बाल केन्द्रित क्रिया आधारित शिक्षा-9 (अनुभव एवं भाव आधारित शिक्षा)


 – रवि कुमार

करणों के विकास में दूसरा विषय आता है अनुभव आधारित शिक्षा । कर्मेन्द्रियां क्रिया करती हैं और ज्ञानेन्द्रियां अनुभव करती हैं । आंख, नाक, कान, त्वचा और जीभ इन पांचों ज्ञानेद्रियों के माध्यम से ही हमारा बाह्म जगत से संपर्क बनता हैं । आंख द्वारा वस्तुओं को देखना, नाक द्वारा सूंघना, कान द्वारा ध्वनियों को सुनना, त्वचा द्वारा पदार्थों को स्पर्श करना तथा जीभ द्वारा स्वाद को चखना, इससे ही ज्ञार्नाजन होता है । इन पांचों इन्द्रियों का विकास निरन्तर अभ्यास से ही संभव होगा । ‘ग’ से गमला यह पढ़ाने मात्र से गमले का आकार-प्रकार पता नहीं लगता है । प्रत्यक्ष गमला देखने व दिखाने से आकार-प्रकार की जानकारी मिलती है । ऐसा ही सम्बन्ध सूंघने, सुनने, स्पर्श करने व चखने से है । यह सब शिशु अवस्था में घर-परिवार से प्रारम्भ हो जाता है ।

एक आचार्य से चर्चा हुई । उनकी छोटी बेटी है । उन्होनें बताया, “मैं अपनी बेटी को प्रतिदिन एक घंटा विभिन्न स्थानों पर भ्रमण करवाता हूँ । वह जहाँ-जहाँ जाती है उसे वहाँ की जानकारी मिलती है । कुछ वह पूछती है, कुछ मैं बताता हूँ । ऐसा होने से इसकी सम आयु वाले बालकों से उसे अधिक जानकारी है ।” प्रारंभिक शिक्षा में बालक को जो पढ़ाया जाता है यदि उसे अनुभव भी करवाया जाए तो अधिगम अधिक व स्थाई होगा । उदाहरण स्वरूप पढाया गया ‘गाँव’ । ग्रामीण क्षेत्र के बालकों को गाँव के बारे में प्रायः जानकारी रहती है । परन्तु नगरीय क्षेत्र में इस विषय में अनभिज्ञता रहती है । नगरीय क्षेत्र के बालकों को गाँव भ्रमण पर ले जाएंगे तो अनुभव अच्छा रहेगा । प्राथमिक शिक्षा में क्रिया के साथ-साथ अनुभव की योजना करने पर हम घर व विद्यालय में असंख्य अनुभव दे सकते हैं ।

भाव आधारित शिक्षा : कर्मेन्द्रियों और ज्ञानेन्द्रियों के साथ-साथ बाल अवस्था में मन सक्रिय होता है । मन से मनुष्य सुख दुःख, हर्ष-शोक, मान-अपमान, राग-द्वेष का अनुभव करता है । मन को ही रुचि-अरुचि होती है । मन पानी जैसा होता है, वह जिसमें लगता हैं उसी के साथ हो जाता है । मन इच्छा करता है । मन भावनाओं का अनुभव करता है । मन विचार करता है । मन के भी दो पक्ष है एक विचार पक्ष, दूसरा भावना पक्ष । बाल अवस्था में मन के विचार पक्ष से भी अधिक भावना पक्ष सक्रिय होता है । इस अवस्था में मन प्रेरणा प्राप्त करता है ।

बालक दो प्रकार से प्रेरित होता है । एक व्यक्तित्व से, जिसे वह देखता है – आचार्य, माता, पिता । ये तीनों उसके आदर्श होते हैं । कई बार ध्यान में आता है कि बालक अपने आचार्य Body language की भी कॉपी करता है । उसके जैसा व्यवहार करने का प्रयास करता है । दूसरे प्रत्यक्ष आदर्श होते हैं, टी.वी पर दिखने वाले चरित्र । अच्छे या बुरे चरित्रों का उसके मन पर काफी असर पड़ता है । इसलिए बालक ही विज्ञापनों के अधिक शिकार होते हैं । बालकों की इस अवस्था को समझकर प्राथमिक शिक्षा में भावना आधारित शिक्षा की योजना करनी आवश्यक है ।

भाव आधारित शिक्षा की योजना करते समय दो प्रकार से विचार करना । पहला आचार्य का व्यवहार । कक्षा-कक्ष के अतिरिक्त विद्यालय में अन्य समय भी सतर्क रहने की आवश्यकता होती है । वेश, Body language व वाणी इन तीनों का भी मन पर असर रहता है । दूसरा अभिभावक के सम्बन्ध में – अभिभावक का घर में बोलचाल कैसा है? घर का वातावरण कैसा है? बालक टी.वी. पर क्या देखता है? बालक अभिभावक की उपस्थिति में टी.वी. देखता है क्या? उपरोक्त सब बातों के सम्बन्ध में अभिभावक प्रबोधन की योजना करना आवश्यक है । आचार्य द्वारा कक्षा में बालक के व्यवहार व मानसिक स्थिति में आई अवांछित परिवर्तन की जानकारी यथा समय अभिभावक से सांझा हो ताकि समय से निदान हो सके । इस प्रकार से भाव आधारित शिक्षा की योजना कर सकते हैं ।

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