दिशा बोध – राष्ट्र के सम्मुख क्या-क्या चुनौती है और उसका निराकरण क्या है?


 – मा. रंगाहरि

(झिंझौली में संपन्न विद्या भारती साधारण सभा बैठक, चैत्र युगाब्द 5102 के उद्घाटन अवसर पर विद्या भारती के मार्गदर्शक मा. रंगहरि जी के उद्बोधन का सारांश)

दुनियाँ और भारत में भी सहस्त्रों चुनौतियाँ विद्यमान हैं परन्तु हम विशेष ध्येय के लिए कटिबद्ध कार्यकर्ता हैं । संघ मे हमें एक विशेष क्षेत्र अर्थात् शिक्षा का क्षेत्र दिया है । अतः जो क्षेत्र हमें दिया गया है और संघ के व्यापक दृष्टिकोण में रहकर हमारे अथवा राष्ट्र के सम्मुख क्या-क्या चुनौती है और उसका निराकरण क्या है यही सीमित विचार अपने लिए उपयोगी होगा ।

मोटे तौर पर तीन प्रकार की चुनौतियाँ आ सकती है – एक तो शिक्षा द्वारा नवभारत का निर्माण करने की दिशा में काम करते समय जो चुनौतियाँ आती हैं उनकी पहचान, मूल्यांकन, विश्लेषण करना अपना कर्तव्य बन जाता है । दूसरे भारत में हम भारतीयता के पुरस्कर्ता हैं इस दृष्टि से चुनौतियों का मूल्यांकन शिक्षा क्षेत्र में करते समय भी उस परिप्रेक्ष्य में राष्ट्रीय चुनौतियाँ क्या-क्या हैं, ये भी हमे सोचना पड़ता है । तीसरे सामाजिक चुनौतियाँ ।

राष्ट्रीय चुनौती : मेरा पहला मुद्दा रहेगा ‘राष्ट्रीय चुनौतियाँ’ ।  राष्ट्रीयता के बारे में आज भी सम्पूर्ण भारत में सर्वसम्मति नहीं है ।  हम स्वामी विवेकानन्द, अरविन्द, परमपूजनीय गुरुजी को मानते हैं ।  जिन्होंने हमें सिखाया कि सम्पूर्ण भारत एक राष्ट्र है, सम्पूर्ण भारत की एक संस्कृति है, इस राष्ट्र का अधिष्ठान धर्म है ।  यह हमारा अकाट्य विश्वास है ।  आज तथाकथित छद्म सैक्यूलरवादी और साम्यवादी लोगों का रवैया क्या है? वे प्रचार करते हैं कि भारत एक राष्ट्र नहीं भारत में एक संस्कृति नहीं ।  तमिलनाडु की संस्कृति अलग है केरल की संस्कृति अलग है ।  इसी प्रकार मुसलमानों की, इसाईयों की संस्कृति अलग है ।  उनका शब्द प्रयोग है ‘प्लूरलिस्ट’ । वे हमें दोष देते हैं कि हम एक संस्कृति वाले हैं । उनका कहना है कि भारत में मिली-जुली संस्कृति है, मिश्रित संस्कृति है, कम्पोजिट संस्कृति है ।  अर्थात् भारत एक है कहने वाला साम्प्रदायिक हो गया या कठमुल्ला हो गया और प्लूरलिज्म के प्रवक्ता प्रगतिवादी हो गए । अपने भी कई लोग अनजाने में कम्पोजिट कल्चर की बात कहते हैं । यह एक चुनौती है ।

इस चुनौती का निराकरण कैसे हो? नदी और नहर में क्या फर्क है? नहर आदमी की बनाई हुई है । उसमें शाखाएँ उपशाखाएँ नहीं मिलती हैं । वे हमें नहरी संस्कृति के प्रस्तोता मानते हैं । जब हम कहते हैं कि भारत की संस्कृति एक है तो हमारा दृष्टिकोण नदी का दृष्टिकोण है स्त्रोत से सागर तक गंगाजी का एक ही प्रवाह है । मार्ग में अनेक नदियाँ उसमें मिलती हैं तो भी गंगाजी गंगाजी है । वही कृष्णा नदी के सम्बन्ध में है ।  उसमें तुंग, भद्रा, भीमा नदी मिलती हैं । सब मिलकर कृष्णा बन जाती है । दूसरी बात यह है कि ‘कम्पोजिट कल्चर’ शब्द दुनियाँ में और कहीं पर नहीं है । यह शब्द गलत है । यदि कहना ही हो तो हम इसे ‘डायनमिक कल्चर’ कह सकते हैं । ये एक संस्कृति है जो सबको हजम कर सकती है और अपना व्यक्तित्व कायम रख सकती है । हमें अधिक से अधिक यह प्रचारित करना चाहिए कि भारत की संस्कृति कम्पोजिट नहीं डायनमिक है ।

लोग कहते हैं ‘युनिटी इन डायवर्सिटी’। डायवर्सिटी में भी यूनिटी है वही हम कहते है । विभक्तेषु’। अर्थात दुनियाँ दिख रही है – विभक्त-विभक्त-विभक्त’ ।  परन्तु उसमें अविभक्त क्या है? यह अपनी संस्कृति अविभक्त है । इस प्रकार हम कहते हैं भारतीय संस्कृति एक है, भारत राष्ट्र एक है और उसका अधिष्ठान ‘धर्म’ है ।

वे कहते हैं धर्म को तुरन्त छोड़ देना चाहिए ।  यह दुष्प्रचार भी एक चुनौती है ।  हमें इसके निराकरण हेतु प्रस्तुतिकरण करना चाहिए कि भारत में धर्म का अधिष्ठान स्वाभाविक है । हम कह सकते हैं ‘सत्यमेव जयते’ आपने स्वीकार किया, यह उपनिषद से लिया ।  धर्मचक्र अपनाया वह अपने बौद्ध, जैन आदि सभी धर्मों में ‘धर्मचक्र प्रर्वतनाय’ लिखा है ।  धर्मचक्र अपनाने का अर्थ है कि आपने भी सम्पूर्ण भारत में धर्म का अधिष्ठान स्वीकार किया है । इस प्रकार अपने विद्यालयों द्वारा अपनी वाणी द्वारा अभिभावक सम्मेलनों में इस चुनौती का उत्तर हमें देना चाहिए ।

एक सावधानी : दूसरे लोग आरोप लगाएँगे, उसका उत्तर देना हमारा कर्तव्य है परन्तु मन का सन्तुलन कायम रखते हुए । कहाँ उत्तर देना, किस स्तर पर उत्तर देना, किसकों उत्तर देना ये भी सोचना चाहिए । कई पत्रकार अथवा नेता अनर्गल आरोप लगाते हैं तो उसका उत्तर देने की आवश्यकता नहीं । अपितु उस अरोप के कारण जहाँ पर जो बुद्धि भ्रम पैदा होने की सम्भावना कहाँ पर है? ये नई पीढी के बच्चे-बच्चियाँ, उनके अभिभावक ये अपनी ‘टार्गेट आडियंस’ है ।  वहाँ उन्हे अच्छी तरह उत्तर दिया तो चुनौती का सामना जहाँ हमें करना है वहाँ हमने किया यह माना जाएगा ।

राजनैतिक स्तर पर राजनेता वहाँ उत्तर देंगे ।  उस क्षेत्र में उत्तर देने का दयित्व उनका । अपने पास शिक्षा का क्षेत्र है । उसमें किस प्रकार का उत्तर देना वो अपना दायित्व है ।  इस प्रकार राष्ट्र के बारे में यह चुनौती है, इसको पहिचानना होगा और इसका उत्तर देना होगा ।

सामाजिक चुनौती : भारत में किस समाज का योगदान है? तो हिन्दू समाज का ।  जीवन बीमा निगम का चिन्ह एक चिराग है । उसके नीचे लिखा है ‘योगक्षेमं वहाम्यहम्’ जो भगवत् गीता से लिया । उसी प्रकार हमारी नौसेना का चिन्ह है ‘शन्नो वरुणः’ जो वेद मन्त्र से लिया । ये किस समाज का योगदान है? अभी-अभी क्लिंटन साहब आए ।  राजस्थान में उनका स्वागत सिन्दूर का टीका लगाकर, फूलों से पूजा करके, नमस्कार करके किया गया । उन्होंने भी ‘नमस्कार’ कहा । ये राजधानी ढंग है अर्थात् हिन्दू ढंग है । ये किस समाज का योगदान है ।

जो समाज संगठित है, लक्ष्यबद्ध है, लक्ष्य की और प्रतिबद्धित है, वह राष्ट्र निर्माण में सफल हो जाएगा । परन्तु अपने समाज में आन्तरिक समस्याएँ चुनौतियों का रूप लेकर आती हैं ।  वे क्या हैं?

वी.पी. सिंह के प्रधानमंत्री रहते मंडल आयोग को जो संरक्षण मिला तो उस समय से जातिवाद बहुत-बहुत बढ़ गया है और उसने चुनौती का रूप ले लिया है । आज समाज जाति-जाति में खंडित होकर, विभाजित होकर खड़ा है । समाज की एकता हम चाहते है पर यह जातिवाद उस एकता का कठोर विरोधी है ।

भारत में जातियाँ थी, आज भी हैं परन्तु जातियों का होना एक बात है जातीयता दूसरी बात है ।  सौ-डेढ़ सौ साल पूर्व जातियाँ थीं परन्तु द्वेष, वैर, घृणा आदि बाते नहीं थीं ।  सब लोग अपनी-अपनी जाति के आचरण, अनुष्ठान, प्रथा के अनुसार आचरण करते थे । फिर भी आपस में प्रेम था । इसी प्रकार प्रान्त एक बात है, प्रान्तीयता दूसरी बात ।  प्रान्तीयता अच्छी नहीं, वैसे ही जातीयता अच्छी नहीं ।  राजनैतिक स्तर पर आज जातीयता इतनी बढ़ गई है कि सब लाग जाति के आधार पर वोट देते हैं ।

एक विडम्बना : पत्रकार और विश्लेषक (Analyst) बन्धु चुनाव पूर्व और चुनाव के बाद दो अलग-अलग प्रकार का रवैया अपनाते हैं ।  चुनाव पूर्व वे कहते हैं यहाँ 25% कुर्मी है, यहाँ 30% यादव है, यहाँ 15% मुसलमान हैं ।  मुसलमानों का वोट उसको जाएगा, कुर्मी का वोट उसको जाएगा, यादव का वोट इसको जाएगा इसलिए यहाँ इस उम्मीदवार के जीतने की सम्भावना है । अर्थात जाति के आधार पर विश्लेषण करते है ।  चुनाव बाद सब कहते हैं । ये पापूलर मैंडेट था । चुनाव पूर्व जाति के स्वर में बोलते हैं । और चुनाव बाद लोकतन्त्र के स्वर में बोलते हैं यह विडम्बना है ।

हम एकात्म समाज चाहते हैं परन्तु बार-बार चुनाव आते हैं और वातावरण विषाक्त हो जाता है । इस जातिवाद के खिलाफ शिक्षा के क्षेत्र में क्या करना? हमें नई पीढ़ी के रूप में छात्र-छात्राएँ मिली हैं । इनका हृदय यदि हमने शुद्ध, निर्मल, निश्छल बनाया, हम सब एक ही भारत माँ की सन्तान हैं यह भाव जगाया तो इस चुनौती का उत्तर हमने यहाँ दिया यह माना जाएगा । गीत, कथाएँ, बोध कथाएँ, महापुरुषों के अमृत वचन हम उनको इस ‘फार्मेटिव एज’ (Formative Age)  में दे सकते हैं । नकारात्मक बातें नहीं करनी । संघ की पद्धति भी यही है । हम जाति की बात तक नहीं करते । बार-बार सम्पर्क करते, घर पर जाते-जाते जाति का पता चलता है । तब तक वह अपना भाई बन चुका होता है । इसलिए कुछ बिगड़ता नहीं । हम भी अपने विद्यालय में इसी प्रकार करें । जब चुनौती होती है तो मन मे थोड़ी Sence of Urgency होती है अतः अधिक बल से, अधिक जोर से ये गीत-कथाएं कहनी चाहिए ।

एक उदाहरण : अब्दुल कलाम जी ने अपनी आत्मकथा Wings of Fire में लिखा है कि वो और रामेश्वरम् के मन्दिर के मुख्य पुजारी का पुत्र एक ही कक्षा में पढ़ते थे और एक ही बैंच पर बैठते थे । एक दिन अध्यापक आए उन्होंने कहा, ‘अब्दुल उठो वहाँ से पीछे जाकर बैठो । ये ब्राह्मण है शास्त्री है, रामेश्वरम् के मन्दिर के पुजारी का बेटा है । तुम उसके साथ क्यों बैठे हो? पीछे बैठो । वे लिखते हैं ब्राह्मण और मुसलमान में फर्क है यह सबक उन्हे जीवन में पहली बार उनके अध्यापक ने उस दिन सिखाया । कितना दु:खद है यह । एक दृष्टि से ये बेईमानी है, दायित्वविहीनता है यह ।

हमारे अध्यापक ऐसा न करे जिम्मेवारी निभाएँ, इसके लिए आचार्यों का प्रशिक्षण होना आवश्यक है ।

इस जातीयता का उत्तर देना हमारे विद्यालयों के लिए बहुत आसान है । जिस प्रकार संघ स्थान पर हम इस चुनौती का सामना करते हैं उसी प्रकार ये जो 16,000 शिक्षण संस्थाएँ है उनमें 40,000 कक्षाएँ होगी । हर कक्षा के स्तर पर इस चुनौती का उत्तर देने के लिए हमारे पास है उतना क्षेत्र अन्य किसी के पास नहीं, यह हमारे लिए एक अतिरिक्त बिन्दु है ।

हिन्दू समाज अलग-अलग है यह सिद्ध करके, हिन्दू समाज की संख्या घटाने के लिए इसको कमजोर करने के लिए भिन्न-भिन्न् षडयन्त्र चल रहे हैं ।  इसमें से सबसे बड़ा षडयन्त्र ईसाइयों का है । अभी यहाँ पोप महाशय आए । उन्होंने कहा कि पहली सहस्त्राब्दी में हमने क्रास का प्लाटिंग यूरोप में किया, दूसरी सहस्त्राब्दी में अमरीका और अफ्रीका में अब तीसरी सहस्त्राब्दी में हम एशिया में Plantation of Cross चाहते हैं ।  इसका अर्थ क्या है? गल्फ कंट्रीज मुसलमाल देश हैं वहाँ तो जा नहीं सकते, उन्होंने सीधे मना कर किया है ।  चीन में भी प्रतिबन्ध है और सीलोन में भी । अब बचा भारत । एशिया बोलते समय उनका सीधा अर्थ है भारत । वे भारत में  Cross Plant करना चाहते हैं । पोप ने भारत में अन्याय धर्म गुरुओं के सम्मुख कहा विवेकानन्द और रामकृष्ण परमहंस जैसे Wise Men (सन्त नहीं कहा) के कारण भारत में सर्व पंथ समभाव है इसलिए हमें Dialogue चाहिए, संवाद चाहिए । परन्तु पादरियों के सम्मुख उन्होंने कहा ये संवाद किसके लिए-केवल मतान्तरण के लिए ।‘मतान्तरण के लिए संवाद, संवाद द्वारा मतान्तरण’ ये उन्होंने खुल्लमखुल्ला कहा है ।  ये भी एक बहुत बड़ी चुनौती है ।

मन्तातरण के खिलाफ मानसिकता कैसे हो ये हमे सोचना होगा ।  मैं भी इसाई स्कूल का लड़का रहा हूँ । अरूण शोरी इसाई मिशनरी स्कूल का छात्र है ।  वैसे तो पुजनीय गुरूजी भी इसाई मिशनरी स्कूल के छात्र रहे । परन्तु हम सब इसाई क्यो नहीं बने क्योंकि हमें घरों के संस्कारों में धर्म पर अटूट श्रद्धा के संस्कार मिले हैं ।

अगर मतान्तरण को रोकना है तो हमारा काम है कि जितने भी लाखों की संख्या में छात्र-छात्राएँ हमारे सम्मुख आते हैं उनके मनों में धर्म के बारे में अटूट श्रद्धा, अडिग श्रद्धा उत्पन्न करना ।  यदि ये हमने किया तो भविष्य में वे यदि अमेरिका भी गए, वे बिगडे़गे नहीं ।  प्रेम के कारण वहाँ उन्होंने शादी भी की तो उसको हिन्दू बनाएँगे स्वयं इसाई नहीं बनेंगे ।

गरीबी के कारण इसाई बनते हैं यह गलत है । गरीब मुसलमान इसाई नहीं बनता गरीब हिन्दू ही इसाई क्यों बनता है? क्योंकि उस हिन्दू के मन में धर्म पर श्रद्ध नहीं । ये धर्म पर श्रद्धा का भाव यदि हम अपने विद्यालयों में उत्पन्न कर सकते हैं तो केवल आज नहीं 25 साल में भी विद्या भारती के स्कूल का एक भी छात्र कभी इसाई नहीं बनेगा ।

कुछ छद्मवादी तत्व हैं जो सरस्वती वन्दना, वन्देमातरम् के पक्ष में नहीं, जो क्रिश्चनाईजेशन के पक्ष में तो नहीं पर डीहिन्दूआइजेशन के पक्ष में है । जीवन में अहिन्दूपन आ जाए इस प्रकार का व्यवहार करते है । इस चुनौती के बारे में भी हमें सोचना चाहिए ।

शिक्षा क्षेत्र की चुनौतियाँ

माध्यम : अंग्रेजी माध्यम या मातृभाषा माध्यम ये प्रश्न आता है । भाषा केवल आदमी बोलता है सो बात नहीं, भाषा समाज भी बोलता है इसलिए भाषा में व्यक्ति ही नहीं समाज के विचार भी व्यक्त होते हैं । जब जाने अनजाने हम दूसरी भाषा स्वीकार करते हैं । तो हमारा विचार जगत भी बदल जाता है । घर में बैठे हम बात कर रहे हैं । एक आदमी, जिसके बारे में हम बात कर रहें है, अकस्मात आ जाए तो हम कहते हैं उसकी सौ साल की आयु होगी । सम्पूर्ण भारत में सभी भाषाओं में से एक ही मुहावरा है । ऐसा ही अवसर आने पर अंग्रेजी में कहेंगे the Devil there he is  विचार जगत बदल गया । हमारे यहाँ सांस्कृतिक आधार पर विचार है, अंग्रेजी में नहीं ।

केवल दुनियाँ भागती है इसलिए हम भी भागेंगे ये ध्येयवादी कार्यकर्ता की सोच नहीं । ध्येयवादी कार्यकर्ता प्रवाह के साथ बहनेवाला नहीं, तो प्रवाह की ठीक दिशा में मोड़नेवाला होता है ।

अगर हम मजबूरी के कारण अंग्रेजी के कारण अंग्रेजी माध्यम अपनाते भी है तो उसके भी द्वारा हम हिन्दुत्व कैसे आगे ले जा सकते हैं यह सोचना होगा । पाठ्य पुस्तकों में स्वामी विवेकानन्द का शिकागो भाषण, सरोजनी नायडू की Our India कविता या रक्षाबन्धन कविता, तोरुदत्त की प्रहलाद कविता या जवाहरलाल नेहरू के आखरी के दस्तावेज से गंगाजी का महत्त्व जैसा भारतीयता उत्पन्न करने वाला साहित्य एकत्र करके सम्मिलित किया तो बेशक हम अंग्रेजी माध्यम का दोष भी उठाएँगे । परन्तु तब वे छद्मवादी तत्व कहेंगे  They have saffronised अंग्रेजी ।  अर्थात् ये भाषा की चुनौती केवल भाषा की नहीं भावों की है । अंग्रेजी समाचार पत्र-पत्रिकाओं में से अपने विचारों के अशों को हाई लाइट करना चाहिए ।  मैग्नीफाई करके विद्यालय के नोटिस बोर्ड पर लिखना चाहिए ।

एक उदाहरण : ‘हिन्दू’ जो आखों का अन्धा नाम नयनसुख है, सविधान पारित होते समय क्या हुआ उसके सम्बन्ध में एक समाचार है :  Some of the members shouted Vande Mataram and Bharat Mata ki jai, When the constitution was passed and when the President was authenticating the Constitution.

इसको Project किया तो भाषा अंग्रेजी भले ही है पर भाव अपने हैं ।  समस्या के सामने घुटने टेक देना, झुक जाना, उसका गुलाम बन जाना अपने को शोभा नहीं देता ।

एक अन्य उदाहरण : जब डॉ राजेन्द्र प्रसाद ने यह वाक्य कहा तो सबने उनकी सराहना की ।  Let us launch a new enterprize of running of Independent Republic with confidence, with truth and non-violence. And above all with heart with in and God above.

ऐसे विचारों से बच्चों का दृष्टिकोण भारतीय बनेगा ।

सामूहिक चिन्तन : जब इस प्रकार की चुनौती आती है तो प्रत्येक विद्यालय के सब आचार्यगण बैठकर सामूहिक चिन्तन द्वारा उसका समाधान खोजेंगे तो अन्यान्य अनेक बहुत अच्छे-अच्छे कार्यक्रम हम कर सकते हैं ।  जब हमारे छात्र-छात्राएँ चुनौती का सामना करेंगे तो समझो समाज सामना कर रहा है ।

चुनौतियाँ आएँगी हम उनका सामना करेंगे कभी झुकेंगे नहीं, कभी रुकेंगे नहीं ।

 

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