार की वित्तीय स्थिति उत्पादों को वहन कर सकती है या नहीं।</li>
<li>जब माता-पिता हर मांग को पूरा करते हैं, तो बच्चे हठी और असावधान हो जाते हैं।</li>
<li>वे चीजों का मूल्य जानने में असफल रहते हैं।</li>
<li>वे अधीर हो जाते हैं।</li>
<li>वे चाहत और जरूरतों के बीच अंतर नहीं कर सकते हैं।</li>
<li>अस्वास्थ्यकर खाने की आदतें।</li>
</ul>
<p><strong> </strong><strong>माता-पिता को क्या करना चाहिए</strong><strong> </strong></p>
<ul>
<li>दिमागी माता-पिता की तरह एक साथ और एक समूह से समस्याओं और समाधानों को साझा करने के लिए आगे आएँ।</li>
<li>बच्चों के साथ टीवी कार्यक्रमों को देखना और उनकी चर्चा करना दर्शकों के लिए उत्साहजनक और परिपक्व बनने में मदद कर सकता है।</li>
<li>यह हमेशा जरूरी नहीं है कि बच्चे जो कुछ भी मांगते हैं, उसे खरीदा जाए।</li>
<li>बच्चों को ना लेना सिखाएं।</li>
<li>उन्हें प्राथमिकताओं का विश्लेषण करना सिखाएं।</li>
<li>परिवार की वित्तीय स्थिति का विचार दें। उनके साथ परिवार की आय और खर्च साझा करें।</li>
<li>बच्चों के विचारों को सुनें और दोस्ताना तरीके से समझाएं।</li>
<li>प्रणाली में संभावित नुकसान की व्याख्या करें।</li>
<li>चाहता है और जरूरतों के बीच अंतर स्पष्ट करें।</li>
<li>उन्हें सतर्क उपभोक्ता बनना सिखाएं।</li>
<li>बच्चों को उनकी वास्तविक जरूरतों को तय करने के बारे में शिक्षित करें।</li>
</ul>
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