आदर्श शिक्षक की भारतीय संकल्पना


 – डॉ शिव भूषण त्रिपाठी

भारतीय मनीषा की चिन्तन धारा में एक गति है प्रवाह है जो हमें परम्परा से प्राप्त हुई है। हमारे रग-रग में जगत का कल्याण और विश्वबन्धुत्व का भाव समाया हुआ है। क्योंकि मानव ब्रह्म की अनुपम कृति है। मनुष्य में वे सारे गुण-शक्ति-ज्ञान अन्तर्निहित है जो ब्राह्म जगत में बाहर दृश्यमान है – यथा ब्रह्माण्डे तथा पिण्डे परन्तु अज्ञानेन आवृत्तं ज्ञानं – ज्ञान तो अज्ञानता से ठका है। अस्तु जीव इर्षा, द्वेष, छल, कपट, मद, मोह, अहंकार आदि विकारों से ग्रसित है। इन्हीं सब विकारों को दूर कर ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ की भावना से मंत्र द्रष्टा ऋषि महर्षियों ने अपने तप और साधना से विविध शास्त्रों की रचना की, वेदों का आविर्भाव हुआ और 14 विद्याएं प्रकाश में आई।

पुराण न्याय मीमांसाधर्म शास्त्रांग मिश्रिताः।

वेदाः स्थानानि विद्यानां धर्मस्य च चतुर्दश।।

अर्थात्  4 वेद (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्व वेद), 4 उपवेद-(आयुर्वेद, धनुर्वेद, गान्धर्ववेद, अर्थवेद) तथा 6 वेदांग (शिक्षा, कल्प (यज्ञविद्या, दर्शन), व्याकरण, निरूक्त, छंद और ज्योतिष) ये 14 विद्यायें है।

मनुष्य की अन्तर्निहित अज्ञानता के आवरण को शिक्षा द्वारा हटाकर पूर्णता को अभिव्यक्त करने वाले को शिक्षक की संज्ञा दी जाती है। अस्तु आदर्श शिक्षक की भारतीय संकल्पना को उजागर करने के लिए शिक्षक के स्वरूप, शिक्षण विधि तथा गुरु-शिष्य सम्बन्ध आदि प्राचीन भारतीय शैक्षिक संदर्भों के साथ वर्तमान समय में उसकी उपयोगिता की चर्चा का उल्लेख करना उपयुक्त होगा।

शिक्षक शब्द में शिक्षक का अर्थ गुम्फित है इनमें कुल पाँच अक्षर हैं ‘वैदिक सम्पत्ति’ नामक पुस्तक में उल्लिखित शिक्षक शब्द में प्रयुक्त अक्षरार्थ को ध्यान में रखते हुए शिक्षक के लिए हम कह सकते हैं कि ऐसा व्यक्तित्व जो स्वयं ज्ञान की पूर्णता व्यापकता को प्राप्त कर अज्ञानता का नाश करते हुए ज्ञान का प्रकाश कर दूसरों को प्रभावशाली ज्ञानवान और सुखी बना सके। प्रायः इन्हीं भावों की अभिव्यक्ति प्राचीन ग्रन्थों में भी विद्वानों ने अपनी-अपनी तरह से की है। कुछेक उदाहरण यहाँ प्रस्तुत है-

शस्त्राणि अधीत्यापि भवन्ति मूर्खाः।

यस्तु क्रियावान पुरुषः सः विद्वान।।

(अर्थात्) शास्त्रों का अध्ययन करके भी जो उस ज्ञान को अपने आचरण में नहीं ढालते, शास्त्रानुसार कार्य व्यवहार नहीं करते, वे शास्त्रज्ञ होकर भी मूर्ख ही समझे जाते हैं और जो आचरणवान होते है वे ही विद्वान-शिक्षक हैं। शिक्षणं करोति यः सः शिक्षकः जो शिक्षण–सीखने-सिखाने का कार्य करता है वह शिक्षक है। शिक्षक के लिए आचार्य, उपाध्याय, उपदेशक, गुरु आदि शब्दों का प्रयोग मिलता है।

इस त्रिगुणात्मिका सृष्टि के तत्वज्ञान में ‘सत्यं शिवं सुन्दरम्’ तीनों समाहित हैं वहीं ‘तेन त्यक्तेन भुंजीथाः’ त्याग भाव की दृष्टि से भारतीय दर्शन-ज्ञान न केवल मनुष्य मात्र अपितु पशु-पक्षी, कीट-पतंग और तृण-पल्लव आदि सबके लिए एक समान लाभदायक और सुखदायक है। जीव के गर्भाधान संस्कार से लेकर मृत्युपर्यन्त तथा उसके बाद के जीवन के प्रत्येक पहलू पर चिन्तन-मनन के साथ करणीय-अकरणीय आदि तथ्यों पर विचार विमर्श और मार्ग दर्शन हुआ है। ‘सर्वा आशा मम मित्रं भवन्तु’ – अर्थात् सभी दिशाएं हमारे लिए हितकारी हों। ‘मा नो द्विक्षत कश्चन’ अर्थात् हममें से कोई द्वेष करने वाला न हो। ‘मित्रस्य चक्षुषा समीक्षामहे’ – अर्थात् हम सब परस्पर मित्र की दृष्टि से देखें। ‘ऋतस्य पथा प्रेतं’ – अर्थात् सत्यमार्ग पर चलें। ‘आ नो भद्रा कतवो यन्तु विश्वतः’ -कल्याणकारी चिन्तन – विचार को हम चारों ओर से आने दें। आदि वैदिक ज्ञान की विशदता व्यापकता गहनता शिक्षकों की विशेषता रही है।

उक्त तत्वज्ञान के प्रतिपादन, हस्तान्तरण की जो विधा ऋषियों ने अपनायी वह वैज्ञानिक-मनोवैज्ञानिक धरातल पर आधारित प्रभावकारी रही है। एक श्लोक ‘ब्रह्म समन्वय’ में ‘विद्यास्ति ज्ञान विज्ञानं दर्शनं संस्क्रियात्मनि। अर्थात् ज्ञानविज्ञान एवं दर्शन से आत्मा में संस्कार उत्पन्न करना विद्या (शिक्षण) है। इस प्रकार शिक्षण प्रक्रिया में तीन कारक निहित है।

  1. बालक/बालिका (सीखने वाला जिज्ञासु), 2. विषय वस्तु, 3. शिक्षक।

ज्ञान प्रदान करने के लिए शिक्षण तथा शिक्षण प्रक्रिया उसकी पद्धति के मूल में वर्णआश्रम व्यवस्था की भूमिका प्रमुख रही है। वैदिक ऋषि-आचार्य-शिक्षक बहुत सारी बातें बिना कुछ बोले हुए अपने रहन-सहन के तौर तरीके और आचरण से संप्रेषित किया करते थे जो शब्द की अपेक्षा कहीं अधिक प्रभावकारी होते रहे। बालक माता-पिता द्वारा प्रारम्भिक शिक्षा भाषाज्ञान घर पर प्राप्त कर, उपनयन संस्कार के साथ गुरूकुल में प्रवेश पाकर गुरूकुल में निवास, गुरू की सेवा, अध्ययन अभ्यास-प्रयोग, ब्रह्मचर्यं व्रत का पालन एवं भिक्षाचर्या करता था। प्रारम्भिक छः माह के अन्दर आचार्य अपने प्रत्येक शिष्य की रूचि-प्रकृति तथा उसकी क्षमताओं से परिचय प्राप्त कर लेते थे। हर एक के साथ यथा योग्य विधा का प्रयोग कर आचार्य हर एक के अन्तर्निहित शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक आदि शक्तियों-कलाओं का विकास करते थे। एक ही विधा सबके साथ प्रयोग की जाय ऐसा नहीं था। कुछ शिक्षण विधाओं का उल्लेख यहाँ किया जा रहा है।

श्रुति-सुनकर, आचार्य के मुख से उच्चरित वेद पाठ सुनकर एक साथ पाठ दोहराने की परम्परा रही है। इस प्रकार पूरा का पूरा वेद कंठाग्र हो जाता था। उच्चारण, आरोह, अवरोह, ताल लय स्वर, शिक्षा, स्वरों का समुचित प्रयोग, स्वरों के अनुसार हस्त संचालन की विधा सरलता से एक पीढ़ी से दूसरी, दूसरी से तीसरी, और इस तरह आगे की पीढ़ी को श्रवण विधि द्वारा ज्ञान हस्तांतरित होता रहा है।

श्रवणं तु गुरोः पूर्वं मननं तदनन्तरम्

निदिध्यासनमित्येतत्पूर्णबोधस्कारणरम्।। (वृहदारण्यकउपनिषद्)

अर्थात् गुरु अथवा शिक्षक के श्री मुख से उच्चरित ज्ञान सुन कर उस पर चिन्तन-मनन के उपरान्त  निदिध्यासन अर्थात् साधनात्मक अनुभूति करके, जीवन में प्राप्त ज्ञान के अनुसार प्रयोग अनुभव करके सम्यक ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है।

मौखिक विधा, प्रश्नोत्तर, परस्पर संवाद, अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता, अनुकरण, अभ्यास प्रयोग का अवसर सभी को प्राप्त था, दृश्य-श्रव्य माध्यमों का प्रयोग यथा दत्तात्रेय द्वारा 24 गुरू बनाया जाना यथा पृथ्वी, वायु, आकाश, जल, अग्नि, कबूतर, अजगर, मधुमक्खी, हाथी, मछली, सर्प, मकड़ी आदि के माध्यम से शिक्षा, देवोपासना में देवी देवताओं के माध्यम से दी जाने वाली अविस्मरणीय प्रभावकारी शिक्षा विधा अपने आप में बेजोड़ रही है।

देवी देवताओं के साथ पशु-पक्षियों का रिश्ता जैसे शिव के साथ नन्दि, पार्वती के साथ सिंह, गणेश के साथ मूषक सरस्वती के साथ हंस का प्रयोग जहाँ शिक्षा का दृश्य माध्यम था वहीं लोक व्यवहारज्ञान का परिचय कराना भी शिक्षा का ही रूप था। शिक्षक और शिक्षार्थी अध्यापन और अध्ययन के वातावरण में स्वयं को ही मांजते हैं, धोते हैं और इस तरह निर्मल होते हैं, ज्ञान प्राप्त करते हैं जिसे गीता में कृष्ण ने परिप्रश्नेन सेवया के संकेत से स्पष्ट किया है।

तदविद्ध् प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया

उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्वदर्शिनः।।  (श्रीमद् भगवतद्गीता 4/34)

अर्थात् गुरु के पास जाकर सत्य-ज्ञान को जानने का प्रयास करो। उनसे विनीत होकर जिज्ञासा करो और उनकी सेवा करो। स्वरूपसिद्ध ज्ञानी व्यक्ति ज्ञान प्रदान कर सकते हैं, क्योंकि उन्होंने सत्य का दर्शन किया है।

आचार्यात् पादमादत्ते पादं शिष्यः स्वमेधया ।

पादं सब्रह्मचारिभ्यः पादं कालक्रमेण हि ।।

अर्थात् शिक्षार्थी एक चौथाई ज्ञान ही शिक्षक से प्राप्त करता है, एक चौथाई ज्ञान तो स्वयं की बुद्धि के उपयोग से प्राप्त करता है, एक चौथाई ज्ञान अपने सहपाठियों से चर्चा विचार विमर्श करके प्राप्त करता है और एक चौथाई ज्ञान समय आने पर प्राप्त होता है। वास्तविक ज्ञानार्जन का आज भी यही श्रेष्ठक्रम – प्रक्रिया है।

‘मनःपूतं समाचरेत्’ अर्थात् अपने मनोनुकूल मार्ग का चयन करो, यह आर्ष वाक्य अनुसंधान आदि की ओर प्रवृत्त करता है। सबके प्रति निष्पक्षभाव, समानता का व्यवहार, सहभागिता समस्याओं का समाधान, निरीक्षण, अवलोकन आदि ज्ञान का हस्तान्तरण उपदेश मात्र से ही नही अपितु शिक्षक और शिक्षार्थी के परस्पर व्यवहार के माध्यम से संप्रेषित होते रहे हैं, जो आज भी उतने ही प्रभावी चिर-नवीन है।

गुरू-शिष्य सम्बन्ध – गुरू-शिष्य दोनों परस्पर एक दूसरे में आस्था, निकटता विश्वास एवं समर्पण का भाव रखते थे। पुत्रवत् शिष्य का लालन-पालन तथा निःश्रेयस की प्राप्ति पर्यन्त चिन्तन एवं व्यवस्था करना, गुरू का अपना दायित्व था। गुरूकुल में प्रवेश पाने के छह माह तक आचार्य छात्र के विविध चेष्टाओं को विशेष ध्यान से देखते थे। इतने समय में छात्र तथा आचार्य का मानसिक सम्बन्ध इतना प्रगाढ़ और दृढ़ हो जाता कि छात्र गुरू के अतिरिक्त किसी की चिन्ता नहीं करता था। गुरू की आज्ञा ही सर्वोपरि होती थी। उपनयन से समावर्तन संस्कार तक गुरू शिष्य एक दूसरे के हित चिन्तन में सदा लगे रहते थे। गुरू निःस्वार्थ भाव से अपने तप साधना, योग आदि से प्राप्त अपना सर्वस्व अपने शिष्य को सौपने में तत्पर रहते और शिष्य एक कदम आगे बढ़कर गुरू से प्राप्त अपनी सम्पूर्ण निधि अपनी अगली पीढ़ी को गुरू परम्परा के रूप में सौंपकर ऋुषि ऋण से मुक्त होने के लिए उद्यत रहते। गुरू शिष्य को अपने से अभिन्न समझते हुए कहता है – मम चित्तमनुचितं तेऽस्तु अयमात्मा ब्रह्म।।

गुरू शिष्य दोनों में आध्यात्मिक सम्बन्ध थे। किसी व्यावसायिक लेन-देन का कोई चिन्तन नहीं था। अनेक अवसरों पर गुरू-शिष्य दोनों एक दूसरे के कल्याण की भावना से प्रार्थना करते –

ऊँ सह नाववतु सह नौ भुनक्तु

सहवीर्यं करवावहै। तेजस्विनावधीतमस्तु।

मा विद्विषावहै। ऊँ शान्तिः। शान्तिः। शान्तिः।         ।।कठोपनिषद।।

ऐतरेयोपनिषद् के तृतीय अनुवाक में आचार्य अपने और शिष्य के अभ्युदय की कामना करते हुए – सह नौ यशः। सह नौ ब्रहबर्चसम्।।  अर्थात् आचार्य और शिष्य दोनों का यश एक साथ बढ़ें एक साथ दोनों का ब्रह्मतेज बढ़े।

गुरू-शिष्य का सम्बन्ध सामाजिक एवं व्यावहारिक जीवन में भी परस्पर एक अच्छा सन्तुलन स्थापित करने में सहयोगी रहा है। शिक्षक शिष्य का चरित्र निर्माण कर धर्म अर्थ काम मोक्ष इन चार पुरूषार्थों की प्राप्ति में सहायक और उत्प्रेरक रहा है। यही कारण है कि आज भी हमारी वैदिककालीन अद्वितीय शिक्षा पद्धति अमर है। शिक्षक जो शान्त विनयशील, शुद्धात्मा, सम्पूर्ण शुभ लक्षणों से युक्त, शम आदि साधनों से सम्पन्न, श्रद्धालु, सुस्थिर विचार वाला, खानपान में शारीरिक शुद्धि से युक्त, धार्मिक शुद्धचित्त, सुदृढ़व्रत एवं सुस्थिर आचार से युक्त, कृतज्ञ एवं पाप से डरने वाला होता है, ऐसे गुरू की सेवा में आस्था श्रद्धा और विश्वास से – श्रद्धावान लभते ज्ञानम्। ज्ञानार्जन करके शिष्य अपने शिक्षक के समान तेजस्वी ओजस्वी बनने में सफल होता है।

एक अच्छे शिक्षक का कार्य विद्यार्थी के स्वयं द्वारा सीखने की प्रक्रिया में सहायक बनना है। वह छात्र को ऐसी पृष्ठ भूमि प्रदान करें कि विद्यार्थी स्वयं सीखने के लिए अभिप्रेरित हो जाये। इस सम्बन्ध में एक सुप्रसिद्ध कहावत का उदाहरण द्रष्टव्य है-

A Poor teacher tells, An average teacher explains, A good teacher demonstrates,

And a great teacher inspires.

वस्तुतः ज्ञान कोई सामग्री नहीं जिसे एक हाथ से दिया जाय और दूसरे हाथ में हस्तान्तरित हो जाय। श्री अरविन्द घोष के विचारों पर यदि दृष्टिपात करें तो विदित होता है कि शिक्षण-शिक्षक की भूमिका सहायक और मार्गदर्शक के रूप में होती है। श्री अरविन्द का कथन है –

The first principal of true teaching is that nothing can be taught. The teacher is not an instructor or task master, he is a helper and a guide. His business is to suggest and not to impose. He does not actually train the pupil’s mind, he only shows him how to perfect his instruments of knowledge and helps and encourages him in the process. He does not import knowledge to him; he shows him how to acquire knowledge for himself. He does not call for the knowledge that is wihin; he only shows him where it lies and how it can be habituated to rise to the surface…”  

अमृतानन्दमयी मां का कथन है कि एक अच्छे शिक्षक को बच्चों से तादात्म्य स्थापित कर बच्चों की रूचि के अनुकूल स्तरानुसार भाषा का प्रयोग करके उसके अन्तर्निहित शक्तियों का विकास करना चाहिए। बच्चों को शिक्षक जो अच्छे से अच्छा उपहार दे सकता है वह है उसे अपने आपको जानना और अपने ऊपर शासन करना सिखलाना।

गुरूदेव रविन्द्रनाथ ने शिक्षक को जीवन पर्यन्त अध्ययन परायण रहने की बात कही है।

प्राचीन भारतीय सुदृढ़ सांस्कृतिक आधार शिला पर आज हमें ऐसे अध्यापक को तैयार करने की आवश्यकता है जो छात्र-छात्राओं में अंतर्निहित नैसर्गिक क्षमता को पहचान कर उसे युगीन आवश्यकताओं के अनुरूप विकसित पल्लवित और पुष्पित कर सकें। शिक्षक और शिक्षार्थी का प्रगाढ़ सम्बन्ध है। समाज इन दोनों का अपरिहार्य अवयव है। समाज की अवश्यकताओं का विश्लेषण करके विद्यार्थी को तदनुरूप तैयार करना अभिष्ट है। उपयोगी व्यक्ति का निर्माण हमारी शीर्ष प्राथमिकता है। अतः अच्छे नागरिक का निर्माण जो राष्ट्रीय भावना से ओत प्रोत हो, साथ ही राष्ट्र निर्माण में अपना योगदान दे सके। बहुमुखी उत्पादन में वृद्धि करना आवश्यक है। कृषि, स्वास्थ्य, रक्षा, उत्पादन, को प्रभावित करने वाले कारकों की समझ विकसित कर सकें। आवागमन के साधन जिसमें सड़क निर्माण से लेकर अन्य साधनों को विकसित करना सर्वथा आवश्यक है। इस दृष्टि से शिक्षक का दायित्व है कि वह विशेषज्ञों को तैयार करने में अपनी दृष्टि रखें। इतना ही नहीं राष्ट्र की प्राथमिकताओं का संज्ञान शिक्षा जगत को लेने की आवश्यकता है। इसके साथ ही राष्ट्रीय स्तर पर जन शक्ति योजना भली प्रकार करके प्रत्येक क्षेत्र में विशेषज्ञों की आवश्यकता का आकलन हमारी शीर्ष प्राथमिकता है। इससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि आगामी वर्षों में विभिन्न क्षेत्रों यथा शिक्षकों, इन्जीनियरों, रक्षा विशेषज्ञों, प्रशासनिक आधिकारियों, वैज्ञानिकों, टेक्नीशियनों आदि की आवश्यकता के अनुरूप योग्य व्यक्तियों के निर्माण में सहायक हो सके। समाज में ऐसे व्यक्तियों का निर्माण हो सके जो सामाजिक नैतिक एवं आध्यत्मिक दृष्टि से उन्नत हो, जो माता-पिता, वृद्ध नर-नारियों का सम्मान कर सकें, धार्मिक उन्माद एवं कट्टरता का परित्याग कर सकें।

वैदिक परम्परा से प्राप्त तत्वज्ञान ही जीवन के हर क्षे़त्र में श्रेष्ठता का मानक रहा है। शिक्षा के क्षेत्र में शिक्षक की पहचान, उसकी योग्यता क्षमता आदि का उल्लेख गुरुकुल, गुरु-शिष्य सम्बन्ध आदि प्रसंगों में किया गया है। सूत्र रूप में वर्णित उक्त तथ्यों के सम्यक अवलोकन मनन से शिक्षा, शिक्षण तथा शिक्षक की अवधारणा स्पष्ट हो जाती है। एक आदर्श शिक्षक के गुणों से युक्त होने में ही शिक्षक होने की सार्थकता है। इससे भिन्न व्यक्तित्व शिक्षक के प्रतिष्ठा से वंचित रहता है, वह छात्रों का हित साधन नही कर पाता है।

‘भारतीय चिन्तन परम्परा’ में ‘यज्ञो वै श्रेष्ठतमम् कर्म’ हमारा सम्पूर्ण जीवन यज्ञमय हो। यही आदर्श रहा है। यज्ञ का तात्पर्य अग्नि में कुछ पदार्थों की आहूति देना ही नहीं है बल्कि बड़ों की पूजा उनका सम्मान, बराबर वालों के साथ मेल-मिलाप, छोटो के प्रति दान आदि नेक कार्य करना है। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में यह व्यवहार अपनाना चाहिए। कर्म, ज्ञान एवं उपासना ये तीन प्रमुख यज्ञ लोक में प्रसिद्ध है। इन्ही के अन्तर्गत हमारे सारे क्रिया-कलाप आ जाते हैं। अपने-अपने दायित्वों का निर्वहन करते हुए ‘इदं न मम’ का भाव सभी में विकसित हो। उक्त समस्त सद्गुणों के साथ हमारा आदर्श शिक्षक हो यही भारतीय संकल्पना और आज की आवश्यकता भी है।

एक दृष्टि में ध्यातव्य आदर्श शिक्षक के गुण :-

  • शिक्षक का ज्ञान कार्य-व्यवहार आध्यात्मिक पृष्ठभूमि पर हो।
  • अपने विषय का सम्यक ज्ञान हो।
  • अपने विषय के अतिरिक्त अन्य विषयों तथा परिवेश आदि का भी ज्ञान हो।
  • यज्ञीय भाव के साथ शिक्षण हो।
  • बाल मनोविज्ञान का अच्छा ज्ञान हो।
  • योगिक साधना से युक्त हों।
  • जीवन पर्यन्तु जिज्ञासु बने रहने का भाव हो।
  • अपने दोषों को स्वीकारने का भाव हो।
  • अभिव्यक्ति की क्षमता हो।
  • अनुकरणीय आचरण हो।
  • वाणी मधुर तथा शान्त विनम्र स्वभाव हो।
  • स्वाध्याय में निरन्तरता हो।
  • निरन्तर स्व मूल्यांकन का भाव हो।

(लेखक भारतीय शिक्षा शोध संस्थान, लखनऊ से जुड़े है)

 

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